शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

कोई किसी से कम नहीं


( पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित )
इसी साल जुलाई के आखिर में लोकायुक्त के अवैध खनन रिपोर्ट में नाम आने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा को ना चाहते हुए भी इस्तीफा देना पड़ा था। कांग्रेस और जेडीएस के लिए ये एक बड़े जष्न का मौका था, क्योंकि कर्नाटक में भाजपा के पैर जमाने में येदुरप्पा की बहुत अहम भूमिका रही है। ऐसे नेता और मुख्यमंत्री का भ्रश्टचारी होने के दाग के साथ विदा होना राज्य के विपक्षी दलो के लिए मंुहमांगी मुराद थी। इसी रिपोर्ट के कारण जनार्दन रेड्डी को भी पर्यटन मंत्रालय और करूणाकर रेड्डी को राजस्व मंत्रालय छोड़ना पड़ा। और इनके करीबी श्रीरामलू भी कैबिनेट से बाहर हुए। पर राजनीति में पासा पलटते देर नहीं लगता, चार महीने बाद ही ये बात कांग्रेस और जेडीएस को समझ में आ गई है। दरअसल, हाल ही में कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस ने राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के खिलाफ अवैध खनन मामलें में एफआईआर दर्ज की है जिसमें दो मुख्यमंत्री कांग्रेसी रहे हैं, मौजूदा विदेष मंत्री एस एम कृश्णा और  धरम सिंह इसके अलावा जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी। इन तीनों पर अपने कार्यकाल में अवैध खनन को आसान बनाने के लिए नियम-कानून को ढ़ीला बनाने के आरोप हैं।  इसके अलावा एफआईआर में 11 अफसरों के भी नाम हैं। एफआईआर बंगलूरू के सामाजिक कार्यकर्ता अब्राहम टी जोसेफ की षिकायत पर दर्ज की गई है, जिसमें उन्होंने कहा है कि राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों ने राज्य के खजाने को भारी नुकसान पहंुचाया है। खासतौर पर एस एम कृश्णा ने लौह खदानों को लीज पर देने की मंजूरी देने के साथ-साथ वन और पर्यावरण विभाग के कड़े एतराज के बावजूद अवैध खनन के लिए रास्ता साफ करने हेतु वन विभाग की जमीन को गैर-संरक्षित घोशित कर दिया।  टी अब्राहम की इस षिकायत पर लोकायुक्त अदालत ने पुलिस को जांच का आदेष दिया है और 6 जनवरी से पहले अपनी रिपोर्ट पेष करने को कहा है।


देखा जाए तो ये कोई नई बात नहीं है जिस रिपोर्ट के कारण येदुरप्पा और रेड्डी बंधुओं की कुर्सी गई और उन्हें सलाखों के पीछे जाना पड़ा उसी रिपोर्ट में  येदुरप्पा से पहले के समय के मामलों की भी जांच को समेटा गया है। लोकायुक्त ने साल  2000 तक के मामलों की जांच की है और  अक्टूबर 1999 से 2004 मई तक एस एम कृश्णा कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे, फिर धरम सिंह और उसके बाद एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने। रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक में लोहे का बहुत समृद्ध भंडार है पर पिछले दस वर्शो में इसे लूटने की होड़ मची हुई है। सिर्फ मौजूदा भाजपा सरकार ही नहीं बल्कि पहले की एचडी कुमारस्वामी और धरम सिंह की सरकारों की भी इस लूट में हिस्सेदारी रही है। वर्श 2006 से 2009 के दौरान कुल 80 खदानों में से  प्रतिदिन बीस हजार टन लौह-अयस्क की अवैध निकासी की गई है और इस निकासी के लिए रिस्क फी के तौर पर प्रतिदिन 50 लाख से ज्यादा राषि वसूली गई है। यानी  करीब  तीन हजार से पांच हजार करोड़ तक की वसूली की गई है। एस एम कृश्णा की ही बात करें तो अपने मुख्यमंत्रीकाल में उन्होंने 39 लाईसेंस मंजूर किए। उनके दामाद वी सिद्धार्थ के काॅफी चेन कैफे काॅफी डे की सफलता में उनका उस दौरान कर्नाटक का मुख्यमंत्री होना ही सबसे ज्यादा काम आया था। जबकि धरम सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में 43 खनन लाईसेंस का अनुमोदन किया था जिसमें 33 को मंजूरी केन्द्र की यूपीए सरकार से ही मिली थी। एच डी कुमारस्वामी ने 47 खनन लाईसेंस का अनुमोदन किया था जिसमें 22 को यूपीए सरकार ने मंजूर कर दिया था। यूपीए सरकार ने कर्नाटक में राश्ट्पति षासनकाल के ही दौरान 14 खनन लाईसेंस मंजूर किया जबकि येदुरप्पा ने तो केवल 22 लाईसेंस को अनुमोदित किया था जिसमें से केन्द्र सरकार ने 2 को ही मंजूर किया। जमीन की लूट में ही केवल येदुरप्पा ही नहीं, एस एम कृश्णा, देवगौड़ा और एच डी कुमारस्वामी भी पीछे नहीं रहे हैं। एस एम कृश्णा ने ही 11 हजार वनभूमि को खनन के लिए डिनोटिफाई किया था। लोकायुक्त रिपोर्ट में एचडीकुमार स्वामी का नाम दो मामलों में है, उन्होंने जंतकाल इंटरप््रााईजेज और साई व्येंकटेष्वरा मिनरल कंपनी के लाईसेंस को नियम-कानून की अनदेखी करते हुए व्यक्तिगत तौर पर मंजूरी दी। उनके मुख्यमंत्रित्व काल में उनके परिवार के सदस्यों को 146 प्लाट अवैध रूप से आवंटित किए गए। उन्होने मुख्यमंत्री के तौर पर 550 करोड़ के ठेके को 1032 करोड़ में मंजूर कर दिया और राज्य के स्वामित्व वाली सिंचाई निगम कर्नाटक नीरवरि निगम के बैठक की अध्यक्षता करने के बाद  ठेका हासिल करने वाली कंपनी को 103 करोड़ अग्रिम भुगतान करने की भी मंजूरी दे दी। साथ ही उनके परिवार  द्वारा संचालित ट्रस्ट को खनन सेक्टर से ढ़ाई सौ करोड़ की रकम दान में और 168 करोड़ की राषि रिष्वत के तौर मिले। यानी कोई भी येदुरप्पा से पीछे नहीं रहा है। येदुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोहे का अवैध खनन अपने चरम पर पहुंच गया और इसे करने वाले राज्य के राजस्व और पर्यटन मंत्री बन गए। रिपोर्ट के मुताबिक 2009 मार्च से से 2010 मई के बीच 14 महीने में अवैध खनन से राज्य को 18 सौ करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ है। 600 से ज्यादा सरकारी अधिकारियों पर लोहे के अवैध खनन के भ्रश्टाचार में संलग्न होने के आरोप हैं। कुल मिलाकर अवैध खनन की बुनियाद काफी पहले ही रखी और मजबूत की जा चुकी थी। इसलिए जुलाई में अपना इस्तीफा देते समय येदुरप्पा को भी लगा होगा कि उनके ग्रह-नक्षत्र वाकई सही नहीं है, एक ही किस्म के आरोप पर उन्हें कुर्सी गंवानी पड़ी और जेल जाना पड़ा, बाकी लोगों की ओर किसी का ध्यान भी नहीं गया। बहरहाल, अब येदुरप्पा को भी कुछ राहत महसूस हो रही होगी। साथ ही उनकी पार्टी भाजपा को भी, क्योकि नैतिकता के सवाल पर अब कांग्रेस से जवाब तलब करने की बारी उनकी है। जो पहले ही अपने एक और मंत्री पी चिदंबरम के 2जी मामले में फंसे होने के आरोपों के बचाव में लगी है।    

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

किसे चाहिए लोकायुक्त


किसे चाहिए लोकायुक्त

लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच ठनी हुई है। इससे राज्य में इस संस्थान के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो गया है। मनोरमा की रिपोर्ट
राजधानी दिल्ली में जोर-शोर से लोकपाल के समर्थन और भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलकर बैठी भाजपा मे अपने ही एक राज्य में लोकायुक्त पद के लिए एक बेदाग नाम प्रस्तावित नहीं कर पा रही है। नतीजा, पिछले दो महीने से ज्यादा समय से कर्नाटक लोकायुक्त का पद खाली है। कर्नाटक सन् 1986 में लोकायुक्त नियुक्त करने वाला देश का पहला राज्य है। लेकिन फिलहाल नये लोकायुक्त की नियुक्ति के मसले पर राज्यपाल और राज्य सरकार में ठनी हुई है। राज्यपाल एचआर भारद्वाज सरकार की ओर से भेजे गये जस्टिस एसआर बन्नुरमठ के नाम को मंजूर नहीं कर रहे हैं तो राज्य सरकार कोई और नाम सुझा नहीं रही है। सरकार के इस रवैये ने ये सवाल पैदा कर दिया है कि कहीं वह लोकायुक्त दफ्तर पर ही ताला तो नहीं लगाना चाहती? और यह संदेश सीधे ना देकर विवाद के जरिये दे रही है? जो भी हो, जस्टिस संतोष हेगड़े के कार्यकाल के दौरान मिले जख्मों के कारण केवल मौजूदा सदानंद गौड़ा सरकार ही नहीं बल्कि राज्य की पूरी भाजपा इकाई छाछ भी फूंक-फूंक कर पीना चाहती है। आखिर पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े की अवैध खनन रिपोर्ट के कारण पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को न सिर्फ कुर्सी छोड़नी पड़ी बल्कि जेल भी जाना पड़ा। मौजूदा सरकार के कई मंत्रियों के सिर पर भ्रष्टाचार की तलवार अब भी लटकी हुई है। जाहिर है ऐसे में राज्य में मजबूत लोकायुक्त संस्थान सरकार की सेहत के लिए तो अच्छा नहीं होगा। दरअसल विवाद की शुरुआत शिवराज पाटिल के लोकायुक्त पद से इस्तीफा दे देने के बाद सरकार की ओर से इस पद के लिए केरल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसआर बन्नुरमठ का नाम प्रस्तावित किये जाने के बाद से हुई। गौरतलब है कि संतोष हेगड़े का कार्यकाल खत्म होने के बाद जस्टिस शिवराज पाटिल नये लोकायुक्त बने पर सहकारी आवासीय सोसायटी में सहकारी सोसायटी के नियमों का उल्लंघन कर जमीन हासिल करने के कारण सितंबर में नियुक्ति के छह सप्ताह के बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद नये लोकायुक्त के तौर पर जस्टिस बन्नुरमठ का नाम सरकार ने प्रस्तावित किया जिसे राज्यपाल मंजूरी नहीं दे रहे हैं। बन्नुरमठ पर भी कानून का उल्लंघन कर जमीन हासिल करने का आरोप है। लेकिन सरकार इन आरोपों को बाद की बात कहकर खारिज कर देती है। संवैधानिक तौर पर राज्यपाल की लोकायुक्त की नियुक्ति में कोई भूमिका नहीं होती। मुख्यमंत्री, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, दोनों सदनों के सभापति और दोनों सदनों के नेता विपक्ष से सलाह-मशविरा करने के बाद राज्यपाल के पास प्रस्तावित नाम अनुमोदन के लिए भेज देता है। उनका कार्यकाल पांच साल का होता है और केवल सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों के ही नाम प्रस्तावित किये जा सकते है। बहरहाल, बन्नुरमठ के नाम को तीसरी बार राज्यपाल खारिज नहीं कर सकते। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो सरकार और राज्यपाल के बीच संवैधानिक विवाद की स्थिति पैदा होगी।हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब राज्यपाल और कर्नाटक सरकार के बीच ऐसी स्थिति बनी हो। इससे पहले जुलाई 2010 में रेड्डी बंधुओं को तत्कालीन सरकार के मंत्रिमंडल से निकालने की मांग पर, जनवरी 2011 में जमीन घोटाले के संदर्भ में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पर मुकदमा चलाने को मंजूरी देने पर और मई 2011 में राज्य में राष्ट्पति शासन की सिफारिश करने पर, जिसे केंद्र ने खारिज कर दिया, भी संवैधानिक विवाद के हालात पैदा हुए थे, जो बाद में सुलझ गये। फिलहाल सदानंद गौड़ा सरकार जस्टिस एसआर बन्नुरमठ के अलावा कोई और नया नाम भी नहीं सुझाना चाहती। उसका कहना है कि अगर राज्यपाल नहीं मानते तो हम इस मसले पर एडवोकेट जनरल से राय लेंगे। उसके बाद ही अगला कदम तय होगा। इसके अलावा राज्य सरकार ने एचआर भारद्वाज के खिलाफ राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है। इधर भारद्वाज कह रहे हैं, "मैं गलत व्यक्ति की नियुक्ति को मंजूरी नहीं दूंगा। अगर राज्य सरकार संतोष हेगड़े का नाम दोबारा प्रस्तावित करती है तो मैं तत्काल मंजूरी दे दूंगा।' जबकि भारद्वाज कानून के जानकार हैं और उन्हें मालूम होगा कि एक व्यक्ति दोबारा लोकायुक्त नहीं बन सकता।सच तो यह है कि जस्टिस संतोष हेगड़े के जाने के बाद राज्य में लोकायुक्त संस्था की विश्वसनीयता और इसपर लोगों का भरोसा पहले से कम हुआ है। आंकड़े तो यही कहते हैं। संतोष हेगड़े के पास रोजाना बीस से पच्चीस शिकायतें आ रही थीं, लेकिन शिवराज पाटिल के कार्यकाल में रोजाना केवल 5-10 शिकायतें ही मिलीं।दरअसल लोकायुक्त पद को सन् 2001 में जस्टिस एन व्येंकटचेलैया ने जो ताकत और गरिमा प्रदान की थी उसे जस्टिस संतोष हेगड़े ने और बताया और प्रासंगिक बनाया। इसलिए गौड़ा-सरकार ऊपरी तौर पर चाहे जो कहे पर मजबूत लोकायुक्त नहीं चाहती। हालात यह है कि एक ओर येदियुरप्पा जेल से बाहर आने के बाद पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े पर वार कर रहे हैं तो भाजपा के के ईश्वरप्पा और जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी जैसे नेता लोकायुक्त संस्था की जरूरत पर ही सवालिया निशान लगा रहे हैं। दूसरी ओर, केवल राज्यपाल ही नहीं बल्कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा कानून मंत्री वीरप्पा मोईली भी बन्नुरमठ के चयन को सही नहीं मानते। लेकिन लोकायुक्त की नियुक्ति या लोकायुक्त संस्था को खत्म करना राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। डर इस बात का है कि कहीं हरियाणा सरकार की तरह यहां भी कानून बनाकर लोकायुक्त कार्यालय ही न भंग कर दिया जाये। कुल मिलाकर, भ्रष्टाचार के मसले पर केंद्र में राजनीति कर रही भाजपा के लिए कर्नाटक में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाले लोकायुक्त संस्था की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। लेकिन ताकतवर लोकायुक्त से राज्य सरकार को डर भी कम नहीं हैं, क्योेंकि वहां राज्य सरकार और इसके मंत्रियों के खिलाफ कई मामले पहले से ही चल रहे हैं। लेकिन कमजोर लोकायुक्त या बगैर लोकायुक्त के रहने से सरकार की अपनी साख ही दांव पर लग जायेगी। 

सरकार बहाना तलाश रही है
कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े से द पब्लिक एजेंडा की बातचीत

लोकायुक्त की नियुक्ति में देरी की वजह?
यह सरकार नहीं चाहती कि लोकायुक्त नियुक्त हो। दरअसल सरकार की मंशा तो लोकायुक्त संस्था को ही खत्म कर देने की लग रही है, लेकिन यह अच्छा नहीं है। ज्यादा दिनों तक यह स्थिति घातक है। कुछ और नहीं हो सकता तो नियुक्ति में देरी करके ही सरकार बचने के रास्ते तलाश रही है।

राज्यपाल ने कहा कि अगर जस्टिस संतोष हेगड़े का नाम फिर से सरकार लोकायुक्त पद के लिए भेजती है तो मैं एक मिनट में उसे मंजूर कर दूंगा।
मैं किसी भी सूरत में दोबारा यह पद स्वीकार नहीं करूंगा। किसी भी राजनीतिक दल से मेरे अच्छे संबंध नहीं हैं। मैं अब उनके लिए ब्लैकलिस्टेड हूं। जब मैं लोकायुक्त बना था तब तो मुझे सब बेदाग मान रहे थे, लेकिन अब अलग-अलग दलों के लोग मुझ पर आरोप लगा रहे हैं। 

आपकी राय में कौन इस पद के लिए उपयुक्त हैं?
यह दुःखद और त्रासद है कि सदानंद गौड़ा जी की सरकार को राज्य में इस पद के लिए एक भी बेदाग न्यायाधीश नहीं मिल रहा है। दरअसल, इस संस्था को ही खत्म करने का यह बहाना है। अगर राज्य में योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे तो दूसरे राज्यों या भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों में से किसी का नाम प्रस्तावित किया जा सकता है। पहले भी दो लोकायुक्त कर्नाटक से बाहर के रहे हैं। 

राज्यपाल बान्नुरमठ के नाम को खारिज कर रहे हैं । क्या यह सही है?
राज्यपाल एक सीमा तक ही ऐसा कर सकते हैं। सदन में चर्चा कराने के बाद अगर तीसरी बार भी सरकार की ओर से वही नाम भेजा गया तो राज्यपाल को मंजूरी देनी पड़ेगी। 

लोकायुक्त को लेकर राज्यपाल और सरकार के बीच चल रही खींचतान पर आपका क्या कहना है? 
मेरा कुछ कहना ठीक नहीं होगा। आखिरकार दोनों अपने संवैधानिक दायरों में ही रहकर फैसला करेंगे। मुझे यह जरूर लगता है कि मेरा कार्यकाल खत्म होने के बाद सरकार की ओर से इस संस्थान को कमजोर करने की ही कोशिशें हुई हैं वरना सरकार दागी मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय लोकायुक्त संस्थान को ही अपना निशाना नहीं बनाती। 

सरकार का इरादा क्या लोकायुक्त दफ्तर पर ताला लगाने का है?
दरअसल, समस्या यही है। राज्य सरकार को लोकायुक्त दफ्तर बंद करने का अधिकार है। कितने दिनों तक यह पद खाली रह सकता है या कितने दिन के भीतर नियुक्ति हो जानी चाहिए, इस बारे में भी कोई साफ निर्देश नहीं है। हां, केवल उच्च न्यायालय से लोकपाल नियुक्त करने के संदर्भ में निर्देश लिये जा सकते हैं। मैं यह नहीं कह सकता कि सरकार लोकायुक्त दफ्तर बंद करेगी या उसे चलने देगी। 

बुधवार, 23 नवंबर 2011

नाम बड़े और दर्शन छोटे

कन्नड़ फ़िल्मों के दो अभिनेताओं पर घरेलू उत्पीड़न के आरोप हैं लेकिन इससे उनकी फ़िल्मों की सफलता प्रभावित नहीं हुई। हिंसा की शिकार पत्नियां भी उन्हें माफ़ करती आयी हैं। मनोरमा की रिपोर्ट (Public Agenda)


चाहे कोई स्थापित अभिनेत्री हो या किसी फिल्मी सितारे की पत्नी, औरतों का दर्जा दोयम ही होता है । कुछ ऐसा ही मानते हैं कन्नड़ फल्मों के स्टार अभिनेता। बीवियों की पिटाई करना इन दिनों उनका दूसरा शौक बन गया है। और बाद में उनकी पत्नियों और प्रशंसकों से उन्हें माफी भी मिल जाती है। इस सबके बावजूद उनकी फिल्में पहले की ही तरह सुपर हिट होती रहती हैं। ऐसे ही एक कन्नड़ नायक के खलनायक बनने का हाई वोल्टेज ड्रामा पिछले महीने बंगलुरू में देखने को मिला। कन्नड़ फिल्मों के सुपर स्टार टी दर्शन अपनी पत्नी की पिटाई के आरोप में जेल भेजे गये, फिर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने पत्नी के साथ अपने प्रशंसको से माफी भी मांग ली। यही नहीं, उन्होंने फिर एक यात्रा का नाटक भी रचा। एक और कन्नड़ अभिनेता प्रशांत भी अपनी पत्नी शशिरेखा को मारने-पीटने और लगातार प्रताड़ित करने के आरोप में गिरफ्तार रहे। दोनों मामलों ने साबित किया कि कन्नड़ फिल्म उद्योग और वहां का समाज औरतों के लिए अभी भी नहीं बदला है। कन्नड़ फिल्मों के बड़े नायक टी दर्शन की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सोना उगलती रही हैं। लेकिन पर्दे का यह नायक घर में खलनायक बन गया। शादी के दस साल बाद उनकी पत्नी विजयलक्ष्मी को थाने में अपने ही पति के खिलाफ शिकायत दर्ज करानी पड़ी। अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि दर्शन ने उन्हें और उनके तीन साल के बेटे को न सिर्फ प्रताड़ित किया, बल्कि जान से मारने की कोशिश भी की। दर्शन ने सिगरेट से विजयलक्ष्मी के हाथों को जलाया और चप्पल से पटाई की। दर्शन को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन जेल में उनकी तबीयत खराब हो गयी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बाद में विजयलक्ष्मी उनसे मिलने अस्पताल गयीं और फिर अपनी बात से पलट गयीं। चोट लगने का कारण बाथरूम में पैर फिसल जाना बताने लगीं। उन्होंने पति पर लगाये सारे आरोप भी वापस ले लिये, लेकिन इसके बावजूद बंगलुरू की दोनों निचली अदालतों ने दर्शन की जमानत याचिका खारिज कर दी। लेकिन आखिरकार कर्नाटक उच्च न्यायालय से उन्हें जमानत मिल गयी। विजयलक्ष्मी ने मीडिया के सामने स्वीकार किया कि घर के झगड़े को बाहर लाना उनकी नासमझी थी। दर्शन ने भी इस पूरे प्रकरण के लिए माफी मांगी और एक अच्छा पति और पिता बनने की कसमें खायीं। लोगों का मानना है कि दर्शन के "पश्चाताप' का कारण यह था कि अगले कुछ ही दिनों में उनकी फिल्म "सारथि' रिलीज होने वाली थी। सारथि के रिलीज होने से पहले दर्शन को अपनी छवि की चिंता सताने लगी थी इसलिए उन्होंने फिल्म के प्रचार के लिए "यात्रा' की और इस दौरान लोगों से माफी मांगी। हैरानी की बात यह रही कि बंगलुरू से लेकर मांड्या, मैसूर, चित्रदुर्गा तुमकूर और दावणगेरे सभी जगह लोगों ने दर्शन को हाथों-हाथ लिया, उसका घंटों इंतजार किया, यहां तक कि कई जगहों पर पुलिस को हल्का लाठी चार्ज भी करना पड़ा। बकौल दर्शन, "सारथि' की सफलता और यात्रा में मिले जन-समर्थन ने उन्हें लोगों का आभारी बना दिया है और जो हुआ, उसके लिए वे बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। दरअसल कई बार औरतों के मामले में मर्द संवेदनशीलता की हदें तोड़ते आये हैं। औरतें मर्दो की दुनिया में सिर्फ गैर-बराबरी ही नहीं, तमाम किस्म के हिंसक वार भी झेलती आयी हैं। मध्य या उच्च वर्ग में होने वाली ऐसी घटनाएं अक्सर घर की दीवारों के अंदर ही दब जाती हैं। बड़े स्टार जो परदे पर अक्सर आदर्शवादी नायक के रूप में अन्याय के खिलाफ खड़े दिखते हैं, वे भी यह भूल जाते हैं कि निजी जीवन से भी उन्हें ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। दर्शन भी कन्नड़ फिल्मों के ऐसे ही स्टार नायक रहे हैं, इसलिए पत्नी से मनमुटांव होने पर उनसे परिपक्व व्यवहार की उम्मीद थी, लेकिन उन्होंने परदे पर अपनी छवि के विपरीत आचरण किया। कन्नड़ फिल्म उद्योग के अंदर घटे ऐसे कई उदाहरणों से यह भी साफ हुआ कि सामाजिक संदेश केवल परदे पर ही दी जानेवाली चीज है। कहा जाता है कि यह मनमुटाव एक अभिनेत्री निकिता ठुकराल से उनकी निकटता और उनके साथ फिल्मों में काम करने को लेकर हुआ। कन्नड़ फिल्म उद्योग ने तीन साल के लिए निकिता ठुकराल पर प्रतिबंध लगा दिया लेकिन दर्शन को उनकी कारगुजारियों के बावजूद सहयोग और समर्थन ही मिला। इससे पता चलता है कि ग्लैमर की दुनिया में भी लोगों की सोच महिलाओं के संदर्भ में कितनी संकीर्ण है। फिल्मी नायकों को पसंद करने वाली जनता को भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका नायक असल जिंदगी में कैसा है। दर्शन को हिरासत में लिये जाने की खबर मिलते ही पूरा कन्नड़ फिल्म उद्योग विजयनगर पुलिस थाना दर्शन को छुड़़ाने पहुंच गया था। फिल्म उद्योग के बड़े-बड़े नामों ने दर्शन की पत्नी विजयलक्ष्मी पर ही समझौता करने का दबाव बनाया। यहां तक कि जनता ने, जिसमें महिलाएं भी बड़ी तादाद में शामिल थीं, दर्शन के समर्थन में प्रदर्शन किया। इसी दबाव में दर्शन पर लगे हत्या की कोशिशों के आरोप धारा 107 को, जिसके तहत जमानत मुश्किल होती है, धारा 324 में बदल दिया गया। बहरहाल, दर्शन और विजयलक्ष्मी प्रकरण ने फिर एक बार साबित किया कि औरतें अपने खिलाफ हो रही घरेलू हिंसा के मामलों में कितनी लचीली और समझौतावादी हैं। अपनी सामाजिक सुरक्षा का सवाल और बच्चों का भविष्य उन्हें अपने ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ कदम आगे बढ़ाने के बावजूद पीछे हटाने को मजबूर कर देता है। दरअसल, घरेलू हिंसा को पारिवारिक और सामाजिक दायरे में गंभीर अपराध नहीं माना जाता और ज्यादातर मामलों में तो पत्नी को भी ये एक सामान्य सी बात लगती है। दर्शन और विजयलक्ष्मी के मामले में दर्शन की आलोचना करने के बाद ज्यादातर लोगों की पहली प्रतिक्रिया यही रही कि ये आपस का मामला था, जिसे विजयलक्ष्मी को आपस में सुलझाना चाहिए था। "सारथि' की सफलता भी इस बात की तसदीक करती है कि समाज पत्नी के साथ की गयी मारपीट को कोई गंभीर अपराध नहीं मानता और इससे अभिनेता के कैरियर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। हैरानी की बात नहीं कि हाल ही में महिलाओं पर शोध करनेवाली अंतरराष्ट्रीय संस्था आईसीआरडब्ल्यू के सर्वेक्षण में 65 फीसद पुरुषों ने माना कि कभी-कभी महिलाओं को मारना जरूरी होता है। बंगलुरू में भी एक सर्वेक्षण में 35 फीसद लोगों को दर्शन का अपराध बड़ा नहीं लगा। अठारह फीसद लोगों की निगाह में यह बहुत आम बात है और 65 फीसद लोग तो मुद्दे को सार्वजनिक करने के कारण विजयलक्ष्मी को ही गलत मान रहे हैं। वैसे हाल ही के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आयी है कि देश में 40 फीसद शादी-शुदा महिलाएं अपने घरों में पतियों से शारीरिक और यौन हिंसा का शिकार होती हैं और 51 प्रतिशत भारतीय पुरुष और 54 प्रतिशत भारतीय महिलाओं को पत्नियों को मारा-पीटा जाना स्वीकार्य और वैध लगता है। दर्शन प्रकरण ने कन्नड़ फिल्म उद्योग के दोमुंहे चेहरे को भी उजागर किया है जो कमोबेश देश के पूरे शो बिजनेस का एक सच है। यहां बातें बड़ी-बड़ी होती हैं लेकिन हकीकत में औरतों और मर्दो में बराबरी नहीं है, चाहे वह पारिश्रमिक की बात हो या शादी के बाद काम करने की स्वीकार्यता की बात। हिंदी फिल्म उद्योग में भी जीनत अमान, नीतू सिंह, और ऐश्वर्या राय तक घरेलू हिंसा का शिकार हुई हैं। वैसे, घरेलू हिंसा कानून 2005 घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए एक कारगर सुरक्षा कवच है। मसलन इसके तहत घरेलू हिंसा की शिकार महिला के लिए हर तरह की कानूनी सहायता मुफ्त मिलती है और दर्ज शिकायत पर कार्रवाई करने के लिए अधिकतम तीन दिन का ही समय दिया गया है। कोई भी महिला सीधे मजिस्ट्रेट के पास शिकायत लेकर जा सकती है।

बुधवार, 7 सितंबर 2011

यह अभी शुरुआत है


Published in Public agenda

कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े से मनोरमा की बातचीत
कर्नाटक के लोकायुक्त पद से रिटायर हुए न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े कर्नाटक में अवैध खनन पर अपनी जांच-रिपोर्ट के कारण चर्चा में रहे। हेगड़े जन लोकपाल विधेयक बनाने वाली संयुक्त समिति के सदस्य और अण्णा टीम के भी एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। बातचीत के मुख्य अंश :

आप अण्णा की टीम और सरकार के बीच बातचीत में अहम भूमिका निभा रहे थे?
नहीं, मैं कोई मध्यस्थता नहीं कर रहा था और न ही मेरे पास सरकार की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव आया। मैं अण्णा की टीम में हूं और हम एक टीम के तौर पर बातचीत के लिए हमेशा से तैयार रहे हैं।

क्या अण्णा के अनशन में दुराग्रह नहीं था?
अण्णा बिल्कुल सही कर रहे थे। सरकार को लोकपाल विधेयक पर व्यापक बहस से गुरेज नहीं होना चाहिए। आखिरकार सर्वसम्मति का ही विधेयक संसद में पारित होगा। लेकिन लोगों को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है। संविधान ने सर्वोच्च सत्ता देश के नागरिकों को ही माना है और सरकार का यह कहना बेबुनियाद था कि हम लोग कानून बना रहे थे। हम सिर्फ सरकार को सुझाव दे रहे थे और संविधान ने ऐसा करने का हमें अधिकार दिया है। 

सरकार के रवैये पर आप क्या सोचते हैं?
जब यह आंदोलन शुरू हुआ था तो हमें उम्मीद नहीं थी कि लोगों का ऐसा साथ और समर्थन मिलेगा। जाहिर है, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में आम आदमी भ्रष्टाचार से बेहद परेशान है। लोगों के पास अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के पैसे नहीं हैं, लेकिन जनता के ही करोड़ों-अरबों रुपये राजनेता घोटाले करके लूट रहे हैं। इस आंदोलन में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की हिस्सेदारी को इसी रूप में देखा जाना चाहिए। 

आप कर्नाटक के लोकायुक्त रहे हैं। क्या लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक में कोई समानता है?
कर्नाटक का लोकपाल रहते हुए मैंने सुओमोटो पावर के लिए काफी प्रयास किये। भाजपा सरकार से आश्वासन मिलने के बावजूद लोकायुक्त को मुख्यमंत्री या कैबिनेट के मंत्रियों के खिलाफ सुओमोटो पावर नहीं मिली। हां, उप-लोकायुक्त पहली श्रेणी के अधिकारियों और उससे नीचे चपरासी तक के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत होने पर संज्ञान ले सकते हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत विशेष लोकायुक्त अदालत में दर्ज होने के कारण उनके खिलाफ मामला बना। 

अण्णा की टीम अपने विधेयक पर इतनी क्यों अड़ी रही?
हम बहस और बातचीत के लिए हमेशा तैयार थे। हमारा तर्क था कि सरकार को अण्णा टीम द्वारा सौंपे गये लोकपाल विधेयक के आठ मुद्दों पर एतराज है तो ठीक है, उन्हें छह मुद्दों पर राजी होने दीजिए और संसद में लेकर आने दीजिए। वैसे भी हम यह नहीं कह रहे कि जन-लोकपाल विधेयक हमने जैसा दिया है, वही पारित हो। हम चाहते हैं कि संसद में इस पर बहस हो, सरकार हमारी मांग और जनभावनाओं को जाने-समझे।

लोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार रोकने में कितना कारगर होगा?
यह सच है कि केवल इस विधेयक से देश और समाज से भ्रष्टाचार पूरी तरह से खत्म नहीं होगा, लेकिन कुछ तो फर्क पड़ेगा ही । 

इस आंदोलन के बाद आप लोगों की रणनीति क्या होगी?
हम चुनाव सुधार और सांसदों और विधायकों को वापस बुलाने या राइट टु रिकॉल के लिए मुहिम चलाने वाले हैं। अब हम रुकने वाले नहीं हैं। जनहित के अलग-अलग मुद्दों पर हम जनता को जागरूक करने उसके साथ मिलकर मुहिम चलाने का काम करते रहेंगे।

शुक्रवार, 24 जून 2011

एक छोटी-सी जीत


एक छोटी-सी जीत
[For Public Agenda]
ऐसा रोज-रोज नहीं होता जब समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग अपने हक के लिए लड़ पाते हों और फिर जीत भी जाते हों। पर बंगलूरू की घरेलू कामगार पापम्मा की कहानी असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे लाखों लोगों के लिए  मील का पत्थर है। नौकरी से अचानक निकाल दिए जाने पर अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली पापम्मा से मिलने जब हम बंगलूरू के लिंगराजपूरम इलाके की झुग्गी-बस्ती में गए तो ईंटों के मलबे से भरे प्लाट पर प्लास्टिक शीट से बनी छोटी सी एक झोपड़ी के आगे पतली-दुबली सावंले रंग की 65 साल की महिला बैठी मिली। उसकी ओर इशारा करके उसके बेटे नागराज ने कहा- मैडम, शी इज पापम्मा, माई मदर!  बगल में ही चोट लग जाने की वजह से 25 साल से बेरोजगार, पापम्मा के पति भी बैठे थे। पापम्मा की टूटी हिन्दी को उसका बेटा नागराज हमें अंग्रेजी में समझा दे रहा था। बात बेटे से ही शुरू हुई, पापम्मा कहने लगी- 12वीं तक पढ़ा है, हम दलित हिन्दु हैं पर छोटे बेटे ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है और यहीं किसी रियल इस्टेट ऑफिस  में काम करता है, इसे साढ़े पांच हजार रूपए मिलते हैं। पांच बच्चों में दो बेटे और दो बेटी  अपने-अपने परिवार के साथ रहते हैं जिन्हें किसी तरह पाल-पोष दिया था उसने। 22 साल तक 8 घंटे काम करने के एवज में महज 60 रूपए महीने की आमदनी पर सात लोगों का गुजारा, सोचने वाली बात है। इसलिए बच्चें छोटी उम्र से ही कुली का काम करने लगे और सबको बस रोटी मिलती रही। 2003 से पापम्मा को 500 रूपए मिलने षुरू हुए जबकि एक साल बाद 2004 में कर्नाटक सरकार ने घरेलू कामगारों के लिए 8 घंटे की न्यूनतम मजदूरी 2,279 तय कर दी। और 2007 में काम से निकाले जाने के छः महीने पहले, बार-बार कहने पर उसे 15 सौ मिलने शुरू हुए थे पर ये भी 2008 के सरकार के न्यूनतम मजदूरी के मानक से कम ही था। बहरहाल, ऐसा ही चलता रहता  अगर वो बीमार न पड़ती और 8 दिन काम पर ना जाती। नौंवे दिन जब वो काम करने गयी तो उसे गेटआउट कह दिया गया, बगैर कारण बताए। यहीं नहीं उन्होंने उसे पैसे देने से भी इनकार कर दिया, जबकि पापम्मा जब 60 रूपए पर काम करती थी, तो उसके मालिक उसे ये कहकर चुप करा देते थे कि जरूरत पर हम दे देंगे। 31 साल काम करने के बाद भी मिले इस अपमान और तिरस्कार ने उसे गहरी चोट दी।
अंततः पापम्मा अपने मामले को बंगलूरू के घरेलू मजदूर युनियन के पास ले गई।  युनियन  पापम्मा के मामले को अदालत ले गई जहां आखिर में फैसला पापम्मा के हक में हुआ। हालांकि पापम्मा को सेटलमेंट में 60 हजार रूपए ही मिले जबकि उसे 1 लाख 45 हजार मिलने चाहिए थे, पर ये भी अपनेआप में उल्लेखनीय है।
दरअसल, पापम्मा का मामला घरेलू काम करने वालों के हालात पर रोशनी डालता है। जहां सिर्फ मुंह से बोलकर सब तय होता है, कोई लिखित एग्रीमेंट नहीं होता और नौकरी पर होने का कोई रिकार्ड नहीं होता, ऐसे में शोषण होने पर कभी भी कुछ साबित ही नहीं किया जा सकता। देश के तमाम घरेलू कामगार इसी तरह से काम करते हैं जबकि इस क्षेत्र में काम करने वालों की तादाद लगभग 45 लाख है।  पर अभी तक सरकार के पास इनके लिए स्पष्ट कानून नहीं है, इन्हें किसी किस्म का सरकारी संरक्षण और आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा हासिल नहीं है। पापम्मा कानूनी सहायता ले पायी तो उसकी वजह बंगलूरू में घरेलू कामगारों के मजबूत यूनियन का होना और इसी के मार्फत आल्टरनेटिव लाॅ फोरम जैसे संगठनों से मिली कानूनी मदद है। जबकि अक्सर ऐसे मामले रजिस्टर ही नहीं हो पाते, इसलिए यह जीत अपने-आप में एक मिसाल तो है ही। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि बावजूद इसके पापम्मा के हालात अब भी नहीं बदले हैं। सब जानते हुए भी वो फिर से 800 रूपए महीना पर चार घंटे रोजाना काम कर रही है। छः महीने पहले स्थानीय कारपोरेटर लावण्या गणेश  रेड्डी के आश्वाशन पर उसने अपना अस्थायी कच्चा घर तोड़ दिया था पर मकान बनाने के लिए कॉर्पोरटर फंड से पैसा नहीं मिला है।  अब वो डेढ़ हजार के किराये के एक कमरे में रहती है और बेटे के दिए दो हजार और अपने 8 सौ में से किराया देने के बाद 1300 रूपए में पति के साथ गुजारा करती है। ऐसा क्यों?े यह पूछने पर वह कहती हैं-इससे ज्यादा इस इलाके में कोई देने का तैयार नहीं होता, या तो मुझे इतने पर ही काम करना होगा या फिर घर बैठना होगा। घर बैठने से काम नहीं चलेगा और ज्यादा दूर काम करने मैं जा नहीं सकती। आल्टरनेटिव लाॅ फोरम की ओर से पापम्मा को कानूनी मदद देने वाली मैत्रेयी कृष्णन कहती हैं दरअसल, ये बहुत ही जटिल मसला है और बगैर किसी स्पष्ट कानून के किसी को न्याय दिलाना मुश्किल है। सबसे बड़ी दिक्कत तो घरेलू कामगार की पहचान की है। ऐसे में कोई भी पलट सकता है कि अमुक उसके यहां नौकरी नहीं करती है। दूसरी ओर सरकार ने 8 घंटे काम के एवज में लगभग 3 हजार न्यूनतम मजदूरी इनके लिए तय की है जबकि सरकार का ही मानना है कि बंगलूरू में गुजारे के लिए कम से कम 6 हजार रूपए मासिक जरूरी है। न्यूनतम मजदूरी के मानक का पालन अभी भी नहीं हो रहा। और इससे भी बड़ा सवाल उनके सम्मान का है जो कोई कोर्ट नहीं उनसे काम लेने वालें ही दे सकते हैं।  इसके लिए इनके प्रति नजरिए में बदलाव की जरूरत होगी।  मैत्रेयी कहती हैं हालांकि कर्नाटक में घरेलू कामगारों का यूनियन काफी मजबूत है और यहां जागरूकता भी है, इसलिए हफ्ते में एक दिन की छुट्टी इन्हें यहां मिल जाती है पर अभी भी काफी कुछ किया जाना बाकी है।
कर्नाटक घरेलू कामगार अधिकार यूनियन की गीता मेनन भी यही मानती हैं कि  सुधार सोच में बदलाव से ही संभव है और उस ओर पहला कदम यही होगा कि इन्हें नौकर नहीं बल्कि कामगार या श्रमिक समझा जाए। अपनी बेहतरी के लिए इनका संगठित होना बेहद जरूरी है तभी ये अपने हक के लिए लड़ पाएंगे।
वैसे, कर्नाटक घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी मानक लागू करने वाला पहला राज्य है। लेकिन छः साल में न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलने का कोई भी मामला दर्ज नहीं हुआ है, इससे हकीकत समझा जा सकता है। दूसरी ओर केन्द्रीय श्रम मंत्री एम मल्लिकार्जून खाड़गे सबसे गरीब तबके के मजदूरों के लिए बनायी गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जो कर्नाटक को छोड़कर 24 राज्यों में लागू है के तहत घरेलू कामगारों को भी लाने की बात कर रहे हैं। पर कर्नाटक में तो अभी मनरेगा के मजदूर ही इससे बाहर हैं।
बहरहाल, इसी साल अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में पूरे विश्व के घरेलू कामगारों के लिए सम्मानजनक कार्यदशा  मुहैया कराने के लिए नया अंतरराष्ट्रीय कानून लाए जाने की चर्चा है। जबकि भारत में अभी भी ठोस कानून नहीं है। राष्ट्रीय सलाहकार समिति की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हाल ही में प्रधानमंत्री  को प्रस्तावित राष्ट्रीय घरेलू कामगार नीति के तहत घरेलू कामगारों को व्यापक श्रम अधिकारों के ढ़ाचें में लाए जाने का सुझाव दिया है जिसके तहत बराबर भुगतान, काम करने की जगह पर यौन-शोषण  और अन्य शोषण के खिलाफ संरक्षण ,हफ्ते में एक और साल में 15 अवकाश देने का भी सुझाव दिया है। प्रस्तावित नीति की घोषणा के बाद हालात,  हो सकता है थोड़ा बदलें।




बंगलूरू में घरेलू कामगारों को सबसे पहले संगठित करने वाली और उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली सामाजिक कार्यकर्ता और बंगलूरू गृह कार्मिक संघ की संस्थापिका रूथ मनोरमा से बातचीत
-कर्नाटक में घरेलू कामगारों की स्थिति क्या है?
बंगलूरू में घरेलू कामगारों की संख्या 3 लाख के करीब है, जिनमें से ज्यादातर किसी यूनियन से रजिस्टर्ड नहीं हैं। पर फिर भी यहां घरेलू कामगारों के युनियनों की मजबूत मौजूदगी है और इनके हक की लड़ाई में इनका सार्थक हस्तक्षेप है। कर्नाटक सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी तय किये जाने को हम अपनी इस लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम मानते हैं। यहां जागरूकता और हमारे काम से थोड़ा फर्क तो आया है और हालात बाकी जगह से कुछ बेहतर हैं।

-बंगलूरू गृह कार्मिक संघ की इसमें क्या भूमिका रही?
-1987 में हमने इसकी नींव रखी और तबसे हमारी लड़ाई जारी है। इससे पहले 1986 में पुलिस में घरेलू कामगारों का रिकार्ड और फोटो दिए जाने का आदेश  हुआ था। हमने वीमेन व्वाईस के जरिए इसका विरोध किया, क्योंकि ये इन कामगारों के सम्मान के खिलाफ था इसके बदले लेबर ऑफिस में इन्हें रजिस्टर्ड किया जाना चाहिए। खैर, वो आदेश  वापस ले लिया गया। न्यूनतम मजदूरी तय होना बंगलूरू गृह कार्मिक संघ की जीत रही है।
-न्यूनतम मजदूरी के बाद अगली मांग क्या है?
हम घरेलू कामगारों को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सूची में लाना चाहते हैं। राष्ट्रीय घरेलू कामगार अधिनियम पर हमारी नजर है। और राज्य सरकार की पहल पर भी। हमारी मांग इन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाए जाने की है। निर्माण क्षेत्र के मजदूरों को लेबर ऑफिस से मिलने वाले पहचान पत्र की तरह ही इन्हें भी आईडेंटिफिकेशन कार्ड मिलना चाहिए। इससे इन्हें 17 फायदें मिलेंगे। साथ ही प्रवासी कामकारों को सरकार की ओर से पूर्ण संरक्षण मिलना चाहिए
- बंगलूरू गृह कार्मिक संघ कामगारों को आर्थिक मदद भी मुहैया कराता है?
हम सदस्यों की आर्थिक मदद भी करते हैं, पर हमारे पास लाए गए मामलों में हम कानूनी मदद करते हैं। इनके सामाजिक, पारिवारिक मसलों में भी हस्तक्षेप करते हैं। लेकिन सरकार के पास इनकी मदद के लिए कोई फंड नहीं है। हम चाहते हैं कि सरकार मामूली सेस लगाकर इनके लिए कोई फंड बनाए और जरूरत पड़ने पर इनकी आर्थिक मदद करें।  

गुरुवार, 23 जून 2011

चंदन के तस्कर


(Published in Public agenda)
कभी दक्षिण-भारत के जंगलों में आतंक का पर्याय रहे और जंगल का राजा कहे जाने वाले वीरप्पन को मरे हुए 7 साल हो चुके हैं। अपने जीवनकाल में दस हजार टन से भी ज्यादा चंदन की लकड़ी की तस्करी करने वाले वीरप्पन ने कर्नाटक, तमिलनाडू और केरल के जंगलों से चंदन के पेड़ों की सफाई करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी, पर उसके जाने के बाद भी यहां एक नहीं बल्कि कई वीरप्पन सक्रिय हैं, जो रातों-रात बंगलूरू जैसे  शहर में विधानसभा से सटे वीवीआईपी इलाके से भी चंदन के पेड़ काट ले जाते हैं और उनका कोई कुछ नहीं कर पाता। हाल ही में तस्करों ने यहाँ चंदन के 3 पेड़ रातों रात काट डाले। जिसमें से एक तो  विधानसभा और हाई कोर्ट के सामने कब्बन पार्क जैसे इलाके  में था।  सार्वजनिक जगह पर साबुत बचा यह शहर का इकलौता चंदन का पेड़ था और जिसकी सुरक्षा में हमेशा  एक सशस्त्र सुरक्षाकर्मी भी तैनात रहता था। और 2 पेड़ सीवी रमण नगर इलाके के एक घर के अहाते से बंदुक की नोक पर काट लिया गया। एक पेशेवर तस्कर  केवल 3 मिनट में परिपक्व चंदन का पेड़ को काट डालता है। आईआईएम बंगलूरू के कैंपस से भी चंदन के पेड़ काट लिए जाते हैं । यहां तक कि इन्सटीट्यूट ऑफ वुड साईंस एंड टेकनॉलजी से भी पांच परिपक्व चंदन के पेड़ों को काटने की कोशिश की गई। सरकार द्वारा अभी भी तमाम सरकारी जमीन और भवनों के अहाते में चंदन के पेड़ लगाए गए हैं पर इन्हें तस्करी से बचाना बड़ा काम है। अभी भी तुराहल्ली के जंगल, बंगलूरू विश्वविद्यालय परिसर, जीकेवीके कैपस, इन्सटीट्यूट ऑफ वुड साईंस एंड टेकनॉलजी और इबलुर में चंदन के पेड़ों की ठीक-ठाक संख्या है जो कुछ सालों में परिपक्व हो जाएंगे पर ये तस्करों से बच पाएंगे या नहीं ये बड़ा सवाल है। अभी के हालात देखकर तो यही लगता है कि तस्करों के हौसले सरकार से ज्यादा बुलंद हैं। कर्नाटक फारेस्ट सेल के रिकार्ड के मुताबिक 2007 में राज्य में चंदन की लकड़ी की तस्करी के 88 मामले सामने आए थे जो 2008 में 191 हो गए लेकिन 2009 में 102 मामले ही दर्ज हुए। लेकिन मामलों में कमी इसलिए नहीं आयी कि पुलिस-प्रशासन ज्यादा मुस्तैद हो गया बल्कि इसलिए कि दिनों दिन चंदन के पेड़ घटते जा रहे है। असलियत ये है कि राज्य के जंगलों में संभवतः गिने-चुने ही प्राकृतिक रूप से उगे चंदन के पेड़ बचे हों या शायद  वो भी नहीं। जबकि कर्नाटक के उत्तरी इलाके में कभी हजारों किलोमीटर तक चंदन के जंगल हुआ करते थे।

अभी एक दशक पहले तक ही बंगलूरू में 97 बड़़े और पुराने चंदन के पेड़ हुआ करते थे जिसमें 21 कब्बन पार्क में थे। लेकिन जल्दी ही इनकी संख्या 21 से 6 रह गई, धीरे-धीरे सब माफियाओं की भेंट चढ़ते गए। और आखिरकार इकलौता पेड़ भी उनकी नजर हो गया। हांलाकि कब्बन पार्क और लाल बाग जैसी जगहों में चंदन के और पेड़़ है पर उन्हें लगाए कुछ ही साल हुए है और वो अभी परिपक्व नहीं हुए हैं।
चंदन, कर्नाटक की पहचान और संस्कृति का हिस्सा रहा है। सिल्क के साथ-साथ कर्नाटक अपने मैसूर सैंडल सोप और चंदन की लकड़ी से बनी खूबसूरत कलाकृतियां के लिए भी उतना ही जाना जाता है। यहां लाखों लोगों की रोजी रोटी, चंदन और इससे जुड़े कारोबार से चलती है मसलन, अगरबत्ती से लेकर  साबुन, टेल्कम पाउडर, परफ्यूम और ऐसे ही अनगिनत सौन्दर्य उत्पाद यहां बनते हैं। इसके अलावा चंदन की लकड़ी पर नक्काषी या इससे कलाकृतियां बनाने का काम भी यहां बड़े पैमाने पर होता है, दवाईयों में भी चंदन के तेल का इस्तेमाल होता है। यह कर्नाटक का राजकीय वृ़क्ष भी है। और मैसूर तो कर्नाटक का चंदन का षहर ही कहलाता है। देष का 70 प्रतिशत चंदन कर्नाटक ही मुहैया कराता रहा है। जो हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि दुनियां में सबसे बेहतरीन माना जाता है।  पर दिनों दिन बढती मांग और घटती आपूर्ति ने आज इस पेड़ के आस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है।
वैसे चंदन के पेड़़ भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक कहीं भी लगाए जा सकते हैं, केवल सही किस्म का चयन करना होता है। फिलहाल देश में 27 किस्म के चंदन के पेड़ पाएं जातें है। मध्यम उर्वर मिट्टी, और थोड़ी ढाल वाली जमीन ताकि जड़ों में पानी नहीं रूके इसके लिए उत्तम है। लेकिन शुष्क जलवायु दशाओं में पेड़ में बनने वाले हार्टवुड और तेल की गुणवत्ता जरूर बहुत उम्दा हो जाती है। कर्नाटक की आबो हवा और प्राकृतिक दशाएं चंदन के पेड़ों के लिए एकदम सटीक है। सदाबहार जंगल का यह पेड़ 40 से 50 फीट तक उंचा और 3 से 8 फीट मोटा होता है। थोड़ा बैंगनीपन लिए हुए इसके भूरे रंग के फूल सुंगधहीन होते हैं। प्राकृतिक  चंदन के पेड़ कम से कम 30 साल में परिपक्व होते है। जबकि प्लानटेशन के तहत उगाए गए चंदन के पेडों में़ दस से पन्द्रह साल के भीतर ही  25 किलो तक संुगधित हार्टवुड का निर्माण हो जाता है। लेकिन अब चंदन के पेड़ों की ऐसी किस्में भी विकसित कर ली गई हैं जो 12 साल में तैयार हो जाती है। चंदन की लकड़ी की बिक्री हार्टवुड, ब्रांचवुड, चिप्स और पाउडर के रूप में होती है। हार्टवुड से ही चंदन की कलाकृतियां और गहने बनाए जाते हैं जबकि छाल को पीसकर उससे अगरबत्ती बनती है। जड़ों से तेल निकाला जाता है। और पेड़ को खरोंच-खरोंच कर पाउडर जमा किया जाता है।
दरअसल, चंदन मतलब पैसा! एक ऐसा पेड़, जो आकार नहीं बल्कि वजन के हिसाब से बेचा जाता है। आज एक टन भारतीय चंदन की लकड़ी की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लगभग 45 लाख से भी ज्यादा है। पिछले 18 साल से सालाना लगभग 18 प्रतिशत की दर से इसमें  इजाफा हो रहा है। जबकि 1 लीटर चंदन के तेल की कीमत सवा लाख से उपर है। दो साल पहले तक प्रति टन चंदन की लकड़ी की कीमत 20 लाख रूपए थी। मोटे तौर पर एक एकड़ में चंदन लगाने पर 12 से 15 साल में 22 से 25 लाख तक खर्च आता है और मुनाफा ढ़ाई करोड़ से उपर। यही वजह है कि निजी क्षेत्र की कई कंपनियां चंदन के प्लानटेशन में उतर चुकी हैं। सूर्या विनायक इंडस्ट्रीज, डी एस समूह और नामधारी सीड्स लिमिटेड कर्नाटक के अलावा देश के अन्य राज्यों में बड़े पैमाने पर चंदन की खेती कर रही हैं। श्री श्री एग्री ग्रुप जैसी कंपनी तो बिहार में भी चंदन की खेती की योजना बना रही है। इसके अलावा भारत को चंदन के उत्पादन में सबसे बड़ी चुनौती आस्ट्रेलिया से मिलने वाली है। जहां बड़े पैमाने पर भारतीय चंदन की प्लानटेषन की गई है और 2012 से वहां के चंदन की पहली खेप बाजार में आनी शुरू  हो जाएगी।
कर्नाटक के कुल 20 फीसदी हिस्से में जंगल हैं और कुल वन-क्षेत्र के 10 फीसदी में कभी चंदन हुआ करते थे जो अब घटकर महज 5 फीसदी या उससे भी कम रह गया है। यानी चंदन के प्राकृतिक वन-क्षेत्र विलुप्त होने के कगार पर हैं। तस्करी का आलम जब बंगलूरू में ऐसा है तो सहज समझा जा सकता है राज्य के जंगल कितने सुरक्षित हैं।  चंदन उत्पादन में अग्रणी रहे कर्नाटक में पिछले तीन साल से लकड़ी की नीलामी ही नहीं हुई है। जाहिर है  दूसरे राज्यों और आयात करके काम चलाया जा रहा है पर लंबे समय तक कच्चे माल की आपूर्ति नहीं होने की सूरत में लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर इसका सीधा असर होगा। इसलिए  चंदन उत्पादन को लेकर सरकार गंभीर हो गई है। और चंदन की खेती का रकबा डेढ़ हजार एकड़ से बढ़ा कर दो हजार एकड़ करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही सरकार ने चंदन की लकड़ी के उत्पादों से होने वाले मुनाफे पर लगाए जाने वाले 50 फीसदी कर में भी रियायत दे दी है। और उत्पादक राज्य सरकार के अलावा अन्य एजेंसियों को भी चंदन की लकड़ी बेच सकता है। यहां तक कि विभिन्न सरकारी संस्थान भी अगर अपने परिसर में लगे चंदन के पेड़ों को हटाते हैं तो  राज्य का वन विभाग उन्हें इसका भुगतान करेगा।  इसके अलावा नेशनल मेडीसिनल प्लांट बोर्ड भारत सरकार की ओर से भी चंदन की खेती पर सबसिडी दी जाती है साथ ही सभी र्राष्ट्रीय बैंक चंदन के पेड़ लगाने की परियोजनाओं के लिए कर्ज भी मुहैया कराते हैं।
हालात को देखते हुए ही राज्य सरकार विधानसभा के अगले सत्र में कर्नाटक राज्य वृक्ष संरक्षण कानून में संशोधन करने जा रही है। राज्य के वन मंत्री सी एच विजयशंकर ने इस संबंध में बताया कि कानून के पारित हो जाने के बाद चंदन के पेड़ के मालिक अंतर्राष्ट्रीय कीमत के अनुसार अपने पेड़ की लकड़ी भी बेच सकेंगे। गौरतलब है कि कर्नाटक में 2001 में वृक्ष संरक्षण कानून में संशोधन कर अपनी जमीन पर लगाए गए चंदन के पेड़ का मालिकाना हक भूस्वामी को दे दिया गया था पर उसकी बिक्री पर सरकार का नियंत्रण है। इसके इस्तेमाल के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी है। यही नहीं बगैर सरकारी मंजूरी के चंदन की लकड़ी अपने पास रखना या इसे कहीं ले जाना भी गैरकानूनी है। जाहिर है ऐसे में पेड़ को बेचना और फिर सरकार की ओर से पैसे का भुगतान बड़ी समस्या थी। इसलिए किसान चंदन की खेती से दूर रह रहे थे।  है। किसानों को इससे जोड़ने के लिए कानून में संशोधन समय की मांग है।
कुल मिलाकर चंदन की लकड़ी उगाने वालों के लिए आने वाला समय सबसे मुफीद साबित होने वाला है। बशर्ते अगर उनके पेड़ वीरप्पनों से बच जाएं।


शुक्रवार, 20 मई 2011

एक कदम तो उठाओ यारों...........

 एक चीनी कहावत है-अंधेरे को कोसने से बेहतर है मोमबत्ती जलाओ। यानी कोसने से बेहतर करना है। हमेशा  सरकार और सिस्टम को कोसने से कुछ नहीं होने वाला, करप्नश  का रोना रोने से भी कोई फायदा नहीं। अगर कुछ हो सकता है तो हमारे लिए बनायी गई योजनाओं, उसके लिए निर्धारित की गई रकम और उसे अपने विकास पर खर्च करने के तौर-तरीके जानने और उसके लिए माहौल बनाने से। कम से कम कर्नाटक के बेलगांव जिले के सिरागुप्पी गांव की पंचायत और वहां के लोग तो यही कहते हैं। हाल ही में इस गांव को न सिर्फ केन्द्र सरकार से माॅडल गांव  अवार्ड मिला है, बल्कि इसने गुगल अवार्ड भी हासिल किया है। ये अवार्ड सरकार की सभी योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करने और सभी बुनियादी सुविधाओं का लक्ष्य हासिल कर लेने वाले गांव को दिया जाता है।
दरअसल, विकास की सैकड़ों योजनाएं सरकार के पास है, हर साल बजट में इन योजनाओं के लिए रकम भी एलोकेट होती है पर ये भी सच है कि ये पैसा उन तक नहीं पहुंचता जिनके लिए ये योजनाएं बनती हैं, या फिर पहंुचता भी है तो नाममात्र को। यानी इन्हें इंप्लीमेंट करने वाला सिस्टम भ्रश्ट है। जबकि देश  की 72 फीसदी आबादी आज भी लगभग 6 लाख गांवों में रहती है। लेकिन फिर भी बुनियादी सुविधाओं तक उनकी पहंुच शहरों में रहने वाली आबादी जैसी नहीं है। लेकिन फिर भी विकास की भूख हो, जमाने के साथ कदम मिला कर चलने की ललक हो, साथ ही अपनी जड़ अपनी मिट्टी से भी उतना ही प्यार हो, तो सब संभव है। अब सिरागुप्पी गांव की ही बात करें तो, ये उसी कर्नाटक का हिस्सा है जिसे फिलहाल देश के भ्रष्टतम राज्यों में से एक समझा जाता है। लेकिन इसे भ्रष्ट कहने वाली पार्टी, जिसकी केन्द्र में सरकार है उसी ने इस गांव को सम्मानित भी किया है। यही नहीं कर्नाटक को पंचायती व्यवस्था को बेहतर ढंग से लागू करने वाला दूसरा राज्य होने का सम्मान भी दिया गया, जबकि पिछले साल कर्नाटक पहले स्थान पर था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्ट तंत्र होने के बावजूद भी विकास के प्रति लोगों की चाहत को यहां नजरअंदाज करना इतना आसान नहीं। तभी तो स्वच्छता, पीने के पानी की सप्लाई, प्राइमरी एजुकेशन, रोड, महिलाओं और समाज के कमजोर तबके में साक्षरता का अनुपात जैसे मानकों पर यह गांव देश  भर में खरा उतर पाया और माॅडल गांव होने का रूतबा हासिल कर पाया। और यहीं से इस गांव की सक्सेस स्टोरी भी देश  के बाकी गांवों के लिए भी एक उदाहरण बन जाती है। क्योंकि विकास के लिए गांव की पंचायत ही नहीं बल्कि पूरे गांव ने एक होकर काम किया, पंचायत में कोई किसी दल का नहीं था और न गांव में कोई किसी समूह का। बस सबकी लाईन एक ही रही-सिरागुप्पी के तरक्की की लाईन। इस गांव की पंचायत और लोगों ने साबित किया कि सब अगर मिलकर एक लक्ष्य के लिए काम करें तो बदलाव जरूर ला सकते हैं। पिछले पांच साल में इस गांव ने 8 करोड़ अपने विकास पर खर्च किए।
सच तो ये है कि माॅडल गांव जैसा कोई अवार्ड होना ही नहीं चाहिए था, विकास के जिन मानकों पर ये अवार्ड दिया जाता है, हर गांव का ये बुनियादी हक है, पर ऐसा है नहीं। आज भी देष के लाखों गांव बिजली, सड़क, स्कुल, अस्पताल, और पीने के पानी की सप्लाई जैसे बुनियादी सुविधाओं से महरूम है। ऐसे में किसी गांव में घर-घर में नल होना, प््रााॅपर अंडरग्राउंड ड्रेनेज सिस्टम होना,घर-घर में टाॅयलेट होना, कचरे का सिस्टेमेटिक ढंग से निपटान होना और अच्छी सड़के होना, निष्चिततौर पर देष के दूसरे गांवों के लिए सपने सरीखा ही है। लेकिन ये सब तभी संभव हो पाया जब पंचायत ने सरकार की सारी योजनाओं को पूरी पारदर्षिता के साथ लागू किया। और लोगों ने भी योजनाओं का किसी भी रूप में दुरूपयोग नहीं किया। सरकारी फंड के साथ-साथ इस गांव ने अपने एमपी और एमएलए फंड का भी बखूबी इस्तेमाल किया। फिर भी पैसा कम पड़ा तो अपने स्रोत से संसाधन जमा कर विकास के अपने लक्ष्यों को हासिल किया। यही नहीं केन्द्र सरकार की मनरेगा जैसी योजना को इस गांव ने 100 प््रातिषत क्षमता के साथ लागू किया है। गांव के प्राईमरी हेल्थ सेंटर में आपको एम्बूलेंस भी मिल जाएगा। 2290 घरों वाले इस गांव के  1335 घर में  नल हैं। गांव की साक्षरता दर 96 फीसदी है। दस हजार की आबादी वाले इस गांव में 70 सेल्फ हेल्प ग्रुप हैं। पंचायत में प्री युनिवर्सिटी काॅलेज, तीन हाई स्कूल, छः प््रााईमरी स्कूल और नौ आंगनबाड़ी सेंटर हैं। यहां बैंकों  की षाखाएं भी हैं  और पंचायत पूरी तरह से कंप्यूटराईज्ड है। साथ ही पानी पर चार्ज से पंचायत ने 7 लाख रूपए अर्जित किए।
षिरागुप्पी गांव ने अपनी सूरत, अपने लिए बनायी गई योजनाओं और उनके लिए आवंटित रकम का इस्तेमाल करके बदली है, देष के बाकी गांवों को यही याद रखने की जरूरत है।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

तेरी याद में एक पेड़



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चाह हो तो राह मिल ही जाती है ये बात बंगलूरू की जैनेट एग्नेश्वरण पर पूरी तरह से लागू होती है। पेशे से लैंडस्केप कलाकार जैनेट स्वभाव से ही प्रकृति प्रेमीरही हैं। बंगलूरू के अपेक्षाकृत ज्यादा हरे.भरे इलाके कोरमंगला में रहनेवाली जैनेट इस गार्डन सिटी को तेजी से ग्रे सिटी में बदलते देख अपनी ओर से कुछ पहल करने की सोच रही थीं। शहरीकरण और विकास के नाम पर बुनियादी ढ़ांचा खड़ा करने के लिए बेहिसाब पेड़ों की कटाई इन दिनों यहां आम है। अपने आस.पास की हरियाली से प्यार करने वाले हर शख्स को यह बात खलती भी है पर पहल कुछ ही लोग कर पाते हैंए जैनेट भी ऐसे ही कुछ लोगों में से हैं जिन्होंने पेड़ों के कटने पर सवाल करने के बजाए पेड़ लगाने को तव्वजों दिया। नतीजा 2005 से अब तक वो बंगलूरू और इसके आस.पास 23 हजार 300 से ज्यादा पेड़ लगा चुकी हैं। दरअसल 2003 में अपने पति की मौत के बाद उनकी याद में उन्होंने पेड़ लगाने की शुरूआत की। फिर नवंबर 2005 में राजानेट एग्नेश्वरण  चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया और ट्री फॉर फ्री नाम से एक संगठन की नींव रखी।  आज इस संगठन के साथ बंगलूरू की ग्रीन ग्रुप्स की कंपनियां जुड़ चुकी हैं और आईटी क्षेत्र में काम करने वाले कई युवा भी वालेन्टियर बन कर पेड़ लगाने की इस मुहिम में निजी तौर पर शामिल हो रहे हैं। जाहिर है परिदृष्य कुछ तो बदल रहा है और भविष्य के प्रति भी कुछ उम्मीद जग रही है। शायद हरियाली बची रहेगी।
जैनेट के लिए शुरूआत इतनी आसान भी नहीं रही। लोगों के पास जाना उन्हें अपने घर के सामने मुफ्त में पेड़ लगाने के लिए जगह देने के लिए राजी करना और फिर ये कहना कि पेड़ लगा देने के बाद क्या वो उसकी देखभाल करेंगे, सब मुश्किल था लेकिन कुछ लोग तैयार हुए और पहले साल वो 250 पेड़ लगाने में कामयाब हुईं। लेकिन अब सब उन्हें और उनके काम को जान गए हैंए खुद उन्हें फोन करके पेड़ लगाने के लिए बुलाते हैं। यहां तक कि किसान भी। जैनेट से जिस दिन बात हुई वो बंगलूरू की बाहरी सीमा पर होस्कोटे में पेड़ लगा कर लौटी थीं। और खुश  होकर बताया अब हम फलों के पेड़ भी लगा रहे हैं। किसानों के खेत में जाकर मुफ्त में कलमी आम के पौधें लगा रहे हैं इसलिए अब उनसे भी हमें बुलावा आ रहा है। बंगलूरू के हाउसिंग कॉम्पलेक्स में रहने वाले भी खुद उन्हें फोन कर पेड़ लगाने का आमंत्रण देने लगे हैं। हाल ही में इन्होंने ऐसे कई आवासीय परिसरों में पेड़ लगाएं जहां पहले एक भी पेड़ नहीं थें। लेकिन उन्हें पेड़ लगाने का बुलावा ज्यादातर बनरगटा और कनकपूरा से आता है जो अभी भी ज्यादा हरे.भरे हैं। जैनेट चाहती हैं कि उन इलाकों के लोग उन्हें बुलाएं जहां अब सचमुच हरियाली कम हो गई है। गौरतलब है कि जैनेट पौध नहीं बांटती हैं अगर आपके पास पेड़ के लिए जगह है तो वहां पेड़ लगाती हैं। उसके बाद देखभाल की जिम्मेदारी पेड़ लगाने के लिए बुलावा देने वाले पर होती है।  
ट्री फॉर फ्री  के अब लोकप्रिय होने का कारण पुछने पर जैनेट कहती हैं हमारा मकसद लोगों को भावानात्मक तौर पेड़ों से जोड़ कर उनकी तादाद में इजाफा करना है। तभी लगाए जाने के बाद इन पेड़ों को संरक्षण मिलेगा जो उनके बचे रहने की गारंटी होगी। पेड़ों से प्यार बढ़ाने के लिए वो किसी की याद में पेड़ लगाने की सलाह देती हैंए तोहफे में पेड़ देने और लेने को प्रोत्साहित करती हैं। वो कहती हैं हम पेड़ लगाने के पैसे नहीं लेते, लोगों को अपने साथ लेकर पेड़ लगाते हैं शायद यही वजह है कि लोग अब ज्यादा संख्या में जुड़ रहे हैं। कुछ बदलाव लोगों में पर्यावरण के प्रति आयी जागरूकता के कारण भी है। इस संदर्भ में जैनेट खासतौर पर आईटी कंपनियों के युवाओं की तारीफ करती हैं जो काम के अलावा अपने आस.पास को लेकर खासे सजग हैं और काम के बाद फुरसत पाते ही कुछ सकारात्मक करने की ख्वाहिश  रखते हैं। जैनेट के साथ साफ्टवेयर कंपनियों में काम करने वाले ऐसे 150 सदस्य हैं जो पेड़ लगाने में अपना सहयोग देते हैं। इसके अलावा याहू, जेपी मोर्गन, हार्ले डेविडसन और अब सेल जैसी कंपनियां भी पेड़ लगाने के इनके इस अभियान में सहयोग कर रही हैं। लेकिन सरकार से इन्हें किसी किस्म का सहयोग नहीं मिला है। जैनेट कहती हैं पिछले दो साल हमें सरकारी नर्सरी से बांस के पौध भी नहीं मिल रहे। यानी यह पूरा अभियान लोगों की अपनी प्रतिबद्धता और ग्रीन ग्रुप्स की कंपनियों के कॉरपोरेट सहयोग से चल रहा है। जैनेट की हरियाली की यह मुहिम धीरे.धीरे अपने पांव पसार रही है बंगलूरू के अलावा आस.पास के जिलों और तमिलनाडू में भी उन्होंने पेड़ लगाएं हैं चाहे तो आप भी उनकी इस मुहिम में http://www.treesforfree.org के मार्फत शामिल हो सकते हैं।

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

बूंद-बूंद सहेजने की टेक्नीक


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सूरज तप रहा है, धरती जल रही है और सारी दुनिया में वाटर क्राइसिस का शोर हो, ऐसे में कोई ये कहे कि पानी के लिए रोते क्यों हो, तुम्हारे पास पानी की कोई कमी नहीं है, तो किसी को यकीन नहीं होगा. बंगलुरू के अयप्पा महादेवप्पा मसागी यही कहते हैं. पानी की बूंद-बूंद को हर कदम पर सहेजने और बर्बादी से बचाने वाले अयप्पा को इसलिए वाटर गांधी कहा जाता है. जबकि देश के ज्यादातर हिस्सों में भंयकर गर्मी वाले दिनों की छोड़ें अब तो सर्दियों में भी पानी के लिए मुश्किल होती है. 
  
महानगरों में तो पूरे साल ही पर्याप्त वाटर-सप्लाई का टोटा रहता है. बंगलुरू भी इससे अछूता नहीं है पर अयप्पा जैसे लोगों ने एक सार्थक और जरूरी कदम इस दिशा में बढ़ाया है, जिसके नतीजे काफी उत्साहजनक और सभी के अमल में लाने योग्य हैं. दरअसल, बढ़ती आबादी और घटते जल-स्त्रोत के कारण पूरी आबादी को पानी की पर्याप्त आपूर्ति बहुत विकट समस्या बनती जा रही है. गौर करने वाली बात यह भी है कि पानी की कमी का रोना रोने के बावजूद वाटर डिस्ट्रीब्यूशन के दौरान पानी की बेशुमार बर्बादी की जाती है. बहरहाल, हम सब ये फैक्ट अच्छी तरह से जानते हैं, पर इस दिशा में कोई पहल नहीं कर पाते. बंगलुरू के अयप्पा महादेवप्पा मसागी ने ऐसा नहीं किया. नतीजा पानी सहेजने की इनकी छोटी-छोटी कोशिशों ने बहुत बड़ा फर्क पैदा किया अब इन्हें दुनिया वाटर गांधी के नाम से जानती है. पानी बचाने के लिए इन्होंने खुद ही बहुत इफेक्टिव और सस्ती तकनीक ईजाद की है, जबकि न तो ये टेक्निकली ट्रेंड हैं और ना ही इनके पास कोई बड़ी डिग्री है. 
  
वाटर क्राइसिस शब्द इस 54 वर्षीय शख्स के सामने कोई मायने नहीं रखता. पानी बचाने के लिए ये अब तक सौ से भी ज्यादा तकनीक का सफल प्रयोग कर चुके हैं. कर्नाटक के गदग जिले के गांव से ताल्लुक रखने वाले मसागी को बचपन की वो बात जरूर याद है, जब उन्हें सुबह-सवेरे 3 बजे ही 2 किलोमीटर चलकर पड़ोस के गांव से पानी लाना पड़ता था. हालांकि शुरुआत में संसाधनों की कमी के कारण वो पानी बचाने की दिशा में शौक के बावजूद कुछ नहीं कर पाए पर बाद में हालात बेहतर होने पर इन्होंने जिन टेक्नीक्स का ईजाद किया, उसे हाउसिंग सेक्टर के साथ-साथ इंडस्ट्रीज भी अपना रही हैं और पानी के खर्च के साथ-साथ पानी को सहेजने और बचाने पर भी उतना ही ध्यान दे रही हैं. मसलन, मसागी ने रिचार्ज सॉफ्ट टेक्नीक ईजाद की जो बेहद कारगर साबित हो रही है, जिसके तहत बोरवेल के पास ही सबसॉईल रिचार्जिग सिस्टम बनाया जाता है. 
  
यह प्रणाली रेनवाटर हारवेस्ंिटग सिस्टम और फिल्टर्ड ग्रे-वाटर से भी कनेक्टेड होती है. इनका मोटो एकदम सरल है और वो ये कि पानी की एक बूंद भी बेकार ना होने पाए, चाहे वो बारिश का पानी हो या फिर सोर्स से घरों के नलों तक पहुंचने वाला पानी. यहां तक कि बाथरूम और किचन में इस्तेमाल हो चुके ग्रे-वाटर का भी इस्तेमाल ये सुनिश्चित करा देते हैं. इनकी सक्सेस स्टोरी ये है कि अब तक 200 अपार्टमेंट, हजार से ज्यादा निजी मकान और 41 इंडस्ट्री ने इनकी तकनीक की मदद से पानी की किल्लत खत्म की है. जबकि 17 और प्रोजेक्ट पर काम जारी है. अगर उनकी बात मानें तो बंगलुरू में ही निर्माणाधीन मेट्रो प्रोजेक्ट के ट्रैक के प्रति किलोमीटर पर ये 3 करोड़ लीटर पानी सालाना बचा सकते हैं. इसके लिए केवल एक बार बीस लाख खर्च करना पड़ेगा. 1 स्क्वॉयर मीटर छत वाले घर में केवल एक बार दस हजार रुपए लगाने के बाद सालाना 1.2 लाख लीटर पानी बचाया जा सकता है. इनके काम को देखते हुए 2009 में इन्हें रूरल डेवलपमेंट में साइंस और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के लिए नेशनल अवॉर्ड दिया गया. साथ ही दक्षिण अफ्रीका जैसे देश ने भी इन्हें अपने यहां जल-सरंक्षण तकनीक सिखाने के लिए बुलाया है. जाहिर है दुनिया को आज ऐसे कई वाटर गांधी की जरूरत है, ताकि पानी के लिए तीसरे विश्व-युद्ध की नौबत ना आने पाएं.

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

सुरों से सवंरता बचपन

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हममें से बहुत से लोग सफल होते हैं शोहरत और दौलत सब कमा लेते हैं पर जिस मिट्टी, जिस गांव, जिस देश , से हम आते हैं उसे उसका बकाया वापस लौटाने लिए बहुत कम ही लोग वापस मुड़ते हैं। अमेरिका के बे-एरिया में रहने वाले कर्नाटक के वादिराजा भट्ट और उनके दो दोस्त एच सी श्रीनिवास और अशोक कुमार ऐसे ही लोगों में से हैं। कुछ साल पहले अपनी मिट्टी का कर्ज चुकाने की जो छोटी सी मुहिम उन्होंने चलायी, अब उसका असर दिखने लगा है। और कर्नाटक और तमिलनाड् के दूर-दराज के गांवों के उन स्कूलों की सूरत बदलने लगी हैं जहां बच्चों को एक ही कमरे के टूटे-फृटे स्कूलों में पढ़ना होता था वो भी बगैर पानी, बिजली और टाॅयलेट जैसी बुनियादी सुविधाओं के। अब यही स्कूल पक्की इमारत में चल रहे हैं वो भी सभी बुनियादी सुविधाओं के साथ। इनकी इस मुहिम का नाम है ‘वन स्कूल एट ए टाईम’ या ‘ओसाट’।


दरअसल, कुछ करने की ख्वाहिश हो तो रास्ते निकल ही आते हैं। ऐसी हर सक्सेस स्टोरी के बारे में जानने-पढ़ने के बाद यही समझ आता है। इन तीन दोस्तों के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, कुछ साल पहले जब ये कर्नाटक आएं तो भट्ट राज्य के दक्षिण कन्नडा जिले में स्थित अपने गांव बाजेगोली भी गए। लेकिन वहां के स्कूल की हालात देखकर उन्हें खासी परेशानी हुई। गांव के सारे बच्चों के लिए वहां एक ही स्कूल था, जो एक कमरे में चलता था अब वो कमरा भी एकदम खस्ताहालत में था। पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं तो बहुत दूर की बात थी। वापस अमेरिका आने पर उन्होंने संगीत के जरिए इस स्कूल के लिए फंड जमा करने की सोचा। और रागा नाम से एक संगीत मंडली बनायी। इसी तरह काटे नाम से थियेटर ग्रुप भी बनाया। संगीत और कल्चरल प्रोग्राम के जरिए उनकी फंड जमा करने की स्कीम रंग लायी जब अमेरिका में आयोजित रागा म्यूजिक कंसर्ट सुपरहिट रहा। बाजेगोली के खस्ताहाल स्कूल की हालात सुधरी तो बच्चों और उनके माता-पिता के चेहरे की मुस्कुराहट ने उन्हें अब इस काम को मिशन बनाने की प्रेरणा दी। अब तक ये ग्रूप पांच स्कूल की सूरत पूरी तरह से बदल चुका है। और दो स्कूल में इनका काम चल रहा है।

उनके काम करने का तरीका बहुत आसान है, तीनों पहले उस स्कूल का चयन करते हैं जिसका रिनोवेशन किया जाना है, फिर ऑथोरिटी बात करते हैं, स्थानीय लोगों और सुपरवाईजरों को इस काम से जोड़ते हैं और फिर स्थानीय रोटरी क्लब को इन्वाल्व कर उनकी मदद से काम पूरा करते हैं। इस प्रोग्राम की खासियत ये है कि कोई भी स्कूल का नाम रिनोवेशन के लिए सुझा सकता है। शर्त केवल यही है कि उस स्कूल से गरीब बच्चों को फायदा होना चाहिए और उस स्कूल के टीचर्स में बच्चों को बेहतर पढ़ाने और बेहतर शैक्षिणक माहौल देने की ललक होनी चाहिए। बहरहाल आने वाले समय में इनका लक्ष्य साल में पच्चीस स्कूलों के रिनोवेशन के सभी हिस्से में काम करने का है।

रविवार, 26 सितंबर 2010

येदुरप्पा का कैबिनेट विस्तार

तूफान से पहले की खामोशी!
कर्नाटक में येदुरप्पा ने आखिरकार महीनों से लंबित अपने कैबिनेट विस्तार को अंजाम दे ही दिया और वो भी बिल्कुल अपनी पसंद का ख्याल रखते हुए। ये और बात है कि कैबिनेट विस्तार से पहले पूरी राजनीतिक ड्रामेबाजी हुई। लेकिन अंत में सभी को येदुरप्पा के फैसले के साथ समझौता करना ही पड़ा। चाहे वो रेड्डी बंधु हों जिन्होंने पिछले साल शोभा करंदलाजे को मंत्रिमंडल से निकलवाकर और जगदीश शेट्टर को मंत्री बनवा कर ही दम लिया था और येदुरप्पा की आंखों में सार्वजनिक मंच पर आंसु तक ला दिया था। पर वहीं शोभा अब फिर मंत्रीमंडल में आ चुकी हैं लेकिन सब खामोश हैं। अब ना तो आत्महत्या की धमकी देने वाले गुलीहट्टी आत्महत्या कर रहे हैं और ना ही इस्तीफे की धमकी देने वालों ने अपना इस्तीफा पेश किया है।


दरअसल, इस कैबिनेट विस्तार को येदुरप्पा की कूटनीतिक सफलता कहा जा सकता है। क्योंकि उन्होंने सारे दवाबों को किनारे कर वही किया जो करना चाहते थे और सबसे बड़ी बात ये कि उनके इन फैसलों पर पार्टी हाईकमान ने अपनी मुहर लगा कर फिलवक्त सारे असंतुष्टों का मुंह बंद कर दिया है।

अपनी चीन यात्रा से वापस आने के तुरंत बाद ही येदुरप्पा ने कैबिनेट का विस्तार करने की घोषणा की और इसके साथ ही राज्य में राजनीतिक ड्रामेबाजी का दौर शुरू हो गया। पहले तो मुख्यमंत्री और कर्नाटक भाजपा राज्य इकाई के अध्यक्ष के.एसईश्वरप्पा की ही अलग सोच सामने आ गई। जहां ईश्वरप्पा कैबिनेट से चार मंत्रियों को केवल हटाए जाने की बात कर रहे थे वहीं येदुरप्पा किसी को हटाए जाने से इन्कार कर रहे थे और साथ ही खाली मंत्रीपदों को वापस भरने की भी बात कर रहे थे। गौरतलब है कि हाल ही में तीन मंत्रियों को विभिन्न आरोपों के कारण मंत्रीपद से इस्तीफा देना पड़ा था। स्वास्थ्य शिक्षा मंत्री रामचंद्र गौड़ा को बहाली घोटाले के कारण, धार्मिक मामलों के मंत्री एस.एन कृष्णैया शेट्टी को भूमि घोटाले के कारण और खाद्य और आपूर्ति मंत्री एच हलप्पा को बलात्कार के आरोप के कारण।

बहरहाल, इस घोषणा के साथ ही मंत्री पद की चाह रखने वाले विधायको और उनके समर्थकों और कैबिनेट से निकाले जाने वाले मंत्रियों ने येदुरप्पा पर तरह तरह से दबाव बनाने की कोशिश की। खेल और युवा मामलों के मंत्री गुलीहट्टी शेखर ने आत्महत्या कर लेने की धमकी दी तो एक और मंत्री ने इस्तीफा दे देने की धमकी दी। इसके अलावा ढ़ेरों विधायक पार्टी से त्यागपत्र देने की धमकी दे रहे थे। गौरतलब है कि शेखर निर्दलीय विधायक हैं जिन्हंे राज्य में भाजपा सरकार बनाने में सहयोग करने के बदले मंत्रीपद मिला था। इसी तरह पब्लिक लाईब्रेरी मंत्री के शिवनगौड़ा नाईक भी जेडीएस से जीतने के बाद भाजपा में शामिल हुए थे और मंत्री बने थे। ये भी गौर करने वाले बात है कि 2008 में राज्य में बनी भाजपा की पहली सरकार में पांच निर्दलीय विधायकों को पार्टी के साथ लाने में रेड्डी बंधुओं की अहम भूमिका रही थी। इसलिए वो निर्दलीय मंत्रियों को हटाए जाने के विरोध में थे।

इस ड्रामेबाजी के तहत बड़ा झटका देने की कोशिश कैबिनेट में शामिल होने की चाह रखने वाले दो विधायक सी टी रवि और एस के बेल्लुबी ने की जब उन्हें पता चला कि वो मंत्री नहीं बनाए जाएंगे तो वो सात विधायकों के साथ बंगलूरू के एक होटल में विरोध की योजना बनाने लगे।



मामला जब बंगलूरू में नहीं सुलझा तो दिल्ली का रूख करना पड़ा। जहां लाल कृष्ण आडवाणी, भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी वरिष्ठ नेता वैंक्यया नायडू और शांताकुमार ने येदुरप्पा के मंत्रीमंडल विस्तार के फैसलों पर सहमति की मुहर लगाई।

अब जिन छः नए मंत्रियों ने शपथ लिया उनके नाम हैं, शोभा करंदलाजे, वी सोमन्ना, सी सी पाटिल, ए नारायणस्वामी, एस ए रामदास, और सी एच विजयशंकर। इनमें शोभा और सोमन्ना येदुरप्पा के खास लोगों में से हैं, और बाकी चार भी भाजपा के ही विधायक हैं।शोभा को उर्जा मंत्रालय मिला है, वी सोमन्ना के जिम्मे खाद्य और नागरिक आपूर्ति है, सी एच विजय शंकर को वन और पर्यावरण दिया गया है ए नारायण स्वामी समाज कल्याण और सी सी पाटिल महिला और बाल विकास तथा एस ए रामदास को स्वास्थ्य शिक्षा।

तीन जिन्हें हटाया गया वे हैं, उच्च शिक्षा मंत्री अरविंद लिंबावली, खेल और युवा मामलों के मंत्री गुलीहट्टी डी शेखर और लाईब्रेरी मंत्री शिवन्नगौडा नाईक। यानी कुल पांच निर्दलीय विधायकों में से केवल एक को ही हटाया गया है, चार अभी भी मंत्री हैं।

इसके अलावा एक बड़ा बदलाव ये भी हुआ है कि वी एस आचार्य को गृहमंत्रालय की जगह उच्च शिक्षा और योजना और सांख्यिकी दे दिया गया है और तर्क ये दिया गया है कि आचार्य काबिल मंत्री हैं इसलिए उन्हें ज्यादा अहम् मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। जबकि परिवहन मंत्री आर. अशोक को पविहन के साथ गृहमंत्रालय भी दे दिया गया है।

बहरहाल, हाईकमान के दखल से अभी सभी को शांत कर लिया गया है। अवैध खनन मामले में फंसे रेड्डी बंधु भी शांत रहकर अपनी ओर से ध्यान हटाना चाह रहे हैं जबकि केन्द्रीय नेतृत्व कर्नाटक भाजपा के अंर्तकलह को बार-बार सुर्खियां बनते नहीं देखना चाहता इसलिए फिलहाल उपरी तौर पर सब कुछ शांत दिख रहा है पर ये तूफान से पहले की भी शान्ति हो सकती है।

बुधवार, 8 सितंबर 2010

लोहे की राजनीति

कर्नाटक की राजधानी बंगलूरू से 350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बेल्लारी यंू तो देश के अन्य कस्बाई शहरों जैसा ही है, धूल-धक्कड़, टूटी सड़के और उनपर बेतरतीब वाहन, लेकिन थोड़ा नजर दौड़ाने पर आलीशान बंगले, गाड़ियां और हेलीकाप्टर भी दिखेंगे, फिर दूर-दूर तक खुदाई की हुई उजाड़ जमीन और चारो ओर लाल धूल का गुबार, जो लोहे के खनन और ढ़ुलाई के कारण यहां के आसमान में फैला रहता है। क्योंकि इसी बेल्लारी और इससे सटे चित्रदुर्गा और तुमकूर में देश के बेहतरीन लोहे का भंडार है।


दरअसल, बचपन से हम जो भारत के बारे में पढ़ते आ रहे हैं वही बात बेल्लारी पर भी लागू होती है- बेल्लारी तो अमीर है लेकिन बेल्लारी के लोग गरीब। कभी अंग्रेजों के बनवाए कुख्यात जेल और अपनी भीषण गर्मी के लिए प्रसिद्ध बेल्लारी अपनी जमीन में बेशकीमती खजाना होने के बावजूद एक गुमनाम सा ही शहर था। लेकिन 1999 में सोनिया गांधी ने यहां से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला करके और मुकाबले में भाजपा ने सुषमा स्वराज को खड़ा करके उनींदे और पिछड़े़ बेल्लारी को सुर्खियों में ला दिया। यहां के रेड्डी बंधुओं के सिर पर सुषमा स्वराज ने हाथ क्या रखा बेल्लारी का लोहा उनके लिए सोना बनने लगा। वर्तमान में येदुरप्पा सरकार में मंत्री, करूणाकर, सोमशेखर और जर्नादन रेड्डी और इनके साथ श्रीरामलू ने बेल्लारी में चिट-फंड के अपने पिटे कारोबार को छोड़कर 2002 में खनन उद्योग में हाथ डाला। 2008 में चीन में होने वाले ओलंपिक खेलों के कारण लोहे की मांग और दाम दोनों आसमान छूने लगे जिसका भरपूर फायदा इनलोगों ने अपनी खनन कंपनी ओबूलापूरम माईनिंग जिसे बेल्लारी से सटे आन्ध्रप्रदेश के अनंतपूर में खनन लीज हासिल था, के मार्फत बेल्लारी की सीमा में अतिक्रमण कर लोहे का अवैध खनन और निर्यात करके उठाया।

आज बेल्लारी की सड़कों पर महंगी विदेशी कारें, निजी हेलीकॉप्टर, आलीशान बंगले और गेस्ट हाउस आम बात है, लेकिन बेल्लारी के लोगों की जिंदगी और बदतर हो गई। अब इन्हें साफ पानी, साफ हवा भी मयस्सर नहीं है, जंगल और जमीन तेजी से घटते जा रहे हैं, प्राकृतकि संपदा चाहे वो पेड़-पौधे हों या संरक्षित विलुप्तप्राय जीव सब खत्म होते जा रहे हैं। बेल्लारी का पारिस्थितकी संतुलन बिगड़ गया है। पिछले कई सालों से वहां सूखे के हालात हैं। कर्नाटक मानव विकास रिपोर्ट 2005 की सूची में बेल्लारी राज्य के 27 जिलों में 18वें स्थान पर है। साक्षरता, स्वास्थ्य, पेय-जल की उपलब्धता के मामले में यह निचले पायदान पर है। जबकि यहां के लोगों की औसत आय राज्य के लोगों के औसत आय से उपर है यानी जिनके पास है बहुत ज्यादा है बाकी के पास कुछ नहीं है। खनन ने बाकी आबादी के रोजगार खेती से भी उन्हें बेदखल कर बेरोजगार बना दिया है वो अलग से। लेकिन और कुछ हो या न हो अब 900 एकड़ जमीन पर 140 करोड़ की लागत से नया हवाईअड्डा जरूर बनने जा रहा है।



अवैध खनन से राज्य के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अवैध खनन ने कर्नाटक के 2,800 एकड़ वन्य-भूमि का विनाश किया है। जो देश भर में खनन से वन्य-भूमि को हुए नुकसान का दस प्रतिशत है। और आकलन के मुताबिक ओबुलापूरम माईनिंग कंपनी ने 2003 से अब तक कर्नाटक से 30 मिलीयन टन लोहे का अवैध खनन और फिर निर्यात कर राज्य को भारी राजस्व नुकसान दिया है। दूसरे शब्दों में बेल्लारी का अवैध लौह-खनन मसला दरअसल देश का सबसे बड़ा घोटाला है जो कम से कम 30 से 60 हजार करोड़ के बीच का है।

बहरहाल, पिछले दस साल से कर्नाटक की राजनीति में लोहे का अवैध खनन और इसका पैसा अहम किरदार बन चुके हैं। और रेड्डी बंधु बेल्लारी ही नहीं बंगलूरू में भीं अपनी बादशाहत कायम कर किंगमेकर बन बैठे। आन्ध्रप्रदेशा  में कांग्रेस के स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी के करीबी और उनके बेटे जगनमोहन के व्यावसायिक साझीदार रेड्डी बंधुओं ने कर्नाटक में येदुरप्पा सरकार की नींव अपने पैसों के बल पर समर्थन खरीद कर ही डाली थी। और हमेशा के लिए येदुरप्पा सरकार की गले की फांस बन गए, जिन्हें खुष करके रखना सरकार की मजबूरी है। रेड्डी बंधुओं की कहानी पैसों के ताकत की कहानी है जिनसे सभी राजनीतिक-दल प्यार करने के लिए नफरत करते हैं या नफरत करने के लिए प्यार। येदुरप्पा ब्लैकमेलिंग के कारण उनसे पीछा छुड़ाना चाहते हैं लेकिन छुड़ा नहीं पाते। कांग्रेस को राजशेखर रेड्डी के समय में रेड्डियों से कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन अब जगनमोहन आन्ध्र में कांग्रेस की गले की हड्डी है और जगनमोहन की औकात रेड्डी बंधुओं के कारण ही है ऐसे में केन्द्र को अब रेड्डी बंधुओं पर शिकंजा कसने की जरूरत महसूस हो रही है।

दरअसल, यह मुद्दा अब इतना बड़ा हो चुका है कि केन्द्र सरकार भी कई राज्यों और खासकर कर्नाटक में अवैध खनन रोकने के लिए नया कानून लाने जा रही है

इधर कर्नाटक सरकार ने राज्य में लोहे के निर्यात पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। साथ ही लोहे व अन्य खनिजो के अवैध खनन और निर्यात की जांच के लिए एक 14 सदस्यीय विशेष पैनल का गठन किया है। यह समिति इसका आकलन करेगी कि खननकर्ताओं ने कितनी मात्रा में लौह-अयस्क का खनन किया, कितना निर्यात किया और कितना घरेलू इस्पात कंपनियों को दिया। साथ ही खनन फर्मो के द्वारा राज्य सरकार को कितनी रायल्टी का भुगतान किया गया। इसके अलावा समिति लोहे के अवैध परिवहन को रोकने के लिए बनाए गए 13 नए चेकपोस्ट पर भी नजर रखेगी। हालांकि खनन पर रोक लगाने से खान मालिक 300 करोड़ प्रति सप्ताह के नुकसान की बातें कर रहे हैं। लेकिन राज्य के सभी जिलों में ज्यादातर खान मालिकों के द्वारा इसका पालन हो रहा है। केवल बेल्लारी से सटे संदुर में अब भी इसका उल्लंघन हो रहा है।

बहरहाल, कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की पहल से भी कर्नाटक और खासकर बेल्लारी में जारी लोहे के खेल पर सभी का ध्यान गया है, अब चाहे जो हो, लेकिन बेल्लारी और राज्य के लोगों में इसके प्रति नाराजगी अब दिख रही है। कांग्रेस की इसी मुद्दे पर बेल्लारी चलो पदयात्रा को मिली सफलता इसका प्रमाण है।
( Public Agenda के लिए )

बुधवार, 11 अगस्त 2010

ग्रीन जाब यानी ग्रीन इकानमी

(Inext में प्रकाशित लेख)
हाल ही में इंटरनेशनल लेबर आॅरगनाईजेशन के साथ भारत सरकार के श्रम और रोजगार मंत्रालय ने ग्रीन जाॅब पर कान्फ्रेंस का आयोजन किया। यह अपनी तरह का पहला कान्फ्रेंस था और रोजगार को लेकर सरकार के नजरिये में भी बदलाव की ओर इशारा कर रहा था। सुनने में ये कुछ अजीब सा लगे पर हकीकत यही है आने वाला समय ग्रीन जाॅब्स का ही है। इसलिए देश के श्रम और रोजगार मंत्री ने लो कार्बन इकोनाॅमी के लिए पाॅलिसी के स्तर पर संरचात्मक बदलाव और इसमें निवेश की बात की। साथ ही एनवायरन्मेंट फ्रेंडली रोजगार संभावनाओं और मौजूदा व्यवसायों को भी ग्रीन इकाॅनमी में बदलने पर चर्चा की।

ग्रीन जाॅब्स आखिर है क्या? दरअसल, ये वो रोजगार हैं जो उत्पादन आैर उपभोग के साईकिल को पर्यावरण के अनुकूल बना सकते हैं। ग्रीन जाॅब ऐसे टिकाउ अर्थव्यवस्था और समाज का प्रतीक तीक है जो पर्यावरण की फिक्र और उसकी रक्षा खुद अपने और अपनी आगे आने वाली पीढ़ी के लिए करने को लेकर सचेत है। इसके तहत ग्रीन एनर्जी एफििशएंट इमारतें, पर्यावरण अनुकूल खेती, वाटर हारवेटिस्टंग, वेस्ट मैनेजमंट, एनवायरन्मेंट फ्रेंडली तरीके से बिजली और ईंधन का उत्पादन वगैरह-वगैरह शामिल है। दरअसल, हर काम या रोजगार के ग्रीन जाॅब होने की संभावनाएं हैं वो भी मुनाफे से बगैर समझौता और सस्टेनेबल विकास को कायम रखते हुए।

लेकिन ग्रीन जाॅब्स का मतलब केवल रिन्यूयेबल एनर्जी, जैव िविवधता संरक्षण , वेस्ट मैनेजमेंट, वाटर हारवेस्टिंग और कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना ही नहीं बल्कि रोजगार के पैटर्न में ही बदलाव है। ताकि  उत्पादन आैर उपभोग एनवायन्मेंट फ्रेंडली बन सके। जैसे-जैसे पर्यावरण और क्लाईमेट चेंज के प्रति सभी की जागरूकता बढ़ेगी ग्रीन जाॅब सेक्टर करोड़ों नई नौकरियां पैदा करेगा। लेकिन इन संभावनाओं को पैदा करने और उनका पूरी तरह से फायदा उठाने के लिए सही समय पर सही पाॅलिसी बनाना भी उतना ही जरूरी है साथ ही शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में समय रहते इस हिसाब से बदलाव भी।

पिछले दिनों आर्थिक मंदी के दौरान ये अनुभव किया गया कि ग्रीन जाॅब्स सभी के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोल सकता है। क्योंकि इसके तहत अधिकांशतः रोजगार का सृजन प्राकृतिक संसाधनों को मैनेज करके किया जा सकता है। इंटरनेशनल लेबर आॅरगनाईजेशन का ग्रीन जाॅब प्रोग्राम आज दुनिया के बहुत से देशों में शुरू हो चुका है। एशिया में भारत, बांग्लादेश,चीन, थाईलैंड और फिलीपींस में इस संबंध में पायलट प्रोग्राम चलाया जा रहा है। जिसका मकसद ग्रीन जाॅब की संभावनाओं और एनवायन्मेंट फ्रेन्डली रोजगार पैदा करने के बारे में लोगों में जागरूकता लाना है। साथ ही इससे जुड़ी नीतियों के बारे में चर्चा भी।



बहरहाल, भारत में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम जैसी योजनाओं में सरकार ने पर्यावरण और रोजगार के बीच तालमेल को तवज्जो दी है। आर्थिक विकास रोजगार के नए मौकों का सृजन और गरीबी हटाना आज ये हर सरकार की प्राथमकिता है। लेकिन साथ ही अपने अस्तित्व के लिए पानी, हवा और अन्य सभी नैचुरल रिसोर्सज का संरक्षण भी उतना ही जरूरी हो गया है। इसलिए , ग्रोथ,  प्रोडक्शन आैर कंजम्पशन को पर्यावरण के साथ जोड़ना ही होगा। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए मार्च 2009 में श्रम और रोजगार मंत्रालय ने आईएलओ के सहयोग से ग्रीन जाॅब और क्लाईमेट चेंज पर मल्टीस्टेकहोल्डर टास्कफोर्स बनाया गया। इस टास्कफोर्स में सरकारी विभागों के प्रतिनिधयों, रिसर्च इंस्टीट्यूट, एनजीओ, वकर्स और एम्प्लायर्स को शामिल किया गया है, ताकि एनवायरन्मेंट फ्रेंडली रोजगार और नीतियों के बारे में एक राय बन सके।

दरअसल, दो दशक पहले जैसी क्रांति आईटी से आयी थी ग्रीन जाॅब भी अब वही करने जा रहा है। रिन्यूयेबल एनर्जी से लेकर, पर्यावरण संरक्षण, वाटर और वेस्ट मैनेजमेंट और जलवायु से जुड़े अन्य सेक्टर में अपार रोजगार की संभावनाएं हैं। एक्सपर्ट की राय में आने वाले दिनों में भारत के 6 लाख गांवों में ही वाटर और वेस्ट मैनेजरों की जरूरत होगी यानी 1.2 करोड़ लोगों के लिए रोजगार पैदा होगा।

इंटरनेशनल लेबर आॅरगनाईजेशन की एक रिसर्च में भी इस बात का खुलासा किया गया है कि क्यों रिसेसन के दौरान दुनिया की बहुत सी सरकारें पर्यावरण को इतनी तव्वजों दे रही हैं और गंभीरता से ले रही हैं। दरअसल, इस रिसर्च के मुताबिक 2020 तक एनवायन्मेंटल प्रोडक्ट और सर्विस की मार्केट वैल्यू 2.740 लाख करोड़ तक हो जाने का अनुमान है। यानी ‘गो ग्रीन  इज फ्यूचर, क्योंकि आनेवाला समय ग्रीन एम्प्लायमेंट और ग्रीन इकाॅनमी के ही नाम होने वाला है।

शनिवार, 3 जुलाई 2010

बिजली बेचने वाला गांव

(Inext के िलए िलखा गया लेख)


भारत की एक तिहाई आबादी के लिए बिजली अभी भी एक सपना ही है। गांव की बात छोड़ें, बड़े शहर यहां तक कि मेट्रो सिटीज भी बिजली की भारी किल्लत झेल रहे हैं। ऐसे में कोई गांव अपनी जरूरत की बिजली न सिर्फ खुद बना रहा हो बल्कि सरप्लस बिजली राज्य सरकार को बेच भी भी रहा हो तो आप क्या कहेंगे? यकीन नहीं करेंगे, लेकिन ऐसा हो रहा है। कर्नाटक का काब्बीगेरे ग्राम पंचायत ऐसा ही एक गांव है, जो अब सारे देश के लिए एनवायरन्मेंट फ्रेडंली सस्टेनेबल डेवलपमेंट का एक उम्दा उदाहरण बन गया है। इस गांव ने रिन्यूयेबल एनर्जी स्रोतों के इस्तेमाल से अपनी तकदीर और तस्वीर बदल डाली है। और यह साबित कर रहा है कि सरकारी योजनाएं भी बहुत कारगर हो सकती हैं अगर स्थानीय जरूरतों के मुताबिक लोकल पार्टीसिपेशन से उसे लागू किया जाए तो।

गहरी हरियाली की चादर से ढंका कर्नाटक का काब्बीगेरे ग्राम पंचायत देश का पहला ऐसा गांव है जो स्टेट पावर ग्रिड यानी बंगलूरू इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी को अपनी बनायी हुई बिजली बेचता है और वो भी मामूली कीमत, 2.85 प्रति के.वाट की दर से। यही नहीं बिजली का उत्पादन भी गांव में ही पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से किया जाता है। दरअसल, ये कहानी शुरू हुई संयुक्त राष्ट्रसंघ-कर्नाटक सरकार के संयुक्त प्रयास से शुरू किए गए बायोमास पावर प्लांटस् प्रोजेक्ट से। यों तो शुरूआत हुई थी बिजली के मामले में इस गांव को इंडीपेंडेंट बनाने से लेकिन बिजली मुहैया कराने का यह प्रोजेक्ट अब गांव के चौरफा विकास और बदलाव की बुनियाद साबित हो चुका है। दरअसल, बायोमास पावर प्लांट लगाने की इस योजना से गांव के लोग बिजली के मामले में आत्मनिर्भर तो हो ही गए है आर्थिक तौर पर भी मजबूत हुए हैं। साथ ही सरप्लस बिजली बेच भी रहे हैं। बायोमास प्रोजेक्ट पेड़ों र्से इंधन हासिल करता है, बायोमास, कार्बन न्यूट्रल होता है यानी इससे कार्बन का उत्सर्जन नहीं होता है। इसके लिए यूकेलिप्टस और अन्य पेड़ों की जरूरत होती है, यानी आस पास हरियाली बढ़ाना होता है। जाहिर है बिजली में इंडीपेंडेंट होने की यह योजना एक साथ कई और मौके उपलब्ध कराती है।

काब्बीगेरे की सफलता की कहानी, यूएनडीपी के बायोमास एनर्जी फाॅर रूरल इंडिया प्रोग्राम का नतीजा है।जिसका इंप्लीमेंटेशन ग्लोबल एनवायरन्मेंट फेसिलिटी, भारत-कनाडा फेसिलिटी और कर्नाटक सरकार के ग्रामीण विकास और पंचायती राज के सहयोग से संभव हो पाया है। इस योजना के तहत 250, 250 और 500 के.वाट क्षमता के तीन छोटे पावर प्लांट लगाए गए जो स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बायोमास का इस्तेमाल कर बिजली बनाते है। इन प्लांटों के द्वारा 2007 से अब तक लगभग 400,000 कि.वाट बिजली पैदा की जा चुकी है।

एक छोटी सी लेकिन बुनियादी जरूरत बिलजी की उपलब्धता लोगों के जीवन को किस कदर बदल देती है इस गांव में देखा जा सकता है। यहां अब खाना बनाना आसान हो गया है। पढ़ने, लिखने के लिए लड़कियों और महिलाओं को दूसरे कामों के लिए ज्यादा समय मिलने लगा है, जलावन के लिए लकड़ियों के इंतजाम में लगने वाले समय की बचत हो रही है, पानी सुलभ हो गया है। बिजली की उपलब्धता के कारण अब गांव में 130 बोरवेल हैं, जाहिर है इससे सिंचाई आसान हो गई है और खेती की तस्वीर बदल गई है। गांव के लोगों की आमदनी में 20 प्रतिशत का इजाफा इसका सबूत है। साथ ही पावर प्लांट में स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। जिन्हें सरकार प्रशिक्षण देती है। यह योजना न सिर्फ पर्यावरण के लिए फायदेमंद साबित हुई है बल्कि इसी प्रोजेक्ट के तहत 51 गोबर-गैस प्लांट भी लगाए गए हैं। जिससे लगभग पौने दो सौ घरों में बगैर किसी अतिरिक्त लागत के स्वच्छ व प्रदूषण-मुक्त कुकिंग ईंधन भी उपलब्ध हो जा रहा है। बायोगैस प्लांट स्थानीय स्वयं-सहायता समूहों के नर्सरियों से आॅरगेनिक कचड़ा भी लेते हैं। इस तरह हािशए पर रहने वाले समुदायों की महिलाओं को भी आमदनी का जरिया मिल गया है।

दरअसल, यह योजना और इसकी सफलता अपने आप में एक बड़ी उम्मीद की किरण है। यदि कोिशश की जाए तो बिजली,पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते देश के बाकी गांव भी न सिर्फ आत्मनिर्भर हो सकते हैं बल्कि उनका भी पूरी तरह से कायाकल्प हो सकता है।

शुक्रवार, 7 मई 2010

एम एस सत्थ्यू से एक मुलाकात


मैसूर श्रीनिवास सत्थ्यू भारतीय फिल्म उद्योग का एक प्रतिष्टत नाम है। 1973 में बनीं उनकी फिल्म गर्म हवा, न सिर्फ विभाजन पर देश  की पहली फिल्म है, बल्कि विभाजन से पैदा मानवीय त्रासदी को संवेदनशील तरीके से सामने लाने वाली फिल्म भी है। इस फिल्म को भारत में नए किस्म के सिनेमा, कला या समानांतर सिनेमा की शुरूआत करने वाला भी कहा जाता है। जिसकी श्याम बेनेगल की अंकुर जैसी फिल्मों से आगे बढती है। 
मैसूर में 1930 में जन्में एम.एस सत्थ्यू ने अपने फिल्मी कैरियर की शरुआत 1956 में चेतन आनंद के साथ की थी। चेतन आनंद की हकीकत के लिए सत्थ्यू को बेस्ट कला निर्देशन का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। सिनेमा के लगभग सभी पक्षों पर मजबूत पकड़ रखने वाले सत्थ्यू ने कला निर्देशक, कैमरामैन, पटकथालेखन, निर्माता और निर्देशक सभी हैसियत से काम किया है। हिन्दी, उर्दु और कन्नड़ में  अब तक ये नौ फिल्में बना चुके हैं साथ ही 15 डाक्यूमेंट्री भी। इसके अलावा कई विज्ञापण फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों का भी इन्होंने निर्माण किया है। फिलहाल, सत्थ्यू बंगलूरू में ‘सिनेमा इत्यादि’ नाम से एक एडिटिंग स्टुडियो चलाते हैं।

सत्थ्यू हिन्दी और कन्नड़ दोनों भाषाओं में फिल्में बनाते रहे हैं, उनकी बाकी फिल्मों के बारे में नहीं भी बात करें तो भी सिर्फ गरम हवा ही उन्हें भारत के समानांतर सिनेमा आंदोलन का सबसे बड़ा नायक साबित करती है। वामपंथ विचारधारा से प्रभावित सत्थ्यू ने  इप्टा के साथ बहुत काम किया। गर्म हवा को भी इप्टा के वैचारिक ट्रेंड वाली फिल्म कहा जा सकता है। जिसमें अल्पसंख्यकों के डर और चिंता को बहुत सलीके से उकेरा गया है साथ ही उनके लौटते आत्मविशवास और भरोसे को भी। यह फिल्म काॅन फिल्म समारोह में में गोल्डन पाम श्रेणी में नामांकित हुई थी और आॅस्कर के लिए भेजी गयी थी। साथ ही इसे नरगिस दत्त पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। गर्म हवा के अलावा कान्नेष्वरा रामा, बारा हिन्दी में सूखा इनकी उल्लेखनीय फिल्में हैं। पद्श्री एम. एस सत्थ्यू की सभी कन्नड़ फिल्मों को कर्नाटक राज्य सम्मान हासिल हुआ है। बहरहाल, लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय के बाद कन्नड़ भाषा की फिल्म इज्जोडू के साथ सत्थ्यू ने फिर वापसी की है।  देवदासी प्रथा पर बनी यह फिल्म 30 अप्रैल को कर्नाटक में रिलीज हुई।
एम. एस सत्थ्यू से  बातचीत की के प्रमुख अंश:



हाल में रीलीज अपनी नई फिल्म इज्जोडू के बारे में बताएं?
-मेरी यह फिल्म देवदासी प्रथा के बारे में है। हांलाकि सरकार ने इस पर 1982 में ही रोक लगा दी है पर अब भी यह जारी है। फिल्म में मुख्य भूमिका राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेत्री मीरा जैसमीन ने िनभाया है साथ में अनिरूद्ध हैं। यह फिल्म और इसका सब्जेक्ट मेरे दिल के बहुत करीब है। मेरी फिल्म देवदासी प्रथा पर बहुत कड़ा स्टैंड लेती है। अभी तक देश के चार फिल्म समारोहों में इज्जोडू दिखायी जा चुकी है, सभी जगह जूरी,आलोचकों और सिनेमा-प्रेमियों ने इसे काफी सराहा है।
देवदासी प्रथा क्या अब भी कायम है? कर्नाटक में इसका क्या स्वरूप है?
-बिल्कुल अभी भी यह कुप्रथा कायम है। उत्तरी कर्नाटक के लगभग 10 जिलों के येल्लमा समाज में देवदासी बनाए जाने की परंपरा है। येल्लमा देवी को मानने वाले खुद को, या अपनी संतान को देवी की सेवा में अर्पित कर देते हैं। मेरी फिल्म में भी गांव वाले एक महामारी से बचने के लिए नायिका को बासवी बनाकर देवी को अर्पित कर देते हैं। बासवी भी देवदासी जैसी ही होती है जो बाद में देह-व्यापार करने पर विवश हो जाती है। कर्नाटक में 10वींशताब्दी से भी पहले से देवदासी प्रथा प्रचलित रही है। जिनमें सबसे प्रमुख येल्लमा देवी को मानने वाला समाज है। गरीबी और अिशक्षा के कारण आज भी ये लोग या तो खुद को या फिर अपनी संतान को देवी की सेवा में अर्पित कर देते हैं। मंदिरों में अपनी बाकी जिंदगी गुजारने को विवश इन लोगों में से महिलाएं बाद में सेक्स वर्कर बनने को बाध्य हो जाती हैं।
लगभग 12 साल के बाद आपने इज्जोडू के साथ वापसी की है, इतना लंबा अंतराल क्यों?
-पैसे नहीं थे। इस दौरान भी कई विषयों और कहानियों पर मेरा मन फिल्म बनाने को हुआ पर उनके लिए फाईंनेंसर नहीं मिल पाए। एफएफसी के पास भी पैसे नहीं हैं और अब तो यह संस्था लगभग निष्क्रय हो गयी है। इज्जोडू को रिलायंस बिग पिक्चर जैसे समूह ने फायनेंस किया है। अब बड़े काॅरपोरेट समूहों का पैसा पाॅपुलर सिनेमा के साथ-साथ प्रायोगिक और छोटी फिल्मों में भी लग रहा है। यह अच्छी बात है, इनके काम करने का तरीका भी पारदर्शी है। बिग पिक्चर हिन्दी में थ्री इंडियट और पा जैसी फिल्मों में पैसा लगाने के साथ साथ क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों में भी पैसा लगा रही हैं।

गर्म हवा को आज भी विभाजन पर बनी सबसे संवेदनशील, प्रमाणिक और बेहतरीन फिल्म माना जाता है। फिर शयाम बेनेगल की मम्मों का नाम याद आता है। दूसरी ओर प िशचम  में युद्ध और ऐसी ही त्रासदियों पर फिल्मों की लंबी श्रृंखला है?
-हमारा सिनेमा इंटरटेनमेंट सिनेमा है। इसलिए अप्रसांगिक है, अपने समय को दर्ज करना हमारे लोकप्रिय सिनेमा को पसंद ही नहीं है, बस एक तय फारमेट में बाॅक्स आॅफिस के हिसाब से फिल्में बनायी जाती है। दरअसल, हम इस्केपिस्ड टाईप हैं जबकि यूरोप में युद्ध के बाद आपको एंटीवार फिल्मों का एक सिलसिला सा मिलेगा, वो रिसेप्टिव रहे हैं।
किसके सिनेमा से आप सबसे ज्यादा प्रभावित रहे हैं?
-स्पीलबर्ग की फिल्में मुझे बहुत पसंद आती रही हैं।
पिछले कुछ सालों में अपने यहां की कौन-कौन सी फिल्में अच्छी लगीं? और निर्देशकों में कौन पसंद हैं?
-माचिस, सत्या, पेज थ्री पसंद आयी मुझे। मणिरत्नम रोचक तरीके से फिल्म बनाते हैं उन्हें व्यावसायिकता और कलात्मकता में संतुलन साधना आ गया है। अनुराग बासु की देव डी भी बहुत उम्दा फिल्म है। उनका काम काफी अच्छा है। रंग दे बंसती में एक अंग्रेज लड़की का आकर हमारा इतिहास बताना मुझे कुछ जमा नहीं। पिछले साल स्लमडाॅग मिलेनियर की बहुत चर्चा रही पर यह कहीं से हमारा सिनेमा नहीं था और न ही आॅस्कर के लायक। लगान भी आॅस्कर टाईप फिल्म नहीं थी और इस बार भेजी गयी हरिष्चंद्राची फैक्टरी भी उस स्तर की नहीं है। हिन्दी के मुकाबले मलयालम, बंगाली और असमी में ज्यादा अच्छी फिल्में बन रही हैं। हिन्दी में नसीर, ओमपूरी परेश रावल के बाद सैफ, शाहिद और अभय देवोल बेहतर अभिनय कर है हैं। शाहरूख और आमिर जैसे अभिनेता महज एक पर्सनेलिटी भर हैं।
आपकी राय में भारतीय सिनेमा का हर पक्ष अपने सर्वोत्तम रूप में किस फिल्म में मौजूद है?
-मृणाल सेन की खंडहर हर मायने में विशवस्तरीय फिल्म है। इसमें सिनेमा का हर पहलू चाहे वो कहानी हो, अभिनय हो या फोटोग्राफी सभी कुछ बहुत उंचा है।
साहित्य से आपको काफी लगाव रहा है। गर्म हवा आपने इस्मत चुगताई की कहानी पर बनायी थी, यू आर अंनतमूर्ति की कहानियों पर भी आपने फिल्म बनायी है। इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं और किन पर काम करने की सोच रहे हैं?
-हां मैं पढ़ता रहता हंू और लगभग हर कहानी और उपन्यास को लगभग इसी नजरिये से पढ़ता हंू कि इस पर फिल्म कैसी बनेगी?  फिलहाल, मैं एक पाकिस्तानी लेखक की रचना ‘स्टोरी आॅफ अ विडो’ पढ़ रहा हूं और वाकई फिल्म बनाने के लिहाज से यह एक अच्छा उपन्यास है। लेकिन साहित्यक रचनाओं पर फिल्म बनाना काफी रिस्की है। इधर कन्नड़ के युवा लेखक बी सुरेशा भी मुझे पसंद आ रहे हैं।
कन्नड़ फिल्म उद्योग के बारे में कुछ बताएं?
-बहुत घटिया फिल्में बन रहीं हैं यहां। सिर्फ रीमेक से काम चलाया जाता है मौलिक काम नही के बराबर हो रहा है। साहित्य में 6 ज्ञानपीठ कन्नड़ को मिल चुका है पर कोई पढ़ता ही नहीं। दूसरी ओर शेशाद्री की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म विमुक्ति को देखने मैं हाॅल में गया तो वहां दर्शक नदारद थे। वैसे काफी बोरिंग फिल्म है यह। गिरीश कासरवल्ली की गुलाबी टाॅकीज अच्छी फिल्म है लेकिन उसे ठीक से रिलीज नहीं किया गया।
स्टेज के लिए काफी काम किया है आपने?
-हां, स्टेज में बहुत पैसों की जरूरत नहीं होती, इसलिए फिल्मों के लिए पैसे नहीं थे तो स्टेज में व्यस्त रहा। वैसे स्टेज का ग्लैमर कुछ अलग ही है।
टीवी के लिए भी आपने बहुत काम किया है, कोई नया प्रोजेक्ट?
-बिल्कुल नहीं! टी.वी में वेराईटी नहीं है अब इस माध्यम में काम करने में कोई मजा नहीं रहा। दूरदर्शन में रचनात्मक आजादी नहीं है और सैटेलाईट चैनलों में टीआरपी की दौड़ में उल-जलूल कार्यक्रमों की भरमार।
सत्तर और आज के सिनेमा की दुनिया में क्या फर्क महसूस करते हैं?
-सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का फर्क महसूस करता हंू मैं। मल्टीप्लेक्स के कारण प्रयोगों को भी जगह मिल रही है।  तकनीक में हम बहुत आगे निकल आएं हैं। काम आसान हो गया है लेकिन तकनीक का दुरूपयोग भी हो रहा है। दरअसल, फिल्म का एक व्याकरण होता है उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
आगे की योजनाएं क्या हैं?
-मेरी सारी फिल्में एक के बाद एक रिलीज हो रही हैं जिनमें ‘कहां कहां से गुजर गया’ भी शामिल है जो अभी तक रिलीज नहीं हो पायी थी। पंकज कपूर की यह पहली फिल्म है और इसमें अनिल कपूर भी हैं। नक्सल आंदोलन के खत्म होने के बाद युवाओं के लक्ष्यहीन भटकाव के बारे में है यह फिल्म। इसके अलाव पेंग्विन इंडिया की ओर से गरम हवा पर किताब भी आ रही है।

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

कहां कहां से गुजर गया

पंकज कपूर की पहली फिल्म अब शायद थियेटर का मंूह देख सके। शयाम बेनेगल की आरोहन से अपने फिल्मी कैिरयर की शुरूआत करने वाले पंकज इस फिल्म से पहले कहां कहां से गुजर गया में काम चुके थे, पर ये फिल्म आज तक िरलीज नहीं हो सकी। अभिनेता अिनल कपूर भी इस फिल्म में हैं। नक्सल आंदोलन के खत्म हो जाने के बाद लक्ष्यहीन, दिशाहीन हो चुके युवाआें की यह कहानी गरम हवा जैसी कालजयी फिल्म बनाने वाले फिल्मकार  एम . एस. सत्थयू  ने 1981 में बनायी थी। लगभग एक दशक के बाद कन्नड़ फिल्म इज्जोडू से वापसी कर रहे सत्थयू  अगले एक दो महीने में कहां कहां से गुजर गया के िडब्बे से बाहर िनकल िथयेटर में आने की उम्मीद कर रहे हैं।
नक्सल आंदोलन के खत्म होने के बाद युवाआें में उपजी िदशाहीनता के बारे में बात करने वाली यह फिल्म अब कितनी प्रासंिगक है इसके बारे में सत्थयू कहते हैं आज फिर नक्सल आंदोलन अपने चरम पर है आैर सरकार के िलए कानून आैर व्यवथा के स्तर पर सबसे बड़ी समस्या। इतने सालों में न तो सरकार का नजिरया बदला आैर न ही यह समस्य  सुलझी। हां हमें भी यह अंदाजा नहीं था कि सरकार इतने लंबे समय में भी इस समस्या को सुलझा नहीं सकेगी। बहरहाल, कहां कहां से गुजर गया नक्सल आंदोलन के कमजोर पड़ने के बाद की कहानी है आज के युवा इससे कितना िरलेट करेंगे ये तो मैं नहीं जानता पर मैंने इस  फिल्म में  उस समय, उस दौर को दर्ज किया है, एक दस्तावेज है वो उस दौर के युवाआें की मनोदशा का। आज के युवा बदल गए हैं, महानगरों आैर बड़े शहरों के युवाआें के िलए नक्सलवाद,   सामािजक आिर्थक  की बात छोड़े  शायद यह कोई समस्या ही न हो । डेवलपमेंट पाकेट में रहने वाले ये युवा उस दौर के शहरों के युवाआें जैसे नहीं  हैं इसलिए देश की समस्याआें पर िरयेक्ट करने का उनका तरीका भी। जो कुछ कर सकते हैं उनमें मेजोरिटी की सोच सरकार जैसी है कि नक्सलवाद महज कानून आैर व्वस्था की समस्या है सामािजक आिर्थक िवषमता, गैरबराबरी या िवकास की दौड़ में हािशये पर छूटे लोगों का िरयेक्शन नहीं। सबसे अफसोसजनक बात तो ये है कि आज तीस साल से भी ज्यादा होने को आए लेकिन महानगरों आैर बड़े बड़े शहरों से इतर दूर  दराज के  लोगों के िलए  अब भी कुछ नहीं बदला। भारत का वो  युवा वहीं हैं, अपने बुिनयादी अिधकारों के िलए  लड़ता हुआ।
 एम . एस. सत्थयू से बाकी बातचीत अगली पोस्ट में