शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

हरा भ्ररा ,प्लास्टिक मुक्त गांव

(Published in Public Agenda)
कर्नाटक के बंतवाल तालुके का इरा गांव युं तो भारत के किसी भी आम गांव जैसा ही है पर कुछ बातें इसे न सिर्फ देश बल्कि दुनियां में एक खास गांव बनाती हंै।  इरा, आज भारत का पहला प्लास्टिक मुक्त गांव है। प्लास्टिक मुक्त ग्राम होने के अलावा इस गांव की अन्य उपलब्धियां भी काबिलेगौर हैं। इरा को केन्द्र सरकार का निर्मल ग्राम पुरस्कार भी मिल चुका है। संपूर्ण साक्षर और पूर्णत: भ्रष्टाचार व बालश्रम मुक्त इस गांव से पिछले तीन साल से सौ प्रतिशत टैक्स कलेक्शन  हासिल हुआ है। इसके अलावा यह देश का पहला डिजीटल ग्राम पंचायत भी है। इरा ग्राम पंचायत दुनियां के अन्य देशों के लिए भी आज रोल-माडल बन चुका है। यूनिसेफ के 20 प्रतिनिधियों की टीम ने भी इस गांव का दौरा किया जिसमें जिम्बाबे, जाम्बिया, नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देशाे के प्रतिनिधी शामिल थे।
दरअसल, सरकार और स्थानीय लोगों की भागीदारी से इस छोटे से गांव ने विकास और सफलता की जो बड़ी कहानी लिखी है वह कृष्णा मूल्या और ‘शीना शेट्टी जैसे लोगों और उनके संगठनों के जिक्र के बगैर अधूरी है। कर्नाटक के दक्षिणी कन्नडा जिले में एक दशक से भी ज्यादा समय से काम कर रहे जन शिक्षण ट्रस्ट के कृष्णा मूल्या और शीना शेट्टी बताते हैं सरकार और नागरिक सहयोग से केवल इरा गांव ही नहीं बल्कि पूरे बंतवाल तालुके की तस्वीर अब बदल रही है। वर्ष 2005 में संपूर्ण स्वच्छता आंदोलन के साथ उनके संगठन ने इस क्षेत्र में केन्द्र की एक नोडल एजेंसी के तौर पर काम करना शुरू  किया और अपना देश नाम से एक आंदोलन चलाया। मूल्या और ‘शेट्टी बताते हैं अपना देश आंदोलन आदर्श  गांव बनाने का आंदोलन है। यह स्थानीय लोगों की भागीदारी से विकास के लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास है जिससे न सिर्फ लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आयी है बल्कि अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की समझ भी पैदा हुई है। दरअसल, अपना देश आंदोलन अपनी स्थानीय समस्याओं को खुद ही हल करने करने का आंदोलन है। वे कहते हैं इरा के कायाकल्प की कहानी की शुरूआत भी वर्ष 2005 में केन्द्र सरकार के संपूर्ण स्वच्छता आंदोलन के क्रियान्वयन के साथ शुरू हुई। जिसका लक्ष्य निर्मल ग्राम और ग्रामीण विकास के सपने को साकार करना था। लेकिन पिछले दो साल से प्लास्टिक के दुष्प्रभाव और इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान  के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के अभियान पर काफी जोर डाला गया, स्थानीय लोगों में इसका काफी गहरा असर हुआ, जिसका परिणाम है आज इरा लगभग प्लास्टिक मुक्त गांव बन चुका है। पालीथिन की थैलियां यहां वर्जित है, धार्मिक स्थलों पर भी प्लास्टिक की जगह कपड़े की थैलियों का प्रयोग होता है हांलाकि अभी भी दवाईयों इत्यादि के लिए प्लास्टिक का प्रयोग होता है। इरा गांव के प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र होने का असर भी अब दिखने लगा है, न सिर्फ गांव की हरियाली में इजाफा हुआ है बल्कि पानी भी पूर्णत: प्रदूषन मुक्त हो गया है। शेट्टी और मूल्या कहते हैं इरा गांव की सफलता और समूचे बतंवाल तालुके में आए बदलाव में भरतलाल मीणा और वी.पी बालिगर जैसे प्रशासनिक अधिकारियों की अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके अलावा इलाके के सभी राजनीतिक दलों ने भी दलगत राजनीति से उपर उठकर क्षेत्र के लिए काम किया है और धर्म, जाति व क्षेत्र की राजनीति से अलग विकास की राजनीति की है। नतीजा बंतवाल तालुके के 45 ग्राम पंचायतों में से आज लगभग 20 गांव आदर्श गांव में तब्दील हो चुके हैं।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून

(बंगलूरू से प्रकाशित होने वाली हिन्दी पत्रिका भारतीय ओपीनियन मे प्रकाशित)


पानी की समस्या आज दुनियां की सबसे बड़ी समस्या है। ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरणीय असन्तुलन, नदियों और उपलब्ध सभी जलस्रोतों का असन्तुलित दोहन, भूमिगत जल स्तर का दिनों दिन नीचे जाना, ये सभी मिलकर भयावह दृश्य पेश कर रहे हैं और संकेत कर रहे हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए ही होगा। दरअसल जल संकट अब करो या मरो की स्थिति में आ चुका है। खासतौर पर शहरों और महानगरों में आबादी में लगातार इजाफा के कारण जल आपूर्ति एक विकट समस्या बनती जा रही है। ऐसे में पानी को सहेज कर रखना और पानी का किफायती इस्तेमाल दोनों बेहद जरूरी हो गया है। जल संरक्षण की दिशा बहुत से लोग उल्लेखनीय काम भी कर रहे हैं। कुछ लोग बड़े स्तर पर तो कुछ व्यक्तिगत स्तर पर। पिछले 12 साल से बंगलूरू में रह रहे फ्रीलांस पेंटर और म्यूरल आर्टिस्ट संजय सिंह पानी और पर्यावरण के प्रति अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहे हैं और अनुकरणीय उदाहरण पेश कर रहे हैं।
मूलत: बिहार के रहने वाले संजय सिंह ने विश्वभारती से पेिन्टंग में  ग्रेजुएशन म्यूरल या भित्तिचित्र में मास्टर की डिग्री ली है। विश्वभारती में ही इनका परिचय कर्नाटक की प्रतिभा से हुआ जो फिलहाल बंगलूरू चित्रकला परिषद में फैकल्टी हैं और इनकी जीवन संगिनी भी। कलाकार होने के कारण दोनों अपने आसपास और पर्यावरण के प्रति काफी संवेदनशील रहे हैं।  इसलिए बंगलूरू में जब इन्होंने अपना घर बनाया तो  वर्षाजल संरक्षण के साथ-साथ घर को यथासम्भव इकोफ्रेडंली बनाने की कोशिश की। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि संजय सिंह के घर में पूरी तरह से प्राकृतिक प्रकाश के इस्तेमाल की व्यवस्था है और प्राकृतिक रंगों का ही प्रयोग किया गया है। बंगलूरू में पानी की समस्या काफी विकट रही है जो दिनों-दिन और गहराती जा रही है। यहां जल आपूर्ति कावेरी नदी के पानी से की जाती है, जिसे 100 किलोमीटर से लाया जाता है।  संजय जिस इलाके में रहते हैं वहां अभी सरकारी सप्लाई का पानी नहीं पहुंचता है। लगभग 25 रिहाईशी घर वाले इस इलाके में पानी की आपूर्ति कॉमन बोरवेल से की जाती है। संजय बताते हैं  वर्षाजल संरक्षण प्रणाली को अपना कर पानी के मामले में हमने खुद को काफी हद तक आत्मनिर्भर बना लिया है। संजय के मुताबिक इस प्रणाली को लगाने के बाद लगभग 4-5 महीने उन्हें किसी अन्य स्रोत से पानी की जरूरत नहीं होती है। साधारण बारिश में भी 7 मिनट की अवधि में उनके पास लगभग 500 लीटर पानी जमा हो जाता है। लेकिन संजय ये भी बताना नहीं भूलते कि वे पानी का इस्तेमाल भी किफायत से करते हैं। दरअसल, आपूर्ति और खर्च के बीच सन्तुलन बेहद जरूरी है और पानी के मामले में तो आपको एक कदम आगे बढ़कर आने वाली पीढ़ियों को सोचकर चलना होगा। इसलिए वे किफायत पर बहुत जोर देते हैं।
आखिर वर्षाजल संरक्षण प्रणाली है क्या और इसकी लागत क्या है?
इस सवाल के जवाब में संजय बताते हैं कि दरअसल घर बनाते समय ही अगर इस प्रणाली को अपनाया जाए तो कोई अतिरिक्त खर्च नहीं आता है, केवल छत पर पतला सा, ढ़ाल वाला प्लास्टर चढ़ाना होता है। छत को साफ रखना होता है और नीचे जहां पानी जमा होता है वहां फिल्टर लगाना होता है। छत से प्राप्त बारिश के पानी को फिल्टर करते हुए संप में पंहुचाना होता है और फिर ओवरहेड टैंक में। पानी को वाटर टैंक, संप या ड्रम में स्टोर करने से पहले फिल्टर करने के लिए जो तकनीक इस्तेमाल की जाती है वो बिल्कुल पारंपरिक होती है। जिसके तहत बोल्डर्स, बड़े जेली स्टोन, छोटे जेली स्टोन इसके बाद चारकोल फिर बड़े जेली स्टोन और छोटे जेली स्टोन, कपड़े और फिर बालू की परत बिछायी जाती है। और हर पांच साल पर इन परतों को फिर से बिछाना होता है। उन्होंने मात्र 2 हजार रूपए में इस प्रणाली को लगाया था। संजय के मुताबिक बाद में भी इस प्रणाली को लगाने पर अधिकतम 5 हजार से ज्यादा खर्च नहीं आता है। रेनवाटर हारवेस्टिंग क्लब के एस विश्वनाथ को संजय पानी और उसके संग्रह के मामले में अपना पथ-प्रदर्शक मानते हैं। अनुमानत: बंगलूरू के लगभग 5 हजार भवनों में वर्षाजल संग्रह प्रणाली को अपनाया जा चुका है।
   
बंगलूरू में सालाना औसत बारिश लगभग 1,000 मिली मीटर तक होती है। जबकि यहां प्रतिव्यक्ति पानी की खपत लगभग 135 से 140 लीटर के बीच में है। वर्षाजल संग्रह के मार्फत 40 गुणा 60 फीट की छत से सालाना सवा दो लाख लीटर तक पानी जमा किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए इस तरह  पानी के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बना जा सकता है।
वर्षाजल के मार्फत बोरवेल को भी रिचार्ज किया जा सकता है, इसके लिए सबसे पहले बोरवेल के केसिंग पाईप के पास एक मीटर लंबा, चौड़ा और 10 फीट गहरा गड्ढ़ा खोदना होता है ।और इसमें सीमेंट रिंग लगाना होता है। गड्ढ़े की तली में फिल्टर होल बनाना होता है और बोरवेल पाईप के साथ स्टील मेश वाला केसिंग पाईप खूब टाईट करके फिक्स करना चाहिए। इस तरह बोरवेल को हमेशा रिचार्ज रखा जा सकता है। इसी तरह से कुओं को भी रिचार्ज किया जा सकता है।
सिंगापूरा में कुछ लोगों ने संजय सिंह से प्रेरित होकर इस प्रणाली को अपनाया भी है पर वे चाहते हैं कि सिर्फ बंगलूरू ही नहीं बल्कि पूरे देश में ज्यादा से ज्यादा लोग इस प्रणाली को जल्द से जल्द अपनाएं।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

तलाक की सिलिकाॅन वैली

 महानगरों  में तलाक के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। बंगलूरू में ही रोजाना तलाक के 25 नए मामले दर्ज हो रहे हैं।
(Published in Public Agenda )

आई टी कंपनी में काम करने वाली प्रमिला का दिन सुबह साढ़े छः बजे षुरू हो जाता है। उन्हें नौ बजे तक दफ्तर पहुंचना होता है और घर लौटते-लौटते आठ बज जाते हैं। उनके पति बालाजी भी आई टी क्षेत्र की बड़ी कंपनी में काम करते हैं और बहुत व्यस्त रहते हैं। प्रमिला दफ्तर और घर की जिम्मेदारियों के बीच खुद को रोबोट जैसी समझने लगी इसलिए नौकरी छोड़ दी लेकिन फिर अकेलेपन ने नौकरी वापस पकड़ा दी। व्यस्तता के कारण संवादहीनता अब उनके लिए संवेदनहीनता बन चुका है, अपनी षादी में उन्हें कोई जोड़ने वाला तत्व नजर नहीं आता इसलिए दोनों ने आपसी सहमति से तलाक के लिए अर्जी दायर कर दी है। बीपीओ सेक्टर में काम करने वाले अजीत के लिए भी उनकी पत्नी की ओर से तलाक की मांग षाॅकिंग था, लेकिन रात की नौकरी और दिन में सोने की उनकी दिनचर्या ने उनकी पत्नी का अपनी षादी से ही मोहभंग कर दिया। आखिरकार अजीत भी तलाक के लिए तैयार हो गए। भारत की सिलिकाॅन वैली में इन दिनों रोजाना तलाक के पच्चीस नए मामले दर्ज हो रहे हैं, जिनमें ज्यादातर मामले आई टी क्षेत्र के दंपतियों हैं। लगभग 13 हजार तलाक के मामले बंगलूरू में लंबित है जिनमें पांच हजार मामले केवल 2008 में दर्ज हुए हैं। सालाना लगभग पांच हजार से अधिक नए मामले दर्ज हो रहे हैं। हांलाकि भारत में अभी भी अमेरिका और अन्य देषों के मुकाबले तलाक दर कम है। अभी भी यहां 100 षादियों में केवल एक षादी ही टूटती है लेकिन महानगरों में पिछले पांच साल में ऐसे मामलों में दोगुना इजाफा हुआ है। और बंगलूरू फैमिली कोर्ट में की सूची में आपको 20 से 30 साल की उम्र वाले जोड़ों के तलाक की अर्जी मिलेगी। यहां तक कि अपेक्षाकृत संकीर्ण सोच वाले परिवार भी अपने बेटे या बेटी के तलाक के फैसले को सहजता से स्वीकार रहे हैं।
षेशाद्रीपूरम में वकालत करने वाले प्रसन्ना कुमार कहते हैं रोजाना 20-25 तलाक के नए मामले दर्ज हो रहे हैं और गौर करने वाली बात है कि आई टी क्षेत्र में काम करने वाले ज्यादातर तलाक के मामले आपसी रजामंदी से दायर हो रहे हैं इसलिए ऐसे मामलों में फैसलें में भी देर नहीं हो रही है। प्रसन्ना बताते हैं- बंगलुरू में दस साल पहले तलाक के मामलों की सुनवाई के लिए केवल एक कोर्ट हुआ करता था आज आठ कोर्ट हैं जिनमें प्रतिदिन सौ मामलों की सुनवाई होती है। तलाक के बढ़ते मामलों के कारणों की तह में जाते हुए प्रसन्ना कहते हैं-समाज तेजी से बदल रहा है, महानगरों में पति-पत्नी दोनों काम पर जाते हैं इसलिए एक-दूसरे के लिए समय नहीं निकाल पाते, बुजुर्गो के साथ नहीं रहने के कारण कोई दवाब भी नहीं होता है। तनाव, काम का लंबा समय और दौरे उन्हें एक-दूसरे से और दूर कर रहे हैं।
जबकि एक-दूसरे से अपेक्षाएं काफी बढ़ गयी हैं साथ ही अहम का टकराव भी। यहां षादी के महज 15 दिन और 6 महीने बाद ही तलाक के लिए आवेदन करने वाले जोड़े आपको मिल जाएंगे।
बंगलूरू उच्च न्यायलय और फैमिली कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील करूणाकरण कहते हैं-मेरे पास रोजाना दस ऐसे फोन आते हैं और ज्यादातर मामले आई टी क्षेत्र के जोड़ों के होते हैं, जो आपसी रजामंदी से तलाक चाहते हैं। गलतफहमी और एक-दूसरे के लिए धैर्य नहीं होना उनके संबंधों में खटास का कारण बन रही है। करूणाकरण बहुत से मामलों में तलाक के कारणों को बेवकूफाना करार देते हैं और बताते हैं कि एक मामले में तो महिला ने सिर्फ इसलिए तलाक की अर्जी दी कि वो अपने पति के घर नहीं रहना चाहती थी, बच्चे के जन्म के बाद वो मायके से नहीं लौटी और अपने मां-बाप के साथ रहने के लिए तलाक की अर्जी दी।
इधर मैरिज कांउंसलर मित्तिनरसिंहमूर्ति कहते हैं-दरअसल, तलाक के मामलों में इजाफा षहरीकरण, और स्त्री पुरूश दोनों के आर्थिक हालात में आयी मजबूती से गहरायी से जुड़ा है।  आज की सक्षम और सषक्त महिला भारतीय समाज के पारंपरिक दोहरेपन को ज्यों का त्यों स्वीकार करने को तैयार नहीं है। तलाक के मामले पहले कम थे और अब ज्यादा हो रहे हैं इसमें कसूरवार महिला नहीं बल्कि उनकी हालत में आया सकारात्मक बदलाव है। पहले वो सह लेती थी अब विकल्प चुनने की ताकत आ रही है उनके पास। इसलिए महानगरों में तलाक के बढ़ते मामलों का सीधा-सीधा संबंध महिला सषक्तिकरण से जोड़ा जाना चाहिए। इसके अलावा अधिक उम्र में षादी, के कारण भी उनकी षख्सियत आसानी से बदलाव नहीं स्वीकार कर पा रही है। खासतौर पर महिलाएं अपने परिवेष से अलग नहीं हो पा रही हैं। दूसरी ओर आर्थिक बंधन नहीं होने पर दोनों अपने रिष्ते को बनाए रखने की कोषिष भी नहीं करते क्योंकि वो अलग-अलग भी बेहतर जिदंगी गुजार सकते हैं।

मैरिज काउंसलर कलावती चंद्रषेखर का मानना हैं कि तलाक के मामलों में बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह महिलाओं का षिक्षित और आत्मनिर्भर होना है। आत्मनिर्भरता ने उनमें आत्मविष्वास भर दिया है ऐसे में षादीषुदा जीवन में उलझाव पैदा होने पर वो अलग हो जाने के विकल्प को अपना रही हैं। ऐसा नहीं है कि आज की महिलाएं षादी से जबरन बाहर आ रही है बल्कि अब वो जबरन षादी को बचाए रखने की कोषिष नहीं कर रही है। क्योंकि उनके पास पहले के मुकाबले ज्यादा आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा है। और ये उनके सषक्तिकरण का प्रतीक है। आज लड़कियों को तलाक के हालात होने पर उनके अपने मां-बाप और परिवार का भी पूरा सहयोग मिल रहा है। लेकिन वो ये भी मानती हैं कि ज्यादातर महिलाएं अपनी षादी को बचाने की भरसक कोषिष करती हैं और अंत में ही तलाक के विकल्प को अपनाती हैं। वो कहती हैं तलाक के किसी भी कारण को बेवकूफाना करार नहीं दिया जा सकता, हमें मसले को उनके नजरिये से देखने की कोषिष करनी चाहिए। हफ्ते में दो-तीन जोड़े को सलाह देने वाली कलावती कामकाजी जोड़ों के लिए षनिवार और रविवार को भी काम करती हैं और काउंसिलिंग को काफी मददगार मानती हैं। तलाक के बढ़ते मामलों का कारण वो आपसी समझ में कमी, एक-दूसरे की उम्मीदों को ज्यादा तव्वजों नहीं देना और संवादहीनता की स्थिति को मानती हैं साथ ही अत्यधिक संवाद के हालात को भी खतरनाक करार देती है। कलावती कहती हैं आर्थिक परेषानी और आजादी में खलल भी तलाक की वजह बन रही है तो दूसरी ओर आर्थिक सुरक्षा और भरपूर निजी स्वतंत्रता भी आपसी संबंधों को कड़वा बना रही है। अब तक पचास से अधिक मामलों में काउंसिलिंग कर चुकी कलावती ने बच्चों को संबंधों को जोड़े रखने वाली कड़ी पाया है और संतानहीन जोड़ों को काउंसिलिंग बावजूद अलग होते पाया है। बहरहाल, बावजूद इसके वो काउंसिलिंग को काफी मददगार मानती है और षादी तोड़ने से पहले काउंसलर के पास जाने की सलाह जरूर देती हैं।

आई टी क्षेत्र के जोड़े मैरिज कांउंसलर मित्तिनरसिंहमूर्ति के पास षादी से पहले भी आते हैं, जब उनकी मर्जी की षादी में उनके मां-बाप बाधा बनते हैं। फिर बाद में जब षादी निभाना मुष्किल होने लगता है तब भी आते हैं।  मित्तिनरसिंहमूर्ति उन्हें पहले अलग रहने और फिर बाद में उनके पास आने की सलाह देते हैं। वो कहते हैं- हम उन्हें जोड़ने की भरसक कोषिष करते हैं पर वो अलग होने की बात पहले ही तय कर चुके होते हैं। अपने अनुभवों में नरसिंहमूर्ति ने पाया कि ज्यादा सफल और सक्षम जोड़े एक-दूसरे को कमोडिटी की तरह लेने लगे हैं और मतभिन्नता होने पर सिर्फ और सिर्फ अलग होना चाहते हैं। तलाक के बड़े कारणों में वो मां-बाप का हस्तक्षेप भी मानते हैं, खासतौर पर महिलाओं के संदर्भ में। नरसिंहमूर्ति कहते हैं षादी के बाद मां-बाप और बच्चे अलग रहें तो षादियों के बचे रहने की संभावना बढ़ सकती है। हांलाकि उनके पास एक ऐसा मामला भी आया था जिसमें पति के बीमार हो जाने पर उसके व्यवहार में आए चिड़चिड़ेपन को पत्नी ज्यादा दिनों तक सहन नहीं कर पायी और तलाक के लिए अर्जी दे दी।
दूसरी ओर बंगलूरू में निम्न मध्यवर्गीय और निम्न तबके की महिलाओं में एक नयी बात भी सामने आ रही हैं। चंूकि इस तबके की महिलाएं आर्थिक तौर पर सक्षम और उतनी षिक्षित नहीं है। साथ ही उनका अपना परिवार भी कमजोर आर्थिक हालात के कारण उनकी मदद नहीं कर सकता अतः वे तलाक के बजाए अलग रहने और गुजारे के लिए अर्जी दायर कर रही है। पिछले दो साल में ऐसे मामलों में 30 प्रतिषत की दर से इजाफा हुआ है। विषेशज्ञ इसकी एक वजह इस तबके में तलाक से जुड़ी सामाजिक अस्वीकार्यता को भी मानते हैं। गौरतलब है कि कानुनन पत्नी के पास आय का कोई साधन नहीं होने और तलाक नहीं चाहने पर वो गुजारा भत्ता के लिए अर्जी दायर कर सकती है। यहां तक कि एक छत के नीचे रहते हुए भी, पति से कोई संबंध नहीं होने पर उसे आजीवन गुजारा पाने का हक है जबकि तलाक की स्थिति में एक ही बार स्थायी सेटलमेंट हो जाता है।
इधर तलाक के बढ़ते मामलों ने प्राईवेट डिटेक्टिव एजेंसियों का काम भी काफी बढ़ा दिया है। पिनिया में सेवियर डिटेक्टिव सर्विसेज चलाने वाले मोहम्मद सादिक कहते हैं- हमारे पास तलाक चाहने के सालाना 50-60  मामले आते हैं। हालांकि आपसी रजामंदी से होने वाले तलाकों में हमारी कोई भूमिका नहीं होती पर विवाहेतर संबंधों के षक की पुश्टि के लिए लोग हमारी षार्ट स्क्रीन सेवा लेते हैं। सादिक बताते हैं-बंगलूरू में इस समय लगभग ढ़ाई हजार डिटेक्टिव एंजेंसी हैं और सभी के पास भरपूर काम है।  

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

कार्बन मुक्त भविष्य की आेर


( पबिलक एजेंडा में प्रकाशित लेख )




बंगलूरू का टीजेड हाउसिंग काॅम्पलेक्स यूं तो किसी भी आम आलीशान, लग्जरी हाउसिंग काॅम्पलेक्स की ही तरह दिखता है, अपेक्षाकृत थोड़ी ज्यादा हरियाली के साथ। लेकिन ऐसा है नहीं, दरअसल, टीजेड यानी जीरो एनर्जी डेवलपमेंट पूरी तरह से कार्बन मुक्त हाउसिंग काॅम्पलेक्स है। जो उर्जा और पानी के अलावा सीवरेज प्रणाली सभी के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर है। 95 परिवारों का यह आशियाना अपनी जरूरत का पानी वर्षा जल संग्रह करके हासिल करता है। सौर उर्जा का इस्तेमाल करता है और जैविक ईंधन व कचड़े से अपने लिए बिजली बनाता है। एनर्जी एफिशियेंट उपकरणों का प्रयोग करता है और दिन में उपलब्ध अधिकतम प्राकृतिक प्रकाश का दोहन करता है।
बीसीआईएल, यानी बायोडायवरसिटी कन्जरवेशन इंडिया लिमिटेड ने इस आवासीय परिसर का निर्माण किया है। व्हाईटफील्ड स्थित यह आवासीय परिसर पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल और खुबसूरत हैं। उल्लेखनीय बात ये है कि पर्यावरण संरक्षण के मानकों पर पूरी तरह से खरा उतरने के बावजूद आधुनिक सुख-सुविधाओं में यहां कोई कटौती नहीं की गई है। केन्द्रीकृत सुरक्षा प्रणाली, लांड्री, कान्फ्रेस हाॅल, स्विमिंग पुल, रेस्तरां, जिम जैसी सभी आधुनिक सुविधाएं हैं यहां। पांच एकड़ में फैले टीजेड की परिकल्पना बीसीआईएल के प्रमुख चंद्रशेख्ार हरिहरन की है। उनका लक्ष्य एक ऐसा शहरी रिहाईश विकल्प मुहैया कराना था जो पानी, उर्जा और कचड़ा प्रबंधन सभी मामलों में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो। अतः टीजेड में निर्माण से जुड़े सभी पक्षों में प्राकृतिक संसाधन के संरक्षण और पर्यावरण पर उसके नकारात्मक प्रभाव कम से कम हों इसका ध्यान रखा गया है। यहां के घरों में आप पर्यावरण के अनुकूल जीरो इलेक्ट्रीसिटी इन बिल्ट रेफ्रिजरेटर पाएंगे, यानी सभी घरों के लिए एक मोटर और कंप्रेषर से संचालित होने वाला फ्रिज। साथ ही सौ प्रतिषत ताजी हवा पर आधारित वातानुकूलन प्रणाली है जो रेफ्रीजेंट के तौर पर पानी का इस्तेमाल करती है। दरअसल, टीजेड इस मायने में भी अन्य आवासीय परिसरों से अलग है कि यह अपने पूरे जीवन चक्र यानी निर्माण, जीवन काल और विध्वंस सभी चरणों में कार्बन उत्सर्जन कम से कम करेगा। इसलिए यह देशा की पहली ऐसी अवासीय परियोजना है जिसे क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म इनीषिएटिव के तहत कार्बन क्रेडिट हासिल है।
अर्थषास्त्री से पर्यावरण व्यवसायी बने चंद्रशेखर हरिहरन 1989 से ग्रीन बिल्डिंग की अवधारणा से जुड़े हुए हैं और दीर्घकालीन विकास के अर्थशास्त्र में यकीन रखते हैं। 11-12 साल उन्हें भारत के विभिन्न हिस्सों में रहने और काम करने का मौका मिला। वे अन्ना हजारे के साथ भी रहे और उन्हें रालेगांव सिद्धि के माॅडल को बहुत करीब से देखने और समझने का मौका मिला। इन अनुभवों ने चंद्रशेखर को शहरी विकास खासतौर पर भवन-निर्माण के क्षेत्र में कुछ नया करने की राह दिखायी। उनका काम पूरी तरह से पेशेवर और मांग यानी बाजार पर आधारित है। अपने ग्रीन बिल्डिंग का पहला माॅडल उन्होंने 1995 में पेश किया और 2003 से टीजेड के निर्माण में लगे। संसाधनों पर शहरी लोगों और उनकी जीवशैली से पड़ने वाले बोझ को कम करना उनका मकसद है। मुंबई में एक सम्मेलन में किसी ने उन्हें बताया भारत के शहरों में बसने वाली 40 फीसदी आबादी 75 फीसदी संसाधनों का इस्तेमाल करती है और सकल घरेलू उत्पादन में 60 प्रतिशत का योगदान करती है। इस जानकारी ने चंद्रशेखर की सोच को काफी प्रभावित किया। नतीजा आज टीजेड जैसे हाउसिंग काॅत्पलेक्स के रूप में सामने है जो एक बैकल्पिक शहरी आवासीय जीवन शैली मुहैया कराता है, वो भी मौजूदा जीवन  शैली से समझौता किए बगैर, पर्यावरण संरक्षण के सभी मानकों को पूरा करते हुए।


फिलहाल 30 लाख से डेढ़ दो करोड़ की कीमत वाले इन फ्लैट को हरिहरन कम लागत में भी लेकर आना चाहते हैं। और 7 से 10 लाख में भी ऐसे मकान बनाना चाहते हैं। टीजेड बीसीआईएल की पांचवी परियोजना है। हरिहरन कहते हैं और भी कंपनियां इस क्षेत्र में गंभीरता से काम कर रही हैं क्योंकि भविश्य इसी का है। बंगलूरू के अलावा उनका मैसूर, कुर्ग, गोवा और लोनावाला में भी इको-टुरिज्म के तहत ग्रीन बिल्डिंग परियोजनाओं पर काम चल रहा है। टीजेड से पहले बंगलूरू में बीसीआईएल की चार और परियोजनाओं में भी संरक्षण के प्राथमिक सिद्धांतों का ध्यान रखा गया था। लेकिन टीजेड भवन निर्माण को बिल्कुल नए सिरे से परिभाषित करता है। यह उपभोग को उत्पादन और पुर्नउत्पादन के साथ जोड़ता है और वो भी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के साथ। मसलन इंटों की जगह पर फ्लाई एश ब्लाॅक्स का प्रयेाग, प्लास्टर के लिए सीमेंट के बजाए मिट्टी और फर्श के लिए कडप्पा और कोटा पत्थर। दीवारों को पेंट फ्री सामग्री से बनाया गया है और प्राकृतिक तापमान नियंत्रण तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। साथ ही वैसी ही लकड़ियों का इस्तेमाल किया गया है जिनकी प्लांनटेशन होती है। टीजेड की उपलब्ध्यिां गौर करने लायक हैं मसलन, यहां निगम का पानी नहीं लिया जाता, सीवर लाईन की यहां जरूरत नहीं है क्योंकि पानी को रीसाईकल कर बागवानी में प्रयोग किया जाता है और फिर इससे भूजल को रिचार्ज किया जाता है। रेफ्रिजरेषन और वातानूकुलन में सीएफसी और एचसीएफसी का उत्सर्जन नहीं होता है। इस तरह कुल 20,000 टन कार्बन उत्सर्जन रोका जाता है।
हरिहरन बताते हैं भारत ग्रीन बिल्डिंग अभियान के अग्रणी देशों में से एक है। फिलहाल भारत में 321 मिलीयन वर्ग फुट प्रमाणित ग्रीन बिल्डिंग है जो अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा है। लेकिन गुणवत्ता के मामले में भारत अमेरिका से आगे है। 2012 तक सीआईआई इंडिया इसे 1 बिलीयन वर्गफुट तक करने का लक्ष्य रखता है।
आवासीय भवनों के मामले में भी भारत का स्थान दूसरा है। हरिहरन कहते हैं संभवतः आने वाले समय में सभी सरकारी भवनों का ग्रीन बिल्डिंग होना अनिवार्य हो जाएगा साथ ही उर्जा के संदर्भ में उनका पांच नहीं ंतो तीन स्टार होना अनिवार्य हो जाएगा। उनके मुताबिक इससे बहुत फर्क पड़ेगा क्योंकि सरकार ने 580 सेज को मंजूरी दी है जिनमें लगभग 400 पर काम षुरू होने वाला है। 1,200 विशवविद्यालय बनने हैं ऐसे में सरकार की ओर से हरित दिशानिर्देष होना बहुत जरूरी है। दरअसल, भवन निर्माण से जुड़े सभी पक्षों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की जरूरत है क्योंकि अभी भी मात्रः 2 प्रतिशत निर्माण ही वास्तुकारों के दिशा-निर्देश में होता है।


चंद्रशेखर बीसीआईएल अल्टरनेटिव टेक फाउंडेशन के भी संस्थापक हैं। यह संस्था उर्जा और इंटेलीजेंट बिल्डिंग प्रबंधन में प्रयोग करती है। और ग्रीन आईडिया लैब की स्थापना में भी इनकी अहम् भूमिका रही। यह संस्था षहरी परिप्रेक्ष्य में ग्रीन बिल्डिंग के लिए जरूरी फ्रेमवर्क पर परामर्श श्मुहैया कराती है। पिछले दो दषक में उन्होंने कई सफल दीर्घकालीन योजनाओं को लांच किया है। 2006 में एडीबी वाटर चैंपियन अवार्ड हासिल करने वाले 63देषों के नौ एषियन में से वे पहले भारतीय हैं।
बंगलूरू में चित्रा विशनाथ जैसे वास्तुकार भी हैं जो इको-फ्रेडली जैसे शब्दों के चलन में आने से काफी पहले से इसे खुद के जीवन शैली का हिस्सा बना चुकी हैं। चित्रा के घर में आपको न ए.सी, पंखे की जरूरत होगी और न ही दिन के समय कृत्रिम रोशनी  की। उर्जा और जल संरक्षण को वो काफी पहले ही अपने जीवन-शैली का हिस्सा बना चुकी हैं। बंगलूरू में ही अब तक 500 से ज्यादा इको-फे्रन्डली भवन डिजायन कर चुकी हैं वों। चित्रा कहती हैं मांग बढ़ रही है इसलिए मेरे जैसे इको-फ्रेन्डली वास्तुकारों के लिए काम बढ़ रहा है। भविश्य ऐसे ही वास्तुकारों का है इसलिए नए वास्तुकार भी  इसी राह पर चल रहे हैं। 1990 से भवन-निर्माण डिजायन से जुड़ी चित्रा कहती हैं-हमने कुछ नया नहीं किया बल्कि स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल कर अपने जीने की बुनियादी सुविधाएं जुटाने, बनाने के हमारे पारंपरिक तरीकों को ही आधुनिक वास्तुकला में समायोजित किया है। बंगलूरू के अलावा चित्रा ने दिल्ली, मध्य-प्रदेष, हैदराबाद, मुंबई और कोलकाता के भी कुछ भवनों को डिजायन किया है और ये सभी इमारतें पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल हैं। चित्रा कहती हैं, ऐसी इमारतों में आकर सात्विकता का अनुभव होता है, जैसे प्रकृति एकदम आपके साथ है।

अपने घर के बारे में बताती हुई वो कहती हैं मेरा घर 15 साल पुराना है और 18 सौ वर्ग-फुट का है लेकिन अभी तक मुझे इसके रखरखाव पर मात्र 17 हजार रूपए खर्च करने पड़े है और मेरा बिजली का बिल सभी उपकरणों के इस्तेमाल के बावजूद 400 रूपए तक ही आता है इसकी वजह घर का प्राकृतिक प्रकाष पर ज्यादा निर्भर रहना और तापमान के लिए अनुकूलित तकनीक और सामग्री से बना होना है। चित्रा अपने भवनों में पेंट का इस्तेमाल नहीं करती हैं इसके बजाए प्लास्टर में मिट्टी का प्रयोग करती हैं और ईंट की शैली वाली दीवार बनाती हैं, जिन्हें पेंट की जरूरत नहीं पड़ती है। चित्रा कहती हैं-वैसे भी भारत में आज भी वही लेड वाले पेंट बिक रहे हैं जिन्हें 36 साल पहले यूरोप में बैन कर दिया गया था और 17 साल पहले अमेरिका में। इसी साल से भारत में लेड-मुक्त पेंट बिकने षुरू हुए हैं लेकिन लेड वाले पेंट पर रोक नहीं लगी है। चित्रा के पति विष्वनाथ जल संरक्षण से गहरे जुड़े हैं वे  रेनवाटर क्लब के मार्फत  वर्षा जल संरक्षन को आधुनिक निर्माण से जोड़ रहे हैं। चित्रा के द्वारा डिजायन की गई सभी इमारतों में वर्षा जल संरक्षण का विषेश प्रावधान होता है।
पिछले बारह साल से बंगलूरू में रह रहे फ्रीलांस पेंटर और म्यूरल आर्टिस्ट संजय सिंह के घर की वास्तुकार चित्रा विष्वनाथ ही हैं। संजय कहते हैं बंगलूरू में पर्यावरण अनुकूल इमारतें लोकप्रिय हो रही हैं और जगहों के मुकाबले यहां इकोफ्रेन्डली इमारतों की संख्या बढ़ रही हैं। वो खुद अपने अनुभव बताते हुए कहते हैं-वर्षा जल संरक्षण के कारण मेरा घर पानी के मामले में लगभग आत्मनिर्भर है। मेरे घर में पेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया है और प्राकृतिक प्रकाश व हवा के अधिकतम इस्तेमाल का प्रावधान है। संजय सिंह के घर में भी ए.सी छोड़ें बिजली के पंखें तक नहीं हैं। संजय बताते हैं-दरअसल इको-फ्रेन्डली घर और सामान्य घर बनाने में लगभग खर्च बराबर ही आता है लेकिन लंबी अवधि में यह किफायती साबित होता है क्योंकि इसके रखरखाव का खर्च बच जाता है साथ ही पानी और बिजली पर होने वाले अतिरिक्त खर्च में भी बचत होती है।

कृतिदेव फान्ट में टाईप सामग्री को ब्लाग पर प्रकाशित करने के लिए कोई टूल बताएं

ब्लागर बंधुआे आप सब से एक मदद चाहिए, क्या आपलोग मुझे कोई एेसा
टूल बता सकते हैं जिसकी  सहायता से मैं कृतिदेव  फान्ट में टाईप सामग्री को
ब्लाग पर प्रकाशित करने योग्य फान्ट में कन्वर्ट का सकने में सक्षम हो सकुं।
आप सबके जवाब का इंतजार रहेगा।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

बदल रही है फिजा

बंगलूरू में रहने वाली बयालीस साल की अमूधा की सकि्यता को देखकर कहीं से एेसा नहीं लगता कि वो पिछले नौ साल से एचआईवी पाजीटिव हैं। दस साल पहले पति के एचवाईवी पाजीटिव होने का पता चलने पर इन्होंने अपना टेस्ट कराया तो अमूधा को खुद के एचआईवी पाजीटिव होने का पता चला। पति तो साल भर   बाद चल बसे लेकिन अमूधा आज अपने तीन बच्चों समेत सभी के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। बेशक यह इतना आसान नहीं था,शुरूआती दो साल बहुत कठिन रहे, समाज में खुलकर अपने एचआईवी पाजीटिव होने का िजक्र करना बहुत मुशिकल था, पहली मुिशकल तो घर से ही शुरू हो गई जब उनकी गलती नहीं होने पर भी ससुराल वालों ने इन्हें बहिष्कृत कर दिया। फिर अगरबत्ती बनाकर परिवार का जैसे तैसे पालन पोषण शुरू किया। सरकारी पुनर्र्वास सूची में अमूधा के परिवार की संख्या 74 थी, ये सब देखकर वो अंदर से टूटने लगीं फिर ख्याल आया, मैं ही नहीं मुझसे आगे 73 परिवार आैर भी हैं, जिदंगी उनके लिए भी तो मुिशकल ही होगी। हांलाकि अमूधा के अपने माता पिता ने उनका काफी साथ दिया। लेकिन पति की मौत के बाद वो आज भी अपने ससुराल वालों से अपनी संपत्ति का केस लड़ रही हैं। अमूधा कहती हैं शुक्र है मेरे तीनों बच्चे एचआईवी निगेटिव िनकले। आज मैं अरूणोदया नेटवक आफ पाजीटिव पीपल की जिला अध्यक्ष हंू आैर कनार्टक पाजीटिव वुमैन की सचिव। साथ ही एसपीएईडी के मिलन प्रोजेक्ट में काम करती हंू आैर अपने ही जैसे लोंगों की काउंसििलंग करती हंू। उन्हें जीवन के आगे के संघष के लिए प्रेरित करती हंू। इन दस सालों के बारे में बात करते हुए वो कहती हैं । अब माहौल बदल गया है। हम खुलकर अपने बारे में अपने हक के बारे में बात करते हैं,मेरी झिझक मेरे बच्चों ने खत्म की जब 2004 में एक पत्रकार ने मुझपर स्टोरी करने के िलए मुझसे संपकर् किया। मैं तैयार नहीं थी, लेकिन मेरे बच्चों ने मुझसे कहा, किसी को तो आगे आना होगा, तुम्हे अपनी बात रखनी चाहिए] तभी आैर लोग भी सामने आएंगे, मेनस्ट्रीम में बगैर किसी झिझक के शामिल होंगे। अमूधा कहती हैं एचआईवी पाजीटिव के जीवित रहने की संभावना दस,बीस, तीस साल कुछ भी हो सकती है। अमूधा खुद आज किसी भी दवा का सेवन नहीं करतीं,बस नियिमत जांच कराती हैं आैर अपना हर तरह से ख्याल रखती हैं।
कुछ इसी से मिलती जुलती कहानी है सरोजा पूत्रम की, पिछले दस साल से एचआईवी पाजीटिव सरोजा आज किसी भी दवा का सेवन नहीं करतीं। सरोजा को भी अपने पति से ही एचआईवी संक्रमण हुआ था आैर ससुराल वालों ने उन्हें ही तिरष्कृत किया था। आैर तो आैर उन्हें अपना दूसरा बच्चा भी एचआईवी पाजीटिव होने के कारण खोना पड़ा। अपने माता पिता का साथ नहीं मिला होता तो शायद जीना इनके लिए मुमकिन नहीं हो पाता। हांलाकि सरोजा के भाई बहनों की शादी नहीं होने के कारण उनके पिता ने शुरू में अपनी बेटी के एचआईवी पाजीटिव होने की बात समाज में नहीं खोली। बहरहाल, आज सरोजा के भाई बहन उनका सबसे बड़ा संबल हैं आैर वह पूरी सक्रियता के साथ एड्स पीड़ितों के लिए काम कर रही हैं आैर कर्नाटक पीपल लीविंग विद एचआईवी/एड्स की अध्यक्ष हैं। इस संगठन में 42 हजार महिलाआे का नामाकंन है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

स्वागत है तुम्हारा हमेशा ही

 
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सादा सा पन्ना
हाथों में कलम या कि तुलकिा
आैर कुछ इन्द्रध्नुषी रंग
एक अतीत
सुनहरा खटटा मीठा
सारी बातें
अब यादें.......

क्यु याद है ना!
साथ् साथ् चले थे
उन पहचानी सी
सड़कों पर
जिसे आंख खोलते के साथ
भ्रर लिया था हमने,
अपनी आंखों में
जैसे, हवाआे को
सांसों मे,
साथ साथ हंसे थे,
झगड़े थे, रूठे थे
मने थे, खेले थे
ये सब बातें
अपने, हमारे बारे में,
जिन्हें हमने हां,
सिफर्र् हमने ही तो
देखा था, महसूसा था
आैर इस क्रम में
वक्त कैसे
आगे निकल आया
आैर हम
इस मोड़ पर


वक्त के साथ
बहुत कुछ पीछे....
बहुत पीछे छुट जाता है
"अपने होने की "
चाहत और शर्त पर!
फिर भी
बहुत स्वभाविक है न-
कि पुरानी तस्वीरे
पार्क में खेलते बच्चे
बहुत कुछ याद दिला जाते हैं
चुपके से........
जैसे, अपनी गुडि़या की शादी,
टीचर.टीचर का खेल
अमरूदों की चोरी।

आैर युं ही
स्मृतियों पर पड़ी गर्द
थोड़ी धुली
पुरानी कड़ी फिर जुड़ी
भुली नहीं ना!
"एक मुक आमंत्रण"
छिपा है दूर कहीं......
हमेशा ही!

अब उकेर भी दो
कुछ रेखाएं आड़ी, तिरछी
आैर..........
फैला दो
इन्द्रधनुषी रंगों को
उस सादे से पन्ने पर
स्वागत है तुम्हारा हमेशा ही।

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

फेसबुक पर फतवा

िमस्र के एक बहुत बड़े मौलवी साहब शेख्न अब्देल हमीद अल.अत्रास ने ताजातरीन फरमान फतवे के रूप में यह जारी किया है कि मुसलमानों को फेसबुक जैसे नेटवकिर्ंग साईट का इस्तेमाल नहीं करना चािहए। यह इस्लाम के िवरूद्ध है आैर इन साईटों का इस्तेमाल करने वालों को गुनहगार समझा जाना चािहए। मौलवी साहब का कहना है कि आंकडों के मुतािबक   फेसबुक आैर इस जैसे नेटवकिर्ंग साईट के प्रचलन के बाद से तलाक के मामले काफी बढ गए हैं आैर बेवफाई के मामलों में भ्ी काफी इजाफा हुआ है। हांलाकि वो फेसबुक के जिरए इस्लाम का प्रचार.प्रसार के पक्ष में हैं लेकिन इससे आगे इसका इस्तेमाल गैरइस्लामी करार देते हैं।
वैसे उनकी यह बात  कम िदलचस्प नहीं कि शौहर के काम पर िनकल जाने के बाद बीबी घ्ार में आनलाईन आिशकी फरमाती हैं आैर सीधे सीधे शरीया का उल्लंघ्न करती है। आंकड़ों के मुतािबक िमस्र में होने वाले पांच तलाक में से एक मामले में  सीधे तौर पर फेसबुक का हाथ् होता है।

चलते चलते
तुकी के एक गांव में 16 साल की एक लड़की को महज इसिलए अपने ही परिवार वालों के द्वारा  जिंदा दफन दिया गया क्योंकि उसने लड़कों से बात करने की हिमाकत की  थ्री।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.