गुरुवार, 12 जून 2014

कुदुंबश्री, विकास का केरल मॉडल !

तरक्की और विकास की पहली शर्त है लोगों का जागरूक और शिक्षित होना, केरल की साक्षरता दर भारत के सभी राज्यों में सबसे अधिक रही है और यही वजह है कि यह भारत के सबसे विकसित राज्यों में से रहा है। देश का सबसे शहरीकृत राज्य होने के साथ साथ केरल ही ऐसा राज्य है जहां शहर और ग्रामीण जीवनशैली में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है और राज्य के सभी जिलों के हर पंचायत में कम से कम एक शैक्षणिक संस्थान और स्वास्थ्य केन्द्र जरूर होता है। लेकिन बेरोजगारी केरल की सबसे बड़ी समस्या रही है 17वीं शताब्दी से ही यहां से  रोजगार की तलाश में प्रवास शुरू हो चुका था। लेकिन पिछले पंद्रह सालों में केरल में गरीबी हटाने और महिलाओं को सशक्त बनाने का काम जमीनी स्तर पर हुआ है जिसका असर अब दिखने लगा है।  कुदुम्बश्री के मार्फत केरल में न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं का अव्वल तरीके से क्रियान्वयन हुआ है बल्कि पंचायती राज की अवधारणा की जड़ें भी मजबूत हुई है। धान की खेती पर निर्भर यहां के गरीब और भूमिहीन किसानों को वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराने के लिए अस्सी के दशक में उन्हें स्व सहायता समूह के बारे में बताया गया और माईक्रोफाईनांस योजनाओं को लागू करने की शुरूआत की गई। और अगले कुछ सालों में  गरीबी को समझने के साथ गरीबी उन्मूलन के लिए भी एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित किया गया। 1994 में इन्हीं अनुभवों के आधार पर पहली बार  केरल में सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए महिला आधारित सामुदायिक संरचना विकसित की गयी। 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण की शुरूआत हुई व पंचायत और नगरनिगम जैसे स्थानीय स्वशासन निकाय मजबूत हुए। इसी दौरान 1998 में गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण के लिए सामुदायिक नेटवर्क के तौर पर कुदुंबश्री की शुरूआत हुई, जिसका लक्ष्य स्थानीय स्वशासी निकायों के साथ मिलकर गरीबी उल्मूलन और महिला सशक्तिकरण के लिए काम करना था। 1998 से अब तक कुदुंबश्री की लगातार कई उपलब्धियां रही हैं संयुक्त राष्ट्रसंघ समेत कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अवार्ड इसे हासिल हुआ है। साथ ही इसे एशिया  का सबसे बडा महिला आंदोलन भी कहा जाता है।
दरअसल, कुदुंबश्री की खासियत रही है गरीबी हटाने की प्रक्रिया पर काम करना ना कि परियोजना पर। इसलिए 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, हर जिले की सभी पंचायतों के सभी वार्ड में इसकी पहुंच है। इसके तहत 1.87 लाख पड़ोस समूह हैं, सत्तरह हजार क्षेत्र विकास समाज या एडीसी हैं और 1,058 समुदाय विकास समाज या सीडीएस ग्रामीण व शहरी हैं। कुदुंबश्री के मार्फत पड़ोस समूह के सदस्यों में अब तक 2,818 करोड़ की राशि बतौर ऋण बांटी जा चुकी है। इसी का नतीजा है कि केरल में जमीन कम होने के बावजूद 47 हजार महिला किसान हैं जो लीज पर खेत लेकर धान की खेती करती हैं। पहले दस रूपए भी जिनके पास नहीं हुआ करते थे उनके अब खुद के पक्के मकान हैं। कुल सवा तीन लाख किसान इसके दायरे में हैं और लीज पर 65 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती की जा रही है, इसके कारण पलायन भी रूका है। कुदुंबश्री माॅडल की एक सफलता ये भी है कि सदस्य ऋृृण वापसी के मामले में नियमित और अनुशासित हैं इसलिए निरंतरता बनी रही है अतंतः जिसका फायदा सदस्यों को ही हो रहा है।
कुदुंबश्री के द्वारा केवल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ही काम नहीं किया गया है बल्कि युवाश्री जैसे विशेष  रोजगार कार्यक्रम के जरिए साढ़े तीन सौ से ज्यादा सामुहिक और सवा तीन सौ के करीब निजी उद्यमों को शुरू किया गया। बेसहारा लोगों के लिए आश्रय कार्यक्रम को 745 स्थानीय निकायों में लागू किया गया और करीब साठ हजार बेघर बेसहारा लोगों का पुर्नवास किया गया। इसके अलावा भावनाश्री गृृह लोन योजना के तहत पैंतालीस हजार से ज्यादा गरीब लोगों को घर बनाने के लिए ऋृृण मुहैया कराया गया।  कुदुंबश्री के मार्फत केरल में केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं के बेहतरीन क्रियान्वयन के कारण दो साल पहले ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार मिशन ने इस माॅडल को पूरे देश में लागू किए जाने की सिफारिश की थी। फिलहाल पांच राज्यों में कुदुंबश्री माॅडल लागू किए जाने पर सहमति भी बनी है।
 





कुदुंबश्री की कार्यकारी निदेशक के बी वल्सला कुमारी से बातचीत
कुदुंबश्री के मार्फत केरल में काफी पहले से केरल में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। हाल के दिनों में और कौन कौन सी शुरूआत की गयी है?
- पिछले पंद्रह सालों में कुदुंबश्री के मार्फत केरल में बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार देकर और आत्मनिर्भर बनने के मौके मुहैया कराकर उनका सशक्तिकरण किया गया है। करीब 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, जो चालीस लाख परिवारों को सशक्त बना रही हैं और साबुन निर्माण व खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक करीब पचास हजार लघु उद्यमों के मार्फत आर्थिक समृृद्धि की कहानी लिख रही हैं।कुदुंबश्री के खाद्य उद्योग को इसी साल दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला में स्वर्णपदक हासिल हुआ है। हाल ही में कुदुंबश्री की ओर से पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित टैक्सी सेवा शुरू की गई है,इससे पहले पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित कुदुंबश्री कैफे भी बहुत सफल रहा है, इसलिए कुदुंबश्री कैफे का और विस्तार किये जाने की घोषणा हुई है। इसके अलावा हमने केरल वेटेरनरी एंड एनीमल साईंस यूनीवर्सिटी के साथ भी समझौता किया है जिसके तहत किसी कारण से पेशेवर उच्च शिक्षा नहीं हासिल का पायी महिलाएं पशुपालन या इससे संबंधित विषयों में डिप्लोमा हासिल कर खुद अपना व्यवसाय कर सकें। दरअसल, कुदुंबश्री की दस्तक खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक है और हर क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तिकरण में यह बेहद कारगर साबित हो रही है। पिछले डेढ़ साल से मै इससे जुड़ी हंू और मेरे लिए ये गर्व की बात है।

इस माॅडल की संरचना किस तरह की है?
-बिल्कुल जमीनी स्तर से हमारी पकड़ है, केरल की 62 फीसद से ज्यादा आबादी  इसके दायरे में हैं। सबसे पहले समुदाय के स्तर पर ग्रामीण या शहरी इलाकों में 10 से 20 महिलाएं जुड़कर आपस में समुदाय बनाती हैं, जिसे पड़ोस समूह कहा जाता है, इस समूह के द्वारा स्वबचत की शुरूआत होती है,ं फिर बैंकों से इन्हें जोड़ा जाता है और बैंक इन्हें इनके काम के लिए लोन देना शुरू करता है। एक पंचायत या नगरपालिका में कई पड़ोस समूह होते हैं जिसे एरिया डेवलपमेंट सोसाईटी या एडीएस कहते हैं, एडीएस के उपर सीडीएस होता है। सीडीएस दातव्य न्यास के तहत रजिस्टर्ड संस्था होती है और सामाजिक न्याय व पंचायत मंत्रायल के अधीन हैं।
गरीबी उन्मूलन के लिए केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं चलायी जा रही हैं, कुदुंबश्री उसी का विस्तार है?
-पूरी तरह से ऐसा नहीं है, केन्द्र और राज्य सरकार दोनों की ओर से इसे फंड मिलता है पर ये एक अलग माॅडल है, केन्द्र सरकार की नारेगा और मनरेगा जैसी योजना लागू करने में केरल पूरे देश में अव्वल रहा हैं तो उसकी वजह कुदुंबश्री है, हम पंचायत स्तर पर लोगों को केन्द्र और राज्य सरकार की सभी योजनाओं की जानकारी देते हैं और उसे कैसे लागू कराना है इसमें मदद करते हैं। हालांकि आन्ध्र प्रदेश का गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम भी बहुत सफल हो रहा है पर वो दस हजार करोड़ की ऋृण राशि के साथ एक वित्तीय माॅडल है और कुदुंबश्री 7 सौ करोड़ ऋृण राशि के साथ एक सामाजिक माॅडल। इसके तहत केवल महिला सशक्तिकरण ही नहीं बच्चों, बुढ़ों, असहायों, बेघर बेसहारा सभी के लिए योजनांए हैं और उन्हें लागू भी किया गया है। पूरे राज्य के सभी जिलों के सभी पंचायतों में इसकी मौजूदगी है फिलहाल केवल दो प्रतिशत जनसंख्या ही इसके दायरे से बाहर है।    
कुदुंबश्री को इसी हफ्ते साल 2013-14 के हडको राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित किया गया ये एक और उपलब्धि है?
-बिल्कुल, यह सम्मान कुदुंबश्री को महिलाओं की आर्थिक दशा सुधारने की दिशा में उल्लेखनीय काम करने के लिए मिला है। कुदुंबश्री ने आमदनी सुनिश्चित करने वाली सर्वोत्तम परियोजनाएं लागू करके यह लक्ष्य हासिल किया है। हमने निर्माण क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं के हुनर को तराशने और उनके लिए बेहतर संभावनाएं बनाने के लिए एरनाकूलम में कुदुंबश्री वुमैंस  कंस्ट्रक्शन ग्रुप परियोजना लागू किया, जिसे एक नयी शुरूआत कहा जा सकता है, इसके तहत निर्माण क्षेत्र में काम कर रही इंजीनियर, सुपरवाईजर और राजमिस्त्री का काम करने वाली महिलाओं को इसी क्षेत्र के अनुभवी लोगों के द्वारा विषेशज्ञ प्रशिक्षण मुहैया कराया गया। जिसका फायदा भी हुआ। फिलहाल इस समूह के पास 87 गृह निर्माण परियोजना का अनुबंध है। 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

हमारे चरित्र का सबसे क्रूर,शोषक,निर्दयी और बेईमान पक्ष  !

बराबरी की किताबी बातें पढ़कर बड़े हुए हैं हम, नहीं तो हम उस समाज और संस्कृति से आते हैं जहाँ अपनी गंदगी साफ़ कराने के लिए हम अपने जैसे ही दूसरे इंसान को मजबूर करते आये हैं पहले वर्ण व्यवस्था के नाम पर और बाद में सरकारी नौकरियों में सफाई कर्मचारी के तौर पर इस तरह की नौकरियां किसी ख़ास जाति के लिए मुक़र्रर करके ! मेरे पापा इंडियन ऑइल में काम करते थे और हम उसी के टाउनशिप में रहते थे, छोटा सा सुन्दर सा टाउनशिप पर वहां के लोग अपने टॉयलेट खुद साफ़ नहीं करते थे, हफ्ते में दो दिन इंडियन ऑइल का सफाई कर्मचारी आकर टॉयलेट क्लीन करता था तो लोगों के टॉयलेट साफ़ होते थे, उसके आने का रास्ता पीछे का दरवाज़ा होता और कुछ लोग कुछ और एक्स्ट्रा काम कराने के बाद पैसे देते तो कभी उनसे वापस छुट्टा नहीं लेते, मुझे हमेशा बहुत बुरा लगा ये,शायद अब भी वहां ऐसा ही हो रहा हो! मेरे पापा खुद से टॉयलेट क्लीन करते थे , माँ को ये बताने समझाने में वक़्त लगा पर जबसे मुझे सफाई का होश हुआ मैंने हमेशा अपना बाथरूम, टॉयलेट खुद साफ़ किया मेरे भाई बहन ने भी, वहां हमारा घर शायद सबसे साफ़ टॉयलेट वाला घर हुआ करता था, बहरहाल हमारे स्कूल की एक महिला सफाई कर्मचारी की बेटी जो बाद में उसी इंडियन ऑइल में इंजीनियर हो गयी, उसकी नौकरी और सफलता पर लोगों के जातिगत दुराग्रह और रिज़र्वेशन वाले कमेंट भी सुने पर किसी को भी सफाई के काम वाली नौकरी में आरक्षण नहीं चाहिए था, सफाई कर्मचारी के बच्चे सफाई कर्मचारी ही बनें उनकी बराबरी और न्याय का सिद्धांत यहीं तक था !
महानगरों की कितनी भी बुराई करें हम पर यही वो जगह है जहाँ हाशिये के सभी लोगों को अपना स्पेस मिलता है चाहे वो कस्बाई शहरों की लड़कियां हों या सवर्णों के द्वारा किनारे कर दिए गए अनुसूचित जाती के लोग, जब से महानगरों के इस फ़्लैट सिस्टम में रह रही हूँ ज्यादातर लोगों को अपना बाथरूम खुद साफ करते देख रही हूँ ! लेकिन अब भी मुझे समस्या है किसी काम को किसी जाति के साथ हमेशा के लिए नत्थी कर देने से ! मुझे वो दिन सबसे बराबरी का लगेगा जब अम्बानी जैसे लोगों को भी अपनी जगह, अपनी गन्दगी खुद से साफ़ करनी पड़े! हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए बाबा साहेब जैसे नायक का जिन्होंने हमें हमारे चरित्र का सबसे क्रूर,शोषक,निर्दयी और बेईमान पक्ष दिखाया !

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

'हाईवे 'सदियों की घुटन के लिए सदियां लगेंगी !

कुछ फ़िल्में आपके भीतर पहले से ही होती हैं ये और बात है परदे पर उसे कोई और उतार देता है , इम्तियाज़ अली की हाईवे देखकर कुछ ऐसा ही लगा, ऐसी फ़िल्म जिसे आप हमेशा देखना चाहते रहे हों! धरती के किसी अनजाने कोने के खेत , कोई घर, कोई नदी, कोई नहर, कोई अकेला पेड़, क्षितिज के साथ खड़े पहाड़,जैसे दुनियां इसके आगे हो ही नहीं, या ये कहते मुझमें से झांककर दूसरी ओर देखो और बगैर कुछ सोचे, प्लान किये, कहीं नहीं पहुँचने के लिए चलते दो लोग! कुछ कुछ ऐसा जैसे गहरी नींद में देखें जाने वाले अज़ीब से सपने जिनमें जाने आप कहाँ पहुचें होते हैं और जहाँ तमाम दृस्य बगैर किसी रेफरेन्स के तिलिस्म की तरह आते रहते हैं ! हम सबके भीतर वीरा होती है सोलह साल से अस्सी साल के होंगे तब भी ताज़ी हवा, स्पेस और अपना आज़ाद वक़्त की छटपटाहट वैसी ही होगी , सदियों की घुटन के लिए सदियां लगेंगी ! वैसे इस फ़िल्म ने मुझे भी अपने उन हाईवे की याद दिला दी जिनकी छवियाँ बचपन से मेरे साथ है , मेरा पहला प्यार एन एच 31, मन करता था इसके किनारे किनारे पूरब की ओर चलते रहे तो असम पहुँच जायेंगे और जब भी जीरो माइल पर खड़े होते थे तो 31 की जगह 28 पकड़ कर चले जाने का मन होता था ! और एन 17 अरब सागर के समानांतर हमेशा बस चलते ही जाने के लिए बुलाती सड़क ! आम और आवलां के घने पेड़ों के साये वाले प्रतापगढ़ , फैज़ाबाद की सड़क , मीलों पलाश के फूलों से सजा बरही का एन एच 2 ,और मुगलसराय से कर्मनाशा तक का लॉन्ग ड्राइव जिसके लिए अजय के पापा से बड़ी डाँट पड़ी थी , तब हम दोस्त थे और वो घर से अलीनगर के लिए निकलते समय मुझे साथ बुलाने की गलती कर बैठा, मोबाइल आने से पहले के उस समय में मुगलसराय से कर्मनाशा तक वो भी शाम पांच -छह बजे के बाद के समय में! दोस्ती सबसे अच्छी चीज़ होती है , कोई कुछ भी कर सकता है उसमें :)
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.