मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

बदल रही है फिजा

बंगलूरू में रहने वाली बयालीस साल की अमूधा की सकि्यता को देखकर कहीं से एेसा नहीं लगता कि वो पिछले नौ साल से एचआईवी पाजीटिव हैं। दस साल पहले पति के एचवाईवी पाजीटिव होने का पता चलने पर इन्होंने अपना टेस्ट कराया तो अमूधा को खुद के एचआईवी पाजीटिव होने का पता चला। पति तो साल भर   बाद चल बसे लेकिन अमूधा आज अपने तीन बच्चों समेत सभी के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। बेशक यह इतना आसान नहीं था,शुरूआती दो साल बहुत कठिन रहे, समाज में खुलकर अपने एचआईवी पाजीटिव होने का िजक्र करना बहुत मुशिकल था, पहली मुिशकल तो घर से ही शुरू हो गई जब उनकी गलती नहीं होने पर भी ससुराल वालों ने इन्हें बहिष्कृत कर दिया। फिर अगरबत्ती बनाकर परिवार का जैसे तैसे पालन पोषण शुरू किया। सरकारी पुनर्र्वास सूची में अमूधा के परिवार की संख्या 74 थी, ये सब देखकर वो अंदर से टूटने लगीं फिर ख्याल आया, मैं ही नहीं मुझसे आगे 73 परिवार आैर भी हैं, जिदंगी उनके लिए भी तो मुिशकल ही होगी। हांलाकि अमूधा के अपने माता पिता ने उनका काफी साथ दिया। लेकिन पति की मौत के बाद वो आज भी अपने ससुराल वालों से अपनी संपत्ति का केस लड़ रही हैं। अमूधा कहती हैं शुक्र है मेरे तीनों बच्चे एचआईवी निगेटिव िनकले। आज मैं अरूणोदया नेटवक आफ पाजीटिव पीपल की जिला अध्यक्ष हंू आैर कनार्टक पाजीटिव वुमैन की सचिव। साथ ही एसपीएईडी के मिलन प्रोजेक्ट में काम करती हंू आैर अपने ही जैसे लोंगों की काउंसििलंग करती हंू। उन्हें जीवन के आगे के संघष के लिए प्रेरित करती हंू। इन दस सालों के बारे में बात करते हुए वो कहती हैं । अब माहौल बदल गया है। हम खुलकर अपने बारे में अपने हक के बारे में बात करते हैं,मेरी झिझक मेरे बच्चों ने खत्म की जब 2004 में एक पत्रकार ने मुझपर स्टोरी करने के िलए मुझसे संपकर् किया। मैं तैयार नहीं थी, लेकिन मेरे बच्चों ने मुझसे कहा, किसी को तो आगे आना होगा, तुम्हे अपनी बात रखनी चाहिए] तभी आैर लोग भी सामने आएंगे, मेनस्ट्रीम में बगैर किसी झिझक के शामिल होंगे। अमूधा कहती हैं एचआईवी पाजीटिव के जीवित रहने की संभावना दस,बीस, तीस साल कुछ भी हो सकती है। अमूधा खुद आज किसी भी दवा का सेवन नहीं करतीं,बस नियिमत जांच कराती हैं आैर अपना हर तरह से ख्याल रखती हैं।
कुछ इसी से मिलती जुलती कहानी है सरोजा पूत्रम की, पिछले दस साल से एचआईवी पाजीटिव सरोजा आज किसी भी दवा का सेवन नहीं करतीं। सरोजा को भी अपने पति से ही एचआईवी संक्रमण हुआ था आैर ससुराल वालों ने उन्हें ही तिरष्कृत किया था। आैर तो आैर उन्हें अपना दूसरा बच्चा भी एचआईवी पाजीटिव होने के कारण खोना पड़ा। अपने माता पिता का साथ नहीं मिला होता तो शायद जीना इनके लिए मुमकिन नहीं हो पाता। हांलाकि सरोजा के भाई बहनों की शादी नहीं होने के कारण उनके पिता ने शुरू में अपनी बेटी के एचआईवी पाजीटिव होने की बात समाज में नहीं खोली। बहरहाल, आज सरोजा के भाई बहन उनका सबसे बड़ा संबल हैं आैर वह पूरी सक्रियता के साथ एड्स पीड़ितों के लिए काम कर रही हैं आैर कर्नाटक पीपल लीविंग विद एचआईवी/एड्स की अध्यक्ष हैं। इस संगठन में 42 हजार महिलाआे का नामाकंन है।

7 टिप्‍पणियां:

  1. सरोजा पूत्रम जी के जज़्बे को सलाम..... बहुत अच्छी और मार्मिक पोस्ट.....

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  2. बहुत बढ़िया पोस्ट .....ऐसे जज्बा रखने वालो को हमारा सलाम ........शुक्रिया आपका भी .

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  3. आपने इन लोगों की कहानी को सबके सामने लाकर बहुत ही सराहनीय कार्य किया है!अक्सर हम सब ये देख कर भी अनदेखा कर देते है,जो उचित नहीं है!जैसा बन पड़े वैसा सहयोग यदि सब करेंगे तो इनका जीवन कुछ न कुछ तो बदलेगा ही....!बहुत अच्छी पोस्ट...सलाम!!!

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  4. मनोरमा जी बहुत संवेदन शील मुद्दा उठाया है आप ने आवश्यकता है सामाजिक जागरूकता और यैसे लोगो के प्रति नजरिया बदलने की
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  5. समाज में जारूकता धीरे धीरे आ रही है। ऐसे मसलों पर चर्चा एक बहुत सकारात्‍मक असर डालने वाला कदम है।

    यदि हिंदी टाइपिंग में अब भी दिक्‍कत हो तो आपकी मदद करने में मुझे खुशी होगी।

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