शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

किसे चाहिए लोकायुक्त


किसे चाहिए लोकायुक्त

लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच ठनी हुई है। इससे राज्य में इस संस्थान के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो गया है। मनोरमा की रिपोर्ट
राजधानी दिल्ली में जोर-शोर से लोकपाल के समर्थन और भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलकर बैठी भाजपा मे अपने ही एक राज्य में लोकायुक्त पद के लिए एक बेदाग नाम प्रस्तावित नहीं कर पा रही है। नतीजा, पिछले दो महीने से ज्यादा समय से कर्नाटक लोकायुक्त का पद खाली है। कर्नाटक सन् 1986 में लोकायुक्त नियुक्त करने वाला देश का पहला राज्य है। लेकिन फिलहाल नये लोकायुक्त की नियुक्ति के मसले पर राज्यपाल और राज्य सरकार में ठनी हुई है। राज्यपाल एचआर भारद्वाज सरकार की ओर से भेजे गये जस्टिस एसआर बन्नुरमठ के नाम को मंजूर नहीं कर रहे हैं तो राज्य सरकार कोई और नाम सुझा नहीं रही है। सरकार के इस रवैये ने ये सवाल पैदा कर दिया है कि कहीं वह लोकायुक्त दफ्तर पर ही ताला तो नहीं लगाना चाहती? और यह संदेश सीधे ना देकर विवाद के जरिये दे रही है? जो भी हो, जस्टिस संतोष हेगड़े के कार्यकाल के दौरान मिले जख्मों के कारण केवल मौजूदा सदानंद गौड़ा सरकार ही नहीं बल्कि राज्य की पूरी भाजपा इकाई छाछ भी फूंक-फूंक कर पीना चाहती है। आखिर पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े की अवैध खनन रिपोर्ट के कारण पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को न सिर्फ कुर्सी छोड़नी पड़ी बल्कि जेल भी जाना पड़ा। मौजूदा सरकार के कई मंत्रियों के सिर पर भ्रष्टाचार की तलवार अब भी लटकी हुई है। जाहिर है ऐसे में राज्य में मजबूत लोकायुक्त संस्थान सरकार की सेहत के लिए तो अच्छा नहीं होगा। दरअसल विवाद की शुरुआत शिवराज पाटिल के लोकायुक्त पद से इस्तीफा दे देने के बाद सरकार की ओर से इस पद के लिए केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसआर बन्नुरमठ का नाम प्रस्तावित किये जाने के बाद से हुई। गौरतलब है कि संतोष हेगड़े का कार्यकाल खत्म होने के बाद जस्टिस शिवराज पाटिल नये लोकायुक्त बने पर सहकारी आवासीय सोसायटी में सहकारी सोसायटी के नियमों का उल्लंघन कर जमीन हासिल करने के कारण सितंबर में नियुक्ति के छह सप्ताह के बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद नये लोकायुक्त के तौर पर जस्टिस बन्नुरमठ का नाम सरकार ने प्रस्तावित किया जिसे राज्यपाल मंजूरी नहीं दे रहे हैं। बन्नुरमठ पर भी कानून का उल्लंघन कर जमीन हासिल करने का आरोप है। लेकिन सरकार इन आरोपों को बाद की बात कहकर खारिज कर देती है। संवैधानिक तौर पर राज्यपाल की लोकायुक्त की नियुक्ति में कोई भूमिका नहीं होती। मुख्यमंत्री, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, दोनों सदनों के सभापति और दोनों सदनों के नेता विपक्ष से सलाह-मशविरा करने के बाद राज्यपाल के पास प्रस्तावित नाम अनुमोदन के लिए भेज देता है। उनका कार्यकाल पांच साल का होता है और केवल सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों के ही नाम प्रस्तावित किये जा सकते है। बहरहाल, बन्नुरमठ के नाम को तीसरी बार राज्यपाल खारिज नहीं कर सकते। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो सरकार और राज्यपाल के बीच संवैधानिक विवाद की स्थिति पैदा होगी।हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब राज्यपाल और कर्नाटक सरकार के बीच ऐसी स्थिति बनी हो। इससे पहले जुलाई 2010 में रेड्डी बंधुओं को तत्कालीन सरकार के मंत्रिमंडल से निकालने की मांग पर, जनवरी 2011 में जमीन घोटाले के संदर्भ में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पर मुकदमा चलाने को मंजूरी देने पर और मई 2011 में राज्य में राष्ट्पति शासन की सिफारिश करने पर, जिसे केंद्र ने खारिज कर दिया, भी संवैधानिक विवाद के हालात पैदा हुए थे, जो बाद में सुलझ गये। फिलहाल सदानंद गौड़ा सरकार जस्टिस एसआर बन्नुरमठ के अलावा कोई और नया नाम भी नहीं सुझाना चाहती। उसका कहना है कि अगर राज्यपाल नहीं मानते तो हम इस मसले पर एडवोकेट जनरल से राय लेंगे। उसके बाद ही अगला कदम तय होगा। इसके अलावा राज्य सरकार ने एचआर भारद्वाज के खिलाफ राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है। इधर भारद्वाज कह रहे हैं, "मैं गलत व्यक्ति की नियुक्ति को मंजूरी नहीं दूंगा। अगर राज्य सरकार संतोष हेगड़े का नाम दोबारा प्रस्तावित करती है तो मैं तत्काल मंजूरी दे दूंगा।' जबकि भारद्वाज कानून के जानकार हैं और उन्हें मालूम होगा कि एक व्यक्ति दोबारा लोकायुक्त नहीं बन सकता।सच तो यह है कि जस्टिस संतोष हेगड़े के जाने के बाद राज्य में लोकायुक्त संस्था की विश्वसनीयता और इसपर लोगों का भरोसा पहले से कम हुआ है। आंकड़े तो यही कहते हैं। संतोष हेगड़े के पास रोजाना बीस से पच्चीस शिकायतें आ रही थीं, लेकिन शिवराज पाटिल के कार्यकाल में रोजाना केवल 5-10 शिकायतें ही मिलीं।दरअसल लोकायुक्त पद को सन् 2001 में जस्टिस एन व्येंकटचेलैया ने जो ताकत और गरिमा प्रदान की थी उसे जस्टिस संतोष हेगड़े ने और बताया और प्रासंगिक बनाया। इसलिए गौड़ा-सरकार ऊपरी तौर पर चाहे जो कहे पर मजबूत लोकायुक्त नहीं चाहती। हालात यह है कि एक ओर येदियुरप्पा जेल से बाहर आने के बाद पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े पर वार कर रहे हैं तो भाजपा के के ईश्वरप्पा और जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी जैसे नेता लोकायुक्त संस्था की जरूरत पर ही सवालिया निशान लगा रहे हैं। दूसरी ओर, केवल राज्यपाल ही नहीं बल्कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा कानून मंत्री वीरप्पा मोईली भी बन्नुरमठ के चयन को सही नहीं मानते। लेकिन लोकायुक्त की नियुक्ति या लोकायुक्त संस्था को खत्म करना राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। डर इस बात का है कि कहीं हरियाणा सरकार की तरह यहां भी कानून बनाकर लोकायुक्त कार्यालय ही न भंग कर दिया जाये। कुल मिलाकर, भ्रष्टाचार के मसले पर केंद्र में राजनीति कर रही भाजपा के लिए कर्नाटक में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाले लोकायुक्त संस्था की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। लेकिन ताकतवर लोकायुक्त से राज्य सरकार को डर भी कम नहीं हैं, क्योेंकि वहां राज्य सरकार और इसके मंत्रियों के खिलाफ कई मामले पहले से ही चल रहे हैं। लेकिन कमजोर लोकायुक्त या बगैर लोकायुक्त के रहने से सरकार की अपनी साख ही दांव पर लग जायेगी। 

सरकार बहाना तलाश रही है
कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े से द पब्लिक एजेंडा की बातचीत

लोकायुक्त की नियुक्ति में देरी की वजह?
यह सरकार नहीं चाहती कि लोकायुक्त नियुक्त हो। दरअसल सरकार की मंशा तो लोकायुक्त संस्था को ही खत्म कर देने की लग रही है, लेकिन यह अच्छा नहीं है। ज्यादा दिनों तक यह स्थिति घातक है। कुछ और नहीं हो सकता तो नियुक्ति में देरी करके ही सरकार बचने के रास्ते तलाश रही है।

राज्यपाल ने कहा कि अगर जस्टिस संतोष हेगड़े का नाम फिर से सरकार लोकायुक्त पद के लिए भेजती है तो मैं एक मिनट में उसे मंजूर कर दूंगा।
मैं किसी भी सूरत में दोबारा यह पद स्वीकार नहीं करूंगा। किसी भी राजनीतिक दल से मेरे अच्छे संबंध नहीं हैं। मैं अब उनके लिए ब्लैकलिस्टेड हूं। जब मैं लोकायुक्त बना था तब तो मुझे सब बेदाग मान रहे थे, लेकिन अब अलग-अलग दलों के लोग मुझ पर आरोप लगा रहे हैं। 

आपकी राय में कौन इस पद के लिए उपयुक्त हैं?
यह दुःखद और त्रासद है कि सदानंद गौड़ा जी की सरकार को राज्य में इस पद के लिए एक भी बेदाग न्यायाधीश नहीं मिल रहा है। दरअसल, इस संस्था को ही खत्म करने का यह बहाना है। अगर राज्य में योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे तो दूसरे राज्यों या भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों में से किसी का नाम प्रस्तावित किया जा सकता है। पहले भी दो लोकायुक्त कर्नाटक से बाहर के रहे हैं। 

राज्यपाल बान्नुरमठ के नाम को खारिज कर रहे हैं । क्या यह सही है?
राज्यपाल एक सीमा तक ही ऐसा कर सकते हैं। सदन में चर्चा कराने के बाद अगर तीसरी बार भी सरकार की ओर से वही नाम भेजा गया तो राज्यपाल को मंजूरी देनी पड़ेगी। 

लोकायुक्त को लेकर राज्यपाल और सरकार के बीच चल रही खींचतान पर आपका क्या कहना है? 
मेरा कुछ कहना ठीक नहीं होगा। आखिरकार दोनों अपने संवैधानिक दायरों में ही रहकर फैसला करेंगे। मुझे यह जरूर लगता है कि मेरा कार्यकाल खत्म होने के बाद सरकार की ओर से इस संस्थान को कमजोर करने की ही कोशिशें हुई हैं वरना सरकार दागी मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय लोकायुक्त संस्थान को ही अपना निशाना नहीं बनाती। 

सरकार का इरादा क्या लोकायुक्त दफ्तर पर ताला लगाने का है?
दरअसल, समस्या यही है। राज्य सरकार को लोकायुक्त दफ्तर बंद करने का अधिकार है। कितने दिनों तक यह पद खाली रह सकता है या कितने दिन के भीतर नियुक्ति हो जानी चाहिए, इस बारे में भी कोई साफ निर्देश नहीं है। हां, केवल उच्च न्यायालय से लोकपाल नियुक्त करने के संदर्भ में निर्देश लिये जा सकते हैं। मैं यह नहीं कह सकता कि सरकार लोकायुक्त दफ्तर बंद करेगी या उसे चलने देगी। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. जानकारी ही जानकारी ,मगर लोकायुक्त को अपनी गरिमा का ख्याल रखना चाहिए, आभार

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  2. एक बेहद अच्छी और सही आर्टिकल..
    जस्टिस संतोष हेगड़े के जाने के बाद राज्य में लोकायुक्त संस्था पर लोगों का भरोसा पहले से कम हुआ है यह बात मैं भी मानता हूँ..

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