बुधवार, 17 मार्च 2010

मिलिए बंगलूरू की महिला पुरोहित स्वतंत्रलता शर्मा से

भारतीय आेपिनियन में प्रकाशित
आज महिलाएं तमाम किस्म के स्टीरियोटाईप को तोड़ रही हैं और हर उस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं जहां पहले कभी उनके होने या काम करने के बारे में सोचा भी नहीं गया था। अठत्तर बसंत से ज्यादा देख चुकीं स्वतंत्रलता शर्मा  का नाम भी उन महिलाओं की सूची में शामिल किया जा सकता है जिन्होंने धार्मिक कर्मकांड और संस्कार कराने जैसे पुरूष वर्चस्व वाले क्षेत्र में अपनी  चुनौती पेश की और लीक से हटकर अपने लिए राह बनायी।
जिस उम्र में आमतौर पर लोगों की सक्रियता खत्म हो जाती है, स्वतंत्रलता लोगों को सांसारिक संस्कारों से जोड़ती हैं और जन्म, मुंडन, शांतिपाठ, विवाह और मृत्यु जैसे संस्कारों को वैदिक रीति से संपन्न कराती हैं। 
स्टेला मेरीज काॅलेज से बी.ए और प्रेसिडेंसी काॅलेज चेन्नई से इकोनाॅमिक्स में एम ए स्वतंत्रलता ने शुरूआत मेरठ में काॅलेज में इकोनाॅमिक्स पढ़ाने से की। लेकिन उनकी किस्मत में कुछ और था और वो प्रोफेसर बनने के बजाए पुरोहित बन गई।
मूलतः अंबाला के पास की रहने वाली स्वतंत्रलता का जन्म वर्मा के रंगून में हुआ था। दूसरे विशव-युद्ध के समय उनके पिता को परिवार समेत पैदल ही वर्मा छोड़ना पड़ा था और 1949 में इनका परिवार चेन्नई में बस गया। इनके पिता आर्य समाज के सदस्य थे, वर्मा में भी इनके परिवार में वैदिक रीति से हवन और शांतिपाठ होते रहते थे। इसलिए पूजा-पाठ और वैदिक रीति-रिवाजों का संस्कार उन्हें बचपन से ही मिल गया था। वर्ष् 1961 में ये पति के साथ बंगलूरू आ गईं। इनके पति पेशे से वकील थे और बंगलूरू में उनका होटल व्यवसाय भी था। बंगलूरू में उन्होंने काफी सालों तक नर्सरी स्कूल भी चलाया। हालांकि शादी की शुरूआत में स्वतंत्रलता और इनके पति दोनों ने मेरठ में काॅलेज में अध्यापन कार्य किया था। बंगलूरू आने के बाद स्वतंत्रलता फिर से आर्य-समाज की गतिविधियों में सक्रिय हो गईं। यहीं पर इनकी मुलाकात वरिष्ठ आर्यसमाजी के. एल पोद्दार से हुईं। स्वतंत्रलता कहती हैं-पोद्दार जी से मेरा बहुत आत्मीय रिशता था, वो मुझमें अपनी बेटी की छवि देखते थे। उन्होंने ही मेरा गंभीर वैदिक साहित्य और भारतीय अध्यात्मिक परंपरा से परिचय कराया और मुझे ढे़रों किताबें पढ़ने को दी। वैदिक साहित्य को गहरायी से जान लेने के बाद मैंने प्रवचन देना शुरू किया और सत्संग में जाना भी।
अब तक चैदह सौ शादियां और तीस मृत्यु संस्कार संपन्न करा चुकी स्वतंत्रलता पुरोहिताई के क्षेत्र में आने को एक संयोग मानती हैं और खुद भी नहीं समझ पाती हैं कि कैसे वो धीरे-धीरे इसमें गहराई से उतरती चली गयीं। स्वतंत्रलता, नियति में पूरी तरह से यकीन करती हैं और मानती हैं कि  इश्वर हर किसी को इस दुनियां में खास मकसद से भेजता है और किसे क्या करना है यह पहले से ही सुनिशचत होता है।
बहरहाल, स्वतंत्रलता की पुरोहिताई की शुरूआत बहुत ही भयावह, मृत्यु-संस्कार के साथ हुई। एक पच्चीस वर्षीय युवक की मौत बंगारपेट में ट्रेन दुर्घटना में हो गई थी और स्वतंत्रलता को उसके रिशतेदार के साथ उसकी पहचान के लिए जाना पड़ा और फिर स्थितियां ऐसी बनीं कि स्वतंत्रलता को उसका क्रिया-कर्म कराना पड़ा। हांलाकि इससे पहले वो बंगलूरू और उसके आस-पास शांतिपाठ और हवन वगैरह जरूर कराती रही थीं। स्वतंत्रलता ने खुद अपने परिवार के लोगों का भी अंतिम संस्कार संपन्न कराया है,  अपनी  जिठानी और बहू की दादी का अंतिम संस्कार भी उनके हाथों ही हुआ है।  
शादियों को संपन्न कराने के बारे में बताते हुए स्वतंत्रलता कहती हैं-बात साल 1991 की है, एक दफा बंगलूरू में ही आर्य-समाज के पंडित छुट्टी पर चले गए थे और उसी दौरान एक विवाह संपन्न कराना था, पंडित नहीं थे अब शादी कौन संपन्न कराए? यह बड़ा सवाल था। आखिरकार उनकी एक दोस्त ने सुझाया तुम क्यों नहीं शादी  संपन्न करा देती, आखिर तुम्हें सारी विधि और मंत्र आते ही हैं। और इस तरह मैं शादियां भी संपन्न कराने लगी। हांलाकि शुरूआत में वो हिन्दी में ही संस्कार संपन्न कराती थीं पर बाद में उनकी किसी परिचित महिला ने उन्हें मंत्रों की व्याख्या अंग्रेजी में करने की सलाह दी और यही उनकी खासियत बन गयी। स्वतंत्रलता ने अब तक लगभग 1400 शादिया करायी हैं इनमें पूर्व केन्द्रीय मंत्री रेणुका चैधरी की बेटी ,इसरो के प्रोफेसर यू आर राव की बेटी, इंदिरा नूई की ममेरी बहन और खुद अपने परपोते की शादी शामिल है। स्वतंत्रलता कहती हैं-दरअसल, मैं उच्चारण पर बहुत ध्यान देती हंू और मंत्रों की व्याख्या अंग्रेजी में करने के कारण लोगों को समझ में आती हैं साथ ही मैं डेढ़ घंटे में ही शादी संपन्न करा देती हंू इसलिए खासतौर पर यंग जेनरेशन मुझे पसंद करती है। समाज में उनके विशिष्ट योगदान को देखते हुए बंगलूरू के रोटरी क्लब ने 2004 में इन्हें सम्मानित किया।
हांलाकि एक दो मौकों पर स्वतंत्रलता को महिला होते हुए पुरोहिताई करने के कारण विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन आर्य-समाज संस्था ने इनका साथ दिया और यह साबित किया कि वैदिक युग महिलाओं के साथ कोई फर्क नहीं करता था और उन्हें पुरूषाें के समकक्ष हर अधिकार देता था।
पुरोहिताई के अलावा स्वतंत्रलता भजन कंपोज करती हैं और गाती भी हैं। पहले वो कहानियां भी लिखती थीं जो हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका धर्मयुग में छपती थीं। स्वतंत्रलता सिर्फ संस्था यानी आर्य-समाज के लिए ही स्वांतः सुखाय यह कार्य करती हैं। पुरोहिताई उनकी आजीविका का जरिया नहीं है। पहले ये केवल बंगलूरू में ही शादियां कराती थीं लेकिन धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों में भी  इनके बारे में लोगों को मालूम चला और अब इनके पास पूरे देश से न्यौता आता है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी जानकारी, इस क्षेत्र (पौरोहित्य - पण्डिताई) में पहले से ही योग्य और ज्ञानवान लोगों की कमी महसूस की जा रही है… वैसे महिलाओं को इस क्षेत्र में लाने के लिये इस प्रकार की पहल बहुत पहले ही महाराष्ट्र में शुरु की जा चुकी है, और कई महिलाएं यह काम बड़ी कुशलता से कर रही हैं…। आपने भी अच्छी जानकारी दी… धन्यवाद

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  2. namaskaar manormaji bhut din se aap ke blog par nahi aa paya kuchh vyast tha bhut achhi jaankaari di hai aap ne ye to hona hi tha parivartan prkti ka niyam hai aur baraabri to aakhir yek din milni hi thi ye unka adhikaar hai abhi bhi bhut kaam hona hai jo bina jan jaagrukta ke nahi ho sakta hai
    saadar
    praveen pathik
    9971969084

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  3. बिना किसी के बताये आपके ब्लॉग क्षेत्र में प्रवेश कर गया.. सचमुच एक अनूठा अनुभव हुआ... एक लीक से हटकर या अपनी लीक स्व्यं बनाती नारी की कथा सुनकर श्रद्धा से मस्तक नत हो गया...
    http://samvedanakeswar.blogspot.com/

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