बुधवार, 15 अप्रैल 2015

वो लिखते भी हैं और लड़ते भी


(दैनिक भास्कर रस-रंग में प्रकाशित ,
यहाँ असंपादित )
साहित्य किसी भी समाज और संस्कृति का आईना होता है, हमारी असली कहानियां इनमें ही होती है। मुख्यधारा का समाज और राजनीति हमेशा  बर्चस्ववादी होती है और साहित्य हाशिए के समाज, हाशिए के लोगों की आवाज होता है। जो लिखा गया है या लिखा जा रहा है भले उसे मिटाया जा सकता है, नष्ट किया जा सकता है लेकिन उसे अनलिखा कभी नहीं किया जा सकता, कहीं न कहीं वो किसी रूप में मौजूद रहेगा ही। इसलिए व्यवस्था को अगर समाज का सच लिखनेवालों से खौफ रहता है तो वही लेखक उनलोगों का नायक होता है जिनकी तकलीफों, पीड़ाओं और सरोकारों को वो शब्द देता है। एक लेखक, साहित्यकार की हैसियत अपने समय के समाज की सामूहिक चेतना के तौर पर होती है और ये तभी होता है जब उसकी जड़ें अपने लोकजीवन और अपनी मिट्टी में बहुत गहरी हो।
लेकिन दूसरी ओर किसी समाज की परिपक्वता, सहिष्णुता और बौद्धिकता का एक पैमाना ये भी होता है कि वो अपने लेखकों और साहित्यकारों का कितना सम्मान करता है। कह सकते हैं, एक लेखक और समाज दोनों एक-दूसरे के प्रतिबिम्ब होते  हैं। मसलन, पिछले कुछ सालों में हमारे परिवेश में असहिष्णुता  किस कदर बढ़ी है, इसका अंदाजा लेखकों, साहित्यकारों पर लगातार हो रहे हमलों से भी लगाया जा सकता है। अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार हमले हो रहे हैं खासतौर पर दक्षिण भारत या क्षेत्रीय भाषाओं  के लेखको पर। हाल ही में तमिलनाडू में पेरूमल मुरूगन पर उनकी किताब  ‘वन पार्ट वुमैन’ के कारण घातक हमले हुए, उनकी पत्नी पर भी हमला हुआ और दोनों को अस्पताल तक जाना पड़ा। ठीक इसके एक हफ्ते बाद फिर तमिलनाडू में ही एक और लेखक पुलियार मुरूगेषन अपने कहानी संग्रह ‘ आई हेव अनदर नेम बालाचंद्रन’ के कारण निशाना बनें। सूची यहीं खत्म नहीं होती,  जनवरी में दलित लेखक दुरई गुना और उनके पिता पर हमले हुए उनकी किताब ‘उरार वराईन्थिा ओवियम’ के विरोध में। 2002 में एच जी रसूल को अपने कविता संग्रह मायीलांजी के कारण माफी मांगने को बाध्य होना पड़ा, के सेंन्थिल मल्लार की किताब की  को 2013 में तमिलनाडू सरकार ने  प्रतिबंधित कर दिया । और 2012 में लेखक मा मू कन्नन के घर को जला दिया गया।
कर्नाटक में पिछले साल यू आर अनंतमूर्ति को उनके मोदी विरोधी बयान पाकिस्तान चले जाने की नसीहत दी गयी और खतरे के कारण उन्हें अपने ही घर में पुलिस की सुरक्षा में रहना पड़ा जबकि अपने जीवनकाल में कर्नाटक और बंगलूरू के सार्वजनिक मंचों पर  वो सबसे मुखर आवाज रहे थे, बंगलूरू के लोगों ने भी उन्हें उतना ही सम्मान भी दिया था।  पिछले ही साल कन्नड़ लेखक कालबुर्गी को भी अपनी एक टिप्पणी के कारण विरोध का सामना करना पड़ा था। और 2014 अप्रैल में मैंगलोर के सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक सौहार्द पर लिखने वाले सुरेश  भाट बकराबैल बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के हमले के शिकार हुए थे। ताजातरीन मामला   81 वर्षीय  कन्नड़ लेखक इतिहासकार एम चिदानंद मुर्ति का है जिन्हें बंगलूरू में मुख्यमंत्री सिद्धारम्मैया की मौजूदगी में एक समारोह से सरकारी फैसले के विरोध के कारण हाथापायी करके  निकाल दिया गया। और केरल की अरूंधती राॅय तो हमेशा  पूरे देश में ऐसे हमलों के केन्द्र में रहती आयी हैं, मराठी विचारक और लेखक गोविंद पानसरे की हत्या को भी अभी ज्यादा समय नहीं बीता है।
अब सवाल ये है कि आखिर क्यों अभिव्यक्ति की आजादी इतने खतरे में है खासतौर पर क्षेत्रीय भाषा का साहित्य और उसके लेखक। उसका एक जवाब ये है कि क्षेत्रीय भाषाओं खासकर दक्षिण के साहित्यकारों का अपने समाज पर गहरा असर रहा है, इसलिए जब वो किसी की आवाज बनकर लिखते हैं तो दूसरा समूह उनके विरोध में उतर आता है। उपर जितने वाकयों का जिक्र है, उन सबमें एक ओर अगर इनका विरोध हुआ है तो दूसरी ओर बड़ी संख्या में लोग इनके साथ भी खड़े हुए हैं। पेरूमल मुरूगन की ही बात करें, उन्होंने विरोध के बाद ये घोषणा  की कि, लेखक मुरूगन की मौत हो चुकी है, जो जीवित है वो केवल शिक्षक पेरूगल मुरूगन है, इस पर हजारों लोगों उनसे उसी किताब का दूसरा भाग लिखने का भी अनुरोध किया।
लेकिन  हिंदी में ऐसा बिल्कुल नहीं है, हाल फिलहाल में आपको ऐसी कोई किताब नहीं याद आएगी जिसका इस कदर विरोध हुआ हो या ऐसा कोई लेखक, साहित्याकार का नाम याद नहीं आएगा जिसकी लोगों में इतनी स्वीकार्यता हो कि एक साथ बड़े स्तर पर लोग विरोध और समर्थन में उठ खड़े हों, ऐसा क्यों है? हिंदी के सम्मानित और बड़े कवि मंगलेश  डबराल कहते हैं, हमारे क्षेत्रीय भाषा  के लेखक अपने परिवेश  और लोगों से गहरे जुड़े हुए हैं, उनमें एक किस्म का ‘सेंस आफॅ बिलाॅगिंगनेस’ है। जबकि हिंदी लेखकों का दुर्भाग्य है कि उनका कोई समाज नहीं है, ये नागर भाषा  है और नगरीकरण बहुत हालिया प्रक्रिया है । हिंदी बहुत बड़ी भाषा  तो है लेकिन ये किसी की मातृभाषा  नहीं है,  हम सब की अपनी कोई अलग मातृभाषा  है जैसे मेरी ही गढ़वाली है, ये बहुत बड़ी बिडंबना है। मराठी, बंगला, मलयालम, कन्नड़, तमिल के लेखक अपनी जड़ों से अपनी पूरी परंपरा और विरासत के साथ जुड़े हैं इसलिए उनका लोगों में सम्मान है। इन सभी के लिए भाषा  ही उनका घर है जबकि भाषा  में घर होने की कल्पना हिंदी में नहीं है।
लेखक, कवि और वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन  भी मानते हैं कि वाकई हिंदी में विद्रोही लेखन नहीं है, हाल में ऐसा कुछ नहीं लिखा गया जो समाज को झकझोर दें और जिसका विरोध हो, वो मानते हैं कि हिंदी के लेखकों का अपने समाज से कटाव लगातार बढ़ा है लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि हिंदी लेखन कमजोर है। वो कहते हैं, हिंदी में बहुत अच्छी कविताएं लिखी जा रही हैं जिनमें मौजूदा समय बहुत संवेदनशीलता के साथ दर्ज हो रहा है, लेकिन इन्हें कोई पढ़ता नहीं है। हिंदी का लेखक अपने समाज को समझता तो है लेकिन दूर से किसी सैटेलाईट की तरह। लेकिन कुछ दोष  हिंदी के पाठकों का भी है, हिंदी का मध्यवर्ग बहुत सयाना हो गया है उसे कैरियर के आगे सामाजिक आंदोलनों से ज्यादा सरोकार नहीं है, मनोरंजन के लिए किताबें नहीं फिल्में हैं उनके घरों में हिंदी की मौजूदगी बगैर साहित्यक संस्कार के है और स्कूलों में सिर्फ अंग्रेजी है। जाहिर है ऐसे में अपनी भाषा का साहित्य उनके चेतन अवचेतन दोनों में एक सिरे से अनुपस्थित रहेगा ही।      

गुरुवार, 12 जून 2014

कुदुंबश्री, विकास का केरल मॉडल !

तरक्की और विकास की पहली शर्त है लोगों का जागरूक और शिक्षित होना, केरल की साक्षरता दर भारत के सभी राज्यों में सबसे अधिक रही है और यही वजह है कि यह भारत के सबसे विकसित राज्यों में से रहा है। देश का सबसे शहरीकृत राज्य होने के साथ साथ केरल ही ऐसा राज्य है जहां शहर और ग्रामीण जीवनशैली में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है और राज्य के सभी जिलों के हर पंचायत में कम से कम एक शैक्षणिक संस्थान और स्वास्थ्य केन्द्र जरूर होता है। लेकिन बेरोजगारी केरल की सबसे बड़ी समस्या रही है 17वीं शताब्दी से ही यहां से  रोजगार की तलाश में प्रवास शुरू हो चुका था। लेकिन पिछले पंद्रह सालों में केरल में गरीबी हटाने और महिलाओं को सशक्त बनाने का काम जमीनी स्तर पर हुआ है जिसका असर अब दिखने लगा है।  कुदुम्बश्री के मार्फत केरल में न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं का अव्वल तरीके से क्रियान्वयन हुआ है बल्कि पंचायती राज की अवधारणा की जड़ें भी मजबूत हुई है। धान की खेती पर निर्भर यहां के गरीब और भूमिहीन किसानों को वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराने के लिए अस्सी के दशक में उन्हें स्व सहायता समूह के बारे में बताया गया और माईक्रोफाईनांस योजनाओं को लागू करने की शुरूआत की गई। और अगले कुछ सालों में  गरीबी को समझने के साथ गरीबी उन्मूलन के लिए भी एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित किया गया। 1994 में इन्हीं अनुभवों के आधार पर पहली बार  केरल में सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए महिला आधारित सामुदायिक संरचना विकसित की गयी। 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण की शुरूआत हुई व पंचायत और नगरनिगम जैसे स्थानीय स्वशासन निकाय मजबूत हुए। इसी दौरान 1998 में गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण के लिए सामुदायिक नेटवर्क के तौर पर कुदुंबश्री की शुरूआत हुई, जिसका लक्ष्य स्थानीय स्वशासी निकायों के साथ मिलकर गरीबी उल्मूलन और महिला सशक्तिकरण के लिए काम करना था। 1998 से अब तक कुदुंबश्री की लगातार कई उपलब्धियां रही हैं संयुक्त राष्ट्रसंघ समेत कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अवार्ड इसे हासिल हुआ है। साथ ही इसे एशिया  का सबसे बडा महिला आंदोलन भी कहा जाता है।
दरअसल, कुदुंबश्री की खासियत रही है गरीबी हटाने की प्रक्रिया पर काम करना ना कि परियोजना पर। इसलिए 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, हर जिले की सभी पंचायतों के सभी वार्ड में इसकी पहुंच है। इसके तहत 1.87 लाख पड़ोस समूह हैं, सत्तरह हजार क्षेत्र विकास समाज या एडीसी हैं और 1,058 समुदाय विकास समाज या सीडीएस ग्रामीण व शहरी हैं। कुदुंबश्री के मार्फत पड़ोस समूह के सदस्यों में अब तक 2,818 करोड़ की राशि बतौर ऋण बांटी जा चुकी है। इसी का नतीजा है कि केरल में जमीन कम होने के बावजूद 47 हजार महिला किसान हैं जो लीज पर खेत लेकर धान की खेती करती हैं। पहले दस रूपए भी जिनके पास नहीं हुआ करते थे उनके अब खुद के पक्के मकान हैं। कुल सवा तीन लाख किसान इसके दायरे में हैं और लीज पर 65 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती की जा रही है, इसके कारण पलायन भी रूका है। कुदुंबश्री माॅडल की एक सफलता ये भी है कि सदस्य ऋृृण वापसी के मामले में नियमित और अनुशासित हैं इसलिए निरंतरता बनी रही है अतंतः जिसका फायदा सदस्यों को ही हो रहा है।
कुदुंबश्री के द्वारा केवल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ही काम नहीं किया गया है बल्कि युवाश्री जैसे विशेष  रोजगार कार्यक्रम के जरिए साढ़े तीन सौ से ज्यादा सामुहिक और सवा तीन सौ के करीब निजी उद्यमों को शुरू किया गया। बेसहारा लोगों के लिए आश्रय कार्यक्रम को 745 स्थानीय निकायों में लागू किया गया और करीब साठ हजार बेघर बेसहारा लोगों का पुर्नवास किया गया। इसके अलावा भावनाश्री गृृह लोन योजना के तहत पैंतालीस हजार से ज्यादा गरीब लोगों को घर बनाने के लिए ऋृृण मुहैया कराया गया।  कुदुंबश्री के मार्फत केरल में केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं के बेहतरीन क्रियान्वयन के कारण दो साल पहले ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार मिशन ने इस माॅडल को पूरे देश में लागू किए जाने की सिफारिश की थी। फिलहाल पांच राज्यों में कुदुंबश्री माॅडल लागू किए जाने पर सहमति भी बनी है।
 





कुदुंबश्री की कार्यकारी निदेशक के बी वल्सला कुमारी से बातचीत
कुदुंबश्री के मार्फत केरल में काफी पहले से केरल में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। हाल के दिनों में और कौन कौन सी शुरूआत की गयी है?
- पिछले पंद्रह सालों में कुदुंबश्री के मार्फत केरल में बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार देकर और आत्मनिर्भर बनने के मौके मुहैया कराकर उनका सशक्तिकरण किया गया है। करीब 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, जो चालीस लाख परिवारों को सशक्त बना रही हैं और साबुन निर्माण व खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक करीब पचास हजार लघु उद्यमों के मार्फत आर्थिक समृृद्धि की कहानी लिख रही हैं।कुदुंबश्री के खाद्य उद्योग को इसी साल दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला में स्वर्णपदक हासिल हुआ है। हाल ही में कुदुंबश्री की ओर से पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित टैक्सी सेवा शुरू की गई है,इससे पहले पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित कुदुंबश्री कैफे भी बहुत सफल रहा है, इसलिए कुदुंबश्री कैफे का और विस्तार किये जाने की घोषणा हुई है। इसके अलावा हमने केरल वेटेरनरी एंड एनीमल साईंस यूनीवर्सिटी के साथ भी समझौता किया है जिसके तहत किसी कारण से पेशेवर उच्च शिक्षा नहीं हासिल का पायी महिलाएं पशुपालन या इससे संबंधित विषयों में डिप्लोमा हासिल कर खुद अपना व्यवसाय कर सकें। दरअसल, कुदुंबश्री की दस्तक खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक है और हर क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तिकरण में यह बेहद कारगर साबित हो रही है। पिछले डेढ़ साल से मै इससे जुड़ी हंू और मेरे लिए ये गर्व की बात है।

इस माॅडल की संरचना किस तरह की है?
-बिल्कुल जमीनी स्तर से हमारी पकड़ है, केरल की 62 फीसद से ज्यादा आबादी  इसके दायरे में हैं। सबसे पहले समुदाय के स्तर पर ग्रामीण या शहरी इलाकों में 10 से 20 महिलाएं जुड़कर आपस में समुदाय बनाती हैं, जिसे पड़ोस समूह कहा जाता है, इस समूह के द्वारा स्वबचत की शुरूआत होती है,ं फिर बैंकों से इन्हें जोड़ा जाता है और बैंक इन्हें इनके काम के लिए लोन देना शुरू करता है। एक पंचायत या नगरपालिका में कई पड़ोस समूह होते हैं जिसे एरिया डेवलपमेंट सोसाईटी या एडीएस कहते हैं, एडीएस के उपर सीडीएस होता है। सीडीएस दातव्य न्यास के तहत रजिस्टर्ड संस्था होती है और सामाजिक न्याय व पंचायत मंत्रायल के अधीन हैं।
गरीबी उन्मूलन के लिए केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं चलायी जा रही हैं, कुदुंबश्री उसी का विस्तार है?
-पूरी तरह से ऐसा नहीं है, केन्द्र और राज्य सरकार दोनों की ओर से इसे फंड मिलता है पर ये एक अलग माॅडल है, केन्द्र सरकार की नारेगा और मनरेगा जैसी योजना लागू करने में केरल पूरे देश में अव्वल रहा हैं तो उसकी वजह कुदुंबश्री है, हम पंचायत स्तर पर लोगों को केन्द्र और राज्य सरकार की सभी योजनाओं की जानकारी देते हैं और उसे कैसे लागू कराना है इसमें मदद करते हैं। हालांकि आन्ध्र प्रदेश का गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम भी बहुत सफल हो रहा है पर वो दस हजार करोड़ की ऋृण राशि के साथ एक वित्तीय माॅडल है और कुदुंबश्री 7 सौ करोड़ ऋृण राशि के साथ एक सामाजिक माॅडल। इसके तहत केवल महिला सशक्तिकरण ही नहीं बच्चों, बुढ़ों, असहायों, बेघर बेसहारा सभी के लिए योजनांए हैं और उन्हें लागू भी किया गया है। पूरे राज्य के सभी जिलों के सभी पंचायतों में इसकी मौजूदगी है फिलहाल केवल दो प्रतिशत जनसंख्या ही इसके दायरे से बाहर है।    
कुदुंबश्री को इसी हफ्ते साल 2013-14 के हडको राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित किया गया ये एक और उपलब्धि है?
-बिल्कुल, यह सम्मान कुदुंबश्री को महिलाओं की आर्थिक दशा सुधारने की दिशा में उल्लेखनीय काम करने के लिए मिला है। कुदुंबश्री ने आमदनी सुनिश्चित करने वाली सर्वोत्तम परियोजनाएं लागू करके यह लक्ष्य हासिल किया है। हमने निर्माण क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं के हुनर को तराशने और उनके लिए बेहतर संभावनाएं बनाने के लिए एरनाकूलम में कुदुंबश्री वुमैंस  कंस्ट्रक्शन ग्रुप परियोजना लागू किया, जिसे एक नयी शुरूआत कहा जा सकता है, इसके तहत निर्माण क्षेत्र में काम कर रही इंजीनियर, सुपरवाईजर और राजमिस्त्री का काम करने वाली महिलाओं को इसी क्षेत्र के अनुभवी लोगों के द्वारा विषेशज्ञ प्रशिक्षण मुहैया कराया गया। जिसका फायदा भी हुआ। फिलहाल इस समूह के पास 87 गृह निर्माण परियोजना का अनुबंध है। 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

हमारे चरित्र का सबसे क्रूर,शोषक,निर्दयी और बेईमान पक्ष  !

बराबरी की किताबी बातें पढ़कर बड़े हुए हैं हम, नहीं तो हम उस समाज और संस्कृति से आते हैं जहाँ अपनी गंदगी साफ़ कराने के लिए हम अपने जैसे ही दूसरे इंसान को मजबूर करते आये हैं पहले वर्ण व्यवस्था के नाम पर और बाद में सरकारी नौकरियों में सफाई कर्मचारी के तौर पर इस तरह की नौकरियां किसी ख़ास जाति के लिए मुक़र्रर करके ! मेरे पापा इंडियन ऑइल में काम करते थे और हम उसी के टाउनशिप में रहते थे, छोटा सा सुन्दर सा टाउनशिप पर वहां के लोग अपने टॉयलेट खुद साफ़ नहीं करते थे, हफ्ते में दो दिन इंडियन ऑइल का सफाई कर्मचारी आकर टॉयलेट क्लीन करता था तो लोगों के टॉयलेट साफ़ होते थे, उसके आने का रास्ता पीछे का दरवाज़ा होता और कुछ लोग कुछ और एक्स्ट्रा काम कराने के बाद पैसे देते तो कभी उनसे वापस छुट्टा नहीं लेते, मुझे हमेशा बहुत बुरा लगा ये,शायद अब भी वहां ऐसा ही हो रहा हो! मेरे पापा खुद से टॉयलेट क्लीन करते थे , माँ को ये बताने समझाने में वक़्त लगा पर जबसे मुझे सफाई का होश हुआ मैंने हमेशा अपना बाथरूम, टॉयलेट खुद साफ़ किया मेरे भाई बहन ने भी, वहां हमारा घर शायद सबसे साफ़ टॉयलेट वाला घर हुआ करता था, बहरहाल हमारे स्कूल की एक महिला सफाई कर्मचारी की बेटी जो बाद में उसी इंडियन ऑइल में इंजीनियर हो गयी, उसकी नौकरी और सफलता पर लोगों के जातिगत दुराग्रह और रिज़र्वेशन वाले कमेंट भी सुने पर किसी को भी सफाई के काम वाली नौकरी में आरक्षण नहीं चाहिए था, सफाई कर्मचारी के बच्चे सफाई कर्मचारी ही बनें उनकी बराबरी और न्याय का सिद्धांत यहीं तक था !
महानगरों की कितनी भी बुराई करें हम पर यही वो जगह है जहाँ हाशिये के सभी लोगों को अपना स्पेस मिलता है चाहे वो कस्बाई शहरों की लड़कियां हों या सवर्णों के द्वारा किनारे कर दिए गए अनुसूचित जाती के लोग, जब से महानगरों के इस फ़्लैट सिस्टम में रह रही हूँ ज्यादातर लोगों को अपना बाथरूम खुद साफ करते देख रही हूँ ! लेकिन अब भी मुझे समस्या है किसी काम को किसी जाति के साथ हमेशा के लिए नत्थी कर देने से ! मुझे वो दिन सबसे बराबरी का लगेगा जब अम्बानी जैसे लोगों को भी अपनी जगह, अपनी गन्दगी खुद से साफ़ करनी पड़े! हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए बाबा साहेब जैसे नायक का जिन्होंने हमें हमारे चरित्र का सबसे क्रूर,शोषक,निर्दयी और बेईमान पक्ष दिखाया !

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

'हाईवे 'सदियों की घुटन के लिए सदियां लगेंगी !

कुछ फ़िल्में आपके भीतर पहले से ही होती हैं ये और बात है परदे पर उसे कोई और उतार देता है , इम्तियाज़ अली की हाईवे देखकर कुछ ऐसा ही लगा, ऐसी फ़िल्म जिसे आप हमेशा देखना चाहते रहे हों! धरती के किसी अनजाने कोने के खेत , कोई घर, कोई नदी, कोई नहर, कोई अकेला पेड़, क्षितिज के साथ खड़े पहाड़,जैसे दुनियां इसके आगे हो ही नहीं, या ये कहते मुझमें से झांककर दूसरी ओर देखो और बगैर कुछ सोचे, प्लान किये, कहीं नहीं पहुँचने के लिए चलते दो लोग! कुछ कुछ ऐसा जैसे गहरी नींद में देखें जाने वाले अज़ीब से सपने जिनमें जाने आप कहाँ पहुचें होते हैं और जहाँ तमाम दृस्य बगैर किसी रेफरेन्स के तिलिस्म की तरह आते रहते हैं ! हम सबके भीतर वीरा होती है सोलह साल से अस्सी साल के होंगे तब भी ताज़ी हवा, स्पेस और अपना आज़ाद वक़्त की छटपटाहट वैसी ही होगी , सदियों की घुटन के लिए सदियां लगेंगी ! वैसे इस फ़िल्म ने मुझे भी अपने उन हाईवे की याद दिला दी जिनकी छवियाँ बचपन से मेरे साथ है , मेरा पहला प्यार एन एच 31, मन करता था इसके किनारे किनारे पूरब की ओर चलते रहे तो असम पहुँच जायेंगे और जब भी जीरो माइल पर खड़े होते थे तो 31 की जगह 28 पकड़ कर चले जाने का मन होता था ! और एन 17 अरब सागर के समानांतर हमेशा बस चलते ही जाने के लिए बुलाती सड़क ! आम और आवलां के घने पेड़ों के साये वाले प्रतापगढ़ , फैज़ाबाद की सड़क , मीलों पलाश के फूलों से सजा बरही का एन एच 2 ,और मुगलसराय से कर्मनाशा तक का लॉन्ग ड्राइव जिसके लिए अजय के पापा से बड़ी डाँट पड़ी थी , तब हम दोस्त थे और वो घर से अलीनगर के लिए निकलते समय मुझे साथ बुलाने की गलती कर बैठा, मोबाइल आने से पहले के उस समय में मुगलसराय से कर्मनाशा तक वो भी शाम पांच -छह बजे के बाद के समय में! दोस्ती सबसे अच्छी चीज़ होती है , कोई कुछ भी कर सकता है उसमें :)

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

भूत-वूत होता है या नहीं ?

भूत-वूत होता है या नहीं मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती न कह सकती हूँ , बचपन के रहस्यमय अनुभवों में २ घटनाएं शामिल हैं और दोनों गावं की है , वहां शाम को इया की ओर से नहर की ओर जाने की मनाही होती थी, कहती थी -पानी में बुडुआ होले सन, जा पानीये में खींच लिह सन ' फिर भी हम गए पूल पर बैठ कर 'सनसेट' देखने के लिए, जैसे सूरज आसमान से गायब हुआ एक काला साया पानी पर चलता हम बच्चों की ओर आता महसूस हुआ , चेचरे-मचेरे मिलाकर हम आठ-दस बच्चे थे , कोई चिल्लाया और हम एक मिनट से भी कम समय में दुआर पर थे  दूसरी घटना मेरे घर काम करने वाले चन्द्रिका की थी जिसे गावं वापस आने के दौरान रात हो जाने पर 'चुपचुपवा डीह' पर रुकना पड़ा वहीँ एक 'पुरनिया पाकड़' के पेड़ के नीचे खैनी बनाकर खाने से पहले उसने 'किसी ' को ऑफर नहीं किया, सुबह जब लौटा तब उसकी आवाज़ बदली हुई थी हर बड़े बुज़ुर्ग सभी को तू-तडाक करके बात कर रहा था और बेहिसाब हँसने लगा था , कोई बाबा आये और विधिवत तरीके से खैनी ऑफर किया गया ,फिर चन्द्रिका की अपनी आवाज़ लौट आयी ! खैर ये सब डर से ज्यादा मज़ेदार अनुभवों का हिस्सा है डर तब लगा जब दस साल पहले दिल्ली के अपने घर में मैंने अकेले 'साइलेंस ऑफ़ द लैम्ब' देख लिया फिर एक हफ्ते तक रात को सो नहीं सकी वो तो शुक्र था उन दिनों एम्स के डाक्टर्स कॉलोनी से उठाया गया 'शेरू 'मेरे साथ साए की तरह रहा करता था ! सालों बाद कल मैंने रोजमेरिज बेबी देखने की कोशिश की आधी फिल्म पर पहुँचने तक फ्रिज की आवाज़ डरावनी लगने लगी, फिर लगा दरवाज़ा खुद ही खुल गया (यहाँ तेज़ हवा के कारण ऐसा अक्सर होता है , पर कल की बात अलग थी ) और सबसे ज्यादा डर तब लगा जब मुझे लगने लगा की एक और कमरे की लाइट मैंने नहीं किसी और ने ऑन कर दी हैं, मेरे अवचेतन में यही था की मैंने सिर्फ अपने पास की छोड़कर सारी लाइट ऑफ कर दी है !अब ये बहुत ज्यादा हो गया था मैंने तुरंत लैपटॉप का फ्लैप बंद किया और एकदम मुहं ढँक कर सो गयी ! हालांकि' हिचकाक' की 'वर्टिगो' भी मैंने देखी है पर उसे देखना मेरे गावं वाले अनुभवों जैसा रहा, पर जो भी हो मूवीज तो मुझे अकेले ही देखना पसंद है पर अगली सायको थ्रिलर अगले दस साल बाद! 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

तुम हो, ये यकीन है मुझे !



                 1

कहना होता है मुझे, छिपा लेता हूँ
सोचता हूँ हर वक़्त पर, सामने झटक देता हूँ
चाहता हूँ सब जिक्र करें तुम्हारा, कर दें कोई,
तो  बन जाता हूँ अनजाना,
ये सब करते हुए जानता हूँ मैं
कितना झूठा हूँ मैं
सौ बार कहता हूँ तुमसे ज्यादा खुद से,
कुछ नहीं हमारे बीच
जबकि सारा दिन कुछ  पलों
की आग में तपता निकाल देता हूँ
मैं डरता हूँ, खुद से ज्यादा तुम्हारे लिए ,
करता हूँ सारे वो  जतन ,जैसे तुम हो ही नहीं
पर,  लौटता हूँ जब रातों को पास अपने
लौट आती हो तुम भी !


              2

कितना त्रासद है
जब हम चाहकर भी,
अपनी कमजोरी
छिपा न सकें,
कमजोरी,
खुद की तकलीफों से,
बाहर नहीं आ पाने की
दुर्बल होना
कितना दयनीय,
कितना दुखद है
तब और भी,
जब अपनी एक दुनिया
सब से छिपाने के लिए ही
बनायी होती है
तुम मिलते हो वहां
उसी पल में
मैं मिलती हूँ वहां
उसी मौसम में
लौटते तो कई बार हैं
पर, खिंच जाता है
वो पल, वो मौसम
हर बार वर्तमान में ! 
     

         3

तुम्हें सुनते हुए
तुम्हें कहते हुए
छलक जाती हैं
आँखें,
रह जाते हैं लगभग सारे
जरूरी शब्द गले तक
और,,,,,सारे  बेमतलब
बाहर !
तुम्हे प्यार करते हुए
आसमान की चाहत में
हो जाती हूँ मैं धरती
भूल जाती हूँ
उन तमाम तकलीफों को
जो लगा मुझे
तुम जानकार भी नहीं जानते
बावजूद इसके हर बार
सौपना चाहती हूँ मैं तुम्हें
अपनी सारी खुशबू , सारे रंग
और सारे गीत
बदले में तुमसे नहीं
इश्वर से कहती हूँ
तुम हो, ये यकीन है मुझे !


रविवार, 21 अप्रैल 2013

नशा खत्म बस बाकी है हैंगओवर !




मुझे याद है ये 2006 के आखिरी दिनों की बात है जब मैंने ऑरकुट के बारे में जाना , अजय का अकाउंट था और मुझे बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि इसके जरिये अपने भूले-बिसरे दोस्तों को खोजा जा सकता है,  उसी अकाउंट से मैं कुछ मयूचुअल दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों से कनेक्ट हुई ! बाद में अपना अकाउंट खोला  और कुछ  दोस्त मुझसे कनेक्ट हुए और  कुछ से मैं! इसी बीच फेसबुक और ट्वीटर आ गए, वहां भी अपना खाता खोल दिया पर ज्यादा आवाजाही फेसबुक पर ही रही, ट्वीटर पर  सिर्फ उन लोगों को कभी-कभार पढ़ लेने के लिए गयी जिन्हें फॉलो कर रही थी ! फेसबुक के शुरुआती दिन बड़े खुमारी वाले थे दस-दस, पंद्रह साल से जिनके बारे में कुछ सुना नहीं था उन दोस्तों, उनके दोस्तों बच्चों, मियां और बीवी के फ़ोटोज़ देखकर बहुत अच्छा लगता था ! अब जो यहाँ नहीं थे वो ही दूर हो रहे थे, पर साल दो साल होते होते ये सब बोरिंग हो गया ! यहाँ सब अच्छा था, सब लोग खुश, खाते-पीते, छुट्टियाँ मनाते, एन्जॉय करते दिख रहे थे! हिंदी स्कूल वालों की भी अंग्रेजी बहुत अच्छी हो गयी थी, उनके स्टेटस की अंग्रेजी बयां करने लगी थी कि उनका "क्लास " चेंज   हो चूका है ! वैसे यहाँ सब कुछ था पर घंटों बिना कुछ बोले हुए  भी एक दुसरे की उदासियों को पी लेने वाला बेमतलब का  साथ नहीं था!

 नेटवर्किंग साइट्स ने दोस्तों को बदल दिया है, हो सकता है ये मेरा ओब्ज़रवेशन हो पर कहीं कुछ तो बदला जरूर है ! जिन्हें आप बिलकूल नहीं जानते और सिर्फ जिन्हें पढने के लिए आप उनसे कनेक्ट होते हैं उन्हें छोड़ दें,  पर असली दोस्त यहाँ ज्यादा सतही लगने लगे हैं, दोस्ती का मतलब एक-दूसरे की पोस्ट या फोटो को लाइक करना ही रह गया है, कमेंट वाले दिन भी अब बीती बात होने लगे हैं! जबकि ये कितना असहज भी होता है हम ऐसे घरों से आते हैं जहाँ किसी अपने की उनके मुहं पर शायद ही तारीफ़ की जाती है और इन साइट्स के आने से पहले भी हम दोस्तों की तारीफ़ से ज्यादा उन्हें लेकर क्रिटिकल हुआ करते थे , जी भर कर खिंचाई!  स्टेटस लिखकर क्रांति करने या करवा लेने का भ्रम पैदा करने वालों का जादू भी लगभग टूट ही चूका है, असली सेलेब्रिटी कुछ दिन यहाँ आकर चले गए या जो नहीं गए वो जाने की सोच रहे हैं ! समय रहते उन्हें अक्ल आ रही है, ज्यादा आम रहे तो ख़ास नहीं रहोगे, अपने आगे -पीछे की इमेज मिस्ट्री  बरक़रार रहनी चाहिए ! पर पिछले कुछ सालों में बेऔकात वाले कुछ लोगों ने इन नेटवर्किंग साईट'स पर आकर जरूर सेलेब्रिटी दर्ज़ा हासिल कर लिया  इसमें मीडिया वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही है, पांच-पांच  हज़ार की फ्रेंड लिस्ट वाले ये लोग कुछ भी लिख दें कोई भी फोटो लगा दें कमेंट्स और लाइक्स की बरसात होने लगती पर  ये स्थितप्रग  भाव में ही नज़र आते महसूस होते हैं  (लैपटॉप पर शायद मुस्कुराते हों पर वो दीखता तो उनको ही होगा ) और कुछ-एक  को छोड़कर  शायद ही कभी दूसरों की पोस्ट पर गौर फरमाते हो ! बहरहाल, ये एकतरफा कदरदानी भी कब तक चलेगी,  इसलिए सौ -दो सौ और पांच सौ या हज़ार की फ्रेंड लिस्ट वाले भी अब अपने आप को कम नहीं समझ रहे हैं  और इन लोगों का एकाधिकार तोड़ते हुए आपस में ही एक मुचुअल  एडमिरेशन ग्रुप बनाने लग गए हैं, अब शायद इन्हें ज्यादा अच्छा महसूस होने लगा है!
लेकिन आत्मप्रचार और आत्ममुग्धता की भी एक हद होती है आखिर कितने  दिनों और साल तक सिर्फ तारीफें लीं और दीं जा सकती हैं ! अब शायद मोहभंग का दौर आ गया है या आनेवाला है कोई  कितना कहें  और कोई कितना सुने या पढ़े  ...कोई कह कह के खाली हो रहा है और कोई पढ़ पढ़ के सर से पैर तक पक रहा है ! शायद अब जो यहाँ नहीं हैं उन्हें याद करने, उनके पास लौटने के दिन आ रहे हैं, उन बेवकूफियों के पास जो  अंतर्जाल में नहीं बल्कि असली रास्ते के किसी मोड़ पर इत्मीनान से बैठे हुए हैं ! हो सकता है उन्हें किसी का इंतज़ार नहीं हो पर कोई आकर हाथ थामने को मांगे तो पकड़ने की फुर्सत अब भी है उनके पास !  

   








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