सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

स्वागत है तुम्हारा हमेशा ही

 
Posted by Picasa
सादा सा पन्ना
हाथों में कलम या कि तुलकिा
आैर कुछ इन्द्रध्नुषी रंग
एक अतीत
सुनहरा खटटा मीठा
सारी बातें
अब यादें.......

क्यु याद है ना!
साथ् साथ् चले थे
उन पहचानी सी
सड़कों पर
जिसे आंख खोलते के साथ
भ्रर लिया था हमने,
अपनी आंखों में
जैसे, हवाआे को
सांसों मे,
साथ साथ हंसे थे,
झगड़े थे, रूठे थे
मने थे, खेले थे
ये सब बातें
अपने, हमारे बारे में,
जिन्हें हमने हां,
सिफर्र् हमने ही तो
देखा था, महसूसा था
आैर इस क्रम में
वक्त कैसे
आगे निकल आया
आैर हम
इस मोड़ पर


वक्त के साथ
बहुत कुछ पीछे....
बहुत पीछे छुट जाता है
"अपने होने की "
चाहत और शर्त पर!
फिर भी
बहुत स्वभाविक है न-
कि पुरानी तस्वीरे
पार्क में खेलते बच्चे
बहुत कुछ याद दिला जाते हैं
चुपके से........
जैसे, अपनी गुडि़या की शादी,
टीचर.टीचर का खेल
अमरूदों की चोरी।

आैर युं ही
स्मृतियों पर पड़ी गर्द
थोड़ी धुली
पुरानी कड़ी फिर जुड़ी
भुली नहीं ना!
"एक मुक आमंत्रण"
छिपा है दूर कहीं......
हमेशा ही!

अब उकेर भी दो
कुछ रेखाएं आड़ी, तिरछी
आैर..........
फैला दो
इन्द्रधनुषी रंगों को
उस सादे से पन्ने पर
स्वागत है तुम्हारा हमेशा ही।

11 टिप्‍पणियां:

  1. एहसासों और भावनाओं से भारी हुई रचना है ये. निसंदेह रचना अपना असर कहीं गहरे तक रख छोड़ती है.

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  2. बहुत ही भावनात्मकता के साथ.... सुंदर रचना...

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  3. हर शब्‍द एक अहसास लिये हुये, सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

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  4. स्वागत है तुम्हारा हमेशा ही। सुन्‍दर अहसास

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  5. स्वागत है बहुत सुन्दर भावमय रचना शुभकामनायें

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  6. आपका स्वागत है, प्रवाहमय कविता. धन्यवाद.

    आरंभ

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  7. स्म्रतियों की जिस तरह आप ने भावना के मीठे समूह में पिरोती हुयी एक प्रवाह मय कविता लिखी उसके लिए आप का बहुत बहुत धन्यबाद
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  8. अच्‍छी लगी आपकी रचना .. इस नए चिट्ठे के साथ हिन्‍दी चिट्ठा जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  9. स्‍वागत सिर्फ नहीं तुम्‍हारा

    हर आगत का करना

    धर्म हो हमारा

    बनता है अपनापा।

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