गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

भूत-वूत होता है या नहीं ?

भूत-वूत होता है या नहीं मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती न कह सकती हूँ , बचपन के रहस्यमय अनुभवों में २ घटनाएं शामिल हैं और दोनों गावं की है , वहां शाम को इया की ओर से नहर की ओर जाने की मनाही होती थी, कहती थी -पानी में बुडुआ होले सन, जा पानीये में खींच लिह सन ' फिर भी हम गए पूल पर बैठ कर 'सनसेट' देखने के लिए, जैसे सूरज आसमान से गायब हुआ एक काला साया पानी पर चलता हम बच्चों की ओर आता महसूस हुआ , चेचरे-मचेरे मिलाकर हम आठ-दस बच्चे थे , कोई चिल्लाया और हम एक मिनट से भी कम समय में दुआर पर थे  दूसरी घटना मेरे घर काम करने वाले चन्द्रिका की थी जिसे गावं वापस आने के दौरान रात हो जाने पर 'चुपचुपवा डीह' पर रुकना पड़ा वहीँ एक 'पुरनिया पाकड़' के पेड़ के नीचे खैनी बनाकर खाने से पहले उसने 'किसी ' को ऑफर नहीं किया, सुबह जब लौटा तब उसकी आवाज़ बदली हुई थी हर बड़े बुज़ुर्ग सभी को तू-तडाक करके बात कर रहा था और बेहिसाब हँसने लगा था , कोई बाबा आये और विधिवत तरीके से खैनी ऑफर किया गया ,फिर चन्द्रिका की अपनी आवाज़ लौट आयी ! खैर ये सब डर से ज्यादा मज़ेदार अनुभवों का हिस्सा है डर तब लगा जब दस साल पहले दिल्ली के अपने घर में मैंने अकेले 'साइलेंस ऑफ़ द लैम्ब' देख लिया फिर एक हफ्ते तक रात को सो नहीं सकी वो तो शुक्र था उन दिनों एम्स के डाक्टर्स कॉलोनी से उठाया गया 'शेरू 'मेरे साथ साए की तरह रहा करता था ! सालों बाद कल मैंने रोजमेरिज बेबी देखने की कोशिश की आधी फिल्म पर पहुँचने तक फ्रिज की आवाज़ डरावनी लगने लगी, फिर लगा दरवाज़ा खुद ही खुल गया (यहाँ तेज़ हवा के कारण ऐसा अक्सर होता है , पर कल की बात अलग थी ) और सबसे ज्यादा डर तब लगा जब मुझे लगने लगा की एक और कमरे की लाइट मैंने नहीं किसी और ने ऑन कर दी हैं, मेरे अवचेतन में यही था की मैंने सिर्फ अपने पास की छोड़कर सारी लाइट ऑफ कर दी है !अब ये बहुत ज्यादा हो गया था मैंने तुरंत लैपटॉप का फ्लैप बंद किया और एकदम मुहं ढँक कर सो गयी ! हालांकि' हिचकाक' की 'वर्टिगो' भी मैंने देखी है पर उसे देखना मेरे गावं वाले अनुभवों जैसा रहा, पर जो भी हो मूवीज तो मुझे अकेले ही देखना पसंद है पर अगली सायको थ्रिलर अगले दस साल बाद! 
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