मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

तुम हो, ये यकीन है मुझे !



                 1

कहना होता है मुझे, छिपा लेता हूँ
सोचता हूँ हर वक़्त पर, सामने झटक देता हूँ
चाहता हूँ सब जिक्र करें तुम्हारा, कर दें कोई,
तो  बन जाता हूँ अनजाना,
ये सब करते हुए जानता हूँ मैं
कितना झूठा हूँ मैं
सौ बार कहता हूँ तुमसे ज्यादा खुद से,
कुछ नहीं हमारे बीच
जबकि सारा दिन कुछ  पलों
की आग में तपता निकाल देता हूँ
मैं डरता हूँ, खुद से ज्यादा तुम्हारे लिए ,
करता हूँ सारे वो  जतन ,जैसे तुम हो ही नहीं
पर,  लौटता हूँ जब रातों को पास अपने
लौट आती हो तुम भी !


              2

कितना त्रासद है
जब हम चाहकर भी,
अपनी कमजोरी
छिपा न सकें,
कमजोरी,
खुद की तकलीफों से,
बाहर नहीं आ पाने की
दुर्बल होना
कितना दयनीय,
कितना दुखद है
तब और भी,
जब अपनी एक दुनिया
सब से छिपाने के लिए ही
बनायी होती है
तुम मिलते हो वहां
उसी पल में
मैं मिलती हूँ वहां
उसी मौसम में
लौटते तो कई बार हैं
पर, खिंच जाता है
वो पल, वो मौसम
हर बार वर्तमान में ! 
     

         3

तुम्हें सुनते हुए
तुम्हें कहते हुए
छलक जाती हैं
आँखें,
रह जाते हैं लगभग सारे
जरूरी शब्द गले तक
और,,,,,सारे  बेमतलब
बाहर !
तुम्हे प्यार करते हुए
आसमान की चाहत में
हो जाती हूँ मैं धरती
भूल जाती हूँ
उन तमाम तकलीफों को
जो लगा मुझे
तुम जानकार भी नहीं जानते
बावजूद इसके हर बार
सौपना चाहती हूँ मैं तुम्हें
अपनी सारी खुशबू , सारे रंग
और सारे गीत
बदले में तुमसे नहीं
इश्वर से कहती हूँ
तुम हो, ये यकीन है मुझे !


रविवार, 21 अप्रैल 2013

नशा खत्म बस बाकी है हैंगओवर !




मुझे याद है ये 2006 के आखिरी दिनों की बात है जब मैंने ऑरकुट के बारे में जाना , अजय का अकाउंट था और मुझे बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि इसके जरिये अपने भूले-बिसरे दोस्तों को खोजा जा सकता है,  उसी अकाउंट से मैं कुछ मयूचुअल दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों से कनेक्ट हुई ! बाद में अपना अकाउंट खोला  और कुछ  दोस्त मुझसे कनेक्ट हुए और  कुछ से मैं! इसी बीच फेसबुक और ट्वीटर आ गए, वहां भी अपना खाता खोल दिया पर ज्यादा आवाजाही फेसबुक पर ही रही, ट्वीटर पर  सिर्फ उन लोगों को कभी-कभार पढ़ लेने के लिए गयी जिन्हें फॉलो कर रही थी ! फेसबुक के शुरुआती दिन बड़े खुमारी वाले थे दस-दस, पंद्रह साल से जिनके बारे में कुछ सुना नहीं था उन दोस्तों, उनके दोस्तों बच्चों, मियां और बीवी के फ़ोटोज़ देखकर बहुत अच्छा लगता था ! अब जो यहाँ नहीं थे वो ही दूर हो रहे थे, पर साल दो साल होते होते ये सब बोरिंग हो गया ! यहाँ सब अच्छा था, सब लोग खुश, खाते-पीते, छुट्टियाँ मनाते, एन्जॉय करते दिख रहे थे! हिंदी स्कूल वालों की भी अंग्रेजी बहुत अच्छी हो गयी थी, उनके स्टेटस की अंग्रेजी बयां करने लगी थी कि उनका "क्लास " चेंज   हो चूका है ! वैसे यहाँ सब कुछ था पर घंटों बिना कुछ बोले हुए  भी एक दुसरे की उदासियों को पी लेने वाला बेमतलब का  साथ नहीं था!

 नेटवर्किंग साइट्स ने दोस्तों को बदल दिया है, हो सकता है ये मेरा ओब्ज़रवेशन हो पर कहीं कुछ तो बदला जरूर है ! जिन्हें आप बिलकूल नहीं जानते और सिर्फ जिन्हें पढने के लिए आप उनसे कनेक्ट होते हैं उन्हें छोड़ दें,  पर असली दोस्त यहाँ ज्यादा सतही लगने लगे हैं, दोस्ती का मतलब एक-दूसरे की पोस्ट या फोटो को लाइक करना ही रह गया है, कमेंट वाले दिन भी अब बीती बात होने लगे हैं! जबकि ये कितना असहज भी होता है हम ऐसे घरों से आते हैं जहाँ किसी अपने की उनके मुहं पर शायद ही तारीफ़ की जाती है और इन साइट्स के आने से पहले भी हम दोस्तों की तारीफ़ से ज्यादा उन्हें लेकर क्रिटिकल हुआ करते थे , जी भर कर खिंचाई!  स्टेटस लिखकर क्रांति करने या करवा लेने का भ्रम पैदा करने वालों का जादू भी लगभग टूट ही चूका है, असली सेलेब्रिटी कुछ दिन यहाँ आकर चले गए या जो नहीं गए वो जाने की सोच रहे हैं ! समय रहते उन्हें अक्ल आ रही है, ज्यादा आम रहे तो ख़ास नहीं रहोगे, अपने आगे -पीछे की इमेज मिस्ट्री  बरक़रार रहनी चाहिए ! पर पिछले कुछ सालों में बेऔकात वाले कुछ लोगों ने इन नेटवर्किंग साईट'स पर आकर जरूर सेलेब्रिटी दर्ज़ा हासिल कर लिया  इसमें मीडिया वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही है, पांच-पांच  हज़ार की फ्रेंड लिस्ट वाले ये लोग कुछ भी लिख दें कोई भी फोटो लगा दें कमेंट्स और लाइक्स की बरसात होने लगती पर  ये स्थितप्रग  भाव में ही नज़र आते महसूस होते हैं  (लैपटॉप पर शायद मुस्कुराते हों पर वो दीखता तो उनको ही होगा ) और कुछ-एक  को छोड़कर  शायद ही कभी दूसरों की पोस्ट पर गौर फरमाते हो ! बहरहाल, ये एकतरफा कदरदानी भी कब तक चलेगी,  इसलिए सौ -दो सौ और पांच सौ या हज़ार की फ्रेंड लिस्ट वाले भी अब अपने आप को कम नहीं समझ रहे हैं  और इन लोगों का एकाधिकार तोड़ते हुए आपस में ही एक मुचुअल  एडमिरेशन ग्रुप बनाने लग गए हैं, अब शायद इन्हें ज्यादा अच्छा महसूस होने लगा है!
लेकिन आत्मप्रचार और आत्ममुग्धता की भी एक हद होती है आखिर कितने  दिनों और साल तक सिर्फ तारीफें लीं और दीं जा सकती हैं ! अब शायद मोहभंग का दौर आ गया है या आनेवाला है कोई  कितना कहें  और कोई कितना सुने या पढ़े  ...कोई कह कह के खाली हो रहा है और कोई पढ़ पढ़ के सर से पैर तक पक रहा है ! शायद अब जो यहाँ नहीं हैं उन्हें याद करने, उनके पास लौटने के दिन आ रहे हैं, उन बेवकूफियों के पास जो  अंतर्जाल में नहीं बल्कि असली रास्ते के किसी मोड़ पर इत्मीनान से बैठे हुए हैं ! हो सकता है उन्हें किसी का इंतज़ार नहीं हो पर कोई आकर हाथ थामने को मांगे तो पकड़ने की फुर्सत अब भी है उनके पास !  

   








इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.