गुरुवार, 25 मार्च 2010

कर्नाटक से केरल भाया बांदीपूर


For Public Agenda
भारत में वन्य जीवों की संख्या, विकास और शहरीकरण के कारण खतरनाक रूप से कम होती जा रही है। इनके प्रति हमारी असंवेदनशीलता का ही नतीजा है कि आज बाघों की संख्या बस हजार से कुछ उपर रह गयी है। जबकि हमारे अस्तित्व के लिए इनका बचे होना भी अनिवार्य है। बहरहाल, हाल ही में कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस दिशा में एक उल्लेखनीय फैसला दिया है। जिससे न सिर्फ कर्नाटक बल्कि देश के सभी वन्य जीव प्रेमी और पर्यावरणवादियों में खुशी की लहर है। आखिर इस फैसले ने वन्य जीवों के संरक्षण और उनके प्राकृतिक अधिवास में हमारी गतिविधियों के प्रति संवेदनशील नजरिया रखने की हिमायत की है।               
दरअसल, हाल ही में कर्नाटक हाई कोर्ट ने बांदीपूर-मधुमलाई जो कि कर्नाटक-तमिलनाडू में आता है और बादीपूर-सुल्तान बाथेरी जो कि कर्नाटक-केरल का इलाका है में रात में होने वाले अंतरराज्यीय यातायात पर रोक लगा दी है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने बांदीपूर संरक्षित वन क्षेत्र से गुजरने वाले कोझीकोड-मैसूर राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-212 और उटी-मैसूर राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-67 पर यातायात पर रात नौ बजे से सुबह छः बजे तक रोक लगा दी है। और  कर्नाटक सरकार को माननथावाडी को जोड़ने वाली  मैसूर-कुट्टा रोड को छः महीने के भीतर ठीक करने को कहा है, ताकि रात में इस सड़क का वैकल्पिक मार्ग के तौर पर इस्तेमाल हो सके।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने यातायात पर रोक को जनहित में बताते हुए कहा कि इससे दुर्लभ वन्य प्राणियों और बाघों की सुरक्षा में मदद मिलेगी। अदालत ने ये भी कहा कि मानवता को बदलते समय के साथ चलना चाहिए। वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए यह छोटा सा त्याग बहुत बड़ा असर पैदा कर सकता है जबकि यह सिर्फ हमारे संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वाह भर है।
जस्टिस वी गोपाल गौडा और जस्टिस बी एस पाटिल की खंडपीठ ने केरल सरकार, एफ.आर फ्रावेश और अन्य के द्वारा 14 अगस्त 2009 को बांदीपूर के मुथंगा-गुंदलपेट मार्ग पर रात में वाहनों की आवाजाही पर लगी रोक को हटाने संबंधी दायर याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए रोक को जारी रखने का आदेश दिया है। गौरतलब है कि बांदीपूर से होकर जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग 212 मैसूर से कालपेट्टा, सुल्तान बाथेरी होते हुए जाता है और एनएच 67 मैसूर से गुंदलपेट होकर। रात में इसके बंद होने पर केरल के ट्रांसपोर्टर को वैकल्पिक मार्ग से जाना होगा।
दरअसल इस विवाद की शुरूआत पिछले साल ही हुई । रात में वाहनों की तेज रफ्तार की चपेट में आकर  बांदीपूर क्षेत्र में वन्य जीवों होने वाली मौतों के कारण  कर्नाटक वन विभाग बहुत लंबे समय से रात में इस क्षेत्र में यातायात पर रोक लगवाने पर विचार कर रहा था। आखिरकार, पिछले साल 3 जून को चामराज नगर जिले के डिप्टी कमिष्नर मनोज कुमार मीणा ने बांदीपूर संरक्षित वन क्षेत्र में एनएच-212 और एनएच-67 के लगभग 30 किलोमीटर के हिस्से में पर रात 9 से सुबह 6 बजे तक यातायात पर रोक लगा दी। लेकिन केरल और कर्नाटक दोनों राज्यों की ओर से पड़ रहे दवाब के कारण मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने उन्हें सात दिनों बाद 10 जून को  रोक हटाने का निर्देश दे दिया। इस आदेश को वापस लिए जाने के पीछे राजनीतिक दवाब के अलावा ट्रक लाॅबी के भी सक्रिय होने की आशंका जतायी गई थी।
अब  कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस आदेश को पुनः बहाल कर दिया है। उल्लेखनीय है कि डीसी के इस आदेश के विरोध में बंगलूरू के वकील और पर्यावरणप्रेमी एल श्रीनिवास बाबू ने जनहित याचिका दायर की थी जिस पर हाई कोर्ट ने 29 जुलाई को श्रीनिवास के पक्ष में आदेश दिया था। और डी सी ने पुनः 1 अगस्त 2009 से रात में यातायात पर रोक लगाने का आदेश दे दिया। साथ ही दो बैकिल्पक रूट सुझाए थे, मैसूर और उटी के लिए साथे होकर जो 78 किलोमीटर ज्यादा लंबा है और मैसूर से कालपेट्टा के लिए पोनमपेट होकर, जो 38 किलोमीटर ज्यादा लंबा है। दिलचस्प बात ये है कि केरल और तमिलनाडू सरकार, के अलावा केएसआरटीसी, केरल व्यापारी व्यवसायी इकोपना समिति वायनाड, और केरल-कर्नाटक यात्री फोरम के साथ  कर्नाटक सरकार ने भी रोक को हटाने के लिए अर्जी दी थी। बहरहाल,  इस फैसले से तमिलनाडू को कोई आपत्ति नहीं है,जबकि कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के अनुरूप चलने की घोशण की है और केरल से जोड़नेवाली सड़क एनएच-212 को जल्द से जल्द वैकल्पिक मार्ग के तौर पर विकसित करने का आशवासन दिया है। कर्नाटक सरकार के एडवोकेड जनरल अशोक हारनहल्ली ने कहा कि वैकल्पिक मार्ग मौजूदा मार्ग से 20-30 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं होगा और इसे छः महीने के भीतर इसे यातायात योग्य बना दिया जाएगा।
लेकिन केरल ने इस मसले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का फैसला किया है। दरअसल, केरल सरकार का मानना है कि इस फैसले  से केरल की अर्थव्यस्था और जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। खासतौर पर वायनाड और उसके आसपास रहने वाले लोगों को इससे परेशानी हो रही है। क्योंकि यहां सब्जियों की आपूर्ति कर्नाटक के गुंदलपेट से होती है। जिसे रात में ही ढ़ोया जाता है। साथ ही लोगों को ज्यादा दूरी तय करनी होगी। इसके अलावा बंगलूरू में काम करने, पढ़ाई करने वाले लोगों को भी इससे खासा परेशानी हो रही है, और व्यापारियों को नुकसान भी। यही वजह है कि मालाबार चैंबर्स आॅफ कामर्स ने राज्य सरकार से बंगलूरू और उत्तरी केरल के बीच बेहतर रेल सुविधा मुहैया कराने की मांग की है। इसके अलावा केरल का यह भी मानना है कि यह रोक केवल वन्य जीव संरक्षण के लिए नहीं है, क्योंकि वैकिल्पक मार्ग को माननथवाडी-कूटा सेक्टर से होकर ले जाने का प्रस्ताव है जो कि वायनाड अभ्यारण्य से होकर ही जाता है। इसलिए केरल की मांग है कि कर्नाटक को वाहनों की गति, को नियंत्रित करने और इस क्षेत्र में व्यवसायिक गतिविधियों पर रोक लगाने जैसे उपायों पर जोर देना चाहिए। साथ ही उनका ये भी कहना है कि यह मार्ग 300 साल पुराना है, फिर आज अचानक इससे कैसे समस्या हो सकती है। इस संदर्भ में कर्नाटक के एडवोकेड जनरल अशोक हारनहल्ली कहते हैं कि वाहनों की संख्या और आवृति बहुत ज्यादा बढ़ गयी है अतः फैसले को इस नजरिए से देखा जाना जरूरी है। केरल द्वारा मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने के सवाल पर भी एडवोकेड जनरल का कहना है कि हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी कोई आपत्ति नहीं होगी। कर्नाटक सरकार वन्य जीवों के संरक्षण को लेकर काफी गंभीर है।
बहरहाल, कर्नाटक हाई कोर्ट के इस फैसले पर विरोध को लेकर केरल में मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंद से लेकर युनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और व्यापारी संघ सभी एक मंच पर हैं। यहां तक कि केरल व्यापारी व्यवसायी इकोपना समिति वायनाड इसे सीधे-सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकार का हनन मानता है। जबकि वायनाड प्रकृति संरक्षण समिति और ऐसी ही कई अन्य पर्यावरण संस्थाओं ने यातायात पर रोक का यह कहते हुए स्वागत किया है कि जब तक केरल में भी इसी तरह बेलगाम रात्रिकालीन यातायात पर रोक नहीं लगता तब तक बांदीपूर में वन्य जीव संरक्षण अधूरा है। 

दरअसल, बांदीपूर,नागरहोले,मधुमलाई और वायनाड का यह  सम्मिलित इलाका बाघों की संख्या के मामले में देश का दूसरा सबसे बड़ा इलाका है। यहां  2,500 वर्ग किलोमीटर में लगभग 300 बाघों के होने का अनुमान है। देश में बाघों की मौजूदा संख्या को देखते हुए इस इलाके को हर प्रकार के सरंक्षण की जरूरत है। अनुमानतः बांदीपूर से प्रति मिनट 15 से 20 वाहन गुजरते हैं। जिनमें लगभग 400 तक सब्जियों के ट्रक और करीब 300 बालू से लदे ट्रक होते हैं, इसके अलावा हजारों पर्यटक वाहन भी। इसी आधार पर कर्नाटक राज्य वन विभाग ने बांदीपूर में गुंदलपेट और उटी को जोड़ने वाले एन एच 212 और गंुदलपेट और सुल्तान बाथेरी को जोड़नेवाले एनएच-67 पर रात में यातायात पर लगी रोक को हटाए जाने का विरोध किया था। जबकि कर्नाटक सरकार ने रोक हटाने का निर्देश दिया था।
बांदीपूर राष्ट्रीय उद्यान में एनएच-212, 17.5 किलामीटर तक केरल के वायनाड राष्ट्रीय उद्यान से होकर गुजरता है और एनएच-67, 12.5 किलोमीटर तमिलनाडू से होकर गुजरता है। अंतरराज्यीय यातायात के कारण यह इलाका वन्य जीवों के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका था। अतः इस फैसले की अहमियत इस बात से भी समझी जा सकती है कि बांदीपूर नेशनल पार्क, वाईल्ड लाईफ कंजरवेशन फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल 2004 से 2007 तक की अवधि में ही इस इलाके में 200 से ज्यादा दुर्लभ वन्य जीव वाहनों की चपेट में आकर मारे गए हैं। इसके अलावा लगभग तीन बड़े जीव हर महीने मारे जाते हैं। और लगभग 65 प्रतिषत वन्य जीव रात में ही वाहनों की चपेट में आते हैं। जबकि इस वन के जितने क्षेत्र में रात में यातायात पर रोक लगी है वह कुल वन्य क्षेत्र का 2 प्रतिषत से भी कम है। वाहनों की चपेट में सबसे ज्यादा बाघ, हाथी, चीता, सांभर और लंगूर आते हैं। यही नहीं सड़क से सटे जंगल के लगभग 2 किलोमीटर भीतर का वन्य जीव अधिवास वाहनों के शोर और हाई बीम लाईट के कारण प्रभावित होता है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसी क्षेत्र में रात में यातायात पर रोक लगायी है। इसके अलावा रात में यातायात पर रोक से शिकार पर भी एक हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
बहरहाल, राज्य वन्य विभाग अधिकारियो और संरक्षणविदो के अनुसार पिछले छः महीने में इस इलाके में सड़क हादसे में मरने वाले वन्य जीवों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से 95 प्रतिशत से भी ज्यादा कमी आयी है। जबकि रोक से पहले लगभग 91 वन्य जीवों की मौत दर्ज की गई थी। जिसमें हाथी, बाघ, चीता और अन्य स्तनधारी व सरीसृप जैसे जीव शामिल हैं। यह काफी उत्साहजनक खबर है।

7 टिप्‍पणियां:

  1. कर्नाटक हाईकोर्ट का बहुत अच्छा फैसला है जल्द से जल्द लागू होना चाहिए।

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  2. बहुत ही सूचनापरक लेख है अगर आप उचित समझें तो इस लेख पत्रिका के अप्रैल के अंक प्रकाशित करने की अनुमति दें ? rajesh.aihrco@gmail.com

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  3. सादर वन्दे!
    इस ज्ञान परक लेख के लिए आभार. अगर कलम किसी कि भलाई के लिए चलती है तो सार्थक हो जाती है.
    रत्नेश त्रिपाठी

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  4. बहुत ही अच्छा फॆसला अच्छा हुया जल्दी ही समझ गये...धन्यवाद इतनी अच्छी जानकारी के लिये

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  5. मनोरमा.....इस तरह के विचार ही मुझे ज्यादा छूते हैं....बाजारीकरण के अंधे इस युग में लालच-स्वार्थ और कमाई के सिवाय किसी और बात पर सोचने वाले लोग नाम-मात्र भर के रह गए हैं.....शायद नक्कारखाने में तूती की आवाज़-भर हैं वो.....चलो फिर भी आवाज़ तो है ना.....इन आवाजों को प्रणाम.....!!

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  6. I have been to Bandipur. We really need to save the left forest and the Animals for our own future.

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