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शनिवार, 28 जुलाई 2012


ताक़त के तीन हिस्से

कलह और गुटबाज़ी से जूझ रही कर्नाटक भाजपा का राजनीतिक संकट फ़िल हाल टल गया है लेकिन येदियुरप्पा की महत्वाकांक्षाओं के शिकार हुए सदानंद गौड़ा का गुट फिर से राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है। मनोरमा की रिपोर्ट( द पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित  )
कर्नाटक में भाजपा का संकट अभी खत्म होता नहीं लगता। सरकार बचाने और चलाने की जद्दोजहद में ही अगला विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ जायेगा, जिसमें मात्र ग्यारह महीने ही बचे हैं। चार साल के अंतराल में राज्य में तीसरे मुख्यमंत्री शपथ लेने वाले हैं। दरअसल, कर्नाटक भाजपा इन दिनों व्यक्तिगत अहम, कलह और गुटबाजी की राजनीति से जूझ रही है। मौजूदा संकट और नेतृत्व परिवर्तन उसी की बानगी है। पार्टी से बड़ा व्यक्ति विशेष का अहम हो गया है और केंद्रीय नेतृत्व की मजबूरी है उसे तुष्ट करना। आखिरकार येदियुरप्पा ने साबित कर ही दिया कि कर्नाटक में फिलहाल भाजपा के सबसे कद्दावर नेता वही हैं, चाहे वे मुख्यमंत्री पद पर रहें या न रहें। भाजपा को राज्य में अपना अस्तित्व बनाये और बचाये रखना है तो येदियुरप्पा के आगे उसे झुकना ही होगा। इसलिए सदानंद गौड़ा को असमय मुख्यमंत्री पद की बलि देनी पड़ी और जगदीश शेट्टर के लिए रास्ता खाली करना पड़ा। 
सदानंद गौड़ा साफ छवि के नेता हैं और उनकी सरकार पर कोई दाग भी नहीं लगा, बावजूद इसके वे अपना पद छोड़ने के लिए राजी हो गये तो इसकी वजह उनका राजनीतिक व्यक्तित्व और शैली ही है। उनकी जगह येदियुरप्पा होते तो ऐसा शायद नहीं कर पाते। गौड़ा शुरू से भाजपा के अनुशासित नेता रहे हैं और अब तक पार्टी के आदेशों के मुताबिक ही उन्होंने राजनीति की है। लेकिन मौजूदा घटनाक्रमों ने कर्नाटक भाजपा में उनका भी एक खेमा विकसित कर दिया है, जो हर आदेश को चुपचाप मानने को तैयार नहीं है। यह उस समय दिखा भी जब वे अपना इस्तीफा राजभवन में सौंपने जा रहे थे। उनके समर्थकों ने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन अंततः उन्होंने एक साल पूरा करने से पहले ही पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, वोक्कालिगा समुदाय के लोगों का तीव्र विरोध जारी है और वेे किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं। 
बहरहाल गौड़ा के प्रस्थान की इस पटकथा को पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने लिखा। जेल से वापस आने के साथ ही येदियुरप्पा ने केंद्रीय नेतृत्व पर खुद को मुख्यमंत्री बनाने या गौड़ा को बदलने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया था, जिसे टालने की भरपूर कोशिशें की गयीं। लेकिन पिछले दिनों उनके खेमे के नौ मंत्रियों ने कैबिनेट से इस्तीफा देकर केंद्रीय नेतृत्व को गौड़ा को हटाने के लिए अंततः मजबूर कर ही दिया। इन मंत्रियों में जगदीश शेट्टर भी एक थे। ये वही येदियुरप्पा हैं जो अपने शासन काल के दौरान इसी तरह की परेशानियां रेड्डी बंधुओं के कारण झेलते रहे थे। हालांकि, सरकार भी उन्होंने उन्हीं रेड्डी बंधुओं के पैसों और सहयोग से ही बनायी थी। लेकिन अवैध खनन के मामले में लोकायुक्त की रिपोर्ट में नाम आने पर पिछले साल जुलाई में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था और अगस्त में सदानंद गौड़ा प्रदेश के नये मुख्यमंत्री बनाये गये थे। ऐसा राजनीति में ही हो सकता है कि जिस जगदीश शेट्टर को मात देकर येदियुरप्पा ने सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनवाया था, आज पासा एकदम पलटा हुआ है। शेट्टर के लिए येदियुरप्पा ने गौड़ा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलवा दिया। वैसे कहा जाता है कि "दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है' लेकिन येदियुरप्पा शायद यह भूल रहे हैं कि सदानंद गौड़ा उनके खेमे के और उनके भरोसे के हुआ करते थे, जबकि जगदीश शेट्टर हमेशा उनके प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। दोनों लिंगायत समुदाय के नेता हैं, इसलिए येदियुरप्पा कभी भी शेट्टर का कद बढ़ने देना नहीं चाहते थे। जब गौड़ा उनके लिए रबर स्टांप मुख्यमंत्री नहीं बने, तो क्या गारंटी है कि शेट्टर आने वाले समय में उन्हें किनारे नहीं करेंगे? 
सबसे दुखद बात ये है कि इस पूरे प्रकरण ने कर्नाटक की जाति आधारित राजनीति का बदरंग चेहरा सामने रखा है, जहां भाजपा को अगली बार भी बहुमत में आने के लिए लिंगायतों को तुष्ट करना पड़ेगा। चूंकि येदियुरप्पा अदालत में चल रहे मामलों के कारण अभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकते इसलिए एक और लिंगायत नेता जगदीश शेट्टर को पार्टी का चेहरा बनाया गया है। कहा ये भी जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद के लिए येदियुरप्पा की पहली पसंद पिछली बार उनकी करीबी ऊर्जा मंत्री शोभा करंदलाजे ही थीं, लेकिन वे लिंगायत की बजाय वोक्कालिगा थीं, इसलिए मुख्यमंत्री नहीं बन सकीं। हालांकि, सदानंद गौड़ा भी वोक्कालिगा ही थे। दरअसल, कर्नाटक में सबसे ज्यादा सतरह फीसद वोट लिगंायतों के ही हैं और वोक्कालिगा 15 फीसद के साथ दूसरे नंबर पर आते हैं, लेकिन उनका वोट बंटा हुआ है। 
फिलहाल जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) की वोक्कालिगा समुदाय पर अच्छी पकड़ है, जबकि भाजपा के लिए राज्य में लिंगायत ही सबसे बड़े वोट-आधार हैं। दूसरी ओर लिंगायत वोट धर्मगुरुओं और मठों के द्वारा बहुत हद तक निर्देशित होते हैं और भाजपा का इन मठों और धर्मगुरुओं पर खासा असर है। कांग्रेस की पकड़ पिछड़ों और दलितों के बीच ज्यादा है। 
बहरहाल, जगदीश शेट्टर पहली लड़ाई तो जीत गये हैं, लेकिन क्या आगे का रास्ता तय करना उनके लिए आसान है? कर्नाटक में भाजपा सरकार के चार साल में तीसरे मुख्यमंत्री बने 56 वर्षीय जगदीश शेट्टर हुबली से चौथी बार विधायक हैं और लिंगायत होने के साथ उत्तरी कर्नाटक के प्रभावशाली नेता भी हैं, जहां भाजपा की मजबूत उपस्थिति है। एसएम कृष्णा के मुख्यमंत्री रहने के दौरान शेट्टर विपक्ष के नेता रह चुके हैं और सन् 2009 में ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री बनने से पहले येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री रहने के दौरान विधानसभा अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अपने कैरियर की शुरुआत में वे येदियुरप्पा के करीब भी रहे हैं। यहां तक कि येदियुरप्पा के "ऑपरेशन कमल' को अमली जामा पहनाने में भी शेट्टर की प्रमुख भूमिका रही। अब देखना यह है कि साफ-साफ दो खेमों में बंट चुके विधायकों के साथ वे कैसा मंत्रिमंडल बना पाते हैं और असंतुष्टों को साध कर कैसे सरकार चला पाते हैं। बड़ी चुनौती उन्हें गौड़ा समर्थक विधायकों से ही मिलेगी। साथ ही अंदरूनी कलह से बिगड़ी भाजपा की छवि सुधारने की बड़ी जिम्मेदारी भी उनपर है। लेकिन इसके लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है। मई 2013 में विधाानसभा चुनाव हो सकते हैं या फिर ये भी हो सकता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ दिसंबर में ही कर्नाटक में चुनाव कराये जायें। बहरहाल, संकट का पहला पड़ाव तो पार कर लिया गया है। यानी मुख्यमंत्री पद का मसला, मंत्रीमंडल का गठन और हर खेमे को संतोषजनक प्रतिनिधित्व देना ये ज्यादा बड़ी समस्याएं नहीं हैं और केंद्रीय नेतृत्व को इसकी ज्यादा चिंता भी नहीं है। संकट शिखर के लोगों का और लोगों से है। दरअसल, येदियुरप्पा प्रदेश पार्टी अध्यक्ष का पद अपने लिए चाहते हैं। वे गौड़ा को किसी भी कीमत पर इस पद पर नहीं देखना चाहते, क्योंकि उनके नेतृत्व में अगर भाजपा राज्य में अगला चुनाव जीत जाती है, तो गौड़ा कर्नाटक में भाजपा के सबसे बड़े नेता बन कर उभर सकते हैं। दूसरी ओर, गौड़ा अपनी ताकत मुख्यमंत्री के बाद एक इसी पद से साबित कर सकते हैं। जाहिर है, केंद्रीय नेतृत्व का उन्हें राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव देना फिलवक्त राज्य की राजनीति से वनवास ले लेने के समान होगा। दूसरी ओर यह भी गौरतलब है कि येदियुरप्पा को कर्नाटक में जब बहुमत मिला तब गौड़ा ही प्रदेश अध्यक्ष थे। ऐसे में भाजपा के लिए "आगे कुंआ, पीछे खाई' सी स्थिति बन रही है। गौड़ा की उपेक्षा से वोक्कालिगा वोट प्रभावित हो सकते हैं। खबर ये भी है कि केंद्रीय नेतृत्व संतुलन बनाने के लिए प्रदेश पार्टी अध्यक्ष पद पर किसी दलित नेता को बिठा सकता है। क्योंकि येदियुरप्पा खेमा ईश्वरप्पा के बजाय गृहमंत्री आर अशोक को उपमुख्यमंत्री बनाना चाहता है और सदानंद गौड़ा खेमे की पसंद ईश्वरप्पा हैं। ऐसे में संभावना दो उपमुख्यमंत्री बनने की है। 
अब देखना ये है कि गौड़ा को प्रदेश पार्टी अध्यक्ष पद मिलता है या नहीं, क्योंकि राज्यसभा जाने की पेशकश तो उन्होंने पहले ही ठुकरा दी है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व उन्हें उनके खेमे के लोगों को बेहतर पोर्टफोलियो देने का आश्वासन ही दे सकता है। ये और बात है कि गौड़ा इस पर शायद ही मानें। उनके खेमे में पचास से ज्यादा विधायक हैं और शेट्टर कैबिनेट में 20 मंत्री पद उनकी मांग है। 

बुधवार, 23 नवंबर 2011

नाम बड़े और दर्शन छोटे

कन्नड़ फ़िल्मों के दो अभिनेताओं पर घरेलू उत्पीड़न के आरोप हैं लेकिन इससे उनकी फ़िल्मों की सफलता प्रभावित नहीं हुई। हिंसा की शिकार पत्नियां भी उन्हें माफ़ करती आयी हैं। मनोरमा की रिपोर्ट (Public Agenda)


चाहे कोई स्थापित अभिनेत्री हो या किसी फिल्मी सितारे की पत्नी, औरतों का दर्जा दोयम ही होता है । कुछ ऐसा ही मानते हैं कन्नड़ फल्मों के स्टार अभिनेता। बीवियों की पिटाई करना इन दिनों उनका दूसरा शौक बन गया है। और बाद में उनकी पत्नियों और प्रशंसकों से उन्हें माफी भी मिल जाती है। इस सबके बावजूद उनकी फिल्में पहले की ही तरह सुपर हिट होती रहती हैं। ऐसे ही एक कन्नड़ नायक के खलनायक बनने का हाई वोल्टेज ड्रामा पिछले महीने बंगलुरू में देखने को मिला। कन्नड़ फिल्मों के सुपर स्टार टी दर्शन अपनी पत्नी की पिटाई के आरोप में जेल भेजे गये, फिर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने पत्नी के साथ अपने प्रशंसको से माफी भी मांग ली। यही नहीं, उन्होंने फिर एक यात्रा का नाटक भी रचा। एक और कन्नड़ अभिनेता प्रशांत भी अपनी पत्नी शशिरेखा को मारने-पीटने और लगातार प्रताड़ित करने के आरोप में गिरफ्तार रहे। दोनों मामलों ने साबित किया कि कन्नड़ फिल्म उद्योग और वहां का समाज औरतों के लिए अभी भी नहीं बदला है। कन्नड़ फिल्मों के बड़े नायक टी दर्शन की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सोना उगलती रही हैं। लेकिन पर्दे का यह नायक घर में खलनायक बन गया। शादी के दस साल बाद उनकी पत्नी विजयलक्ष्मी को थाने में अपने ही पति के खिलाफ शिकायत दर्ज करानी पड़ी। अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि दर्शन ने उन्हें और उनके तीन साल के बेटे को न सिर्फ प्रताड़ित किया, बल्कि जान से मारने की कोशिश भी की। दर्शन ने सिगरेट से विजयलक्ष्मी के हाथों को जलाया और चप्पल से पटाई की। दर्शन को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन जेल में उनकी तबीयत खराब हो गयी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बाद में विजयलक्ष्मी उनसे मिलने अस्पताल गयीं और फिर अपनी बात से पलट गयीं। चोट लगने का कारण बाथरूम में पैर फिसल जाना बताने लगीं। उन्होंने पति पर लगाये सारे आरोप भी वापस ले लिये, लेकिन इसके बावजूद बंगलुरू की दोनों निचली अदालतों ने दर्शन की जमानत याचिका खारिज कर दी। लेकिन आखिरकार कर्नाटक उच्च न्यायालय से उन्हें जमानत मिल गयी। विजयलक्ष्मी ने मीडिया के सामने स्वीकार किया कि घर के झगड़े को बाहर लाना उनकी नासमझी थी। दर्शन ने भी इस पूरे प्रकरण के लिए माफी मांगी और एक अच्छा पति और पिता बनने की कसमें खायीं। लोगों का मानना है कि दर्शन के "पश्चाताप' का कारण यह था कि अगले कुछ ही दिनों में उनकी फिल्म "सारथि' रिलीज होने वाली थी। सारथि के रिलीज होने से पहले दर्शन को अपनी छवि की चिंता सताने लगी थी इसलिए उन्होंने फिल्म के प्रचार के लिए "यात्रा' की और इस दौरान लोगों से माफी मांगी। हैरानी की बात यह रही कि बंगलुरू से लेकर मांड्या, मैसूर, चित्रदुर्गा तुमकूर और दावणगेरे सभी जगह लोगों ने दर्शन को हाथों-हाथ लिया, उसका घंटों इंतजार किया, यहां तक कि कई जगहों पर पुलिस को हल्का लाठी चार्ज भी करना पड़ा। बकौल दर्शन, "सारथि' की सफलता और यात्रा में मिले जन-समर्थन ने उन्हें लोगों का आभारी बना दिया है और जो हुआ, उसके लिए वे बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। दरअसल कई बार औरतों के मामले में मर्द संवेदनशीलता की हदें तोड़ते आये हैं। औरतें मर्दो की दुनिया में सिर्फ गैर-बराबरी ही नहीं, तमाम किस्म के हिंसक वार भी झेलती आयी हैं। मध्य या उच्च वर्ग में होने वाली ऐसी घटनाएं अक्सर घर की दीवारों के अंदर ही दब जाती हैं। बड़े स्टार जो परदे पर अक्सर आदर्शवादी नायक के रूप में अन्याय के खिलाफ खड़े दिखते हैं, वे भी यह भूल जाते हैं कि निजी जीवन से भी उन्हें ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। दर्शन भी कन्नड़ फिल्मों के ऐसे ही स्टार नायक रहे हैं, इसलिए पत्नी से मनमुटांव होने पर उनसे परिपक्व व्यवहार की उम्मीद थी, लेकिन उन्होंने परदे पर अपनी छवि के विपरीत आचरण किया। कन्नड़ फिल्म उद्योग के अंदर घटे ऐसे कई उदाहरणों से यह भी साफ हुआ कि सामाजिक संदेश केवल परदे पर ही दी जानेवाली चीज है। कहा जाता है कि यह मनमुटाव एक अभिनेत्री निकिता ठुकराल से उनकी निकटता और उनके साथ फिल्मों में काम करने को लेकर हुआ। कन्नड़ फिल्म उद्योग ने तीन साल के लिए निकिता ठुकराल पर प्रतिबंध लगा दिया लेकिन दर्शन को उनकी कारगुजारियों के बावजूद सहयोग और समर्थन ही मिला। इससे पता चलता है कि ग्लैमर की दुनिया में भी लोगों की सोच महिलाओं के संदर्भ में कितनी संकीर्ण है। फिल्मी नायकों को पसंद करने वाली जनता को भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका नायक असल जिंदगी में कैसा है। दर्शन को हिरासत में लिये जाने की खबर मिलते ही पूरा कन्नड़ फिल्म उद्योग विजयनगर पुलिस थाना दर्शन को छुड़़ाने पहुंच गया था। फिल्म उद्योग के बड़े-बड़े नामों ने दर्शन की पत्नी विजयलक्ष्मी पर ही समझौता करने का दबाव बनाया। यहां तक कि जनता ने, जिसमें महिलाएं भी बड़ी तादाद में शामिल थीं, दर्शन के समर्थन में प्रदर्शन किया। इसी दबाव में दर्शन पर लगे हत्या की कोशिशों के आरोप धारा 107 को, जिसके तहत जमानत मुश्किल होती है, धारा 324 में बदल दिया गया। बहरहाल, दर्शन और विजयलक्ष्मी प्रकरण ने फिर एक बार साबित किया कि औरतें अपने खिलाफ हो रही घरेलू हिंसा के मामलों में कितनी लचीली और समझौतावादी हैं। अपनी सामाजिक सुरक्षा का सवाल और बच्चों का भविष्य उन्हें अपने ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ कदम आगे बढ़ाने के बावजूद पीछे हटाने को मजबूर कर देता है। दरअसल, घरेलू हिंसा को पारिवारिक और सामाजिक दायरे में गंभीर अपराध नहीं माना जाता और ज्यादातर मामलों में तो पत्नी को भी ये एक सामान्य सी बात लगती है। दर्शन और विजयलक्ष्मी के मामले में दर्शन की आलोचना करने के बाद ज्यादातर लोगों की पहली प्रतिक्रिया यही रही कि ये आपस का मामला था, जिसे विजयलक्ष्मी को आपस में सुलझाना चाहिए था। "सारथि' की सफलता भी इस बात की तसदीक करती है कि समाज पत्नी के साथ की गयी मारपीट को कोई गंभीर अपराध नहीं मानता और इससे अभिनेता के कैरियर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। हैरानी की बात नहीं कि हाल ही में महिलाओं पर शोध करनेवाली अंतरराष्ट्रीय संस्था आईसीआरडब्ल्यू के सर्वेक्षण में 65 फीसद पुरुषों ने माना कि कभी-कभी महिलाओं को मारना जरूरी होता है। बंगलुरू में भी एक सर्वेक्षण में 35 फीसद लोगों को दर्शन का अपराध बड़ा नहीं लगा। अठारह फीसद लोगों की निगाह में यह बहुत आम बात है और 65 फीसद लोग तो मुद्दे को सार्वजनिक करने के कारण विजयलक्ष्मी को ही गलत मान रहे हैं। वैसे हाल ही के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आयी है कि देश में 40 फीसद शादी-शुदा महिलाएं अपने घरों में पतियों से शारीरिक और यौन हिंसा का शिकार होती हैं और 51 प्रतिशत भारतीय पुरुष और 54 प्रतिशत भारतीय महिलाओं को पत्नियों को मारा-पीटा जाना स्वीकार्य और वैध लगता है। दर्शन प्रकरण ने कन्नड़ फिल्म उद्योग के दोमुंहे चेहरे को भी उजागर किया है जो कमोबेश देश के पूरे शो बिजनेस का एक सच है। यहां बातें बड़ी-बड़ी होती हैं लेकिन हकीकत में औरतों और मर्दो में बराबरी नहीं है, चाहे वह पारिश्रमिक की बात हो या शादी के बाद काम करने की स्वीकार्यता की बात। हिंदी फिल्म उद्योग में भी जीनत अमान, नीतू सिंह, और ऐश्वर्या राय तक घरेलू हिंसा का शिकार हुई हैं। वैसे, घरेलू हिंसा कानून 2005 घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए एक कारगर सुरक्षा कवच है। मसलन इसके तहत घरेलू हिंसा की शिकार महिला के लिए हर तरह की कानूनी सहायता मुफ्त मिलती है और दर्ज शिकायत पर कार्रवाई करने के लिए अधिकतम तीन दिन का ही समय दिया गया है। कोई भी महिला सीधे मजिस्ट्रेट के पास शिकायत लेकर जा सकती है।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

सुरों से सवंरता बचपन

Published in Inext
हममें से बहुत से लोग सफल होते हैं शोहरत और दौलत सब कमा लेते हैं पर जिस मिट्टी, जिस गांव, जिस देश , से हम आते हैं उसे उसका बकाया वापस लौटाने लिए बहुत कम ही लोग वापस मुड़ते हैं। अमेरिका के बे-एरिया में रहने वाले कर्नाटक के वादिराजा भट्ट और उनके दो दोस्त एच सी श्रीनिवास और अशोक कुमार ऐसे ही लोगों में से हैं। कुछ साल पहले अपनी मिट्टी का कर्ज चुकाने की जो छोटी सी मुहिम उन्होंने चलायी, अब उसका असर दिखने लगा है। और कर्नाटक और तमिलनाड् के दूर-दराज के गांवों के उन स्कूलों की सूरत बदलने लगी हैं जहां बच्चों को एक ही कमरे के टूटे-फृटे स्कूलों में पढ़ना होता था वो भी बगैर पानी, बिजली और टाॅयलेट जैसी बुनियादी सुविधाओं के। अब यही स्कूल पक्की इमारत में चल रहे हैं वो भी सभी बुनियादी सुविधाओं के साथ। इनकी इस मुहिम का नाम है ‘वन स्कूल एट ए टाईम’ या ‘ओसाट’।


दरअसल, कुछ करने की ख्वाहिश हो तो रास्ते निकल ही आते हैं। ऐसी हर सक्सेस स्टोरी के बारे में जानने-पढ़ने के बाद यही समझ आता है। इन तीन दोस्तों के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ, कुछ साल पहले जब ये कर्नाटक आएं तो भट्ट राज्य के दक्षिण कन्नडा जिले में स्थित अपने गांव बाजेगोली भी गए। लेकिन वहां के स्कूल की हालात देखकर उन्हें खासी परेशानी हुई। गांव के सारे बच्चों के लिए वहां एक ही स्कूल था, जो एक कमरे में चलता था अब वो कमरा भी एकदम खस्ताहालत में था। पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं तो बहुत दूर की बात थी। वापस अमेरिका आने पर उन्होंने संगीत के जरिए इस स्कूल के लिए फंड जमा करने की सोचा। और रागा नाम से एक संगीत मंडली बनायी। इसी तरह काटे नाम से थियेटर ग्रुप भी बनाया। संगीत और कल्चरल प्रोग्राम के जरिए उनकी फंड जमा करने की स्कीम रंग लायी जब अमेरिका में आयोजित रागा म्यूजिक कंसर्ट सुपरहिट रहा। बाजेगोली के खस्ताहाल स्कूल की हालात सुधरी तो बच्चों और उनके माता-पिता के चेहरे की मुस्कुराहट ने उन्हें अब इस काम को मिशन बनाने की प्रेरणा दी। अब तक ये ग्रूप पांच स्कूल की सूरत पूरी तरह से बदल चुका है। और दो स्कूल में इनका काम चल रहा है।

उनके काम करने का तरीका बहुत आसान है, तीनों पहले उस स्कूल का चयन करते हैं जिसका रिनोवेशन किया जाना है, फिर ऑथोरिटी बात करते हैं, स्थानीय लोगों और सुपरवाईजरों को इस काम से जोड़ते हैं और फिर स्थानीय रोटरी क्लब को इन्वाल्व कर उनकी मदद से काम पूरा करते हैं। इस प्रोग्राम की खासियत ये है कि कोई भी स्कूल का नाम रिनोवेशन के लिए सुझा सकता है। शर्त केवल यही है कि उस स्कूल से गरीब बच्चों को फायदा होना चाहिए और उस स्कूल के टीचर्स में बच्चों को बेहतर पढ़ाने और बेहतर शैक्षिणक माहौल देने की ललक होनी चाहिए। बहरहाल आने वाले समय में इनका लक्ष्य साल में पच्चीस स्कूलों के रिनोवेशन के सभी हिस्से में काम करने का है।

रविवार, 26 सितंबर 2010

येदुरप्पा का कैबिनेट विस्तार

तूफान से पहले की खामोशी!
कर्नाटक में येदुरप्पा ने आखिरकार महीनों से लंबित अपने कैबिनेट विस्तार को अंजाम दे ही दिया और वो भी बिल्कुल अपनी पसंद का ख्याल रखते हुए। ये और बात है कि कैबिनेट विस्तार से पहले पूरी राजनीतिक ड्रामेबाजी हुई। लेकिन अंत में सभी को येदुरप्पा के फैसले के साथ समझौता करना ही पड़ा। चाहे वो रेड्डी बंधु हों जिन्होंने पिछले साल शोभा करंदलाजे को मंत्रिमंडल से निकलवाकर और जगदीश शेट्टर को मंत्री बनवा कर ही दम लिया था और येदुरप्पा की आंखों में सार्वजनिक मंच पर आंसु तक ला दिया था। पर वहीं शोभा अब फिर मंत्रीमंडल में आ चुकी हैं लेकिन सब खामोश हैं। अब ना तो आत्महत्या की धमकी देने वाले गुलीहट्टी आत्महत्या कर रहे हैं और ना ही इस्तीफे की धमकी देने वालों ने अपना इस्तीफा पेश किया है।


दरअसल, इस कैबिनेट विस्तार को येदुरप्पा की कूटनीतिक सफलता कहा जा सकता है। क्योंकि उन्होंने सारे दवाबों को किनारे कर वही किया जो करना चाहते थे और सबसे बड़ी बात ये कि उनके इन फैसलों पर पार्टी हाईकमान ने अपनी मुहर लगा कर फिलवक्त सारे असंतुष्टों का मुंह बंद कर दिया है।

अपनी चीन यात्रा से वापस आने के तुरंत बाद ही येदुरप्पा ने कैबिनेट का विस्तार करने की घोषणा की और इसके साथ ही राज्य में राजनीतिक ड्रामेबाजी का दौर शुरू हो गया। पहले तो मुख्यमंत्री और कर्नाटक भाजपा राज्य इकाई के अध्यक्ष के.एसईश्वरप्पा की ही अलग सोच सामने आ गई। जहां ईश्वरप्पा कैबिनेट से चार मंत्रियों को केवल हटाए जाने की बात कर रहे थे वहीं येदुरप्पा किसी को हटाए जाने से इन्कार कर रहे थे और साथ ही खाली मंत्रीपदों को वापस भरने की भी बात कर रहे थे। गौरतलब है कि हाल ही में तीन मंत्रियों को विभिन्न आरोपों के कारण मंत्रीपद से इस्तीफा देना पड़ा था। स्वास्थ्य शिक्षा मंत्री रामचंद्र गौड़ा को बहाली घोटाले के कारण, धार्मिक मामलों के मंत्री एस.एन कृष्णैया शेट्टी को भूमि घोटाले के कारण और खाद्य और आपूर्ति मंत्री एच हलप्पा को बलात्कार के आरोप के कारण।

बहरहाल, इस घोषणा के साथ ही मंत्री पद की चाह रखने वाले विधायको और उनके समर्थकों और कैबिनेट से निकाले जाने वाले मंत्रियों ने येदुरप्पा पर तरह तरह से दबाव बनाने की कोशिश की। खेल और युवा मामलों के मंत्री गुलीहट्टी शेखर ने आत्महत्या कर लेने की धमकी दी तो एक और मंत्री ने इस्तीफा दे देने की धमकी दी। इसके अलावा ढ़ेरों विधायक पार्टी से त्यागपत्र देने की धमकी दे रहे थे। गौरतलब है कि शेखर निर्दलीय विधायक हैं जिन्हंे राज्य में भाजपा सरकार बनाने में सहयोग करने के बदले मंत्रीपद मिला था। इसी तरह पब्लिक लाईब्रेरी मंत्री के शिवनगौड़ा नाईक भी जेडीएस से जीतने के बाद भाजपा में शामिल हुए थे और मंत्री बने थे। ये भी गौर करने वाले बात है कि 2008 में राज्य में बनी भाजपा की पहली सरकार में पांच निर्दलीय विधायकों को पार्टी के साथ लाने में रेड्डी बंधुओं की अहम भूमिका रही थी। इसलिए वो निर्दलीय मंत्रियों को हटाए जाने के विरोध में थे।

इस ड्रामेबाजी के तहत बड़ा झटका देने की कोशिश कैबिनेट में शामिल होने की चाह रखने वाले दो विधायक सी टी रवि और एस के बेल्लुबी ने की जब उन्हें पता चला कि वो मंत्री नहीं बनाए जाएंगे तो वो सात विधायकों के साथ बंगलूरू के एक होटल में विरोध की योजना बनाने लगे।



मामला जब बंगलूरू में नहीं सुलझा तो दिल्ली का रूख करना पड़ा। जहां लाल कृष्ण आडवाणी, भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी वरिष्ठ नेता वैंक्यया नायडू और शांताकुमार ने येदुरप्पा के मंत्रीमंडल विस्तार के फैसलों पर सहमति की मुहर लगाई।

अब जिन छः नए मंत्रियों ने शपथ लिया उनके नाम हैं, शोभा करंदलाजे, वी सोमन्ना, सी सी पाटिल, ए नारायणस्वामी, एस ए रामदास, और सी एच विजयशंकर। इनमें शोभा और सोमन्ना येदुरप्पा के खास लोगों में से हैं, और बाकी चार भी भाजपा के ही विधायक हैं।शोभा को उर्जा मंत्रालय मिला है, वी सोमन्ना के जिम्मे खाद्य और नागरिक आपूर्ति है, सी एच विजय शंकर को वन और पर्यावरण दिया गया है ए नारायण स्वामी समाज कल्याण और सी सी पाटिल महिला और बाल विकास तथा एस ए रामदास को स्वास्थ्य शिक्षा।

तीन जिन्हें हटाया गया वे हैं, उच्च शिक्षा मंत्री अरविंद लिंबावली, खेल और युवा मामलों के मंत्री गुलीहट्टी डी शेखर और लाईब्रेरी मंत्री शिवन्नगौडा नाईक। यानी कुल पांच निर्दलीय विधायकों में से केवल एक को ही हटाया गया है, चार अभी भी मंत्री हैं।

इसके अलावा एक बड़ा बदलाव ये भी हुआ है कि वी एस आचार्य को गृहमंत्रालय की जगह उच्च शिक्षा और योजना और सांख्यिकी दे दिया गया है और तर्क ये दिया गया है कि आचार्य काबिल मंत्री हैं इसलिए उन्हें ज्यादा अहम् मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। जबकि परिवहन मंत्री आर. अशोक को पविहन के साथ गृहमंत्रालय भी दे दिया गया है।

बहरहाल, हाईकमान के दखल से अभी सभी को शांत कर लिया गया है। अवैध खनन मामले में फंसे रेड्डी बंधु भी शांत रहकर अपनी ओर से ध्यान हटाना चाह रहे हैं जबकि केन्द्रीय नेतृत्व कर्नाटक भाजपा के अंर्तकलह को बार-बार सुर्खियां बनते नहीं देखना चाहता इसलिए फिलहाल उपरी तौर पर सब कुछ शांत दिख रहा है पर ये तूफान से पहले की भी शान्ति हो सकती है।

बुधवार, 8 सितंबर 2010

लोहे की राजनीति

कर्नाटक की राजधानी बंगलूरू से 350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बेल्लारी यंू तो देश के अन्य कस्बाई शहरों जैसा ही है, धूल-धक्कड़, टूटी सड़के और उनपर बेतरतीब वाहन, लेकिन थोड़ा नजर दौड़ाने पर आलीशान बंगले, गाड़ियां और हेलीकाप्टर भी दिखेंगे, फिर दूर-दूर तक खुदाई की हुई उजाड़ जमीन और चारो ओर लाल धूल का गुबार, जो लोहे के खनन और ढ़ुलाई के कारण यहां के आसमान में फैला रहता है। क्योंकि इसी बेल्लारी और इससे सटे चित्रदुर्गा और तुमकूर में देश के बेहतरीन लोहे का भंडार है।


दरअसल, बचपन से हम जो भारत के बारे में पढ़ते आ रहे हैं वही बात बेल्लारी पर भी लागू होती है- बेल्लारी तो अमीर है लेकिन बेल्लारी के लोग गरीब। कभी अंग्रेजों के बनवाए कुख्यात जेल और अपनी भीषण गर्मी के लिए प्रसिद्ध बेल्लारी अपनी जमीन में बेशकीमती खजाना होने के बावजूद एक गुमनाम सा ही शहर था। लेकिन 1999 में सोनिया गांधी ने यहां से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला करके और मुकाबले में भाजपा ने सुषमा स्वराज को खड़ा करके उनींदे और पिछड़े़ बेल्लारी को सुर्खियों में ला दिया। यहां के रेड्डी बंधुओं के सिर पर सुषमा स्वराज ने हाथ क्या रखा बेल्लारी का लोहा उनके लिए सोना बनने लगा। वर्तमान में येदुरप्पा सरकार में मंत्री, करूणाकर, सोमशेखर और जर्नादन रेड्डी और इनके साथ श्रीरामलू ने बेल्लारी में चिट-फंड के अपने पिटे कारोबार को छोड़कर 2002 में खनन उद्योग में हाथ डाला। 2008 में चीन में होने वाले ओलंपिक खेलों के कारण लोहे की मांग और दाम दोनों आसमान छूने लगे जिसका भरपूर फायदा इनलोगों ने अपनी खनन कंपनी ओबूलापूरम माईनिंग जिसे बेल्लारी से सटे आन्ध्रप्रदेश के अनंतपूर में खनन लीज हासिल था, के मार्फत बेल्लारी की सीमा में अतिक्रमण कर लोहे का अवैध खनन और निर्यात करके उठाया।

आज बेल्लारी की सड़कों पर महंगी विदेशी कारें, निजी हेलीकॉप्टर, आलीशान बंगले और गेस्ट हाउस आम बात है, लेकिन बेल्लारी के लोगों की जिंदगी और बदतर हो गई। अब इन्हें साफ पानी, साफ हवा भी मयस्सर नहीं है, जंगल और जमीन तेजी से घटते जा रहे हैं, प्राकृतकि संपदा चाहे वो पेड़-पौधे हों या संरक्षित विलुप्तप्राय जीव सब खत्म होते जा रहे हैं। बेल्लारी का पारिस्थितकी संतुलन बिगड़ गया है। पिछले कई सालों से वहां सूखे के हालात हैं। कर्नाटक मानव विकास रिपोर्ट 2005 की सूची में बेल्लारी राज्य के 27 जिलों में 18वें स्थान पर है। साक्षरता, स्वास्थ्य, पेय-जल की उपलब्धता के मामले में यह निचले पायदान पर है। जबकि यहां के लोगों की औसत आय राज्य के लोगों के औसत आय से उपर है यानी जिनके पास है बहुत ज्यादा है बाकी के पास कुछ नहीं है। खनन ने बाकी आबादी के रोजगार खेती से भी उन्हें बेदखल कर बेरोजगार बना दिया है वो अलग से। लेकिन और कुछ हो या न हो अब 900 एकड़ जमीन पर 140 करोड़ की लागत से नया हवाईअड्डा जरूर बनने जा रहा है।



अवैध खनन से राज्य के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हुआ उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अवैध खनन ने कर्नाटक के 2,800 एकड़ वन्य-भूमि का विनाश किया है। जो देश भर में खनन से वन्य-भूमि को हुए नुकसान का दस प्रतिशत है। और आकलन के मुताबिक ओबुलापूरम माईनिंग कंपनी ने 2003 से अब तक कर्नाटक से 30 मिलीयन टन लोहे का अवैध खनन और फिर निर्यात कर राज्य को भारी राजस्व नुकसान दिया है। दूसरे शब्दों में बेल्लारी का अवैध लौह-खनन मसला दरअसल देश का सबसे बड़ा घोटाला है जो कम से कम 30 से 60 हजार करोड़ के बीच का है।

बहरहाल, पिछले दस साल से कर्नाटक की राजनीति में लोहे का अवैध खनन और इसका पैसा अहम किरदार बन चुके हैं। और रेड्डी बंधु बेल्लारी ही नहीं बंगलूरू में भीं अपनी बादशाहत कायम कर किंगमेकर बन बैठे। आन्ध्रप्रदेशा  में कांग्रेस के स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी के करीबी और उनके बेटे जगनमोहन के व्यावसायिक साझीदार रेड्डी बंधुओं ने कर्नाटक में येदुरप्पा सरकार की नींव अपने पैसों के बल पर समर्थन खरीद कर ही डाली थी। और हमेशा के लिए येदुरप्पा सरकार की गले की फांस बन गए, जिन्हें खुष करके रखना सरकार की मजबूरी है। रेड्डी बंधुओं की कहानी पैसों के ताकत की कहानी है जिनसे सभी राजनीतिक-दल प्यार करने के लिए नफरत करते हैं या नफरत करने के लिए प्यार। येदुरप्पा ब्लैकमेलिंग के कारण उनसे पीछा छुड़ाना चाहते हैं लेकिन छुड़ा नहीं पाते। कांग्रेस को राजशेखर रेड्डी के समय में रेड्डियों से कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन अब जगनमोहन आन्ध्र में कांग्रेस की गले की हड्डी है और जगनमोहन की औकात रेड्डी बंधुओं के कारण ही है ऐसे में केन्द्र को अब रेड्डी बंधुओं पर शिकंजा कसने की जरूरत महसूस हो रही है।

दरअसल, यह मुद्दा अब इतना बड़ा हो चुका है कि केन्द्र सरकार भी कई राज्यों और खासकर कर्नाटक में अवैध खनन रोकने के लिए नया कानून लाने जा रही है

इधर कर्नाटक सरकार ने राज्य में लोहे के निर्यात पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। साथ ही लोहे व अन्य खनिजो के अवैध खनन और निर्यात की जांच के लिए एक 14 सदस्यीय विशेष पैनल का गठन किया है। यह समिति इसका आकलन करेगी कि खननकर्ताओं ने कितनी मात्रा में लौह-अयस्क का खनन किया, कितना निर्यात किया और कितना घरेलू इस्पात कंपनियों को दिया। साथ ही खनन फर्मो के द्वारा राज्य सरकार को कितनी रायल्टी का भुगतान किया गया। इसके अलावा समिति लोहे के अवैध परिवहन को रोकने के लिए बनाए गए 13 नए चेकपोस्ट पर भी नजर रखेगी। हालांकि खनन पर रोक लगाने से खान मालिक 300 करोड़ प्रति सप्ताह के नुकसान की बातें कर रहे हैं। लेकिन राज्य के सभी जिलों में ज्यादातर खान मालिकों के द्वारा इसका पालन हो रहा है। केवल बेल्लारी से सटे संदुर में अब भी इसका उल्लंघन हो रहा है।

बहरहाल, कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की पहल से भी कर्नाटक और खासकर बेल्लारी में जारी लोहे के खेल पर सभी का ध्यान गया है, अब चाहे जो हो, लेकिन बेल्लारी और राज्य के लोगों में इसके प्रति नाराजगी अब दिख रही है। कांग्रेस की इसी मुद्दे पर बेल्लारी चलो पदयात्रा को मिली सफलता इसका प्रमाण है।
( Public Agenda के लिए )

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

हरा भ्ररा ,प्लास्टिक मुक्त गांव

(Published in Public Agenda)
कर्नाटक के बंतवाल तालुके का इरा गांव युं तो भारत के किसी भी आम गांव जैसा ही है पर कुछ बातें इसे न सिर्फ देश बल्कि दुनियां में एक खास गांव बनाती हंै।  इरा, आज भारत का पहला प्लास्टिक मुक्त गांव है। प्लास्टिक मुक्त ग्राम होने के अलावा इस गांव की अन्य उपलब्धियां भी काबिलेगौर हैं। इरा को केन्द्र सरकार का निर्मल ग्राम पुरस्कार भी मिल चुका है। संपूर्ण साक्षर और पूर्णत: भ्रष्टाचार व बालश्रम मुक्त इस गांव से पिछले तीन साल से सौ प्रतिशत टैक्स कलेक्शन  हासिल हुआ है। इसके अलावा यह देश का पहला डिजीटल ग्राम पंचायत भी है। इरा ग्राम पंचायत दुनियां के अन्य देशों के लिए भी आज रोल-माडल बन चुका है। यूनिसेफ के 20 प्रतिनिधियों की टीम ने भी इस गांव का दौरा किया जिसमें जिम्बाबे, जाम्बिया, नाइजीरिया और इंडोनेशिया जैसे देशाे के प्रतिनिधी शामिल थे।
दरअसल, सरकार और स्थानीय लोगों की भागीदारी से इस छोटे से गांव ने विकास और सफलता की जो बड़ी कहानी लिखी है वह कृष्णा मूल्या और ‘शीना शेट्टी जैसे लोगों और उनके संगठनों के जिक्र के बगैर अधूरी है। कर्नाटक के दक्षिणी कन्नडा जिले में एक दशक से भी ज्यादा समय से काम कर रहे जन शिक्षण ट्रस्ट के कृष्णा मूल्या और शीना शेट्टी बताते हैं सरकार और नागरिक सहयोग से केवल इरा गांव ही नहीं बल्कि पूरे बंतवाल तालुके की तस्वीर अब बदल रही है। वर्ष 2005 में संपूर्ण स्वच्छता आंदोलन के साथ उनके संगठन ने इस क्षेत्र में केन्द्र की एक नोडल एजेंसी के तौर पर काम करना शुरू  किया और अपना देश नाम से एक आंदोलन चलाया। मूल्या और ‘शेट्टी बताते हैं अपना देश आंदोलन आदर्श  गांव बनाने का आंदोलन है। यह स्थानीय लोगों की भागीदारी से विकास के लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास है जिससे न सिर्फ लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आयी है बल्कि अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की समझ भी पैदा हुई है। दरअसल, अपना देश आंदोलन अपनी स्थानीय समस्याओं को खुद ही हल करने करने का आंदोलन है। वे कहते हैं इरा के कायाकल्प की कहानी की शुरूआत भी वर्ष 2005 में केन्द्र सरकार के संपूर्ण स्वच्छता आंदोलन के क्रियान्वयन के साथ शुरू हुई। जिसका लक्ष्य निर्मल ग्राम और ग्रामीण विकास के सपने को साकार करना था। लेकिन पिछले दो साल से प्लास्टिक के दुष्प्रभाव और इससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान  के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के अभियान पर काफी जोर डाला गया, स्थानीय लोगों में इसका काफी गहरा असर हुआ, जिसका परिणाम है आज इरा लगभग प्लास्टिक मुक्त गांव बन चुका है। पालीथिन की थैलियां यहां वर्जित है, धार्मिक स्थलों पर भी प्लास्टिक की जगह कपड़े की थैलियों का प्रयोग होता है हांलाकि अभी भी दवाईयों इत्यादि के लिए प्लास्टिक का प्रयोग होता है। इरा गांव के प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र होने का असर भी अब दिखने लगा है, न सिर्फ गांव की हरियाली में इजाफा हुआ है बल्कि पानी भी पूर्णत: प्रदूषन मुक्त हो गया है। शेट्टी और मूल्या कहते हैं इरा गांव की सफलता और समूचे बतंवाल तालुके में आए बदलाव में भरतलाल मीणा और वी.पी बालिगर जैसे प्रशासनिक अधिकारियों की अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके अलावा इलाके के सभी राजनीतिक दलों ने भी दलगत राजनीति से उपर उठकर क्षेत्र के लिए काम किया है और धर्म, जाति व क्षेत्र की राजनीति से अलग विकास की राजनीति की है। नतीजा बंतवाल तालुके के 45 ग्राम पंचायतों में से आज लगभग 20 गांव आदर्श गांव में तब्दील हो चुके हैं।