सोमवार, 14 अप्रैल 2014

हमारे चरित्र का सबसे क्रूर,शोषक,निर्दयी और बेईमान पक्ष  !

बराबरी की किताबी बातें पढ़कर बड़े हुए हैं हम, नहीं तो हम उस समाज और संस्कृति से आते हैं जहाँ अपनी गंदगी साफ़ कराने के लिए हम अपने जैसे ही दूसरे इंसान को मजबूर करते आये हैं पहले वर्ण व्यवस्था के नाम पर और बाद में सरकारी नौकरियों में सफाई कर्मचारी के तौर पर इस तरह की नौकरियां किसी ख़ास जाति के लिए मुक़र्रर करके ! मेरे पापा इंडियन ऑइल में काम करते थे और हम उसी के टाउनशिप में रहते थे, छोटा सा सुन्दर सा टाउनशिप पर वहां के लोग अपने टॉयलेट खुद साफ़ नहीं करते थे, हफ्ते में दो दिन इंडियन ऑइल का सफाई कर्मचारी आकर टॉयलेट क्लीन करता था तो लोगों के टॉयलेट साफ़ होते थे, उसके आने का रास्ता पीछे का दरवाज़ा होता और कुछ लोग कुछ और एक्स्ट्रा काम कराने के बाद पैसे देते तो कभी उनसे वापस छुट्टा नहीं लेते, मुझे हमेशा बहुत बुरा लगा ये,शायद अब भी वहां ऐसा ही हो रहा हो! मेरे पापा खुद से टॉयलेट क्लीन करते थे , माँ को ये बताने समझाने में वक़्त लगा पर जबसे मुझे सफाई का होश हुआ मैंने हमेशा अपना बाथरूम, टॉयलेट खुद साफ़ किया मेरे भाई बहन ने भी, वहां हमारा घर शायद सबसे साफ़ टॉयलेट वाला घर हुआ करता था, बहरहाल हमारे स्कूल की एक महिला सफाई कर्मचारी की बेटी जो बाद में उसी इंडियन ऑइल में इंजीनियर हो गयी, उसकी नौकरी और सफलता पर लोगों के जातिगत दुराग्रह और रिज़र्वेशन वाले कमेंट भी सुने पर किसी को भी सफाई के काम वाली नौकरी में आरक्षण नहीं चाहिए था, सफाई कर्मचारी के बच्चे सफाई कर्मचारी ही बनें उनकी बराबरी और न्याय का सिद्धांत यहीं तक था !
महानगरों की कितनी भी बुराई करें हम पर यही वो जगह है जहाँ हाशिये के सभी लोगों को अपना स्पेस मिलता है चाहे वो कस्बाई शहरों की लड़कियां हों या सवर्णों के द्वारा किनारे कर दिए गए अनुसूचित जाती के लोग, जब से महानगरों के इस फ़्लैट सिस्टम में रह रही हूँ ज्यादातर लोगों को अपना बाथरूम खुद साफ करते देख रही हूँ ! लेकिन अब भी मुझे समस्या है किसी काम को किसी जाति के साथ हमेशा के लिए नत्थी कर देने से ! मुझे वो दिन सबसे बराबरी का लगेगा जब अम्बानी जैसे लोगों को भी अपनी जगह, अपनी गन्दगी खुद से साफ़ करनी पड़े! हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए बाबा साहेब जैसे नायक का जिन्होंने हमें हमारे चरित्र का सबसे क्रूर,शोषक,निर्दयी और बेईमान पक्ष दिखाया !

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