शनिवार, 28 जुलाई 2012


ताक़त के तीन हिस्से

कलह और गुटबाज़ी से जूझ रही कर्नाटक भाजपा का राजनीतिक संकट फ़िल हाल टल गया है लेकिन येदियुरप्पा की महत्वाकांक्षाओं के शिकार हुए सदानंद गौड़ा का गुट फिर से राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है। मनोरमा की रिपोर्ट( द पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित  )
कर्नाटक में भाजपा का संकट अभी खत्म होता नहीं लगता। सरकार बचाने और चलाने की जद्दोजहद में ही अगला विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ जायेगा, जिसमें मात्र ग्यारह महीने ही बचे हैं। चार साल के अंतराल में राज्य में तीसरे मुख्यमंत्री शपथ लेने वाले हैं। दरअसल, कर्नाटक भाजपा इन दिनों व्यक्तिगत अहम, कलह और गुटबाजी की राजनीति से जूझ रही है। मौजूदा संकट और नेतृत्व परिवर्तन उसी की बानगी है। पार्टी से बड़ा व्यक्ति विशेष का अहम हो गया है और केंद्रीय नेतृत्व की मजबूरी है उसे तुष्ट करना। आखिरकार येदियुरप्पा ने साबित कर ही दिया कि कर्नाटक में फिलहाल भाजपा के सबसे कद्दावर नेता वही हैं, चाहे वे मुख्यमंत्री पद पर रहें या न रहें। भाजपा को राज्य में अपना अस्तित्व बनाये और बचाये रखना है तो येदियुरप्पा के आगे उसे झुकना ही होगा। इसलिए सदानंद गौड़ा को असमय मुख्यमंत्री पद की बलि देनी पड़ी और जगदीश शेट्टर के लिए रास्ता खाली करना पड़ा। 
सदानंद गौड़ा साफ छवि के नेता हैं और उनकी सरकार पर कोई दाग भी नहीं लगा, बावजूद इसके वे अपना पद छोड़ने के लिए राजी हो गये तो इसकी वजह उनका राजनीतिक व्यक्तित्व और शैली ही है। उनकी जगह येदियुरप्पा होते तो ऐसा शायद नहीं कर पाते। गौड़ा शुरू से भाजपा के अनुशासित नेता रहे हैं और अब तक पार्टी के आदेशों के मुताबिक ही उन्होंने राजनीति की है। लेकिन मौजूदा घटनाक्रमों ने कर्नाटक भाजपा में उनका भी एक खेमा विकसित कर दिया है, जो हर आदेश को चुपचाप मानने को तैयार नहीं है। यह उस समय दिखा भी जब वे अपना इस्तीफा राजभवन में सौंपने जा रहे थे। उनके समर्थकों ने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन अंततः उन्होंने एक साल पूरा करने से पहले ही पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, वोक्कालिगा समुदाय के लोगों का तीव्र विरोध जारी है और वेे किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं। 
बहरहाल गौड़ा के प्रस्थान की इस पटकथा को पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने लिखा। जेल से वापस आने के साथ ही येदियुरप्पा ने केंद्रीय नेतृत्व पर खुद को मुख्यमंत्री बनाने या गौड़ा को बदलने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया था, जिसे टालने की भरपूर कोशिशें की गयीं। लेकिन पिछले दिनों उनके खेमे के नौ मंत्रियों ने कैबिनेट से इस्तीफा देकर केंद्रीय नेतृत्व को गौड़ा को हटाने के लिए अंततः मजबूर कर ही दिया। इन मंत्रियों में जगदीश शेट्टर भी एक थे। ये वही येदियुरप्पा हैं जो अपने शासन काल के दौरान इसी तरह की परेशानियां रेड्डी बंधुओं के कारण झेलते रहे थे। हालांकि, सरकार भी उन्होंने उन्हीं रेड्डी बंधुओं के पैसों और सहयोग से ही बनायी थी। लेकिन अवैध खनन के मामले में लोकायुक्त की रिपोर्ट में नाम आने पर पिछले साल जुलाई में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था और अगस्त में सदानंद गौड़ा प्रदेश के नये मुख्यमंत्री बनाये गये थे। ऐसा राजनीति में ही हो सकता है कि जिस जगदीश शेट्टर को मात देकर येदियुरप्पा ने सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनवाया था, आज पासा एकदम पलटा हुआ है। शेट्टर के लिए येदियुरप्पा ने गौड़ा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलवा दिया। वैसे कहा जाता है कि "दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है' लेकिन येदियुरप्पा शायद यह भूल रहे हैं कि सदानंद गौड़ा उनके खेमे के और उनके भरोसे के हुआ करते थे, जबकि जगदीश शेट्टर हमेशा उनके प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। दोनों लिंगायत समुदाय के नेता हैं, इसलिए येदियुरप्पा कभी भी शेट्टर का कद बढ़ने देना नहीं चाहते थे। जब गौड़ा उनके लिए रबर स्टांप मुख्यमंत्री नहीं बने, तो क्या गारंटी है कि शेट्टर आने वाले समय में उन्हें किनारे नहीं करेंगे? 
सबसे दुखद बात ये है कि इस पूरे प्रकरण ने कर्नाटक की जाति आधारित राजनीति का बदरंग चेहरा सामने रखा है, जहां भाजपा को अगली बार भी बहुमत में आने के लिए लिंगायतों को तुष्ट करना पड़ेगा। चूंकि येदियुरप्पा अदालत में चल रहे मामलों के कारण अभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकते इसलिए एक और लिंगायत नेता जगदीश शेट्टर को पार्टी का चेहरा बनाया गया है। कहा ये भी जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद के लिए येदियुरप्पा की पहली पसंद पिछली बार उनकी करीबी ऊर्जा मंत्री शोभा करंदलाजे ही थीं, लेकिन वे लिंगायत की बजाय वोक्कालिगा थीं, इसलिए मुख्यमंत्री नहीं बन सकीं। हालांकि, सदानंद गौड़ा भी वोक्कालिगा ही थे। दरअसल, कर्नाटक में सबसे ज्यादा सतरह फीसद वोट लिगंायतों के ही हैं और वोक्कालिगा 15 फीसद के साथ दूसरे नंबर पर आते हैं, लेकिन उनका वोट बंटा हुआ है। 
फिलहाल जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) की वोक्कालिगा समुदाय पर अच्छी पकड़ है, जबकि भाजपा के लिए राज्य में लिंगायत ही सबसे बड़े वोट-आधार हैं। दूसरी ओर लिंगायत वोट धर्मगुरुओं और मठों के द्वारा बहुत हद तक निर्देशित होते हैं और भाजपा का इन मठों और धर्मगुरुओं पर खासा असर है। कांग्रेस की पकड़ पिछड़ों और दलितों के बीच ज्यादा है। 
बहरहाल, जगदीश शेट्टर पहली लड़ाई तो जीत गये हैं, लेकिन क्या आगे का रास्ता तय करना उनके लिए आसान है? कर्नाटक में भाजपा सरकार के चार साल में तीसरे मुख्यमंत्री बने 56 वर्षीय जगदीश शेट्टर हुबली से चौथी बार विधायक हैं और लिंगायत होने के साथ उत्तरी कर्नाटक के प्रभावशाली नेता भी हैं, जहां भाजपा की मजबूत उपस्थिति है। एसएम कृष्णा के मुख्यमंत्री रहने के दौरान शेट्टर विपक्ष के नेता रह चुके हैं और सन् 2009 में ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री बनने से पहले येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री रहने के दौरान विधानसभा अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अपने कैरियर की शुरुआत में वे येदियुरप्पा के करीब भी रहे हैं। यहां तक कि येदियुरप्पा के "ऑपरेशन कमल' को अमली जामा पहनाने में भी शेट्टर की प्रमुख भूमिका रही। अब देखना यह है कि साफ-साफ दो खेमों में बंट चुके विधायकों के साथ वे कैसा मंत्रिमंडल बना पाते हैं और असंतुष्टों को साध कर कैसे सरकार चला पाते हैं। बड़ी चुनौती उन्हें गौड़ा समर्थक विधायकों से ही मिलेगी। साथ ही अंदरूनी कलह से बिगड़ी भाजपा की छवि सुधारने की बड़ी जिम्मेदारी भी उनपर है। लेकिन इसके लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है। मई 2013 में विधाानसभा चुनाव हो सकते हैं या फिर ये भी हो सकता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ दिसंबर में ही कर्नाटक में चुनाव कराये जायें। बहरहाल, संकट का पहला पड़ाव तो पार कर लिया गया है। यानी मुख्यमंत्री पद का मसला, मंत्रीमंडल का गठन और हर खेमे को संतोषजनक प्रतिनिधित्व देना ये ज्यादा बड़ी समस्याएं नहीं हैं और केंद्रीय नेतृत्व को इसकी ज्यादा चिंता भी नहीं है। संकट शिखर के लोगों का और लोगों से है। दरअसल, येदियुरप्पा प्रदेश पार्टी अध्यक्ष का पद अपने लिए चाहते हैं। वे गौड़ा को किसी भी कीमत पर इस पद पर नहीं देखना चाहते, क्योंकि उनके नेतृत्व में अगर भाजपा राज्य में अगला चुनाव जीत जाती है, तो गौड़ा कर्नाटक में भाजपा के सबसे बड़े नेता बन कर उभर सकते हैं। दूसरी ओर, गौड़ा अपनी ताकत मुख्यमंत्री के बाद एक इसी पद से साबित कर सकते हैं। जाहिर है, केंद्रीय नेतृत्व का उन्हें राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव देना फिलवक्त राज्य की राजनीति से वनवास ले लेने के समान होगा। दूसरी ओर यह भी गौरतलब है कि येदियुरप्पा को कर्नाटक में जब बहुमत मिला तब गौड़ा ही प्रदेश अध्यक्ष थे। ऐसे में भाजपा के लिए "आगे कुंआ, पीछे खाई' सी स्थिति बन रही है। गौड़ा की उपेक्षा से वोक्कालिगा वोट प्रभावित हो सकते हैं। खबर ये भी है कि केंद्रीय नेतृत्व संतुलन बनाने के लिए प्रदेश पार्टी अध्यक्ष पद पर किसी दलित नेता को बिठा सकता है। क्योंकि येदियुरप्पा खेमा ईश्वरप्पा के बजाय गृहमंत्री आर अशोक को उपमुख्यमंत्री बनाना चाहता है और सदानंद गौड़ा खेमे की पसंद ईश्वरप्पा हैं। ऐसे में संभावना दो उपमुख्यमंत्री बनने की है। 
अब देखना ये है कि गौड़ा को प्रदेश पार्टी अध्यक्ष पद मिलता है या नहीं, क्योंकि राज्यसभा जाने की पेशकश तो उन्होंने पहले ही ठुकरा दी है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व उन्हें उनके खेमे के लोगों को बेहतर पोर्टफोलियो देने का आश्वासन ही दे सकता है। ये और बात है कि गौड़ा इस पर शायद ही मानें। उनके खेमे में पचास से ज्यादा विधायक हैं और शेट्टर कैबिनेट में 20 मंत्री पद उनकी मांग है। 
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