गुरुवार, 4 मार्च 2010

काले सफेद का जादूगर वी के मूर्ति



Published in Public Agenda
गरूदत्त की कागज के फूल, साहब बीबी और गुलाम और प्यासा जैसी फिल्मों को अपनी अपनी सिनेमैटोग्राफी से कालजयी बनाने वाले वी के मूर्ति को इस साल के दादा साहब फाल्के सम्मान के लिए चुना गया है। प्रकाश और छाया के बेमिसाल समायोजन से सेल्युलायड पर चित्रकारी करने वाली इस शख्सियत ने फिल्मों में अपने कैरियर की शुरूआत आरकेस्ट्रा में वायलिन बजाने की थी। पेश है उनसे गुरूदत्त उनकी फिल्मों, सिनेमैटोग्राफी तकनीक और उनके संस्मरणों पर की गई खास बातचीत।


अपने शुरूआती दिनों के बारे में बताएं?
-मैं मैसूर का हंू, बचपन से ही फिल्मों में दिलचस्पी थी। मेरे चाचा मूक फिल्मों के दौर में सिनेमा हाॅल में बैठकर संगीत बजाया करते थे। मैंने भी वायलिन सीखा था। बंगलूरू से मैंने सिनेमैटोग्राफी का कोर्स किया। उस जमाने में कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री नहीं थी, और तमिल, तेलगू में भी उतनी फिल्में नहीं बन रही थी, इसलिए मैं सीधा मंुबई चला गया।
हिंदी फिल्मों में ब्रेक कैसे मिला?
-साल 1946 में मैं जयंत देसाई की फिल्म महाराणा प्रताप में द्रोणाचार्य का सहायक सिनेमैटोग्राफर था। वहीं मैं ने पहली बार आम्रपाली में फली मिस्त्री के काम को देखा। उनकी सिनेमैटोग्राफी अंग्रेजी फिल्मों के स्तर की  थी। तभी से मैं उनके साथ काम करना चाहता था। बाद में फली ने खुद मुझे अपने साथ काम करने बुलाया। सच कहुं मैं आज भी नहीं जानता ऐसा कैसे हुआ शायद् इसे ही किस्मत कहते हैं। दरअसल, मैं वायलिन भी बजाता था, मैंने एक संगीत-निर्देशक के लिए वायलिन बजाया था और उसी के पैसे लेने गया था, वहीं पर किसी ने मुझे बताया कि फली साहब तुम्हें काम करने के लिए खोज रहे हैं। मैं तुरंत उनके पास गया, उन्होंने बतौर सहायक मुझे रख लिया। सुबह से शाम तक मैं काम करता रहा। शाम को उन्होंने कहा अब तक 23 असिस्टेंट कैमरामैन मेरे साथ काम कर चुके हैं तुम 24वें हो और यू आर द बेस्ट। मैंने 4-5 साल उनके साथ काम किया और खूब सीखा, वो मेरे गुरू थे। उस दौर में फरीदूर ईरानी, जल मिस्त्री, द्वारका दीवेचा भी अच्छे सिनेमैटोग्राफर थे। 

गुरूदत्त से कैसे मिलना हुआ ?
--वो जमाना स्टुडियो का था। फिल्में स्टुडियों में ही बना करती थीं। मैं तब फेमस स्टुडियों में बतौर सहायक कैमरामैन काम कर रहा था। चेतन आनंद ने अपनी फिल्म बाजी की शुटिंग के लिए इस स्टुडियो को किराए पर लिया था। देव आनंद फिल्म के हीरो थे। देव साहब के ही रिश्ते के भाई वी रात्रा  कैमरामैन थे और मैं उन्हें स्टुडियो की ओर से असिस्ट कर रहा था। फिल्म के निर्देशक गुरूदत्त  थे। रात्रा काम को लेकर उतने गंभीर नहीं होते थे इसलिए उनकी संगत में मुझे अपने मन मुताबिक काम करने के मौके मिल जाया करते थे। एक दिन गुरूदत्त एक गाने को फिल्माने को लेकर कुछ परेशान दिख रहे थे, शायद , सुनो गजर क्या गाए ये गीत था। वो गाने के एक हिस्से को फिल्माने के लिए किसी खास एंगल की तलाश कर रहे थे। क्योंकि उस हिस्से में काफी संगीत था। वो संगीत को कैमरा मूवमेंट के साथ ढंकना चाहते थे। मैंने उनसे कहा, अगर आप चाहें तो मैं कुछ कर सकता हंू , मैंने उन्हें एक बड़ा आईना दिखाते हुए कहा, इसकी मदद से प्रभावशाली कैमरा मूवमेंट पैदा किया जा सकता है। उन्होंने कहा कैसे? मैंने कहा हम कैमरा को आईना पर रखेंगे और देव साहब की एंट्री उनके अक्स से शुट करेंगे। और जब तक वो कुर्सी पर बैठेंगे तब तक कैमरा उन्हीं पर होगा। गुरूदत्त को लगा रात्रा से इतनी मूवमेंट संभव नहीं है। इसलिए रात्रा से पूछकर उन्होंने इस सीन को मुझसे शुट कराया और फिर शाम को उन्होंने मुझसे कहा अब मेरी हर फिल्म के कैमरामैन तुम ही होगे। जाल में पहली बार बतौर कैमरामैन उन्होंने मुझे मौका दिया।
उनके साथ काम करना कैसा अनुभव था?
-उनके साथ काम करना सबसे अलग था। वो कहते थे मूर्ति कागज के फूल और प्यासा मैने तुम्हारे लिए ही बनायी है। उन्होंने मुझे टेक्नीकलर लैब में सिनेमैटोग्राफी सीखने के लिए गन्स आॅफ नवारून के शुटिंग के दौरान पांच महीने के लिए लंदन भेजा था। इस फिल्म में ग्रेगरी पेक थे और मेरे पसंदीदा ओस्वाल्ड माॅरिश सिनेमैटोग्राफर थे। सभी को लगता था कि मैं वहां तकनीक सीखने गया हंू, पर ऐसा बिल्कुल नहीं था। दरअसल, तकनीक में कोई फर्क नहीं था केवल उनके काम करने का तरीका बहुत नियोजित हुआ करता था। जबकि हमारे यहां ऐसा नहीं था। मैंने वहां यही सीखा था और कुछ नहीं। लेकिन गुरूदत्त के साथ इन बातों का कोई मतलब ही नहीं था। आपने एक दिन पहले जो भी तैयारी की हो, अगली सुबह उनके दिमाग में कुछ अलग होता था। मेरे ख्याल से उनके बाद सत्यजित रे ही उनकी जैसी सृजनात्मकता के साथ काम करते थे। वो कैमरा के आगे आने से झिझकते थे पर मेरे लगातार कहने पर आखिरकार अभिनय  के लिए वो मान गए।
गुरूदत्त ने आत्महत्या क्यों की?
--मैं कह नहीं सकता शायद ये उनकी प्रवृति में था। वो यूं भी कहा करते थे-मुर्ति ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! उनके बच्चों में से एक बेटे अरूण ने भी 32 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली, ये प्रवृति ही हो सकती है। वो स्वभावतः एकाकी थे, आत्महत्या की उनकी ये तीसरी कोशिश  थी। उनकी पत्नी और बच्चे उनके साथ नहीं थे शायद ये भी कारण हो। लेकिन गीता दत्त को मैं सबसे ज्यादा मानवीय व्यक्तिव मानता हूं, वो बहुत अच्छी थीं। खैर, उस दिन मैं बंगलूरू में था, और सबसे पहले तो मुझे अपने लिए ही अफसोस हुआ। सच भी है उनके बाद वैसा साथ, वैसा बौ़िद्धक काम और वैसी रचनात्मक आजादी मुझे नहीं मिल पायी। 

गुरूदत्त के पसंदीदा शाट्स के बारे में बताएं?



 मेरे तीन साल के बेटे के कैमरे में मुर्ति
-उन्हें प्रयोग पंसद था। लेकिन खासतौर पर उन्हें बड़े क्लोज-अप पसंद थे। वो कैमरे को जितना संभव हो उतना नजदीक ले जाकर शाट लेना पसंद करते थे। बहुत जल्दी संतुष्ट नहीं होते थे और नई तकनीक को तुरंत अपनाते थे। चाहे सिनेमास्कोप में फिल्म बनाने की बात हो या फिर चैदवीं का चंाद फिल्म के गीत की कलर प्रिंट में शुटिंग।

उन दिनों के लोगों के साथ संपर्क में हैं?
-कुछ खास नहीं। वहीदा मुझे फोन करती रहती हैं। गुरूदत्त की बेटी ललिता लाजमी जो पेंटर भी हैं उनके संपर्क में हंू।



अपनी विरासत आप किसमें देखते हैं?
-नरीमन ईरानी, गोविन्द निहलाणी, जे मलिक, के जी प्रभाकर और एस आर के मूर्ति जिन्होंने मेरे साथ काम किया मैंने उन्हें अपने बच्चे की तरह सब कुछ सिखाया। ये सब बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

इन दिनों किसका काम पसंद आ रहा है?
-फिल्मों से मैं बिल्कुल दूर हंू। पिछले 10-12 साल से मैंने कोई फिल्म नहीं देखी है इसलिए कोई जानकारी नहीं है।

आपने मुंबई क्यों छोड़ दिया?
-1964 में गुरूदत्त की मौत के बाद मैंने कमाल अमरोही, गोविन्द निहलाणी, श्याम बेनेगल और प्रमोद चक्रवर्ती के साथ काम किया। भारत की खोज और तमस जैसे धारावाहिकों में मजा आया। कमाल अमरोही के साथ पाकीजा और रजिया सुल्तान में भी। लेकिन धीरे-धीरे सब बदल रहा था, मुझे काम में मजा नहीं आ रहा था। इसलिए मैंने 2001 में मुंबई छोड़ दिया।

अपना बेहतरीन आपने किस फिल्म को दिया?
-हांलाकि कागज के फूल और साहब बीबी और गुलाम के लिए मुझे फिल्म फेयर अवार्ड मिला पर प्यासा को मैं अपना बेहतरीन काम मानता हंू। कागज के फूल पहली 75 एम.एम सिनेमास्कोप फिल्म थी इसलिए लोगों ने बेहतर तरीके से समझा। लेकिन प्यासा में मैंने फ्रेम दर फ्रेम गुरूदत्त के साथ स्क्रीन पर कविता लिखी है।
बहरहाल, कागज के फूल के गीत वक्त ने किया क्या हसीं सितम को प्रकाश संयोजन के लिहाज से मील का पत्थर माना जाता है। यह प्रयोग भी तब सूझा जब नटराज स्टुडियों में शुटिंग करते समय मैंने वेंटीलेटर से आती हुई सूरज की रोशनी के बीम को देखा। गुरूदत्त ने मुझे सूर्यप्रकाश का इस्तेमाल करने को कहा, इसलिए मैंने दो बड़े-बड़े आईने मंगवाएं एक को स्टुडियों में रखा और एक को उपर बाहर बालकनी में और दरवाजा खोल दिया। प्रकाश के परावर्तन से रोशनी का बीम बना। स्टुडियो में हमने लोबान जलाकर इस प्रभाव को और गहन किया।

पश्चिम  के किन सिनेमैटोग्राफर ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया? आप दोनों की जोड़ी को दुनिया की बेहतरीन निर्देशक-कैमरामैन जोड़ियों मसलन बर्गमैन-निकवेस्ट, सुब्रतो-सत्यजित रे में से एक माना जाता है?

-निकवेस्ट का मुझे याद नहीं लेकिन ब्रिटिश सिनेमैटोग्राफर और निर्देशक जैक कार्डिफ का मैं कायल रहा हंू। पावेल, हु्रस्टन और हिचकाॅक की फिल्मों में उनका काम देखने को मिलता है। उनका कैरियर मूक फिल्मों के दौर से टेक्नीकलर फिल्मों तक था। पावेल की फिल्म अ मैटर आॅफ डेथ एंड लाईफ और ब्लैक नारसिसस में उनका काम बेमिसाल था। एक और ब्रिटीश सिनेमोटोग्राफर हुआ करते थे ओस्वाल्ड माॅरिश उनकी शैली भी मुझे बहुत पसंद थी। उन्होंने रोनाल्ड नीमे और डेविड लीन के साथ खूब काम किया था। और खुद सिनेमैटोग्राफर से निर्देशक बने नीमे तो ओस्वाल्ड को दुनिया का सबसे बेहतरीन कैमरामैन कहा करते थे। गन्स आॅफ नवारून्स के सिनेमैटोग्राफर भी ओस्वाल्ड ही थे। इस फिल्म की यूनिट के साथ मैं लंदन में था और इस दौरान मुझे इनके काम को करीब से देखने का मौका भी मिला। इसके अलावा ओलीवर फिल्म में भी उनका काम पसंद आया।
हाॅलीवुड में मुझे जेम्स वांग होवे का काम पसंद आता था। ये हाॅलीवुड के सबसे चहेते सिनेमैटोग्राफर हुआ करते थे। शैडो या छाया के फिल्मांकन का उन्हें मास्टर कहा जाता था और उन्होंने ही डीप फोकस सिनेमैटोग्राफी की शुरूआत की थी। उन्हें ड्रामैटिक लाईटिंग और डीप शैडो का उस्ताद कहा जाता था। ब्लैक एंड वह्राईट फिल्मों में उनका काम बेमिसाल था। खासतौर पर अ रोज टैटू , फनी लेडी और हुड जैसी फिल्म में। एक और अमेरिकन सिनेमैटोग्राफर चाल्र्स ब्रायंट लैंग जुनियर की शैली का भी मैं कायल था। ए फेयरवेल टू आम्र्स, डिजायर और एंजेल इन फिल्मों में उनका काम बहुत अच्छा था। ये सभी ब्लैक एंड व्ह्राईट फिल्में थीं। ट्राशलुसेंट लाईट के साथ उनका प्रयोग बेजोड़ हुआ करता था। उनकी रंगीन फिल्मों में बटरफलाईज आर फ्री में भी बहुत अच्छा काम है। इसके अलावा रेनाहन और अरनेस्ट हालर भी मुझे बहुत पसंद थे। फिल्म गाॅन विद द विंड  में दोनों को अकेडमी अवार्ड मिला था। अरनेस्ट की फिल्म फ्लेम एंड द एैरो भी उल्लेखनीय है।

दादा साहब फाल्के पाकर कैसा लग रहा है?
-मेरे पास जब सूचना और प्रसारण मंत्रालय से फोन आया तो मुझे लगा कोई मजाक कर रहा है, लेकिन जब दोबारा उन्होंने मेरा नाम लेकर कहा तब मैंने समझा ये मेरी ही बात कर रहे हैं। आमतौर पर अभिनय और निर्देशन के लिए ही अवार्ड मिलते हैं शायद मैं पहला तकनीशियन हंू जिसे यह अवार्ड मिला है। मुझसे पहले नितिन बोस को भी मिला था पर वो सिनेमैटोग्राफर के साथ-साथ निर्देशक भी थे। मेरा तो पूरा जीवन बीत गया जब मैंने फोकस हमेशा स्टार पर ही देखा। पत्रकार भी हमारे साथ फोटो खिंचवा लिया करते थे, लेकिन प्रकाशित कभी नहीं कराते थे, हमेशा स्टार ही तस्वीरों में हुआ करते थे। खैर, इस सम्मान से तकनीशियनों के योगदान को भी समझा जाएगा। मेरे लिए तो सबसे बड़ी उपलब्धि मेरी पूरी यात्रा और इसमें मिले लोग हैं खासतौर पर गुरूदत्त।


  मेरे बेटे के साथ मुर्ति

10 टिप्‍पणियां:

  1. दादा साहाब फाल्के सम्मान से विभूषित वी के मूर्ति जी के बारे में यह साक्षात्कार ज्ञानवर्द्धक है -आभार !

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  2. अच्छी जानकारी मिली...इस बहाने!

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  3. बहुत बढ़िया लगा जानकर ।

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  4. बहुत ही बढि़या बातचीत। मूर्ति की बातों में यादों की महक है जो प्रस्‍तुति के अंदाज में सहज ही दिख जाती है। बहुत बढि़या... जारी रखिए।

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  5. संजय जी मात्राआें की गलती कन्वर्टर के कारण ही हो रही है।

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  6. बेहद ही रोमांचित हूं कि आपने श्री मूर्ति जी का इंटरव्यु यहां प्रकाशित किया है. पूरा पढने की बाद फिर से कमेंट करूंगा , मगर अभी तो यही एक्साईटमेंट है कि मूर्ति जी के बारे में जितना भी पढा है दूसरे सोर्सेस से पढा है, यहां सीधे और साक्षात ही जानने को मिल रहा हू.

    आपका मेल आई डी दे सकें तो कुछ और जानकारी लेना चाहुंगा आपसे, अगर दें सकें तो मेहरबानी होगी.

    मैं गुरुदत्त जी पर लिख रहा हूं प्राप्त जानकारीयों के बल पर, और चाहुंगा कि इसमें इज़ाफ़ा हो या पुष्टि हो.

    आप मेरी साईट पर गुरुदत्त्जी के बारे में और जो भी लिखा है वे पढ सकती हैं.

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  7. बहुत बढ़िया लगा जानकर ।

    कभी अजनबी सी, कभी जानी पहचानी सी, जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…
    http://qatraqatra.yatishjain.com/

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