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शुक्रवार, 20 मई 2011

एक कदम तो उठाओ यारों...........

 एक चीनी कहावत है-अंधेरे को कोसने से बेहतर है मोमबत्ती जलाओ। यानी कोसने से बेहतर करना है। हमेशा  सरकार और सिस्टम को कोसने से कुछ नहीं होने वाला, करप्नश  का रोना रोने से भी कोई फायदा नहीं। अगर कुछ हो सकता है तो हमारे लिए बनायी गई योजनाओं, उसके लिए निर्धारित की गई रकम और उसे अपने विकास पर खर्च करने के तौर-तरीके जानने और उसके लिए माहौल बनाने से। कम से कम कर्नाटक के बेलगांव जिले के सिरागुप्पी गांव की पंचायत और वहां के लोग तो यही कहते हैं। हाल ही में इस गांव को न सिर्फ केन्द्र सरकार से माॅडल गांव  अवार्ड मिला है, बल्कि इसने गुगल अवार्ड भी हासिल किया है। ये अवार्ड सरकार की सभी योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करने और सभी बुनियादी सुविधाओं का लक्ष्य हासिल कर लेने वाले गांव को दिया जाता है।
दरअसल, विकास की सैकड़ों योजनाएं सरकार के पास है, हर साल बजट में इन योजनाओं के लिए रकम भी एलोकेट होती है पर ये भी सच है कि ये पैसा उन तक नहीं पहुंचता जिनके लिए ये योजनाएं बनती हैं, या फिर पहंुचता भी है तो नाममात्र को। यानी इन्हें इंप्लीमेंट करने वाला सिस्टम भ्रश्ट है। जबकि देश  की 72 फीसदी आबादी आज भी लगभग 6 लाख गांवों में रहती है। लेकिन फिर भी बुनियादी सुविधाओं तक उनकी पहंुच शहरों में रहने वाली आबादी जैसी नहीं है। लेकिन फिर भी विकास की भूख हो, जमाने के साथ कदम मिला कर चलने की ललक हो, साथ ही अपनी जड़ अपनी मिट्टी से भी उतना ही प्यार हो, तो सब संभव है। अब सिरागुप्पी गांव की ही बात करें तो, ये उसी कर्नाटक का हिस्सा है जिसे फिलहाल देश के भ्रष्टतम राज्यों में से एक समझा जाता है। लेकिन इसे भ्रष्ट कहने वाली पार्टी, जिसकी केन्द्र में सरकार है उसी ने इस गांव को सम्मानित भी किया है। यही नहीं कर्नाटक को पंचायती व्यवस्था को बेहतर ढंग से लागू करने वाला दूसरा राज्य होने का सम्मान भी दिया गया, जबकि पिछले साल कर्नाटक पहले स्थान पर था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्ट तंत्र होने के बावजूद भी विकास के प्रति लोगों की चाहत को यहां नजरअंदाज करना इतना आसान नहीं। तभी तो स्वच्छता, पीने के पानी की सप्लाई, प्राइमरी एजुकेशन, रोड, महिलाओं और समाज के कमजोर तबके में साक्षरता का अनुपात जैसे मानकों पर यह गांव देश  भर में खरा उतर पाया और माॅडल गांव होने का रूतबा हासिल कर पाया। और यहीं से इस गांव की सक्सेस स्टोरी भी देश  के बाकी गांवों के लिए भी एक उदाहरण बन जाती है। क्योंकि विकास के लिए गांव की पंचायत ही नहीं बल्कि पूरे गांव ने एक होकर काम किया, पंचायत में कोई किसी दल का नहीं था और न गांव में कोई किसी समूह का। बस सबकी लाईन एक ही रही-सिरागुप्पी के तरक्की की लाईन। इस गांव की पंचायत और लोगों ने साबित किया कि सब अगर मिलकर एक लक्ष्य के लिए काम करें तो बदलाव जरूर ला सकते हैं। पिछले पांच साल में इस गांव ने 8 करोड़ अपने विकास पर खर्च किए।
सच तो ये है कि माॅडल गांव जैसा कोई अवार्ड होना ही नहीं चाहिए था, विकास के जिन मानकों पर ये अवार्ड दिया जाता है, हर गांव का ये बुनियादी हक है, पर ऐसा है नहीं। आज भी देष के लाखों गांव बिजली, सड़क, स्कुल, अस्पताल, और पीने के पानी की सप्लाई जैसे बुनियादी सुविधाओं से महरूम है। ऐसे में किसी गांव में घर-घर में नल होना, प््रााॅपर अंडरग्राउंड ड्रेनेज सिस्टम होना,घर-घर में टाॅयलेट होना, कचरे का सिस्टेमेटिक ढंग से निपटान होना और अच्छी सड़के होना, निष्चिततौर पर देष के दूसरे गांवों के लिए सपने सरीखा ही है। लेकिन ये सब तभी संभव हो पाया जब पंचायत ने सरकार की सारी योजनाओं को पूरी पारदर्षिता के साथ लागू किया। और लोगों ने भी योजनाओं का किसी भी रूप में दुरूपयोग नहीं किया। सरकारी फंड के साथ-साथ इस गांव ने अपने एमपी और एमएलए फंड का भी बखूबी इस्तेमाल किया। फिर भी पैसा कम पड़ा तो अपने स्रोत से संसाधन जमा कर विकास के अपने लक्ष्यों को हासिल किया। यही नहीं केन्द्र सरकार की मनरेगा जैसी योजना को इस गांव ने 100 प््रातिषत क्षमता के साथ लागू किया है। गांव के प्राईमरी हेल्थ सेंटर में आपको एम्बूलेंस भी मिल जाएगा। 2290 घरों वाले इस गांव के  1335 घर में  नल हैं। गांव की साक्षरता दर 96 फीसदी है। दस हजार की आबादी वाले इस गांव में 70 सेल्फ हेल्प ग्रुप हैं। पंचायत में प्री युनिवर्सिटी काॅलेज, तीन हाई स्कूल, छः प््रााईमरी स्कूल और नौ आंगनबाड़ी सेंटर हैं। यहां बैंकों  की षाखाएं भी हैं  और पंचायत पूरी तरह से कंप्यूटराईज्ड है। साथ ही पानी पर चार्ज से पंचायत ने 7 लाख रूपए अर्जित किए।
षिरागुप्पी गांव ने अपनी सूरत, अपने लिए बनायी गई योजनाओं और उनके लिए आवंटित रकम का इस्तेमाल करके बदली है, देष के बाकी गांवों को यही याद रखने की जरूरत है।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

हरा भ्ररा ,प्लास्टिक मुक्त गांव

(Published in Public Agenda)
कर्नाटक के बंतवाल तालुके का इरा गांव युं तो भारत के किसी भी आम गांव जैसा ही है पर कुछ बातें इसे न सिर्फ देश बल्कि दुनियां में एक खास गांव बनाती हंै।  इरा, आज भारत का पहला प्लास्टिक मुक्त गांव है। प्लास्टिक मुक्त ग्राम होने के अलावा इस गांव की अन्य उपलब्धियां भी काबिलेगौर हैं। इरा को केन्द्र सरकार का निर्मल ग्राम पुरस्कार भी मिल चुका है। संपूर्ण साक्षर और पूर्णत: भ्रष्टाचार व बालश्रम मुक्त इस गांव से पिछले तीन साल से सौ प्रतिशत टैक्स कलेक्शन  हासिल हुआ है। इसके अलावा यह देश का पहला डिजीटल ग्राम पंचायत भी है। इरा ग्राम पंचायत दुनियां के अन्य देशों के लिए भी आज रोल-माडल बन चुका है। यूनिसेफ के 20 प्रतिनिधियों की टीम ने भी इस गांव का दौरा किया जिसमें जिम्बाबे, जाम्बिया, नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देशाे के प्रतिनिधी शामिल थे।
दरअसल, सरकार और स्थानीय लोगों की भागीदारी से इस छोटे से गांव ने विकास और सफलता की जो बड़ी कहानी लिखी है वह कृष्णा मूल्या और ‘शीना शेट्टी जैसे लोगों और उनके संगठनों के जिक्र के बगैर अधूरी है। कर्नाटक के दक्षिणी कन्नडा जिले में एक दशक से भी ज्यादा समय से काम कर रहे जन शिक्षण ट्रस्ट के कृष्णा मूल्या और शीना शेट्टी बताते हैं सरकार और नागरिक सहयोग से केवल इरा गांव ही नहीं बल्कि पूरे बंतवाल तालुके की तस्वीर अब बदल रही है। वर्ष 2005 में संपूर्ण स्वच्छता आंदोलन के साथ उनके संगठन ने इस क्षेत्र में केन्द्र की एक नोडल एजेंसी के तौर पर काम करना शुरू  किया और अपना देश नाम से एक आंदोलन चलाया। मूल्या और ‘शेट्टी बताते हैं अपना देश आंदोलन आदर्श  गांव बनाने का आंदोलन है। यह स्थानीय लोगों की भागीदारी से विकास के लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास है जिससे न सिर्फ लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आयी है बल्कि अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की समझ भी पैदा हुई है। दरअसल, अपना देश आंदोलन अपनी स्थानीय समस्याओं को खुद ही हल करने करने का आंदोलन है। वे कहते हैं इरा के कायाकल्प की कहानी की शुरूआत भी वर्ष 2005 में केन्द्र सरकार के संपूर्ण स्वच्छता आंदोलन के क्रियान्वयन के साथ शुरू हुई। जिसका लक्ष्य निर्मल ग्राम और ग्रामीण विकास के सपने को साकार करना था। लेकिन पिछले दो साल से प्लास्टिक के दुष्प्रभाव और इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान  के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के अभियान पर काफी जोर डाला गया, स्थानीय लोगों में इसका काफी गहरा असर हुआ, जिसका परिणाम है आज इरा लगभग प्लास्टिक मुक्त गांव बन चुका है। पालीथिन की थैलियां यहां वर्जित है, धार्मिक स्थलों पर भी प्लास्टिक की जगह कपड़े की थैलियों का प्रयोग होता है हांलाकि अभी भी दवाईयों इत्यादि के लिए प्लास्टिक का प्रयोग होता है। इरा गांव के प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र होने का असर भी अब दिखने लगा है, न सिर्फ गांव की हरियाली में इजाफा हुआ है बल्कि पानी भी पूर्णत: प्रदूषन मुक्त हो गया है। शेट्टी और मूल्या कहते हैं इरा गांव की सफलता और समूचे बतंवाल तालुके में आए बदलाव में भरतलाल मीणा और वी.पी बालिगर जैसे प्रशासनिक अधिकारियों की अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके अलावा इलाके के सभी राजनीतिक दलों ने भी दलगत राजनीति से उपर उठकर क्षेत्र के लिए काम किया है और धर्म, जाति व क्षेत्र की राजनीति से अलग विकास की राजनीति की है। नतीजा बंतवाल तालुके के 45 ग्राम पंचायतों में से आज लगभग 20 गांव आदर्श गांव में तब्दील हो चुके हैं।