बुधवार, 21 अप्रैल 2010

कहां कहां से गुजर गया

पंकज कपूर की पहली फिल्म अब शायद थियेटर का मंूह देख सके। शयाम बेनेगल की आरोहन से अपने फिल्मी कैिरयर की शुरूआत करने वाले पंकज इस फिल्म से पहले कहां कहां से गुजर गया में काम चुके थे, पर ये फिल्म आज तक िरलीज नहीं हो सकी। अभिनेता अिनल कपूर भी इस फिल्म में हैं। नक्सल आंदोलन के खत्म हो जाने के बाद लक्ष्यहीन, दिशाहीन हो चुके युवाआें की यह कहानी गरम हवा जैसी कालजयी फिल्म बनाने वाले फिल्मकार  एम . एस. सत्थयू  ने 1981 में बनायी थी। लगभग एक दशक के बाद कन्नड़ फिल्म इज्जोडू से वापसी कर रहे सत्थयू  अगले एक दो महीने में कहां कहां से गुजर गया के िडब्बे से बाहर िनकल िथयेटर में आने की उम्मीद कर रहे हैं।
नक्सल आंदोलन के खत्म होने के बाद युवाआें में उपजी िदशाहीनता के बारे में बात करने वाली यह फिल्म अब कितनी प्रासंिगक है इसके बारे में सत्थयू कहते हैं आज फिर नक्सल आंदोलन अपने चरम पर है आैर सरकार के िलए कानून आैर व्यवथा के स्तर पर सबसे बड़ी समस्या। इतने सालों में न तो सरकार का नजिरया बदला आैर न ही यह समस्य  सुलझी। हां हमें भी यह अंदाजा नहीं था कि सरकार इतने लंबे समय में भी इस समस्या को सुलझा नहीं सकेगी। बहरहाल, कहां कहां से गुजर गया नक्सल आंदोलन के कमजोर पड़ने के बाद की कहानी है आज के युवा इससे कितना िरलेट करेंगे ये तो मैं नहीं जानता पर मैंने इस  फिल्म में  उस समय, उस दौर को दर्ज किया है, एक दस्तावेज है वो उस दौर के युवाआें की मनोदशा का। आज के युवा बदल गए हैं, महानगरों आैर बड़े शहरों के युवाआें के िलए नक्सलवाद,   सामािजक आिर्थक  की बात छोड़े  शायद यह कोई समस्या ही न हो । डेवलपमेंट पाकेट में रहने वाले ये युवा उस दौर के शहरों के युवाआें जैसे नहीं  हैं इसलिए देश की समस्याआें पर िरयेक्ट करने का उनका तरीका भी। जो कुछ कर सकते हैं उनमें मेजोरिटी की सोच सरकार जैसी है कि नक्सलवाद महज कानून आैर व्वस्था की समस्या है सामािजक आिर्थक िवषमता, गैरबराबरी या िवकास की दौड़ में हािशये पर छूटे लोगों का िरयेक्शन नहीं। सबसे अफसोसजनक बात तो ये है कि आज तीस साल से भी ज्यादा होने को आए लेकिन महानगरों आैर बड़े बड़े शहरों से इतर दूर  दराज के  लोगों के िलए  अब भी कुछ नहीं बदला। भारत का वो  युवा वहीं हैं, अपने बुिनयादी अिधकारों के िलए  लड़ता हुआ।
 एम . एस. सत्थयू से बाकी बातचीत अगली पोस्ट में

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

सिर्फ पढ़ना काफी नहीं

Inext में प्रकाशित लेख
राइट टू एजूकेशन का जश्न मन रहा है इसके प्रैक्टिकल एप्लीकेशन में क्या.क्या दिक्कतें आने वाली हैं  इस पर भी चर्चा हो रही है । इन सबके बीच क्वालिटी एजूकेशन का सवाल भी तो है। मौजूदा समय में हमारे देश में एजूकेशन में क्वांटिटेटिव सुधार तो आया है लेकिन क्वालिटी में नहीं। सरकार की कोशिशों के कारण अगर प्राइमरी एजूकेशन सभी के लिए सुनिश्चित हो भी जाए तो भी भविष्य में हायर एजूकेशन पर इससे बहुत फर्क पड़ेगा इसमें शक है। इस संदर्भ में लगातार पहले ही काफी चिंताएं जताई जा रही हैं लेकिन ज्यादा परेशान करने वाली बात ये है कि मौजूदा समय में देश में हायर एजूकेशन स्टैंडर्ड भी काफी चिंताजनक हैं।   हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार सैम पित्रोदा ने कहा कि देश की 90 प्रतिशत यूनिवर्सिटी मानक से लो स्टैंडर्ड एजूकेशन मुहैया करा रही है, एक कान्फ्रेंस में सैम पित्रोदा ने अपनी चिंताएं जाहिर करते हुए कहा कि 90 प्रतिशत यूनिवर्सिटी मानक से लो स्टैंडर्ड एजूकेशन मुहैया करा रही हैं आैर इनकी क्वालिटी ऑफ एजूकेशन अप.टू.द मार्क नहीं है, इसे तुरंत सुधारे जाने की जरूरत है।   चिंता यह भी थी कि जितनी यूनिवर्सिटीज या कॉलेजेस हायर एजूकेशन के लिए हैं  वे काफी नहीं हैं, शायद इसलिए सरकार ने 14 नई यूनिवर्सिटी ऑफ इनोवेशन और 400 नए कॉलेज खोलने का फैसला लिया है, लेकिन कॉलेज खोले जाना भर काफी नहीं है।  असल सवाल यह है कि जो एजूकेशन अवेलेबल कराई जा रही है, वो कितनी कारगर है? शिक्षा के इस मसले के दो बिल्कुल अलग.अलग सेक्शन हैं, एक जिसकी चिंता में हर व्यक्ति की जद में शिक्षा का न पहुंचना है जिससे संबंधित राइट टू एजूकेशन हाल ही में आया ही है, दूसरा सेक्शन है कि क्वालिटी एजूकेशन, क्वालिटी एजूकेशन किसी भी देश की बेसिक रिक्वायरमेंट तो है ही, इसी पर देश की तरक्की बेस करती है।  देश में हर साल बड़ी संख्या में बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है यह संख्या अपने आप में काफी कुछ कहती है हाथों में डिग्रियां थामे बेरोजगारों की संख्या बढ़ाने वाले हाथ कितने इक्विप्ड हैं उनकी शिक्षा कितनी कारगर है खुद उनके लिए और देश की प्रोग्रेस के लिए उनके हाथ में शिक्षा का हथियार तो है लेकिन अगर वो मोथरा है तो किस काम का? ये वो सवाल हैं जिन पर काम होना जरूरी है। एक बढि़या कॉलेज से पढ़.लिखकर निकला युवा किसी भी सूरत में बेरोजगार नहीं हो सकता, नौकरी भर उसका लक्ष्य होता भी नहीं वो नये रास्ते खोजता है और कुछ न कुछ बेहतर करने की फिराक में रहता है एक बार किसी ने कहा था कि एक आईआईएम पास आउट अगर सब्जी का ठेला भी लगायेगा तो उसमें भी कुछ न कुछ लैंडमार्क सक्सेस जरूर अचीव करेगा।  एजूकेशन का व्यापक अर्थ समझना है, एजूकेशन सिर्फ डिग्री हासिल करना नहीं काले अक्षरों को जानना भर नहीं है, जीवन के जटिल अर्थो को सहज रूप में समझना है एक वेल एजूकेटेड व्यक्ति कभी भी बेकार नहीं रह सकता  वह कुछ न कुछ करके अपने लिए रास्ते निकाल ही लेगा।
  किसी देश के भविष्य की चाभी बेहतर एजूकेशन में छिपी होती है। भारत में बंगलूरू इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जो आज से 20.25 साल पहले केवल अपने कॉलेजों के लिए प्रसिद्ध था।  लेकिन बाद में तकनीकी शिक्षा से लैस यही युवा यहां.वहां बड़ा वर्कफोर्स बन गए और दुनिया में भारत को बंगलूरू के नाम से एक अलग पहचान दिलाई। पूरे देश को बंगलूरू बनना है ,जो  भी पढ़ा.पढ़ाया जा रहा है उसकी क्वालिटी पर ध्यान रखे जाने की जरूरत है सरकार की जिम्मेदारी तो है ही लेकिन एक इंडीविजुअल के तौर पर टीचर्स और स्टूडेंट्स का इनीसिएशन भी इंपॉर्टेट है  इसे इग्नोर नहीं किया जा सकता।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कर्नाटक में जारी लोहे के अवैध खनन पर राज्य के लोकायुक्त जस्टिस संतोश हेगड़े के साथ बातचीत।


For Public Agenda



-कर्नाटक में लोहे की राजनीति के बारे में क्या कहेंगे आप?
बेल्लारी, चित्रदुर्गा और टूमकूर में लोहे का जमाव है और सारा किस्सा इस खजाने के ज्यादा से ज्यादा हिस्से पर अपना कब्जा जमाने की प्रतिस्पद्र्धा का है। इसकी शुरूआत वर्ष 2002 से हुई जब चीन को अपने यहां 2008 में होने वाले ओलंपिक खेलों के लिए भारी मात्रा में लोहे की जरूरत हंई। अचानक लोहे की कीमत आसमान छूने लगी और यहीं से लोहे की राजनीति शुरू हुई।
-खनन क्षेत्र में जारी लूट-खसोट की जांच कैसे शुरू की आपने? और कहां तक पहंुचे?
2007 में मेरे पास सरकार की ओर से लोहे के अवैध खनन और वन क्षेत्र में लोहे की ढुलाई की जांच की लिखित शिकायत आयी। इस आधार पर बेल्लारी, होस्पेट और टूमकूर में जांच करने पर हमने पाया कि यहां भारतीय खान ब्यूरो के मानकों का सीधे तौर पर उल्लंघन हो रहा है। जिसके तहत वन क्षेत्र में अतिक्रमण, वहां माल की अवैध डंपिंग, लीज क्षेत्र से बाहर और मानक गहराई से ज्यादा खनन जैसी बाते हमने देखीं। हमने लोहे की ढुलाई में भारी अनियमितता पायी। मैं किसी भी कंपनी का नाम नहीं लेना चाहुंगा, बहरहाल, मैंने पाया कि एक लाॅरी को 30 दिन में एक बार लौह-अयस्क ढुलाई करने का परमिट होता है पर पोर्ट तक पहंुचने और लौटने में मात्र एक दिन लगता है अतः  महीने एक लाॅरी 10 से 15 ट्रिप माल ढ़ुलाई करती है। राज्य सरकार के कर्मचारी घूस लेकर उस कंपनी के ट्रकों की बेरोकटोक आवाजाही सुनिष्चित कर रहे हैं।

-कर्नाटक में अवैध खनन पर अपनी रिपोर्ट का पहला हिस्सा आप सौंप चुके हैं दूसरा भाग कब तक आने की संभावना है?
 दूसरा भाग लगभग तैयार है एक महीने के भीतर हम इसे सार्वजनिक कर देंगे।
-इस रिपोर्ट में कुछ खास है?
नहीं ऐसा कुछ नहीं है, लोहे के अवैध खनन, वन अधिनियम का उल्लंघन और उसके ट्रांसपोर्टेशन में होने वाली अनियमितताओं व  भ्रष्टाचार पर पहले भाग में ही हम काफी कुछ कह चुके हैं। हां इस रिपोर्ट में हमने कर्नाटक में ग्रेनाईट के खनन में जारी अनियमितताओं और खनन व वन्य कानून के उल्लंघन पर भी फोकस किया है। बंगलूरू के पास कनकपूरा,चामराजनगर, रामनगर और बिदड़ी में ग्रेनाईट खनन में भी हमने काफी अनियमितता पायी है। इन इलाकों में पाया जाने वाला ग्रेनाईट इटैलियन ग्रेनाईट की श्रेणी का है।
-हाल ही में आपने कहा था कि आपके पास पावर नहीं है सरकार को लोकायुक्त को और शक्ति प्रदान करनी चाहिए और आपसे ज्यादा शक्ति उपलोकायुक्त के पास है?
बिल्कुल सही! मैं मौजूदा व्यवस्था से खुश नहीं हंू। और मैं इस संदर्भ में प्रक्रियात्मक बदलावा चाहता हंू। लेकिन सरकार इस बदलाव के पक्ष में तो नहीं दिखती है। दरअसल लोकायुक्त के पास सुओ मोटो अधिकार नहीं है। लोकायुक्त के जांच के दायरे में प्रथम श्रेणी के कमर्चारी  से लेकर मुख्यमंत्री तक आते हैं पर हमें बगैर लिखित िशकायत के किसी भी प्रकार की कार्रवाही का अधिकार नहीं है जबकि उपलोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र में निचले पायदान के कर्मचारी तक शामिल हैं और उसे सुओ मोटो अधिकार हासिल है। सबसे रोचक बात तो ये है कि पिछले चुनाव में भी कर्नाटक में चुनाव लड़ रहे तीन बड़े दलों के चुनावी घोषणापत्र में लोकायुक्त को और अधिक शक्तिशाली बनाने और सुओ मोटो अधिकार देने की बात थी। अब उनमें से एक दल की सरकार है पर हालात पहले जैसे ही हैं। वैसे भी हमारे काम का केवल दस फीसदी ही भ्रष्टाचार जैसे मामलों की जांच से संबंधित होता है, नब्बे प्रतिषत मामले तो हम जनता की शिकायतों मसलन पेशंन , उपचार इत्यादि से संबंधित सुलझाते हैं।
-अवैध खनन के कारण कर्नाटक के सरकारी खजाने को हुए नुकसान की भरपायी दोषियों से वसूल करने की बात कही थी आपने?
मेरा मतलब उन सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों से जुर्माना वसूल करना था जिनके भ्रष्टाचार की वजह से सरकारी खजाने को इतना बड़ा नुकसान हुआ।
-कुछ बदला?
राज्य सरकार को पहले प्रति टन लोहे पर 27 रूपए राॅयल्टी मिलती थी अब यह 200 रूपए हो गई है। जबकि 2006 और 2007 में राज्य सरकार को 27 रूपए रायल्टी देकर इसी लौह-अयस्क का 6,000 से 7,000 हजार रूपए प्रति टन के हिसाब से निर्यात होता था। यानी सरकार को पहले ही करोड़ों का नुकसान हो चुका है।
-पर्यावरण और वन मंत्रालय के मुताबिक 1980 वन अधिनियम के बाद इसके उल्लंघन के कुल 1309 मामले अभी तक अनुमोदित हुए हैं और कुल 100,871 हक्टेयर वन क्षेत्र इसके कारण नष्ट हुआ है और इसमें केवल कर्नाटक से ही 10 फीसदी से कुछ ज्यादा वन क्षेत्र नष्ट हुआ है?
- मैं इस बात से सहमत हंू, खनन से पर्यावरण और वन क्षेत्र बहुत प्रभावित है। आज इस इलाके से स्लाॅग बीयर पूरी तरह से गायब हो चुके हैं। चंदन के पेड़ भी खत्म हो गए। और इसके लिए जिम्मेदार खनन लीज प्रदान करने में होने वाली धांधली ही है। पहले प्रोस्पेक्टिंग मानचित्र के आधार पर लीज मिलता था अब केवल काल्पनिक मानचित्र जमा करके भी लीज हासिल कर लेते है न तो केन्द्र सरकार और न ही राज्य सरकार की ओर से उस क्षेत्र की क्रास चेकिंग की जाती है। इसके अलावा एक और वजह रेजिंग काॅन्ट्रेक्ट भी है जिसके तहत लीज मिलने के बाद उसे थर्ड पार्टी को बेच दिया जाता है। जिसे सिर्फ और सिर्फ धातू के अधिकतम दोहन से मतलब होता है। राज्य सरकार ने केवल 158 खनन लीज प्रदान किया है जबकि ढ़ाई सौ से ती सौ जगहों पर खनन हो रहा है। जिस तेजी से यहां खनन हो रहा है उसके आधार पर अनुमान है कि 30 साल तक चलने वाला यह खजाना 6 साल में ही खत्म हो जाएगा।
-येदुरप्पा सरकार के रूख के बारे में आपकी क्या राय है?
सरकार को हम अपनी आधी रिपोर्ट सौंप चुके हैं लेकिन अभी तक उसके मुताबिक कार्रवाही नहीं हुई है। सरकार कितनी मजबूर है यह कुछ महीने पहले ही सब देख चुके हैं। अभी तक इस सदंर्भ में कुछ ठोस नहीं हुआ है।
-आपको क्या लगता है कैसे अवैध खनन और इस क्षेत्र में जारी भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है?
हमने तो अपनी रिपोर्ट दे दी, सरकार को उसके मुताबिक एक्शन लेना है। हालात सभी के सामने हैं। मैं किसी भी विशेष व्यक्ति, कंपनी या राजनीतिक दल का नाम लेना नहीं चाहंूगा। पर ये जरूर कहंूगा कि खनन क्षेत्र में पूरे देश में खासतौर पर कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश में पूरी तरह से राजनीति हावी है। मैंने निर्यात बंद करने का सुझाव दिया था, मेरी समझ से निर्यात पर पूरी तरह से रोक लगाकर इस क्षेत्र में जारी लूट-खसोट को नियंत्रित किया जा सकता है। सरकार को कैप्टिव खनन लीज यानी खनन करने वाली कंपनियों के लिए वहां कारखाना लगाना अनिवार्य हो इस व्यवस्था के तहत खनन लीज देना चाहिए। इससे हालात बदल सकते हैं लोगों को रोजगार मिलेगा, केन्द्र सरकार को सेंट्रल एक्साईज टैक्स और राज्य सरकार को वैट के जरिए हजारों करोड़ों की आय होगी। साथ ही देश की बहुमुल्य संपदा देश में ही रहेगी। मेरे विचार से केवल सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार ही इस पर रोक लगा सकती है।

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बुधवार, 14 अप्रैल 2010

अब आया उंट पहाड़ के नीचे

Published in Public Agenda
कर्नाटक में इन दिनों लोहा फिर गर्म है लेकिन इस बार तस्वीर का रूख कुछ और है। कुछ महीने पहले लोहे की ताकत से येदुरप्पा सरकार की जान अटकाने वाले बेल्लारी के बेताज बदशाह इन दिनों थोड़ा बौखलाए हुए हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सर्वे आॅफ इंडिया की टीम मेजर जनरल ए के पाधा के नेतृत्व में बेल्लारी में अनंतपूर जिले के 6 खनन लीज का सर्वेक्षण कर रही है। जिसमें से तीन ओबुलापूरम माईनिंग कंपनी या ओएमसी के पास है। ओएमसी की एक खान का सर्वेक्षण पूरा कर टीम ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया है। इस रिपोर्ट में कुछ अतिक्रमण किए जाने का संकेत है। सर्वेक्षण पूरा होने तक इस क्षेत्र में खनन पर पहले ही अदालत ने रोक लगाया हुआ है। सर्वे आॅफ इंडिया की यह रिपोर्ट रेड्डी बंधुओं के लिए एक बड़ा झटका है। वैसे उनकी बौखलाहट इससे पहले ही दिखनी शुरू हो गई थी जब उनके विरूद्ध मामला दायर करने वाले लोगों पर हमले हुए या उनके खिलाफ आवाज उठाने वाले दहशत के साये में जी रहे हैं।
हाल ही में  बेल्लारी में आठ अज्ञात हमलावरों ने टुम्टी आयरन ओर के मालिक तापल गणेष और उनके भाईयों पर उस समय जानलेवा हमला किया जब वे एक रेस्तरां में सर्वे आॅफ इंडिया की टीम से मुलाकात करने के लिए इंतजार कर रहे थे। उनके साथ कुछ पत्रकार भी थे, उन पर भी हमला किया गया। दरअसल, तापल गणेष वहीं शख्स हैं जिनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बेल्लारी के रेड्डी भाईयों करूणाकर रेड्डी, जर्नादन रेड्डी और सोमशेखर रेड्डी की कंपनी ओबुलापूरम माईंनिंग कंपनी के आन्ध्रप्रदेश के अनंतपूर जिले में खनन कार्य पर रोक लगा दी है। उन्हीं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे आॅफ इंडिया की टीम को यह पता लगाने का आदेश दिया है कि ओएमसी के द्वारा कर्नाटक राज्य के बेल्लारी जिले में उनकी खानों में अतिक्रमण कर अवैध खनन किया गया है और दोनों राज्यों के बीच की सीमा से छेड़डाड़ की गई है साथ ही आरक्षित वन क्षेत्र में भी अतिक्रमण किया गया है। गणेष अपने परिवार के तीसरी पीढ़ी के खननकर्ता हैं। उनकी खानें कर्नाटक में है और रेड्डी बंधुओं की आन्ध्रप्रदेश में, दोनों की सीमाएं आपस में मिलती है। गणेष ने 2006 में यह पुलिस शिकायत दर्ज करायी थी कि रेड्डी बंधु उनकी खानों का अतिक्रमण कर रहे हैं, बाद में 2009 में उन्होंने इसी से संबंधित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की।
इधर, ओएमसी के पूर्व कर्मचारी वी अंजनैया जैसे लोग भी हैं जो इन दिनों दहशत के कारण बंगलूरू में हैं और बाहर लोगों के संपर्क में आने से डर रहे हैं। उनका कसूर केवल यही है कि उन्होंने ओएमसी में उपमहाप्रबंधक के तौर पर काम किया था। ं केन्द्रीय श्रम मंत्रालय और खान सुरक्षा के डायरेक्टर जनरल की ओर से उन्हें प्रथम श्रेणी खनन प्रबंधक प्रमाणपत्र हासिल है। रेड्डी बंधु की ओएमसी का काम उनकी इस योग्यता से बहुत आसान हो जाता था। लेकिन पिछले साल दिसंबर में सीबीआई के द्वारा ओएमसी के दफ्तर पर छापे की खबर के बाद रातों रात अंजनैया के दफ्तर को ओएमसी के द्वारा ही नेस्तनाबूद कर दिया गया। सारे रिकार्ड हटा दिए गए। अंजनैया ने इसी पर सवाल उठाया था। दरअसल, ये सभी वाकये रेड्डी बंधुओं की घबराहट में किए गए पलटवार ही हैं। लेकिन इस मसले पर रेड्डी बंधुओं में से कोई भी कुछ नहीं कह रहा। उनके फोन बंद हैं और उनके सचिव ओएमसी के मुद्दे पर कुछ भी टिप्पणी करने को तैयार नहीं हैं।
दूसरी ओर अपनी पांच सदस्यीय टीम के साथ सर्वेक्षण कर रहे मेजर जनरल ए. के पाधा भी सर्वेक्षण के बाबत अभी कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं। उनसे संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि मैं कुछ नहीं जानता। हांलाकि उनकी टीम ने बेल्लारी को केन्द्र बनाते हुए हैदराबाद में सैटेलाईट नियंत्रण प्वाइंट रखकर नवीनतम वैज्ञानिक विधि से इस इलाके का सर्वेक्षण किया है। पहली बार इस इलाके का सर्वे आॅफ इंडिया के 1972-73 के मानचित्रों के आधार पर सैटेलाईट सर्वेक्षण किया गया है। जबकि अनंतपूर के मुख्य वन संरक्षक पदनाभन ने जरूर कहा कि पहली बार इलाके का सैटेलाईट सर्वे किया जा रहा है इसलिए कितना समय लगेगा इसके बारे में अभी निष्चित तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। टीम ने फिलहाल आन्ध्रप्रदेश और कर्नाटक के राजस्व और वन विभाग के मानचित्रो साथ ही ओएमसी के 68.5 हेक्टेयर के स्केच का निरीक्षण किया। जहां कुछ हद तक अतिक्रमण पाया है। ताजा सर्वेक्षण का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने आन्ध्रप्रदेश सरकार की उस याचिका पर दिया है तहत आन्ध्र सरकार ने हाई कोर्ट में सर्वेक्षण की अपनी याचिका के खारिज हो जाने और खनन पर रोक हटा देने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
दरअसल, 22 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कर्नाटक के राजस्व मंत्री जनार्दन रेड्डी और पर्यटन मंत्री करूणाकर रेड्डी के स्वामित्व वाली कंपनी ओबुलापुरम माईनिंग कंपनी और तीन  अन्य कंपनियों के इस क्षेत्र में खनन कार्यो पर रोक लगा दी थी। और आरोपों की जांच के लिए एक समिति नियुक्त कर उसे दो सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया। जस्टिस के जी बालाकृष्नन, और जस्टिस दीपक वर्मा की खंडपीठ ने संरक्षित वन क्षेत्र में ओएमसी के अतिक्रमण की जांच का भी आदेश दिया है। कोर्ट ने 9 अप्रैल तक पहले ओएमसी के 68.5 हेक्टेयर वाले एक खान की सर्वे रिपोर्ट सौंपने को कहा था। इस बीच ओएमसी के वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत से बाकी दो खानों में खनन जारी रखने की अनुमति की निवेदन किया। लेकिन अदालत ने कहा कि खनन की अनुमति तभी मिलेगी जब यह सुनिष्चित हो जाएगा कि ओएमसी ने लीज क्षेत्र और वन क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं किया है। साथ ही सभी लीज क्षेत्र में सर्वेक्षण कार्य पूरा होने तक कोई खनन गतिविधि नहीं हो सकेगी। गौरतलब है कि ओएमसी के दो अन्य लीज क्षेत्र क्रमषः 25.98 हेक्टेयर और 39.5 हेक्टेयर के हैं। ओएमसी के बाद बेल्लारी आयरन ओर लिमिटेड, वाई.एम सन और अनंतपूर माईनिंग काॅरपोरेशन के लीज क्षेत्र का सर्वे किया जाएगा।
इधर येदुरप्पा सरकार की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तापल गणेष पर हुए हमले के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह, और डायरेक्टर जनरल व इंस्पेक्टर जनरल आॅफ पुलिस को बेल्लारी के एस पी श्रीमंत कुमार सिंह को वहां से हटाने का आदेष दिया था लेकिन इस आदेष का पालन नहीं हुआ। अब राज्य मानवाधिकार आयोग  राज्य सरकार को इस मुद्दे पर नोटिस भेजने का मन बना रहा है। इधर ओएमसी के अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार ने कहा कि हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं हमारा कोई भी कदम उस फैसले के अनुरूप ही होगा।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.