गुरुवार, 25 मार्च 2010

कर्नाटक से केरल भाया बांदीपूर


For Public Agenda
भारत में वन्य जीवों की संख्या, विकास और शहरीकरण के कारण खतरनाक रूप से कम होती जा रही है। इनके प्रति हमारी असंवेदनशीलता का ही नतीजा है कि आज बाघों की संख्या बस हजार से कुछ उपर रह गयी है। जबकि हमारे अस्तित्व के लिए इनका बचे होना भी अनिवार्य है। बहरहाल, हाल ही में कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस दिशा में एक उल्लेखनीय फैसला दिया है। जिससे न सिर्फ कर्नाटक बल्कि देश के सभी वन्य जीव प्रेमी और पर्यावरणवादियों में खुशी की लहर है। आखिर इस फैसले ने वन्य जीवों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक अधिवास में हमारी गतिविधियों के प्रति संवेदनशील नजरिया रखने की हिमायत की है।               
दरअसल, हाल ही में कर्नाटक हाई कोर्ट ने बांदीपूर-मधुमलाई जो कि कर्नाटक-तमिलनाडू में आता है और बादीपूर-सुल्तान बाथेरी जो कि कर्नाटक-केरल का इलाका है में रात में होने वाले अंतरराज्यीय यातायात पर रोक लगा दी है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने बांदीपूर संरक्षित वन क्षेत्र से गुजरने वाले कोझीकोड-मैसूर राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-212 और उटी-मैसूर राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-67 पर यातायात पर रात नौ बजे से सुबह छः बजे तक रोक लगा दी है। और  कर्नाटक सरकार को माननथावाडी को जोड़ने वाली  मैसूर-कुट्टा रोड को छः महीने के भीतर ठीक करने को कहा है, ताकि रात में इस सड़क का वैकल्पिक मार्ग के तौर पर इस्तेमाल हो सके।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने यातायात पर रोक को जनहित में बताते हुए कहा कि इससे दुर्लभ वन्य प्राणियों और बाघों की सुरक्षा में मदद मिलेगी। अदालत ने ये भी कहा कि मानवता को बदलते समय के साथ चलना चाहिए। वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए यह छोटा सा त्याग बहुत बड़ा असर पैदा कर सकता है जबकि यह सिर्फ हमारे संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वाह भर है।
जस्टिस वी गोपाल गौडा और जस्टिस बी एस पाटिल की खंडपीठ ने केरल सरकार, एफ.आर फ्रावेश और अन्य के द्वारा 14 अगस्त 2009 को बांदीपूर के मुथंगा-गुंदलपेट मार्ग पर रात में वाहनों की आवाजाही पर लगी रोक को हटाने संबंधी दायर याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए रोक को जारी रखने का आदेश दिया है। गौरतलब है कि बांदीपूर से होकर जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग 212 मैसूर से कालपेट्टा, सुल्तान बाथेरी होते हुए जाता है और एनएच 67 मैसूर से गुंदलपेट होकर। रात में इसके बंद होने पर केरल के ट्रांसपोर्टर को वैकल्पिक मार्ग से जाना होगा।
दरअसल इस विवाद की शुरूआत पिछले साल ही हुई । रात में वाहनों की तेज रफ्तार की चपेट में आकर  बांदीपूर क्षेत्र में वन्य जीवों होने वाली मौतों के कारण  कर्नाटक वन विभाग बहुत लंबे समय से रात में इस क्षेत्र में यातायात पर रोक लगवाने पर विचार कर रहा था। आखिरकार, पिछले साल 3 जून को चामराज नगर जिले के डिप्टी कमिष्नर मनोज कुमार मीणा ने बांदीपूर संरक्षित वन क्षेत्र में एनएच-212 और एनएच-67 के लगभग 30 किलोमीटर के हिस्से में पर रात 9 से सुबह 6 बजे तक यातायात पर रोक लगा दी। लेकिन केरल और कर्नाटक दोनों राज्यों की ओर से पड़ रहे दवाब के कारण मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने उन्हें सात दिनों बाद 10 जून को  रोक हटाने का निर्देश दे दिया। इस आदेश को वापस लिए जाने के पीछे राजनीतिक दवाब के अलावा ट्रक लाॅबी के भी सक्रिय होने की आशंका जतायी गई थी।
अब  कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस आदेश को पुनः बहाल कर दिया है। उल्लेखनीय है कि डीसी के इस आदेश के विरोध में बंगलूरू के वकील और पर्यावरणप्रेमी एल श्रीनिवास बाबू ने जनहित याचिका दायर की थी जिस पर हाई कोर्ट ने 29 जुलाई को श्रीनिवास के पक्ष में आदेश दिया था। और डी सी ने पुनः 1 अगस्त 2009 से रात में यातायात पर रोक लगाने का आदेश दे दिया। साथ ही दो बैकिल्पक रूट सुझाए थे, मैसूर और उटी के लिए साथे होकर जो 78 किलोमीटर ज्यादा लंबा है और मैसूर से कालपेट्टा के लिए पोनमपेट होकर, जो 38 किलोमीटर ज्यादा लंबा है। दिलचस्प बात ये है कि केरल और तमिलनाडू सरकार, के अलावा केएसआरटीसी, केरल व्यापारी व्यवसायी इकोपना समिति वायनाड, और केरल-कर्नाटक यात्री फोरम के साथ  कर्नाटक सरकार ने भी रोक को हटाने के लिए अर्जी दी थी। बहरहाल,  इस फैसले से तमिलनाडू को कोई आपत्ति नहीं है,जबकि कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के अनुरूप चलने की घोशण की है और केरल से जोड़नेवाली सड़क एनएच-212 को जल्द से जल्द वैकल्पिक मार्ग के तौर पर विकसित करने का आशवासन दिया है। कर्नाटक सरकार के एडवोकेड जनरल अशोक हारनहल्ली ने कहा कि वैकल्पिक मार्ग मौजूदा मार्ग से 20-30 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं होगा और इसे छः महीने के भीतर इसे यातायात योग्य बना दिया जाएगा।
लेकिन केरल ने इस मसले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का फैसला किया है। दरअसल, केरल सरकार का मानना है कि इस फैसले  से केरल की अर्थव्यस्था और जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। खासतौर पर वायनाड और उसके आसपास रहने वाले लोगों को इससे परेशानी हो रही है। क्योंकि यहां सब्जियों की आपूर्ति कर्नाटक के गुंदलपेट से होती है। जिसे रात में ही ढ़ोया जाता है। साथ ही लोगों को ज्यादा दूरी तय करनी होगी। इसके अलावा बंगलूरू में काम करने, पढ़ाई करने वाले लोगों को भी इससे खासा परेशानी हो रही है, और व्यापारियों को नुकसान भी। यही वजह है कि मालाबार चैंबर्स आॅफ कामर्स ने राज्य सरकार से बंगलूरू और उत्तरी केरल के बीच बेहतर रेल सुविधा मुहैया कराने की मांग की है। इसके अलावा केरल का यह भी मानना है कि यह रोक केवल वन्य जीव संरक्षण के लिए नहीं है, क्योंकि वैकिल्पक मार्ग को माननथवाडी-कूटा सेक्टर से होकर ले जाने का प्रस्ताव है जो कि वायनाड अभ्यारण्य से होकर ही जाता है। इसलिए केरल की मांग है कि कर्नाटक को वाहनों की गति, को नियंत्रित करने और इस क्षेत्र में व्यवसायिक गतिविधियों पर रोक लगाने जैसे उपायों पर जोर देना चाहिए। साथ ही उनका ये भी कहना है कि यह मार्ग 300 साल पुराना है, फिर आज अचानक इससे कैसे समस्या हो सकती है। इस संदर्भ में कर्नाटक के एडवोकेड जनरल अशोक हारनहल्ली कहते हैं कि वाहनों की संख्या और आवृति बहुत ज्यादा बढ़ गयी है अतः फैसले को इस नजरिए से देखा जाना जरूरी है। केरल द्वारा मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने के सवाल पर भी एडवोकेड जनरल का कहना है कि हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी कोई आपत्ति नहीं होगी। कर्नाटक सरकार वन्य जीवों के संरक्षण को लेकर काफी गंभीर है।
बहरहाल, कर्नाटक हाई कोर्ट के इस फैसले पर विरोध को लेकर केरल में मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंद से लेकर युनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और व्यापारी संघ सभी एक मंच पर हैं। यहां तक कि केरल व्यापारी व्यवसायी इकोपना समिति वायनाड इसे सीधे-सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकार का हनन मानता है। जबकि वायनाड प्रकृति संरक्षण समिति और ऐसी ही कई अन्य पर्यावरण संस्थाओं ने यातायात पर रोक का यह कहते हुए स्वागत किया है कि जब तक केरल में भी इसी तरह बेलगाम रात्रिकालीन यातायात पर रोक नहीं लगता तब तक बांदीपूर में वन्य जीव संरक्षण अधूरा है। 

दरअसल, बांदीपूर,नागरहोले,मधुमलाई और वायनाड का यह  सम्मिलित इलाका बाघों की संख्या के मामले में देश का दूसरा सबसे बड़ा इलाका है। यहां  2,500 वर्ग किलोमीटर में लगभग 300 बाघों के होने का अनुमान है। देश में बाघों की मौजूदा संख्या को देखते हुए इस इलाके को हर प्रकार के सरंक्षण की जरूरत है। अनुमानतः बांदीपूर से प्रति मिनट 15 से 20 वाहन गुजरते हैं। जिनमें लगभग 400 तक सब्जियों के ट्रक और करीब 300 बालू से लदे ट्रक होते हैं, इसके अलावा हजारों पर्यटक वाहन भी। इसी आधार पर कर्नाटक राज्य वन विभाग ने बांदीपूर में गुंदलपेट और उटी को जोड़ने वाले एन एच 212 और गंुदलपेट और सुल्तान बाथेरी को जोड़नेवाले एनएच-67 पर रात में यातायात पर लगी रोक को हटाए जाने का विरोध किया था। जबकि कर्नाटक सरकार ने रोक हटाने का निर्देश दिया था।
बांदीपूर राष्ट्रीय उद्यान में एनएच-212, 17.5 किलामीटर तक केरल के वायनाड राष्ट्रीय उद्यान से होकर गुजरता है और एनएच-67, 12.5 किलोमीटर तमिलनाडू से होकर गुजरता है। अंतरराज्यीय यातायात के कारण यह इलाका वन्य जीवों के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका था। अतः इस फैसले की अहमियत इस बात से भी समझी जा सकती है कि बांदीपूर नेशनल पार्क, वाईल्ड लाईफ कंजरवेशन फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल 2004 से 2007 तक की अवधि में ही इस इलाके में 200 से ज्यादा दुर्लभ वन्य जीव वाहनों की चपेट में आकर मारे गए हैं। इसके अलावा लगभग तीन बड़े जीव हर महीने मारे जाते हैं। और लगभग 65 प्रतिषत वन्य जीव रात में ही वाहनों की चपेट में आते हैं। जबकि इस वन के जितने क्षेत्र में रात में यातायात पर रोक लगी है वह कुल वन्य क्षेत्र का 2 प्रतिषत से भी कम है। वाहनों की चपेट में सबसे ज्यादा बाघ, हाथी, चीता, सांभर और लंगूर आते हैं। यही नहीं सड़क से सटे जंगल के लगभग 2 किलोमीटर भीतर का वन्य जीव अधिवास वाहनों के शोर और हाई बीम लाईट के कारण प्रभावित होता है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसी क्षेत्र में रात में यातायात पर रोक लगायी है। इसके अलावा रात में यातायात पर रोक से शिकार पर भी एक हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
बहरहाल, राज्य वन्य विभाग अधिकारियो और संरक्षणविदो के अनुसार पिछले छः महीने में इस इलाके में सड़क हादसे में मरने वाले वन्य जीवों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से 95 प्रतिशत से भी ज्यादा कमी आयी है। जबकि रोक से पहले लगभग 91 वन्य जीवों की मौत दर्ज की गई थी। जिसमें हाथी, बाघ, चीता और अन्य स्तनधारी व सरीसृप जैसे जीव शामिल हैं। यह काफी उत्साहजनक खबर है।

बुधवार, 17 मार्च 2010

मिलिए बंगलूरू की महिला पुरोहित स्वतंत्रलता शर्मा से

भारतीय आेपिनियन में प्रकाशित
आज महिलाएं तमाम किस्म के स्टीरियोटाईप को तोड़ रही हैं और हर उस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं जहां पहले कभी उनके होने या काम करने के बारे में सोचा भी नहीं गया था। अठत्तर बसंत से ज्यादा देख चुकीं स्वतंत्रलता शर्मा  का नाम भी उन महिलाओं की सूची में शामिल किया जा सकता है जिन्होंने धार्मिक कर्मकांड और संस्कार कराने जैसे पुरूष वर्चस्व वाले क्षेत्र में अपनी  चुनौती पेश की और लीक से हटकर अपने लिए राह बनायी।
जिस उम्र में आमतौर पर लोगों की सक्रियता खत्म हो जाती है, स्वतंत्रलता लोगों को सांसारिक संस्कारों से जोड़ती हैं और जन्म, मुंडन, शांतिपाठ, विवाह और मृत्यु जैसे संस्कारों को वैदिक रीति से संपन्न कराती हैं। 
स्टेला मेरीज काॅलेज से बी.ए और प्रेसिडेंसी काॅलेज चेन्नई से इकोनाॅमिक्स में एम ए स्वतंत्रलता ने शुरूआत मेरठ में काॅलेज में इकोनाॅमिक्स पढ़ाने से की। लेकिन उनकी किस्मत में कुछ और था और वो प्रोफेसर बनने के बजाए पुरोहित बन गई।
मूलतः अंबाला के पास की रहने वाली स्वतंत्रलता का जन्म वर्मा के रंगून में हुआ था। दूसरे विशव-युद्ध के समय उनके पिता को परिवार समेत पैदल ही वर्मा छोड़ना पड़ा था और 1949 में इनका परिवार चेन्नई में बस गया। इनके पिता आर्य समाज के सदस्य थे, वर्मा में भी इनके परिवार में वैदिक रीति से हवन और शांतिपाठ होते रहते थे। इसलिए पूजा-पाठ और वैदिक रीति-रिवाजों का संस्कार उन्हें बचपन से ही मिल गया था। वर्ष् 1961 में ये पति के साथ बंगलूरू आ गईं। इनके पति पेशे से वकील थे और बंगलूरू में उनका होटल व्यवसाय भी था। बंगलूरू में उन्होंने काफी सालों तक नर्सरी स्कूल भी चलाया। हालांकि शादी की शुरूआत में स्वतंत्रलता और इनके पति दोनों ने मेरठ में काॅलेज में अध्यापन कार्य किया था। बंगलूरू आने के बाद स्वतंत्रलता फिर से आर्य-समाज की गतिविधियों में सक्रिय हो गईं। यहीं पर इनकी मुलाकात वरिष्ठ आर्यसमाजी के. एल पोद्दार से हुईं। स्वतंत्रलता कहती हैं-पोद्दार जी से मेरा बहुत आत्मीय रिशता था, वो मुझमें अपनी बेटी की छवि देखते थे। उन्होंने ही मेरा गंभीर वैदिक साहित्य और भारतीय अध्यात्मिक परंपरा से परिचय कराया और मुझे ढे़रों किताबें पढ़ने को दी। वैदिक साहित्य को गहरायी से जान लेने के बाद मैंने प्रवचन देना शुरू किया और सत्संग में जाना भी।
अब तक चैदह सौ शादियां और तीस मृत्यु संस्कार संपन्न करा चुकी स्वतंत्रलता पुरोहिताई के क्षेत्र में आने को एक संयोग मानती हैं और खुद भी नहीं समझ पाती हैं कि कैसे वो धीरे-धीरे इसमें गहराई से उतरती चली गयीं। स्वतंत्रलता, नियति में पूरी तरह से यकीन करती हैं और मानती हैं कि  इश्वर हर किसी को इस दुनियां में खास मकसद से भेजता है और किसे क्या करना है यह पहले से ही सुनिशचत होता है।
बहरहाल, स्वतंत्रलता की पुरोहिताई की शुरूआत बहुत ही भयावह, मृत्यु-संस्कार के साथ हुई। एक पच्चीस वर्षीय युवक की मौत बंगारपेट में ट्रेन दुर्घटना में हो गई थी और स्वतंत्रलता को उसके रिशतेदार के साथ उसकी पहचान के लिए जाना पड़ा और फिर स्थितियां ऐसी बनीं कि स्वतंत्रलता को उसका क्रिया-कर्म कराना पड़ा। हांलाकि इससे पहले वो बंगलूरू और उसके आस-पास शांतिपाठ और हवन वगैरह जरूर कराती रही थीं। स्वतंत्रलता ने खुद अपने परिवार के लोगों का भी अंतिम संस्कार संपन्न कराया है,  अपनी  जिठानी और बहू की दादी का अंतिम संस्कार भी उनके हाथों ही हुआ है।  
शादियों को संपन्न कराने के बारे में बताते हुए स्वतंत्रलता कहती हैं-बात साल 1991 की है, एक दफा बंगलूरू में ही आर्य-समाज के पंडित छुट्टी पर चले गए थे और उसी दौरान एक विवाह संपन्न कराना था, पंडित नहीं थे अब शादी कौन संपन्न कराए? यह बड़ा सवाल था। आखिरकार उनकी एक दोस्त ने सुझाया तुम क्यों नहीं शादी  संपन्न करा देती, आखिर तुम्हें सारी विधि और मंत्र आते ही हैं। और इस तरह मैं शादियां भी संपन्न कराने लगी। हांलाकि शुरूआत में वो हिन्दी में ही संस्कार संपन्न कराती थीं पर बाद में उनकी किसी परिचित महिला ने उन्हें मंत्रों की व्याख्या अंग्रेजी में करने की सलाह दी और यही उनकी खासियत बन गयी। स्वतंत्रलता ने अब तक लगभग 1400 शादिया करायी हैं इनमें पूर्व केन्द्रीय मंत्री रेणुका चैधरी की बेटी ,इसरो के प्रोफेसर यू आर राव की बेटी, इंदिरा नूई की ममेरी बहन और खुद अपने परपोते की शादी शामिल है। स्वतंत्रलता कहती हैं-दरअसल, मैं उच्चारण पर बहुत ध्यान देती हंू और मंत्रों की व्याख्या अंग्रेजी में करने के कारण लोगों को समझ में आती हैं साथ ही मैं डेढ़ घंटे में ही शादी संपन्न करा देती हंू इसलिए खासतौर पर यंग जेनरेशन मुझे पसंद करती है। समाज में उनके विशिष्ट योगदान को देखते हुए बंगलूरू के रोटरी क्लब ने 2004 में इन्हें सम्मानित किया।
हांलाकि एक दो मौकों पर स्वतंत्रलता को महिला होते हुए पुरोहिताई करने के कारण विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन आर्य-समाज संस्था ने इनका साथ दिया और यह साबित किया कि वैदिक युग महिलाओं के साथ कोई फर्क नहीं करता था और उन्हें पुरूषाें के समकक्ष हर अधिकार देता था।
पुरोहिताई के अलावा स्वतंत्रलता भजन कंपोज करती हैं और गाती भी हैं। पहले वो कहानियां भी लिखती थीं जो हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका धर्मयुग में छपती थीं। स्वतंत्रलता सिर्फ संस्था यानी आर्य-समाज के लिए ही स्वांतः सुखाय यह कार्य करती हैं। पुरोहिताई उनकी आजीविका का जरिया नहीं है। पहले ये केवल बंगलूरू में ही शादियां कराती थीं लेकिन धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों में भी  इनके बारे में लोगों को मालूम चला और अब इनके पास पूरे देश से न्यौता आता है।

गुरुवार, 4 मार्च 2010

काले सफेद का जादूगर वी के मूर्ति



Published in Public Agenda
गरूदत्त की कागज के फूल, साहब बीबी और गुलाम और प्यासा जैसी फिल्मों को अपनी अपनी सिनेमैटोग्राफी से कालजयी बनाने वाले वी के मूर्ति को इस साल के दादा साहब फाल्के सम्मान के लिए चुना गया है। प्रकाश और छाया के बेमिसाल समायोजन से सेल्युलायड पर चित्रकारी करने वाली इस शख्सियत ने फिल्मों में अपने कैरियर की शुरूआत आरकेस्ट्रा में वायलिन बजाने की थी। पेश है उनसे गुरूदत्त उनकी फिल्मों, सिनेमैटोग्राफी तकनीक और उनके संस्मरणों पर की गई खास बातचीत।


अपने शुरूआती दिनों के बारे में बताएं?
-मैं मैसूर का हंू, बचपन से ही फिल्मों में दिलचस्पी थी। मेरे चाचा मूक फिल्मों के दौर में सिनेमा हाॅल में बैठकर संगीत बजाया करते थे। मैंने भी वायलिन सीखा था। बंगलूरू से मैंने सिनेमैटोग्राफी का कोर्स किया। उस जमाने में कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री नहीं थी, और तमिल, तेलगू में भी उतनी फिल्में नहीं बन रही थी, इसलिए मैं सीधा मंुबई चला गया।
हिंदी फिल्मों में ब्रेक कैसे मिला?
-साल 1946 में मैं जयंत देसाई की फिल्म महाराणा प्रताप में द्रोणाचार्य का सहायक सिनेमैटोग्राफर था। वहीं मैं ने पहली बार आम्रपाली में फली मिस्त्री के काम को देखा। उनकी सिनेमैटोग्राफी अंग्रेजी फिल्मों के स्तर की  थी। तभी से मैं उनके साथ काम करना चाहता था। बाद में फली ने खुद मुझे अपने साथ काम करने बुलाया। सच कहुं मैं आज भी नहीं जानता ऐसा कैसे हुआ शायद् इसे ही किस्मत कहते हैं। दरअसल, मैं वायलिन भी बजाता था, मैंने एक संगीत-निर्देशक के लिए वायलिन बजाया था और उसी के पैसे लेने गया था, वहीं पर किसी ने मुझे बताया कि फली साहब तुम्हें काम करने के लिए खोज रहे हैं। मैं तुरंत उनके पास गया, उन्होंने बतौर सहायक मुझे रख लिया। सुबह से शाम तक मैं काम करता रहा। शाम को उन्होंने कहा अब तक 23 असिस्टेंट कैमरामैन मेरे साथ काम कर चुके हैं तुम 24वें हो और यू आर द बेस्ट। मैंने 4-5 साल उनके साथ काम किया और खूब सीखा, वो मेरे गुरू थे। उस दौर में फरीदूर ईरानी, जल मिस्त्री, द्वारका दीवेचा भी अच्छे सिनेमैटोग्राफर थे। 

गुरूदत्त से कैसे मिलना हुआ ?
--वो जमाना स्टुडियो का था। फिल्में स्टुडियों में ही बना करती थीं। मैं तब फेमस स्टुडियों में बतौर सहायक कैमरामैन काम कर रहा था। चेतन आनंद ने अपनी फिल्म बाजी की शुटिंग के लिए इस स्टुडियो को किराए पर लिया था। देव आनंद फिल्म के हीरो थे। देव साहब के ही रिश्ते के भाई वी रात्रा  कैमरामैन थे और मैं उन्हें स्टुडियो की ओर से असिस्ट कर रहा था। फिल्म के निर्देशक गुरूदत्त  थे। रात्रा काम को लेकर उतने गंभीर नहीं होते थे इसलिए उनकी संगत में मुझे अपने मन मुताबिक काम करने के मौके मिल जाया करते थे। एक दिन गुरूदत्त एक गाने को फिल्माने को लेकर कुछ परेशान दिख रहे थे, शायद , सुनो गजर क्या गाए ये गीत था। वो गाने के एक हिस्से को फिल्माने के लिए किसी खास एंगल की तलाश कर रहे थे। क्योंकि उस हिस्से में काफी संगीत था। वो संगीत को कैमरा मूवमेंट के साथ ढंकना चाहते थे। मैंने उनसे कहा, अगर आप चाहें तो मैं कुछ कर सकता हंू , मैंने उन्हें एक बड़ा आईना दिखाते हुए कहा, इसकी मदद से प्रभावशाली कैमरा मूवमेंट पैदा किया जा सकता है। उन्होंने कहा कैसे? मैंने कहा हम कैमरा को आईना पर रखेंगे और देव साहब की एंट्री उनके अक्स से शुट करेंगे। और जब तक वो कुर्सी पर बैठेंगे तब तक कैमरा उन्हीं पर होगा। गुरूदत्त को लगा रात्रा से इतनी मूवमेंट संभव नहीं है। इसलिए रात्रा से पूछकर उन्होंने इस सीन को मुझसे शुट कराया और फिर शाम को उन्होंने मुझसे कहा अब मेरी हर फिल्म के कैमरामैन तुम ही होगे। जाल में पहली बार बतौर कैमरामैन उन्होंने मुझे मौका दिया।
उनके साथ काम करना कैसा अनुभव था?
-उनके साथ काम करना सबसे अलग था। वो कहते थे मूर्ति कागज के फूल और प्यासा मैने तुम्हारे लिए ही बनायी है। उन्होंने मुझे टेक्नीकलर लैब में सिनेमैटोग्राफी सीखने के लिए गन्स आॅफ नवारून के शुटिंग के दौरान पांच महीने के लिए लंदन भेजा था। इस फिल्म में ग्रेगरी पेक थे और मेरे पसंदीदा ओस्वाल्ड माॅरिश सिनेमैटोग्राफर थे। सभी को लगता था कि मैं वहां तकनीक सीखने गया हंू, पर ऐसा बिल्कुल नहीं था। दरअसल, तकनीक में कोई फर्क नहीं था केवल उनके काम करने का तरीका बहुत नियोजित हुआ करता था। जबकि हमारे यहां ऐसा नहीं था। मैंने वहां यही सीखा था और कुछ नहीं। लेकिन गुरूदत्त के साथ इन बातों का कोई मतलब ही नहीं था। आपने एक दिन पहले जो भी तैयारी की हो, अगली सुबह उनके दिमाग में कुछ अलग होता था। मेरे ख्याल से उनके बाद सत्यजित रे ही उनकी जैसी सृजनात्मकता के साथ काम करते थे। वो कैमरा के आगे आने से झिझकते थे पर मेरे लगातार कहने पर आखिरकार अभिनय  के लिए वो मान गए।
गुरूदत्त ने आत्महत्या क्यों की?
--मैं कह नहीं सकता शायद ये उनकी प्रवृति में था। वो यूं भी कहा करते थे-मुर्ति ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! उनके बच्चों में से एक बेटे अरूण ने भी 32 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली, ये प्रवृति ही हो सकती है। वो स्वभावतः एकाकी थे, आत्महत्या की उनकी ये तीसरी कोशिश  थी। उनकी पत्नी और बच्चे उनके साथ नहीं थे शायद ये भी कारण हो। लेकिन गीता दत्त को मैं सबसे ज्यादा मानवीय व्यक्तिव मानता हूं, वो बहुत अच्छी थीं। खैर, उस दिन मैं बंगलूरू में था, और सबसे पहले तो मुझे अपने लिए ही अफसोस हुआ। सच भी है उनके बाद वैसा साथ, वैसा बौ़िद्धक काम और वैसी रचनात्मक आजादी मुझे नहीं मिल पायी। 

गुरूदत्त के पसंदीदा शाट्स के बारे में बताएं?



 मेरे तीन साल के बेटे के कैमरे में मुर्ति
-उन्हें प्रयोग पंसद था। लेकिन खासतौर पर उन्हें बड़े क्लोज-अप पसंद थे। वो कैमरे को जितना संभव हो उतना नजदीक ले जाकर शाट लेना पसंद करते थे। बहुत जल्दी संतुष्ट नहीं होते थे और नई तकनीक को तुरंत अपनाते थे। चाहे सिनेमास्कोप में फिल्म बनाने की बात हो या फिर चैदवीं का चंाद फिल्म के गीत की कलर प्रिंट में शुटिंग।

उन दिनों के लोगों के साथ संपर्क में हैं?
-कुछ खास नहीं। वहीदा मुझे फोन करती रहती हैं। गुरूदत्त की बेटी ललिता लाजमी जो पेंटर भी हैं उनके संपर्क में हंू।



अपनी विरासत आप किसमें देखते हैं?
-नरीमन ईरानी, गोविन्द निहलाणी, जे मलिक, के जी प्रभाकर और एस आर के मूर्ति जिन्होंने मेरे साथ काम किया मैंने उन्हें अपने बच्चे की तरह सब कुछ सिखाया। ये सब बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

इन दिनों किसका काम पसंद आ रहा है?
-फिल्मों से मैं बिल्कुल दूर हंू। पिछले 10-12 साल से मैंने कोई फिल्म नहीं देखी है इसलिए कोई जानकारी नहीं है।

आपने मुंबई क्यों छोड़ दिया?
-1964 में गुरूदत्त की मौत के बाद मैंने कमाल अमरोही, गोविन्द निहलाणी, श्याम बेनेगल और प्रमोद चक्रवर्ती के साथ काम किया। भारत की खोज और तमस जैसे धारावाहिकों में मजा आया। कमाल अमरोही के साथ पाकीजा और रजिया सुल्तान में भी। लेकिन धीरे-धीरे सब बदल रहा था, मुझे काम में मजा नहीं आ रहा था। इसलिए मैंने 2001 में मुंबई छोड़ दिया।

अपना बेहतरीन आपने किस फिल्म को दिया?
-हांलाकि कागज के फूल और साहब बीबी और गुलाम के लिए मुझे फिल्म फेयर अवार्ड मिला पर प्यासा को मैं अपना बेहतरीन काम मानता हंू। कागज के फूल पहली 75 एम.एम सिनेमास्कोप फिल्म थी इसलिए लोगों ने बेहतर तरीके से समझा। लेकिन प्यासा में मैंने फ्रेम दर फ्रेम गुरूदत्त के साथ स्क्रीन पर कविता लिखी है।
बहरहाल, कागज के फूल के गीत वक्त ने किया क्या हसीं सितम को प्रकाश संयोजन के लिहाज से मील का पत्थर माना जाता है। यह प्रयोग भी तब सूझा जब नटराज स्टुडियों में शुटिंग करते समय मैंने वेंटीलेटर से आती हुई सूरज की रोशनी के बीम को देखा। गुरूदत्त ने मुझे सूर्यप्रकाश का इस्तेमाल करने को कहा, इसलिए मैंने दो बड़े-बड़े आईने मंगवाएं एक को स्टुडियों में रखा और एक को उपर बाहर बालकनी में और दरवाजा खोल दिया। प्रकाश के परावर्तन से रोशनी का बीम बना। स्टुडियो में हमने लोबान जलाकर इस प्रभाव को और गहन किया।

पश्चिम  के किन सिनेमैटोग्राफर ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया? आप दोनों की जोड़ी को दुनिया की बेहतरीन निर्देशक-कैमरामैन जोड़ियों मसलन बर्गमैन-निकवेस्ट, सुब्रतो-सत्यजित रे में से एक माना जाता है?

-निकवेस्ट का मुझे याद नहीं लेकिन ब्रिटिश सिनेमैटोग्राफर और निर्देशक जैक कार्डिफ का मैं कायल रहा हंू। पावेल, हु्रस्टन और हिचकाॅक की फिल्मों में उनका काम देखने को मिलता है। उनका कैरियर मूक फिल्मों के दौर से टेक्नीकलर फिल्मों तक था। पावेल की फिल्म अ मैटर आॅफ डेथ एंड लाईफ और ब्लैक नारसिसस में उनका काम बेमिसाल था। एक और ब्रिटीश सिनेमोटोग्राफर हुआ करते थे ओस्वाल्ड माॅरिश उनकी शैली भी मुझे बहुत पसंद थी। उन्होंने रोनाल्ड नीमे और डेविड लीन के साथ खूब काम किया था। और खुद सिनेमैटोग्राफर से निर्देशक बने नीमे तो ओस्वाल्ड को दुनिया का सबसे बेहतरीन कैमरामैन कहा करते थे। गन्स आॅफ नवारून्स के सिनेमैटोग्राफर भी ओस्वाल्ड ही थे। इस फिल्म की यूनिट के साथ मैं लंदन में था और इस दौरान मुझे इनके काम को करीब से देखने का मौका भी मिला। इसके अलावा ओलीवर फिल्म में भी उनका काम पसंद आया।
हाॅलीवुड में मुझे जेम्स वांग होवे का काम पसंद आता था। ये हाॅलीवुड के सबसे चहेते सिनेमैटोग्राफर हुआ करते थे। शैडो या छाया के फिल्मांकन का उन्हें मास्टर कहा जाता था और उन्होंने ही डीप फोकस सिनेमैटोग्राफी की शुरूआत की थी। उन्हें ड्रामैटिक लाईटिंग और डीप शैडो का उस्ताद कहा जाता था। ब्लैक एंड वह्राईट फिल्मों में उनका काम बेमिसाल था। खासतौर पर अ रोज टैटू , फनी लेडी और हुड जैसी फिल्म में। एक और अमेरिकन सिनेमैटोग्राफर चाल्र्स ब्रायंट लैंग जुनियर की शैली का भी मैं कायल था। ए फेयरवेल टू आम्र्स, डिजायर और एंजेल इन फिल्मों में उनका काम बहुत अच्छा था। ये सभी ब्लैक एंड व्ह्राईट फिल्में थीं। ट्राशलुसेंट लाईट के साथ उनका प्रयोग बेजोड़ हुआ करता था। उनकी रंगीन फिल्मों में बटरफलाईज आर फ्री में भी बहुत अच्छा काम है। इसके अलावा रेनाहन और अरनेस्ट हालर भी मुझे बहुत पसंद थे। फिल्म गाॅन विद द विंड  में दोनों को अकेडमी अवार्ड मिला था। अरनेस्ट की फिल्म फ्लेम एंड द एैरो भी उल्लेखनीय है।

दादा साहब फाल्के पाकर कैसा लग रहा है?
-मेरे पास जब सूचना और प्रसारण मंत्रालय से फोन आया तो मुझे लगा कोई मजाक कर रहा है, लेकिन जब दोबारा उन्होंने मेरा नाम लेकर कहा तब मैंने समझा ये मेरी ही बात कर रहे हैं। आमतौर पर अभिनय और निर्देशन के लिए ही अवार्ड मिलते हैं शायद मैं पहला तकनीशियन हंू जिसे यह अवार्ड मिला है। मुझसे पहले नितिन बोस को भी मिला था पर वो सिनेमैटोग्राफर के साथ-साथ निर्देशक भी थे। मेरा तो पूरा जीवन बीत गया जब मैंने फोकस हमेशा स्टार पर ही देखा। पत्रकार भी हमारे साथ फोटो खिंचवा लिया करते थे, लेकिन प्रकाशित कभी नहीं कराते थे, हमेशा स्टार ही तस्वीरों में हुआ करते थे। खैर, इस सम्मान से तकनीशियनों के योगदान को भी समझा जाएगा। मेरे लिए तो सबसे बड़ी उपलब्धि मेरी पूरी यात्रा और इसमें मिले लोग हैं खासतौर पर गुरूदत्त।


  मेरे बेटे के साथ मुर्ति

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