गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

भूत-वूत होता है या नहीं ?

भूत-वूत होता है या नहीं मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती न कह सकती हूँ , बचपन के रहस्यमय अनुभवों में २ घटनाएं शामिल हैं और दोनों गावं की है , वहां शाम को इया की ओर से नहर की ओर जाने की मनाही होती थी, कहती थी -पानी में बुडुआ होले सन, जा पानीये में खींच लिह सन ' फिर भी हम गए पूल पर बैठ कर 'सनसेट' देखने के लिए, जैसे सूरज आसमान से गायब हुआ एक काला साया पानी पर चलता हम बच्चों की ओर आता महसूस हुआ , चेचरे-मचेरे मिलाकर हम आठ-दस बच्चे थे , कोई चिल्लाया और हम एक मिनट से भी कम समय में दुआर पर थे  दूसरी घटना मेरे घर काम करने वाले चन्द्रिका की थी जिसे गावं वापस आने के दौरान रात हो जाने पर 'चुपचुपवा डीह' पर रुकना पड़ा वहीँ एक 'पुरनिया पाकड़' के पेड़ के नीचे खैनी बनाकर खाने से पहले उसने 'किसी ' को ऑफर नहीं किया, सुबह जब लौटा तब उसकी आवाज़ बदली हुई थी हर बड़े बुज़ुर्ग सभी को तू-तडाक करके बात कर रहा था और बेहिसाब हँसने लगा था , कोई बाबा आये और विधिवत तरीके से खैनी ऑफर किया गया ,फिर चन्द्रिका की अपनी आवाज़ लौट आयी ! खैर ये सब डर से ज्यादा मज़ेदार अनुभवों का हिस्सा है डर तब लगा जब दस साल पहले दिल्ली के अपने घर में मैंने अकेले 'साइलेंस ऑफ़ द लैम्ब' देख लिया फिर एक हफ्ते तक रात को सो नहीं सकी वो तो शुक्र था उन दिनों एम्स के डाक्टर्स कॉलोनी से उठाया गया 'शेरू 'मेरे साथ साए की तरह रहा करता था ! सालों बाद कल मैंने रोजमेरिज बेबी देखने की कोशिश की आधी फिल्म पर पहुँचने तक फ्रिज की आवाज़ डरावनी लगने लगी, फिर लगा दरवाज़ा खुद ही खुल गया (यहाँ तेज़ हवा के कारण ऐसा अक्सर होता है , पर कल की बात अलग थी ) और सबसे ज्यादा डर तब लगा जब मुझे लगने लगा की एक और कमरे की लाइट मैंने नहीं किसी और ने ऑन कर दी हैं, मेरे अवचेतन में यही था की मैंने सिर्फ अपने पास की छोड़कर सारी लाइट ऑफ कर दी है !अब ये बहुत ज्यादा हो गया था मैंने तुरंत लैपटॉप का फ्लैप बंद किया और एकदम मुहं ढँक कर सो गयी ! हालांकि' हिचकाक' की 'वर्टिगो' भी मैंने देखी है पर उसे देखना मेरे गावं वाले अनुभवों जैसा रहा, पर जो भी हो मूवीज तो मुझे अकेले ही देखना पसंद है पर अगली सायको थ्रिलर अगले दस साल बाद! 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

तुम हो, ये यकीन है मुझे !



                 1

कहना होता है मुझे, छिपा लेता हूँ
सोचता हूँ हर वक़्त पर, सामने झटक देता हूँ
चाहता हूँ सब जिक्र करें तुम्हारा, कर दें कोई,
तो  बन जाता हूँ अनजाना,
ये सब करते हुए जानता हूँ मैं
कितना झूठा हूँ मैं
सौ बार कहता हूँ तुमसे ज्यादा खुद से,
कुछ नहीं हमारे बीच
जबकि सारा दिन कुछ  पलों
की आग में तपता निकाल देता हूँ
मैं डरता हूँ, खुद से ज्यादा तुम्हारे लिए ,
करता हूँ सारे वो  जतन ,जैसे तुम हो ही नहीं
पर,  लौटता हूँ जब रातों को पास अपने
लौट आती हो तुम भी !


              2

कितना त्रासद है
जब हम चाहकर भी,
अपनी कमजोरी
छिपा न सकें,
कमजोरी,
खुद की तकलीफों से,
बाहर नहीं आ पाने की
दुर्बल होना
कितना दयनीय,
कितना दुखद है
तब और भी,
जब अपनी एक दुनिया
सब से छिपाने के लिए ही
बनायी होती है
तुम मिलते हो वहां
उसी पल में
मैं मिलती हूँ वहां
उसी मौसम में
लौटते तो कई बार हैं
पर, खिंच जाता है
वो पल, वो मौसम
हर बार वर्तमान में ! 
     

         3

तुम्हें सुनते हुए
तुम्हें कहते हुए
छलक जाती हैं
आँखें,
रह जाते हैं लगभग सारे
जरूरी शब्द गले तक
और,,,,,सारे  बेमतलब
बाहर !
तुम्हे प्यार करते हुए
आसमान की चाहत में
हो जाती हूँ मैं धरती
भूल जाती हूँ
उन तमाम तकलीफों को
जो लगा मुझे
तुम जानकार भी नहीं जानते
बावजूद इसके हर बार
सौपना चाहती हूँ मैं तुम्हें
अपनी सारी खुशबू , सारे रंग
और सारे गीत
बदले में तुमसे नहीं
इश्वर से कहती हूँ
तुम हो, ये यकीन है मुझे !


रविवार, 21 अप्रैल 2013

नशा खत्म बस बाकी है हैंगओवर !




मुझे याद है ये 2006 के आखिरी दिनों की बात है जब मैंने ऑरकुट के बारे में जाना , अजय का अकाउंट था और मुझे बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि इसके जरिये अपने भूले-बिसरे दोस्तों को खोजा जा सकता है,  उसी अकाउंट से मैं कुछ मयूचुअल दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों से कनेक्ट हुई ! बाद में अपना अकाउंट खोला  और कुछ  दोस्त मुझसे कनेक्ट हुए और  कुछ से मैं! इसी बीच फेसबुक और ट्वीटर आ गए, वहां भी अपना खाता खोल दिया पर ज्यादा आवाजाही फेसबुक पर ही रही, ट्वीटर पर  सिर्फ उन लोगों को कभी-कभार पढ़ लेने के लिए गयी जिन्हें फॉलो कर रही थी ! फेसबुक के शुरुआती दिन बड़े खुमारी वाले थे दस-दस, पंद्रह साल से जिनके बारे में कुछ सुना नहीं था उन दोस्तों, उनके दोस्तों बच्चों, मियां और बीवी के फ़ोटोज़ देखकर बहुत अच्छा लगता था ! अब जो यहाँ नहीं थे वो ही दूर हो रहे थे, पर साल दो साल होते होते ये सब बोरिंग हो गया ! यहाँ सब अच्छा था, सब लोग खुश, खाते-पीते, छुट्टियाँ मनाते, एन्जॉय करते दिख रहे थे! हिंदी स्कूल वालों की भी अंग्रेजी बहुत अच्छी हो गयी थी, उनके स्टेटस की अंग्रेजी बयां करने लगी थी कि उनका "क्लास " चेंज   हो चूका है ! वैसे यहाँ सब कुछ था पर घंटों बिना कुछ बोले हुए  भी एक दुसरे की उदासियों को पी लेने वाला बेमतलब का  साथ नहीं था!

 नेटवर्किंग साइट्स ने दोस्तों को बदल दिया है, हो सकता है ये मेरा ओब्ज़रवेशन हो पर कहीं कुछ तो बदला जरूर है ! जिन्हें आप बिलकूल नहीं जानते और सिर्फ जिन्हें पढने के लिए आप उनसे कनेक्ट होते हैं उन्हें छोड़ दें,  पर असली दोस्त यहाँ ज्यादा सतही लगने लगे हैं, दोस्ती का मतलब एक-दूसरे की पोस्ट या फोटो को लाइक करना ही रह गया है, कमेंट वाले दिन भी अब बीती बात होने लगे हैं! जबकि ये कितना असहज भी होता है हम ऐसे घरों से आते हैं जहाँ किसी अपने की उनके मुहं पर शायद ही तारीफ़ की जाती है और इन साइट्स के आने से पहले भी हम दोस्तों की तारीफ़ से ज्यादा उन्हें लेकर क्रिटिकल हुआ करते थे , जी भर कर खिंचाई!  स्टेटस लिखकर क्रांति करने या करवा लेने का भ्रम पैदा करने वालों का जादू भी लगभग टूट ही चूका है, असली सेलेब्रिटी कुछ दिन यहाँ आकर चले गए या जो नहीं गए वो जाने की सोच रहे हैं ! समय रहते उन्हें अक्ल आ रही है, ज्यादा आम रहे तो ख़ास नहीं रहोगे, अपने आगे -पीछे की इमेज मिस्ट्री  बरक़रार रहनी चाहिए ! पर पिछले कुछ सालों में बेऔकात वाले कुछ लोगों ने इन नेटवर्किंग साईट'स पर आकर जरूर सेलेब्रिटी दर्ज़ा हासिल कर लिया  इसमें मीडिया वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही है, पांच-पांच  हज़ार की फ्रेंड लिस्ट वाले ये लोग कुछ भी लिख दें कोई भी फोटो लगा दें कमेंट्स और लाइक्स की बरसात होने लगती पर  ये स्थितप्रग  भाव में ही नज़र आते महसूस होते हैं  (लैपटॉप पर शायद मुस्कुराते हों पर वो दीखता तो उनको ही होगा ) और कुछ-एक  को छोड़कर  शायद ही कभी दूसरों की पोस्ट पर गौर फरमाते हो ! बहरहाल, ये एकतरफा कदरदानी भी कब तक चलेगी,  इसलिए सौ -दो सौ और पांच सौ या हज़ार की फ्रेंड लिस्ट वाले भी अब अपने आप को कम नहीं समझ रहे हैं  और इन लोगों का एकाधिकार तोड़ते हुए आपस में ही एक मुचुअल  एडमिरेशन ग्रुप बनाने लग गए हैं, अब शायद इन्हें ज्यादा अच्छा महसूस होने लगा है!
लेकिन आत्मप्रचार और आत्ममुग्धता की भी एक हद होती है आखिर कितने  दिनों और साल तक सिर्फ तारीफें लीं और दीं जा सकती हैं ! अब शायद मोहभंग का दौर आ गया है या आनेवाला है कोई  कितना कहें  और कोई कितना सुने या पढ़े  ...कोई कह कह के खाली हो रहा है और कोई पढ़ पढ़ के सर से पैर तक पक रहा है ! शायद अब जो यहाँ नहीं हैं उन्हें याद करने, उनके पास लौटने के दिन आ रहे हैं, उन बेवकूफियों के पास जो  अंतर्जाल में नहीं बल्कि असली रास्ते के किसी मोड़ पर इत्मीनान से बैठे हुए हैं ! हो सकता है उन्हें किसी का इंतज़ार नहीं हो पर कोई आकर हाथ थामने को मांगे तो पकड़ने की फुर्सत अब भी है उनके पास !  

   








सोमवार, 25 मार्च 2013

सौ दुश्वारियां हैं तेरे ख्यालों की!


     (1)
सुनो.....क्या तुम सुन सकते हो?
मैं चाहती हूँ तुम सुनो मुझे
पता नहीं कब-कब,
क्या-क्या कहते रहे तुम
चलते रहे हम, बढ़ते रहे तुम 
थम सी गयी मैं पर.... 
बड़ी होती गयी मुझमें स्त्री
उफ़! पत्थर सा कठोर है सब आस-पास
फिर भी बचा ही लेती हूँ थोड़ी कोमलता
तुम इतना भी नहीं कर सकते ?

      (2)
हिमालय सा ऊँचा हो
तो भी क्या 
टूटना पत्थरों की नियति है!

      (3)
कुछ अन्धेरें उजालों से ज्यादा रोशन होते हैं,
ये वो अन्धेरें हैं, 
जब पता होता है,
एक-दुसरे को देख नहीं सकते
लेकिन यकीन बना रहता है,
एक-दुसरे को देखते रहने का,
उजालें तो सबके पास होते हैं,
ऐसे अन्धेरें सब सहेजते नहीं !

    (4)
बैठी रही सारा दिन, वैसे ही,
जबकि करने को बहुत कुछ था 
यूँ ही हो गयी दोपहर, फिर हुई शाम,
मैं गयी वहां, जहाँ जाने का कोई अर्थ न था
रही खड़ी वहां , जहाँ खड़ा रहना, 
अक्सर व्यर्थ होता है
सुना लोगों की बातों को 
जिनका कोई मतलब न था !

   (5)
शब्द छु जाते हैं, 
चोट करते हैं,
रुला देते हैं 
फिर नरमी से,
सहला देते है, 
गुदगुदा देते हैं पर..
सबसे ताकतवर होते हैं,
जब भरोसा देते हैं !

  (6)
महत्वकांक्षाएं मेरी सिकंदर सी,
निस्पृहता मुझमें बुद्ध सी
या तो सबकुछ मुझे चाहिए
या फिर
कुछ भी नहीं!

  (7)
दो मुझे सिर्फ अनुराग
ना तो अतृप्त कामना
और ना ही आवारा बैराग
मैं स्वीकारूं बिल्कुल 'अपने' की तरह
दो ऐसी पीड़ा
करो प्यार ऐसे, मिले दुःख मुझे!

  (8)
सौ दुश्वारियां हैं तेरे ख्यालों की ...
रहतें ढूंढती हूँ औरों के फसानों में !

  (9)
बहुत लिखा तुमने, 
यहाँ की वहां की
बस नहीं लिखा तो....
सरगोशियाँ अपने करीब की !

(10)
पुराने कैलेंडर सहेज कर,
रखने की बुरी आदत है मेरी,
सहेज लिया तुम्हें भी,
ओ पुराने वक़्त
जो गुज़रे हो अभी-अभी

(11)

आना जाना लहरों का,
कि‍नारे न जाने मैं कि‍स सोच में,
तहों में कुछ दब सा रहा है
कहीं....................
सहेज कर रखना कि‍श्‍तों में,
मेरा, तुम्‍हें बार बार
जि‍न्‍दगी मतलब तुम्‍हारा
गीले गीले से एहसास
बार बार।

(12)
अनुभवों के अनेकों संस्तरो के बीच 
कभी देखा हैं 
कहाँ हैं, कैसा हैं
हमारा असली मन ?

गुरुवार, 21 मार्च 2013

दक्षिण भारत की अनदेखी होती है मुख्यधारा में!


प्रसिद्ध पार्श्वगायिका एस जानकी को भारत सरकार द्वारा हाल ही में पद्मभूषण  सम्मान देने की घोषणा की गई। लेकिन 75 वर्षीय एस जानकी ने इसे बहुत देरी से मिला सम्मान बताते हुए स्वीकार करने से मना कर दिया। इसी मसले पर एस जानकी की ओर से उनके संगीतकार-अभिनेता बेटे मुरली कृष्णा से मनोरमा की बातचीत।

1.एस जानकी ने पद्मभूषण सम्मान क्यों अस्वीकार कर दिया?
-पचपन साल लंबे संगीत कैरियर में क्या वो इससे पहले किसी भी पद्म सम्मान के योग्य नहीं थी? वो 17 भाषाओं में लगभग 17 हजार से ज्यादा  गाने गा चुकी हैं बावजूद इसके उन्हें इससे पहले पद्म सम्मान के योग्य नहीं समझा गया। और अब इन पुरस्कारों के मुकाबले उन्हें पसंद करने वालों का प्यार उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है।
2. आपके विचार से उन्हें ये सम्मान कब मिल जाना चाहिए था?
-अम्मा ने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली , और ना ही शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण है उनके पास, लेकिन अपने कैरियर के शुरुआत में ही उन्होंने नादस्वरम के साथ ताल मिलाते हुए सुब्बय्या रेड्डी के संगीत में श्रृंगार वेले का कठिनतम गीत गाया। हालांकि उन्हें सुर सिंगार सम्मान, साथ ही केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, उड़ीसा और आन्ध्र प्रदेश जैसे राज्यों का राज्य सम्मान मिल चुका है। देर से भी भारत सरकार की ओर से उन्हें  ये सम्मान कम से कम 10-15 साल पहले मिल जाना चाहिए था। इसके अलावा इस पुरस्कार की सूचना प्रोटोकाल के तहत दी जाती है पर अम्मा के साथ ऐसा नहीं किया गया।
3.दक्षिण भारत की अनदेखी होती है मुख्यधारा में?
-हिन्दी भाषा के अपने फायदे हैं, हिन्दी में किया गया काम पूरे देश में जाना जाता है। दक्षिण भारत की बात करें तो यहां केरल के कलाकारों के बारे में आन्ध्रप्रदेश के लोगों को नहीं पता होता और तमिलनाडू के बारे में कर्नाटक को। हिन्दी का बाजार और पहंुच दोनों विशाल हैं इसलिए पुरस्कारों के नजरिये से इसका पलड़ा भारी रहता है। पी लीलाम्मा का ही उदाहरण लें, वो एस जानकी से वरिष्ठ हैं और उन्होंने ही श्रृंगार वेले गीत के लिए उनका नाम सुझाया था, पर देश में कितने लोग उनके बारे में जानते हैं? ऐसे बहुत से बड़े नाम हैं जिनके काम के बारे में पूरे देश के लोगों को जानकारी नहीं है।
4. सरकार ही नहीं देश की जनता को भी सभी राज्यों के कलाकारों और संस्कृति के बारे में ज्यादा मालूम नहीं होता?
- हां देश के हर हिस्से के लागों को दूसरे हिस्से और वहां के लागों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। ये अपनी साझी विरासत को अगली पीढ़ी तक ले जाने की भी बात है। दरअसल, यहां ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी सरकार और उनके प्रतिनिधियों की है। उन्हें हर राज्य और वहां जो भी उल्लेखनीय काम कर रहा है उसपर फोकस करना चाहिए और सम्मान व पुरस्कारों के संदर्भ में राष्ट्रीय  स्तर पर सभी के काम का मुल्यांकन होना चाहिए।
5.दक्षिण भारत में संगीत के कुछ बड़े नामों की राय में एस जानकी को पच्चीस साल पहले ऐसे सम्मान मिल जाने चाहिए थे?
-वो सही कह रहे हैं, 75 साल की उम्र बहुत बड़ी होती है। आप जब पूरी उर्जा से सक्रिय होते हैं तब आपके काम की सराहना होनी चाहिए। कोई  व्ह्रीलचेयर पर आ जाएं तब उसे सम्मानित करना मुझे तर्कसंगत नहीं लगता। ये तब मिलना चाहिए जब आप उस ख़ुशी का जश्न मनाने लायक हों।
6. और कौन-कौन हैं, जिनके काम की अब तक अनदेखी हुयी है?
-उर्वशी शारदा, पी सुशीला, एम विश्वनाथन  और राममूर्ति ये संगीत के बहुत उंचें नाम हैं। इन्हें बहुत से सम्मान मिले हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर इनके नाम और काम को और सराहना मिलनी चाहिए।

7. अब तक के अपने संगीत कैरियर से वो संतुष्ट हैं?
-बिल्कुल! अम्मा 4-5 साल की उम्र से गा रही हैं, कीर्तन से शुरू  होकर उनकी संगीत-यात्रा 17 भाषाओं में 17 हजार से ज्यादा गीतों तक पहुंच गयी हैं और अभी भी सक्रिय हैं, 1957 से उन्होंने  पार्श्वगायन शुरू किया और तब से लगातार गा रही हैं अस्थमा की गंभीर बीमारी के बावजूद। इस साल भी एक तमिल गीत रिकार्ड हो चुका है। लोगों से बहुत प्यार मिला है जो सबसे बड़ी चीज है।
8.हिन्दी फिल्मों के लिए गाना कैसा अनुभव रहा? वो अपने समकालीनों संपर्क में अब भी है?
-हिन्दी फिल्मों के लिए गाना बहुत अच्छा अनुभव रहा, ओ पी नय्यर साहब ने उनकी आवाज सुनते ही कहा था तुम अब तक कहां थी? मोहम्मद रफी साहब के लिए अम्मा के मन में बहुत सम्मान है। लगभग चार-पांच सौ हिन्दी गाने गाए हैं अम्मा ने । और सबसे अच्छी बात रही बहुतों के बच्चों के साथ भी काम किया मसलन किशोर कुमार और अमित कुमार,येसुदास और फिर उनके बेटे के साथ। लेकिन हिन्दी फिल्मों के लिए 6-7 साल से गाने नहीं गा रही है। लेकिन पिछले 6-7 साल से हिन्दी फिल्मों के लिए गाने नहीं गा रही है। दरअसल, पहले पिता मां का सारा काम संभालते थे और रिकार्डिंग के लिए बार-बार मुंबई जाने से उन्हें काफी परेशानी होती थी, इसलिए वहां जाना ही बंद कर दिया। अभी हिन्दी फिल्म उद्योग के लोगों से उनका लगभग नहीं के बराबर संपर्क है।
9.नयी पीढ़ी के गायक-गायिकाओं में  कौन-कौन उन्हें पसंद आ रहे हैं
-नयी पीढ़ी में सभी बहुत अच्छा कर रहे हैं सभी का काम उन्हें अच्छा लगता है इसलिए किसी रियलिटी शो  में वो जज बनकर नहीं जाती ताकि अंक न देने पड़ें। वैसे चित्रा, सुजाता, मिनमिनी का गाना उन्हें बहुत पसंद है। शरण और विजय भी पसंद हैं और रहमान, इल्लैय्याराजा और सुब्बय्या रेड्डी का संगीत अच्छा लगता है।
10.  कौन सी भाषा में काम करना ज्यादा आसान रहा?
-तेलगू छोड़कर बाकी सभी भाषा अम्मा के लिए अनजानी ही थीं लेकिन पार्श्वगायन के पहले ही दिन उन्होंने तेलगू, तमिल, मलयालम, सिंहली और कन्नड़ भाषा में गाने रिकार्ड किए। दरअसल, वो गीतकार के साथ बैठकर पहले उच्चारण सीख लेती थीं। इसलिए सभी भाषाओं में काम करने में एक सा मजा आया।
11.  भविष्य में  भारत सरकार भारत रत्न दे ंतो उन्हें स्वीकार होगा?
- इस बारे में अभी कोई टिप्पणी उचित नहीं हैं। वैसे भी वो सम्मान के खिलाफ नहीं हैं बस उन्हें इसके टाईमिंग से शिकायत है। पुरस्कार को लेकर उनके मन में कोई दुर्भावना नहीं है बस इतनी लंबी अनदेखी से उन्हें शिकायत है जिसे उन्होंने जता भी दिया है।    

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

कितना बर्बर है किसी से उसकी शख्सियत की पहली पहचान छीन लेना, इस दर्द की कोई भी दवा बहुत कम है !



लड़कियों और महिलाओं पर तेजाबी हमले के मामले में कर्नाटक भी पीछे नहीं है। कार्तिका परमेश्वरन न,डा. महालक्ष्मी, श्रृति, हसीना हुसैन ये कुछ ऐसे नाम हैं जिनके वजूद को तेजाबी आग में झुलसा कर खत्म कर देने की कोशिश  की गई, वो भी उनके किसी के जबरदस्ती के प्यार को स्वीकार नहीं करने के इंसानी और बुनियादी अधिकार के कारण। ज्यादातर मामलों में एकतरफा प्यार में ठुकराए पुरुष  के अहम्  ने -तुम मेरी नहीं हो सकती तो तुम्हें किसी और का भी नहीं होने दुंगा, मानसिकता ने इन जिंदगी से भरे पढ़ते-लिखते, अपना काम करते भविष्य के सपने बुनते खुबसूरत चेहरों में हमेशा के लिए अंधेरा भर दिया। बंगलूरू में एसिड हमले की शिकार  हुई लड़कियों और महिलाओं के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था कैंपेन एंड स्ट्रगल अगेन्स्ट एस्डि अटैक आॅन वुमैन (सीएसएएएडब्ल्यू ) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस साल में केवल कर्नाटक में ही एसिड हमले 68 से ज्यादा मामले हुए हैं। कर्नाटक में सीएसएएएडब्ल्यू लगातार कई सालों से इनकी लड़ाई लड़ रहा है पर कोई खास नतीजा नहीं मिलने और सरकार की ओर से केवल आश्वासन, इस संस्था के साथ जुड़कर अपनी लड़ाई लड़ रही पीडि़तों के हौसलों को तोड़ रहा है। इस लड़ाई में उनकी सक्रियता और भागीदारी लगातार कम हो रही है। एसिड हमले की शिकार हसीना हुसैन से बात करने पर इसकी वजह का भी पता चल गया। उनके परिवार ने लगातार सात साल अदालत में उनकी लड़ाई लड़ी और कर्नाटक  हाई कोर्ट ने आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई साथ ही एसिड हमले की शिकार पीडि़तों के पुर्नवास के लिए कर्नाटक सरकार को निर्देष जारी किए, जिसके तहत प्लास्टिक सर्जरी का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन करना, पीडि़तो के संपूर्ण अदालती खर्च उठाना और पीडि़ता का  पुर्नवास होने तक उनकी पूरी देखभाल। कर्नाटक हाई कोर्ट के इस निर्देष से हसीना और उनके परिवार को बहुत राहत मिली थी और इंसाफ की उम्मीद जगी थी पर हकीकत कुछ और है। हसीना कहती हैं-अब 14 साल हो गए पर कुछ हासिल नहीं हुआ। अब तक सरकार से 1 लाख 80 हजार रूपए मिले, जबकि मेरे ईलाज में 20 लाख खर्च हो चुके हैं, मुझे आंखों से दिखता नहीं है। मेरे पिता ने अपना घर बेचकर मेरा ईलाज कराया थोड़ी मदद आम लोगों ने कर दी। पुर्नवास होने तक पीडि़तों की पूरी देखभाल की बात करते हैं पर सरकार द्वारा हर पीडि़त को 1 लाख 80 हजार थमा कर सब ठीक है मान लिया जाता है। हसीना इतनी मायुस हैं कि कहती हैं प्लीज मेरी स्टोरी नहीं लिखिए, हमारी कहानी छपती है और अगले दिन रद्दी की खबर बन जाती है। मैं नहीं चाहती कोई मेरी तस्वीर छापें, हमाले लिए मुद्दा महत्वपूर्ण है। दरअसल, कुछ होना होता तो मेरे बारे में इतना लिखा गया कि अब तक सब कुछ हो जाना चाहिए था। लेकिन अभी भी सिर्फ मैं ही नहीं मेरा परिवार भी इस हादसे और इसकी वजह से मिले षारीरिक, मानसिक और आर्थिक चोट से बाहर नहीं आ पाया है। हसीना जितनी सषंकित सरकार की ओर से है उतना ही इन लोगों की लड़ाई लड़ने वाली संस्थाओ से भी। हालांकि सभी के बारे में उनकी एक राय नहीं है पर ये जरूर कहती हैं कि-हमारा दुरूपयोग हुआ है कुछ लोग हमारे नाम पर लाखों रूपए अनुदान में हासिल कर लेते हैं और पीडि़तों को कुछ हजार थमा देते हैं।
हसीना, पढ़ लिख का नौकरी कर रही थी लेकिन अपने इंप्लायर से ही एसिड हमले की शिकार हो गई। 1999 में उनके पास ढ़रों सपने थे और आज उनका कोई फ्यूचर प्लान नहीं है। वो बस इतना चाहती हैं एसिड हमले को रोका जाना, आरोपी को सजा मिलना और पीडि़त का पुर्नवास इसी पर फोकस किया जाना चाहिए। उनके जैसी और पीडि़तों के बारे में उनसे जानकारी मांगने पर वो कहती हैं-सीसा ने दो साल से काम करना लगभग बंद कर दिया है, उसके मार्फत हम बहुत से पीडि़त आपस में संपर्क में थे और हमने खुद को इंसाफ दिलाने की आखिरी हद तक अधिकतम कोषिषें कर ली, पर इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता आप किसी से भी बात कर लें सब यहीं कहेंगी। पुरुषों की सोच में बदलाव ऐसे हमलों पर रोक और पीडि़तों के ईलाज व पुर्नवास के साथ उनकी शिक्षा और काबिलियत के मुताबिक काम, उन्हें यही चाहिए।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.