बुधवार, 15 अप्रैल 2015

वो लिखते भी हैं और लड़ते भी


(दैनिक भास्कर रस-रंग में प्रकाशित ,
यहाँ असंपादित )
साहित्य किसी भी समाज और संस्कृति का आईना होता है, हमारी असली कहानियां इनमें ही होती है। मुख्यधारा का समाज और राजनीति हमेशा  बर्चस्ववादी होती है और साहित्य हाशिए के समाज, हाशिए के लोगों की आवाज होता है। जो लिखा गया है या लिखा जा रहा है भले उसे मिटाया जा सकता है, नष्ट किया जा सकता है लेकिन उसे अनलिखा कभी नहीं किया जा सकता, कहीं न कहीं वो किसी रूप में मौजूद रहेगा ही। इसलिए व्यवस्था को अगर समाज का सच लिखनेवालों से खौफ रहता है तो वही लेखक उनलोगों का नायक होता है जिनकी तकलीफों, पीड़ाओं और सरोकारों को वो शब्द देता है। एक लेखक, साहित्यकार की हैसियत अपने समय के समाज की सामूहिक चेतना के तौर पर होती है और ये तभी होता है जब उसकी जड़ें अपने लोकजीवन और अपनी मिट्टी में बहुत गहरी हो।
लेकिन दूसरी ओर किसी समाज की परिपक्वता, सहिष्णुता और बौद्धिकता का एक पैमाना ये भी होता है कि वो अपने लेखकों और साहित्यकारों का कितना सम्मान करता है। कह सकते हैं, एक लेखक और समाज दोनों एक-दूसरे के प्रतिबिम्ब होते  हैं। मसलन, पिछले कुछ सालों में हमारे परिवेश में असहिष्णुता  किस कदर बढ़ी है, इसका अंदाजा लेखकों, साहित्यकारों पर लगातार हो रहे हमलों से भी लगाया जा सकता है। अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार हमले हो रहे हैं खासतौर पर दक्षिण भारत या क्षेत्रीय भाषाओं  के लेखको पर। हाल ही में तमिलनाडू में पेरूमल मुरूगन पर उनकी किताब  ‘वन पार्ट वुमैन’ के कारण घातक हमले हुए, उनकी पत्नी पर भी हमला हुआ और दोनों को अस्पताल तक जाना पड़ा। ठीक इसके एक हफ्ते बाद फिर तमिलनाडू में ही एक और लेखक पुलियार मुरूगेषन अपने कहानी संग्रह ‘ आई हेव अनदर नेम बालाचंद्रन’ के कारण निशाना बनें। सूची यहीं खत्म नहीं होती,  जनवरी में दलित लेखक दुरई गुना और उनके पिता पर हमले हुए उनकी किताब ‘उरार वराईन्थिा ओवियम’ के विरोध में। 2002 में एच जी रसूल को अपने कविता संग्रह मायीलांजी के कारण माफी मांगने को बाध्य होना पड़ा, के सेंन्थिल मल्लार की किताब की  को 2013 में तमिलनाडू सरकार ने  प्रतिबंधित कर दिया । और 2012 में लेखक मा मू कन्नन के घर को जला दिया गया।
कर्नाटक में पिछले साल यू आर अनंतमूर्ति को उनके मोदी विरोधी बयान पाकिस्तान चले जाने की नसीहत दी गयी और खतरे के कारण उन्हें अपने ही घर में पुलिस की सुरक्षा में रहना पड़ा जबकि अपने जीवनकाल में कर्नाटक और बंगलूरू के सार्वजनिक मंचों पर  वो सबसे मुखर आवाज रहे थे, बंगलूरू के लोगों ने भी उन्हें उतना ही सम्मान भी दिया था।  पिछले ही साल कन्नड़ लेखक कालबुर्गी को भी अपनी एक टिप्पणी के कारण विरोध का सामना करना पड़ा था। और 2014 अप्रैल में मैंगलोर के सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक सौहार्द पर लिखने वाले सुरेश  भाट बकराबैल बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के हमले के शिकार हुए थे। ताजातरीन मामला   81 वर्षीय  कन्नड़ लेखक इतिहासकार एम चिदानंद मुर्ति का है जिन्हें बंगलूरू में मुख्यमंत्री सिद्धारम्मैया की मौजूदगी में एक समारोह से सरकारी फैसले के विरोध के कारण हाथापायी करके  निकाल दिया गया। और केरल की अरूंधती राॅय तो हमेशा  पूरे देश में ऐसे हमलों के केन्द्र में रहती आयी हैं, मराठी विचारक और लेखक गोविंद पानसरे की हत्या को भी अभी ज्यादा समय नहीं बीता है।
अब सवाल ये है कि आखिर क्यों अभिव्यक्ति की आजादी इतने खतरे में है खासतौर पर क्षेत्रीय भाषा का साहित्य और उसके लेखक। उसका एक जवाब ये है कि क्षेत्रीय भाषाओं खासकर दक्षिण के साहित्यकारों का अपने समाज पर गहरा असर रहा है, इसलिए जब वो किसी की आवाज बनकर लिखते हैं तो दूसरा समूह उनके विरोध में उतर आता है। उपर जितने वाकयों का जिक्र है, उन सबमें एक ओर अगर इनका विरोध हुआ है तो दूसरी ओर बड़ी संख्या में लोग इनके साथ भी खड़े हुए हैं। पेरूमल मुरूगन की ही बात करें, उन्होंने विरोध के बाद ये घोषणा  की कि, लेखक मुरूगन की मौत हो चुकी है, जो जीवित है वो केवल शिक्षक पेरूगल मुरूगन है, इस पर हजारों लोगों उनसे उसी किताब का दूसरा भाग लिखने का भी अनुरोध किया।
लेकिन  हिंदी में ऐसा बिल्कुल नहीं है, हाल फिलहाल में आपको ऐसी कोई किताब नहीं याद आएगी जिसका इस कदर विरोध हुआ हो या ऐसा कोई लेखक, साहित्याकार का नाम याद नहीं आएगा जिसकी लोगों में इतनी स्वीकार्यता हो कि एक साथ बड़े स्तर पर लोग विरोध और समर्थन में उठ खड़े हों, ऐसा क्यों है? हिंदी के सम्मानित और बड़े कवि मंगलेश  डबराल कहते हैं, हमारे क्षेत्रीय भाषा  के लेखक अपने परिवेश  और लोगों से गहरे जुड़े हुए हैं, उनमें एक किस्म का ‘सेंस आफॅ बिलाॅगिंगनेस’ है। जबकि हिंदी लेखकों का दुर्भाग्य है कि उनका कोई समाज नहीं है, ये नागर भाषा  है और नगरीकरण बहुत हालिया प्रक्रिया है । हिंदी बहुत बड़ी भाषा  तो है लेकिन ये किसी की मातृभाषा  नहीं है,  हम सब की अपनी कोई अलग मातृभाषा  है जैसे मेरी ही गढ़वाली है, ये बहुत बड़ी बिडंबना है। मराठी, बंगला, मलयालम, कन्नड़, तमिल के लेखक अपनी जड़ों से अपनी पूरी परंपरा और विरासत के साथ जुड़े हैं इसलिए उनका लोगों में सम्मान है। इन सभी के लिए भाषा  ही उनका घर है जबकि भाषा  में घर होने की कल्पना हिंदी में नहीं है।
लेखक, कवि और वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन  भी मानते हैं कि वाकई हिंदी में विद्रोही लेखन नहीं है, हाल में ऐसा कुछ नहीं लिखा गया जो समाज को झकझोर दें और जिसका विरोध हो, वो मानते हैं कि हिंदी के लेखकों का अपने समाज से कटाव लगातार बढ़ा है लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि हिंदी लेखन कमजोर है। वो कहते हैं, हिंदी में बहुत अच्छी कविताएं लिखी जा रही हैं जिनमें मौजूदा समय बहुत संवेदनशीलता के साथ दर्ज हो रहा है, लेकिन इन्हें कोई पढ़ता नहीं है। हिंदी का लेखक अपने समाज को समझता तो है लेकिन दूर से किसी सैटेलाईट की तरह। लेकिन कुछ दोष  हिंदी के पाठकों का भी है, हिंदी का मध्यवर्ग बहुत सयाना हो गया है उसे कैरियर के आगे सामाजिक आंदोलनों से ज्यादा सरोकार नहीं है, मनोरंजन के लिए किताबें नहीं फिल्में हैं उनके घरों में हिंदी की मौजूदगी बगैर साहित्यक संस्कार के है और स्कूलों में सिर्फ अंग्रेजी है। जाहिर है ऐसे में अपनी भाषा का साहित्य उनके चेतन अवचेतन दोनों में एक सिरे से अनुपस्थित रहेगा ही।      

गुरुवार, 12 जून 2014

कुदुंबश्री, विकास का केरल मॉडल !

तरक्की और विकास की पहली शर्त है लोगों का जागरूक और शिक्षित होना, केरल की साक्षरता दर भारत के सभी राज्यों में सबसे अधिक रही है और यही वजह है कि यह भारत के सबसे विकसित राज्यों में से रहा है। देश का सबसे शहरीकृत राज्य होने के साथ साथ केरल ही ऐसा राज्य है जहां शहर और ग्रामीण जीवनशैली में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है और राज्य के सभी जिलों के हर पंचायत में कम से कम एक शैक्षणिक संस्थान और स्वास्थ्य केन्द्र जरूर होता है। लेकिन बेरोजगारी केरल की सबसे बड़ी समस्या रही है 17वीं शताब्दी से ही यहां से  रोजगार की तलाश में प्रवास शुरू हो चुका था। लेकिन पिछले पंद्रह सालों में केरल में गरीबी हटाने और महिलाओं को सशक्त बनाने का काम जमीनी स्तर पर हुआ है जिसका असर अब दिखने लगा है।  कुदुम्बश्री के मार्फत केरल में न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं का अव्वल तरीके से क्रियान्वयन हुआ है बल्कि पंचायती राज की अवधारणा की जड़ें भी मजबूत हुई है। धान की खेती पर निर्भर यहां के गरीब और भूमिहीन किसानों को वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराने के लिए अस्सी के दशक में उन्हें स्व सहायता समूह के बारे में बताया गया और माईक्रोफाईनांस योजनाओं को लागू करने की शुरूआत की गई। और अगले कुछ सालों में  गरीबी को समझने के साथ गरीबी उन्मूलन के लिए भी एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित किया गया। 1994 में इन्हीं अनुभवों के आधार पर पहली बार  केरल में सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए महिला आधारित सामुदायिक संरचना विकसित की गयी। 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण की शुरूआत हुई व पंचायत और नगरनिगम जैसे स्थानीय स्वशासन निकाय मजबूत हुए। इसी दौरान 1998 में गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण के लिए सामुदायिक नेटवर्क के तौर पर कुदुंबश्री की शुरूआत हुई, जिसका लक्ष्य स्थानीय स्वशासी निकायों के साथ मिलकर गरीबी उल्मूलन और महिला सशक्तिकरण के लिए काम करना था। 1998 से अब तक कुदुंबश्री की लगातार कई उपलब्धियां रही हैं संयुक्त राष्ट्रसंघ समेत कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अवार्ड इसे हासिल हुआ है। साथ ही इसे एशिया  का सबसे बडा महिला आंदोलन भी कहा जाता है।
दरअसल, कुदुंबश्री की खासियत रही है गरीबी हटाने की प्रक्रिया पर काम करना ना कि परियोजना पर। इसलिए 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, हर जिले की सभी पंचायतों के सभी वार्ड में इसकी पहुंच है। इसके तहत 1.87 लाख पड़ोस समूह हैं, सत्तरह हजार क्षेत्र विकास समाज या एडीसी हैं और 1,058 समुदाय विकास समाज या सीडीएस ग्रामीण व शहरी हैं। कुदुंबश्री के मार्फत पड़ोस समूह के सदस्यों में अब तक 2,818 करोड़ की राशि बतौर ऋण बांटी जा चुकी है। इसी का नतीजा है कि केरल में जमीन कम होने के बावजूद 47 हजार महिला किसान हैं जो लीज पर खेत लेकर धान की खेती करती हैं। पहले दस रूपए भी जिनके पास नहीं हुआ करते थे उनके अब खुद के पक्के मकान हैं। कुल सवा तीन लाख किसान इसके दायरे में हैं और लीज पर 65 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती की जा रही है, इसके कारण पलायन भी रूका है। कुदुंबश्री माॅडल की एक सफलता ये भी है कि सदस्य ऋृृण वापसी के मामले में नियमित और अनुशासित हैं इसलिए निरंतरता बनी रही है अतंतः जिसका फायदा सदस्यों को ही हो रहा है।
कुदुंबश्री के द्वारा केवल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ही काम नहीं किया गया है बल्कि युवाश्री जैसे विशेष  रोजगार कार्यक्रम के जरिए साढ़े तीन सौ से ज्यादा सामुहिक और सवा तीन सौ के करीब निजी उद्यमों को शुरू किया गया। बेसहारा लोगों के लिए आश्रय कार्यक्रम को 745 स्थानीय निकायों में लागू किया गया और करीब साठ हजार बेघर बेसहारा लोगों का पुर्नवास किया गया। इसके अलावा भावनाश्री गृृह लोन योजना के तहत पैंतालीस हजार से ज्यादा गरीब लोगों को घर बनाने के लिए ऋृृण मुहैया कराया गया।  कुदुंबश्री के मार्फत केरल में केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं के बेहतरीन क्रियान्वयन के कारण दो साल पहले ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार मिशन ने इस माॅडल को पूरे देश में लागू किए जाने की सिफारिश की थी। फिलहाल पांच राज्यों में कुदुंबश्री माॅडल लागू किए जाने पर सहमति भी बनी है।
 





कुदुंबश्री की कार्यकारी निदेशक के बी वल्सला कुमारी से बातचीत
कुदुंबश्री के मार्फत केरल में काफी पहले से केरल में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। हाल के दिनों में और कौन कौन सी शुरूआत की गयी है?
- पिछले पंद्रह सालों में कुदुंबश्री के मार्फत केरल में बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार देकर और आत्मनिर्भर बनने के मौके मुहैया कराकर उनका सशक्तिकरण किया गया है। करीब 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, जो चालीस लाख परिवारों को सशक्त बना रही हैं और साबुन निर्माण व खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक करीब पचास हजार लघु उद्यमों के मार्फत आर्थिक समृृद्धि की कहानी लिख रही हैं।कुदुंबश्री के खाद्य उद्योग को इसी साल दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला में स्वर्णपदक हासिल हुआ है। हाल ही में कुदुंबश्री की ओर से पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित टैक्सी सेवा शुरू की गई है,इससे पहले पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित कुदुंबश्री कैफे भी बहुत सफल रहा है, इसलिए कुदुंबश्री कैफे का और विस्तार किये जाने की घोषणा हुई है। इसके अलावा हमने केरल वेटेरनरी एंड एनीमल साईंस यूनीवर्सिटी के साथ भी समझौता किया है जिसके तहत किसी कारण से पेशेवर उच्च शिक्षा नहीं हासिल का पायी महिलाएं पशुपालन या इससे संबंधित विषयों में डिप्लोमा हासिल कर खुद अपना व्यवसाय कर सकें। दरअसल, कुदुंबश्री की दस्तक खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक है और हर क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तिकरण में यह बेहद कारगर साबित हो रही है। पिछले डेढ़ साल से मै इससे जुड़ी हंू और मेरे लिए ये गर्व की बात है।

इस माॅडल की संरचना किस तरह की है?
-बिल्कुल जमीनी स्तर से हमारी पकड़ है, केरल की 62 फीसद से ज्यादा आबादी  इसके दायरे में हैं। सबसे पहले समुदाय के स्तर पर ग्रामीण या शहरी इलाकों में 10 से 20 महिलाएं जुड़कर आपस में समुदाय बनाती हैं, जिसे पड़ोस समूह कहा जाता है, इस समूह के द्वारा स्वबचत की शुरूआत होती है,ं फिर बैंकों से इन्हें जोड़ा जाता है और बैंक इन्हें इनके काम के लिए लोन देना शुरू करता है। एक पंचायत या नगरपालिका में कई पड़ोस समूह होते हैं जिसे एरिया डेवलपमेंट सोसाईटी या एडीएस कहते हैं, एडीएस के उपर सीडीएस होता है। सीडीएस दातव्य न्यास के तहत रजिस्टर्ड संस्था होती है और सामाजिक न्याय व पंचायत मंत्रायल के अधीन हैं।
गरीबी उन्मूलन के लिए केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं चलायी जा रही हैं, कुदुंबश्री उसी का विस्तार है?
-पूरी तरह से ऐसा नहीं है, केन्द्र और राज्य सरकार दोनों की ओर से इसे फंड मिलता है पर ये एक अलग माॅडल है, केन्द्र सरकार की नारेगा और मनरेगा जैसी योजना लागू करने में केरल पूरे देश में अव्वल रहा हैं तो उसकी वजह कुदुंबश्री है, हम पंचायत स्तर पर लोगों को केन्द्र और राज्य सरकार की सभी योजनाओं की जानकारी देते हैं और उसे कैसे लागू कराना है इसमें मदद करते हैं। हालांकि आन्ध्र प्रदेश का गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम भी बहुत सफल हो रहा है पर वो दस हजार करोड़ की ऋृण राशि के साथ एक वित्तीय माॅडल है और कुदुंबश्री 7 सौ करोड़ ऋृण राशि के साथ एक सामाजिक माॅडल। इसके तहत केवल महिला सशक्तिकरण ही नहीं बच्चों, बुढ़ों, असहायों, बेघर बेसहारा सभी के लिए योजनांए हैं और उन्हें लागू भी किया गया है। पूरे राज्य के सभी जिलों के सभी पंचायतों में इसकी मौजूदगी है फिलहाल केवल दो प्रतिशत जनसंख्या ही इसके दायरे से बाहर है।    
कुदुंबश्री को इसी हफ्ते साल 2013-14 के हडको राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित किया गया ये एक और उपलब्धि है?
-बिल्कुल, यह सम्मान कुदुंबश्री को महिलाओं की आर्थिक दशा सुधारने की दिशा में उल्लेखनीय काम करने के लिए मिला है। कुदुंबश्री ने आमदनी सुनिश्चित करने वाली सर्वोत्तम परियोजनाएं लागू करके यह लक्ष्य हासिल किया है। हमने निर्माण क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं के हुनर को तराशने और उनके लिए बेहतर संभावनाएं बनाने के लिए एरनाकूलम में कुदुंबश्री वुमैंस  कंस्ट्रक्शन ग्रुप परियोजना लागू किया, जिसे एक नयी शुरूआत कहा जा सकता है, इसके तहत निर्माण क्षेत्र में काम कर रही इंजीनियर, सुपरवाईजर और राजमिस्त्री का काम करने वाली महिलाओं को इसी क्षेत्र के अनुभवी लोगों के द्वारा विषेशज्ञ प्रशिक्षण मुहैया कराया गया। जिसका फायदा भी हुआ। फिलहाल इस समूह के पास 87 गृह निर्माण परियोजना का अनुबंध है। 

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

हमारे चरित्र का सबसे क्रूर,शोषक,निर्दयी और बेईमान पक्ष  !

बराबरी की किताबी बातें पढ़कर बड़े हुए हैं हम, नहीं तो हम उस समाज और संस्कृति से आते हैं जहाँ अपनी गंदगी साफ़ कराने के लिए हम अपने जैसे ही दूसरे इंसान को मजबूर करते आये हैं पहले वर्ण व्यवस्था के नाम पर और बाद में सरकारी नौकरियों में सफाई कर्मचारी के तौर पर इस तरह की नौकरियां किसी ख़ास जाति के लिए मुक़र्रर करके ! मेरे पापा इंडियन ऑइल में काम करते थे और हम उसी के टाउनशिप में रहते थे, छोटा सा सुन्दर सा टाउनशिप पर वहां के लोग अपने टॉयलेट खुद साफ़ नहीं करते थे, हफ्ते में दो दिन इंडियन ऑइल का सफाई कर्मचारी आकर टॉयलेट क्लीन करता था तो लोगों के टॉयलेट साफ़ होते थे, उसके आने का रास्ता पीछे का दरवाज़ा होता और कुछ लोग कुछ और एक्स्ट्रा काम कराने के बाद पैसे देते तो कभी उनसे वापस छुट्टा नहीं लेते, मुझे हमेशा बहुत बुरा लगा ये,शायद अब भी वहां ऐसा ही हो रहा हो! मेरे पापा खुद से टॉयलेट क्लीन करते थे , माँ को ये बताने समझाने में वक़्त लगा पर जबसे मुझे सफाई का होश हुआ मैंने हमेशा अपना बाथरूम, टॉयलेट खुद साफ़ किया मेरे भाई बहन ने भी, वहां हमारा घर शायद सबसे साफ़ टॉयलेट वाला घर हुआ करता था, बहरहाल हमारे स्कूल की एक महिला सफाई कर्मचारी की बेटी जो बाद में उसी इंडियन ऑइल में इंजीनियर हो गयी, उसकी नौकरी और सफलता पर लोगों के जातिगत दुराग्रह और रिज़र्वेशन वाले कमेंट भी सुने पर किसी को भी सफाई के काम वाली नौकरी में आरक्षण नहीं चाहिए था, सफाई कर्मचारी के बच्चे सफाई कर्मचारी ही बनें उनकी बराबरी और न्याय का सिद्धांत यहीं तक था !
महानगरों की कितनी भी बुराई करें हम पर यही वो जगह है जहाँ हाशिये के सभी लोगों को अपना स्पेस मिलता है चाहे वो कस्बाई शहरों की लड़कियां हों या सवर्णों के द्वारा किनारे कर दिए गए अनुसूचित जाती के लोग, जब से महानगरों के इस फ़्लैट सिस्टम में रह रही हूँ ज्यादातर लोगों को अपना बाथरूम खुद साफ करते देख रही हूँ ! लेकिन अब भी मुझे समस्या है किसी काम को किसी जाति के साथ हमेशा के लिए नत्थी कर देने से ! मुझे वो दिन सबसे बराबरी का लगेगा जब अम्बानी जैसे लोगों को भी अपनी जगह, अपनी गन्दगी खुद से साफ़ करनी पड़े! हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए बाबा साहेब जैसे नायक का जिन्होंने हमें हमारे चरित्र का सबसे क्रूर,शोषक,निर्दयी और बेईमान पक्ष दिखाया !

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

'हाईवे 'सदियों की घुटन के लिए सदियां लगेंगी !

कुछ फ़िल्में आपके भीतर पहले से ही होती हैं ये और बात है परदे पर उसे कोई और उतार देता है , इम्तियाज़ अली की हाईवे देखकर कुछ ऐसा ही लगा, ऐसी फ़िल्म जिसे आप हमेशा देखना चाहते रहे हों! धरती के किसी अनजाने कोने के खेत , कोई घर, कोई नदी, कोई नहर, कोई अकेला पेड़, क्षितिज के साथ खड़े पहाड़,जैसे दुनियां इसके आगे हो ही नहीं, या ये कहते मुझमें से झांककर दूसरी ओर देखो और बगैर कुछ सोचे, प्लान किये, कहीं नहीं पहुँचने के लिए चलते दो लोग! कुछ कुछ ऐसा जैसे गहरी नींद में देखें जाने वाले अज़ीब से सपने जिनमें जाने आप कहाँ पहुचें होते हैं और जहाँ तमाम दृस्य बगैर किसी रेफरेन्स के तिलिस्म की तरह आते रहते हैं ! हम सबके भीतर वीरा होती है सोलह साल से अस्सी साल के होंगे तब भी ताज़ी हवा, स्पेस और अपना आज़ाद वक़्त की छटपटाहट वैसी ही होगी , सदियों की घुटन के लिए सदियां लगेंगी ! वैसे इस फ़िल्म ने मुझे भी अपने उन हाईवे की याद दिला दी जिनकी छवियाँ बचपन से मेरे साथ है , मेरा पहला प्यार एन एच 31, मन करता था इसके किनारे किनारे पूरब की ओर चलते रहे तो असम पहुँच जायेंगे और जब भी जीरो माइल पर खड़े होते थे तो 31 की जगह 28 पकड़ कर चले जाने का मन होता था ! और एन 17 अरब सागर के समानांतर हमेशा बस चलते ही जाने के लिए बुलाती सड़क ! आम और आवलां के घने पेड़ों के साये वाले प्रतापगढ़ , फैज़ाबाद की सड़क , मीलों पलाश के फूलों से सजा बरही का एन एच 2 ,और मुगलसराय से कर्मनाशा तक का लॉन्ग ड्राइव जिसके लिए अजय के पापा से बड़ी डाँट पड़ी थी , तब हम दोस्त थे और वो घर से अलीनगर के लिए निकलते समय मुझे साथ बुलाने की गलती कर बैठा, मोबाइल आने से पहले के उस समय में मुगलसराय से कर्मनाशा तक वो भी शाम पांच -छह बजे के बाद के समय में! दोस्ती सबसे अच्छी चीज़ होती है , कोई कुछ भी कर सकता है उसमें :)

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

भूत-वूत होता है या नहीं ?

भूत-वूत होता है या नहीं मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानती न कह सकती हूँ , बचपन के रहस्यमय अनुभवों में २ घटनाएं शामिल हैं और दोनों गावं की है , वहां शाम को इया की ओर से नहर की ओर जाने की मनाही होती थी, कहती थी -पानी में बुडुआ होले सन, जा पानीये में खींच लिह सन ' फिर भी हम गए पूल पर बैठ कर 'सनसेट' देखने के लिए, जैसे सूरज आसमान से गायब हुआ एक काला साया पानी पर चलता हम बच्चों की ओर आता महसूस हुआ , चेचरे-मचेरे मिलाकर हम आठ-दस बच्चे थे , कोई चिल्लाया और हम एक मिनट से भी कम समय में दुआर पर थे  दूसरी घटना मेरे घर काम करने वाले चन्द्रिका की थी जिसे गावं वापस आने के दौरान रात हो जाने पर 'चुपचुपवा डीह' पर रुकना पड़ा वहीँ एक 'पुरनिया पाकड़' के पेड़ के नीचे खैनी बनाकर खाने से पहले उसने 'किसी ' को ऑफर नहीं किया, सुबह जब लौटा तब उसकी आवाज़ बदली हुई थी हर बड़े बुज़ुर्ग सभी को तू-तडाक करके बात कर रहा था और बेहिसाब हँसने लगा था , कोई बाबा आये और विधिवत तरीके से खैनी ऑफर किया गया ,फिर चन्द्रिका की अपनी आवाज़ लौट आयी ! खैर ये सब डर से ज्यादा मज़ेदार अनुभवों का हिस्सा है डर तब लगा जब दस साल पहले दिल्ली के अपने घर में मैंने अकेले 'साइलेंस ऑफ़ द लैम्ब' देख लिया फिर एक हफ्ते तक रात को सो नहीं सकी वो तो शुक्र था उन दिनों एम्स के डाक्टर्स कॉलोनी से उठाया गया 'शेरू 'मेरे साथ साए की तरह रहा करता था ! सालों बाद कल मैंने रोजमेरिज बेबी देखने की कोशिश की आधी फिल्म पर पहुँचने तक फ्रिज की आवाज़ डरावनी लगने लगी, फिर लगा दरवाज़ा खुद ही खुल गया (यहाँ तेज़ हवा के कारण ऐसा अक्सर होता है , पर कल की बात अलग थी ) और सबसे ज्यादा डर तब लगा जब मुझे लगने लगा की एक और कमरे की लाइट मैंने नहीं किसी और ने ऑन कर दी हैं, मेरे अवचेतन में यही था की मैंने सिर्फ अपने पास की छोड़कर सारी लाइट ऑफ कर दी है !अब ये बहुत ज्यादा हो गया था मैंने तुरंत लैपटॉप का फ्लैप बंद किया और एकदम मुहं ढँक कर सो गयी ! हालांकि' हिचकाक' की 'वर्टिगो' भी मैंने देखी है पर उसे देखना मेरे गावं वाले अनुभवों जैसा रहा, पर जो भी हो मूवीज तो मुझे अकेले ही देखना पसंद है पर अगली सायको थ्रिलर अगले दस साल बाद! 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

तुम हो, ये यकीन है मुझे !



                 1

कहना होता है मुझे, छिपा लेता हूँ
सोचता हूँ हर वक़्त पर, सामने झटक देता हूँ
चाहता हूँ सब जिक्र करें तुम्हारा, कर दें कोई,
तो  बन जाता हूँ अनजाना,
ये सब करते हुए जानता हूँ मैं
कितना झूठा हूँ मैं
सौ बार कहता हूँ तुमसे ज्यादा खुद से,
कुछ नहीं हमारे बीच
जबकि सारा दिन कुछ  पलों
की आग में तपता निकाल देता हूँ
मैं डरता हूँ, खुद से ज्यादा तुम्हारे लिए ,
करता हूँ सारे वो  जतन ,जैसे तुम हो ही नहीं
पर,  लौटता हूँ जब रातों को पास अपने
लौट आती हो तुम भी !


              2

कितना त्रासद है
जब हम चाहकर भी,
अपनी कमजोरी
छिपा न सकें,
कमजोरी,
खुद की तकलीफों से,
बाहर नहीं आ पाने की
दुर्बल होना
कितना दयनीय,
कितना दुखद है
तब और भी,
जब अपनी एक दुनिया
सब से छिपाने के लिए ही
बनायी होती है
तुम मिलते हो वहां
उसी पल में
मैं मिलती हूँ वहां
उसी मौसम में
लौटते तो कई बार हैं
पर, खिंच जाता है
वो पल, वो मौसम
हर बार वर्तमान में ! 
     

         3

तुम्हें सुनते हुए
तुम्हें कहते हुए
छलक जाती हैं
आँखें,
रह जाते हैं लगभग सारे
जरूरी शब्द गले तक
और,,,,,सारे  बेमतलब
बाहर !
तुम्हे प्यार करते हुए
आसमान की चाहत में
हो जाती हूँ मैं धरती
भूल जाती हूँ
उन तमाम तकलीफों को
जो लगा मुझे
तुम जानकार भी नहीं जानते
बावजूद इसके हर बार
सौपना चाहती हूँ मैं तुम्हें
अपनी सारी खुशबू , सारे रंग
और सारे गीत
बदले में तुमसे नहीं
इश्वर से कहती हूँ
तुम हो, ये यकीन है मुझे !


रविवार, 21 अप्रैल 2013

नशा खत्म बस बाकी है हैंगओवर !




मुझे याद है ये 2006 के आखिरी दिनों की बात है जब मैंने ऑरकुट के बारे में जाना , अजय का अकाउंट था और मुझे बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि इसके जरिये अपने भूले-बिसरे दोस्तों को खोजा जा सकता है,  उसी अकाउंट से मैं कुछ मयूचुअल दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों से कनेक्ट हुई ! बाद में अपना अकाउंट खोला  और कुछ  दोस्त मुझसे कनेक्ट हुए और  कुछ से मैं! इसी बीच फेसबुक और ट्वीटर आ गए, वहां भी अपना खाता खोल दिया पर ज्यादा आवाजाही फेसबुक पर ही रही, ट्वीटर पर  सिर्फ उन लोगों को कभी-कभार पढ़ लेने के लिए गयी जिन्हें फॉलो कर रही थी ! फेसबुक के शुरुआती दिन बड़े खुमारी वाले थे दस-दस, पंद्रह साल से जिनके बारे में कुछ सुना नहीं था उन दोस्तों, उनके दोस्तों बच्चों, मियां और बीवी के फ़ोटोज़ देखकर बहुत अच्छा लगता था ! अब जो यहाँ नहीं थे वो ही दूर हो रहे थे, पर साल दो साल होते होते ये सब बोरिंग हो गया ! यहाँ सब अच्छा था, सब लोग खुश, खाते-पीते, छुट्टियाँ मनाते, एन्जॉय करते दिख रहे थे! हिंदी स्कूल वालों की भी अंग्रेजी बहुत अच्छी हो गयी थी, उनके स्टेटस की अंग्रेजी बयां करने लगी थी कि उनका "क्लास " चेंज   हो चूका है ! वैसे यहाँ सब कुछ था पर घंटों बिना कुछ बोले हुए  भी एक दुसरे की उदासियों को पी लेने वाला बेमतलब का  साथ नहीं था!

 नेटवर्किंग साइट्स ने दोस्तों को बदल दिया है, हो सकता है ये मेरा ओब्ज़रवेशन हो पर कहीं कुछ तो बदला जरूर है ! जिन्हें आप बिलकूल नहीं जानते और सिर्फ जिन्हें पढने के लिए आप उनसे कनेक्ट होते हैं उन्हें छोड़ दें,  पर असली दोस्त यहाँ ज्यादा सतही लगने लगे हैं, दोस्ती का मतलब एक-दूसरे की पोस्ट या फोटो को लाइक करना ही रह गया है, कमेंट वाले दिन भी अब बीती बात होने लगे हैं! जबकि ये कितना असहज भी होता है हम ऐसे घरों से आते हैं जहाँ किसी अपने की उनके मुहं पर शायद ही तारीफ़ की जाती है और इन साइट्स के आने से पहले भी हम दोस्तों की तारीफ़ से ज्यादा उन्हें लेकर क्रिटिकल हुआ करते थे , जी भर कर खिंचाई!  स्टेटस लिखकर क्रांति करने या करवा लेने का भ्रम पैदा करने वालों का जादू भी लगभग टूट ही चूका है, असली सेलेब्रिटी कुछ दिन यहाँ आकर चले गए या जो नहीं गए वो जाने की सोच रहे हैं ! समय रहते उन्हें अक्ल आ रही है, ज्यादा आम रहे तो ख़ास नहीं रहोगे, अपने आगे -पीछे की इमेज मिस्ट्री  बरक़रार रहनी चाहिए ! पर पिछले कुछ सालों में बेऔकात वाले कुछ लोगों ने इन नेटवर्किंग साईट'स पर आकर जरूर सेलेब्रिटी दर्ज़ा हासिल कर लिया  इसमें मीडिया वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही है, पांच-पांच  हज़ार की फ्रेंड लिस्ट वाले ये लोग कुछ भी लिख दें कोई भी फोटो लगा दें कमेंट्स और लाइक्स की बरसात होने लगती पर  ये स्थितप्रग  भाव में ही नज़र आते महसूस होते हैं  (लैपटॉप पर शायद मुस्कुराते हों पर वो दीखता तो उनको ही होगा ) और कुछ-एक  को छोड़कर  शायद ही कभी दूसरों की पोस्ट पर गौर फरमाते हो ! बहरहाल, ये एकतरफा कदरदानी भी कब तक चलेगी,  इसलिए सौ -दो सौ और पांच सौ या हज़ार की फ्रेंड लिस्ट वाले भी अब अपने आप को कम नहीं समझ रहे हैं  और इन लोगों का एकाधिकार तोड़ते हुए आपस में ही एक मुचुअल  एडमिरेशन ग्रुप बनाने लग गए हैं, अब शायद इन्हें ज्यादा अच्छा महसूस होने लगा है!
लेकिन आत्मप्रचार और आत्ममुग्धता की भी एक हद होती है आखिर कितने  दिनों और साल तक सिर्फ तारीफें लीं और दीं जा सकती हैं ! अब शायद मोहभंग का दौर आ गया है या आनेवाला है कोई  कितना कहें  और कोई कितना सुने या पढ़े  ...कोई कह कह के खाली हो रहा है और कोई पढ़ पढ़ के सर से पैर तक पक रहा है ! शायद अब जो यहाँ नहीं हैं उन्हें याद करने, उनके पास लौटने के दिन आ रहे हैं, उन बेवकूफियों के पास जो  अंतर्जाल में नहीं बल्कि असली रास्ते के किसी मोड़ पर इत्मीनान से बैठे हुए हैं ! हो सकता है उन्हें किसी का इंतज़ार नहीं हो पर कोई आकर हाथ थामने को मांगे तो पकड़ने की फुर्सत अब भी है उनके पास !  

   








सोमवार, 25 मार्च 2013

सौ दुश्वारियां हैं तेरे ख्यालों की!


     (1)
सुनो.....क्या तुम सुन सकते हो?
मैं चाहती हूँ तुम सुनो मुझे
पता नहीं कब-कब,
क्या-क्या कहते रहे तुम
चलते रहे हम, बढ़ते रहे तुम 
थम सी गयी मैं पर.... 
बड़ी होती गयी मुझमें स्त्री
उफ़! पत्थर सा कठोर है सब आस-पास
फिर भी बचा ही लेती हूँ थोड़ी कोमलता
तुम इतना भी नहीं कर सकते ?

      (2)
हिमालय सा ऊँचा हो
तो भी क्या 
टूटना पत्थरों की नियति है!

      (3)
कुछ अन्धेरें उजालों से ज्यादा रोशन होते हैं,
ये वो अन्धेरें हैं, 
जब पता होता है,
एक-दुसरे को देख नहीं सकते
लेकिन यकीन बना रहता है,
एक-दुसरे को देखते रहने का,
उजालें तो सबके पास होते हैं,
ऐसे अन्धेरें सब सहेजते नहीं !

    (4)
बैठी रही सारा दिन, वैसे ही,
जबकि करने को बहुत कुछ था 
यूँ ही हो गयी दोपहर, फिर हुई शाम,
मैं गयी वहां, जहाँ जाने का कोई अर्थ न था
रही खड़ी वहां , जहाँ खड़ा रहना, 
अक्सर व्यर्थ होता है
सुना लोगों की बातों को 
जिनका कोई मतलब न था !

   (5)
शब्द छु जाते हैं, 
चोट करते हैं,
रुला देते हैं 
फिर नरमी से,
सहला देते है, 
गुदगुदा देते हैं पर..
सबसे ताकतवर होते हैं,
जब भरोसा देते हैं !

  (6)
महत्वकांक्षाएं मेरी सिकंदर सी,
निस्पृहता मुझमें बुद्ध सी
या तो सबकुछ मुझे चाहिए
या फिर
कुछ भी नहीं!

  (7)
दो मुझे सिर्फ अनुराग
ना तो अतृप्त कामना
और ना ही आवारा बैराग
मैं स्वीकारूं बिल्कुल 'अपने' की तरह
दो ऐसी पीड़ा
करो प्यार ऐसे, मिले दुःख मुझे!

  (8)
सौ दुश्वारियां हैं तेरे ख्यालों की ...
रहतें ढूंढती हूँ औरों के फसानों में !

  (9)
बहुत लिखा तुमने, 
यहाँ की वहां की
बस नहीं लिखा तो....
सरगोशियाँ अपने करीब की !

(10)
पुराने कैलेंडर सहेज कर,
रखने की बुरी आदत है मेरी,
सहेज लिया तुम्हें भी,
ओ पुराने वक़्त
जो गुज़रे हो अभी-अभी

(11)

आना जाना लहरों का,
कि‍नारे न जाने मैं कि‍स सोच में,
तहों में कुछ दब सा रहा है
कहीं....................
सहेज कर रखना कि‍श्‍तों में,
मेरा, तुम्‍हें बार बार
जि‍न्‍दगी मतलब तुम्‍हारा
गीले गीले से एहसास
बार बार।

(12)
अनुभवों के अनेकों संस्तरो के बीच 
कभी देखा हैं 
कहाँ हैं, कैसा हैं
हमारा असली मन ?

गुरुवार, 21 मार्च 2013

दक्षिण भारत की अनदेखी होती है मुख्यधारा में!


प्रसिद्ध पार्श्वगायिका एस जानकी को भारत सरकार द्वारा हाल ही में पद्मभूषण  सम्मान देने की घोषणा की गई। लेकिन 75 वर्षीय एस जानकी ने इसे बहुत देरी से मिला सम्मान बताते हुए स्वीकार करने से मना कर दिया। इसी मसले पर एस जानकी की ओर से उनके संगीतकार-अभिनेता बेटे मुरली कृष्णा से मनोरमा की बातचीत।

1.एस जानकी ने पद्मभूषण सम्मान क्यों अस्वीकार कर दिया?
-पचपन साल लंबे संगीत कैरियर में क्या वो इससे पहले किसी भी पद्म सम्मान के योग्य नहीं थी? वो 17 भाषाओं में लगभग 17 हजार से ज्यादा  गाने गा चुकी हैं बावजूद इसके उन्हें इससे पहले पद्म सम्मान के योग्य नहीं समझा गया। और अब इन पुरस्कारों के मुकाबले उन्हें पसंद करने वालों का प्यार उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है।
2. आपके विचार से उन्हें ये सम्मान कब मिल जाना चाहिए था?
-अम्मा ने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली , और ना ही शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण है उनके पास, लेकिन अपने कैरियर के शुरुआत में ही उन्होंने नादस्वरम के साथ ताल मिलाते हुए सुब्बय्या रेड्डी के संगीत में श्रृंगार वेले का कठिनतम गीत गाया। हालांकि उन्हें सुर सिंगार सम्मान, साथ ही केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, उड़ीसा और आन्ध्र प्रदेश जैसे राज्यों का राज्य सम्मान मिल चुका है। देर से भी भारत सरकार की ओर से उन्हें  ये सम्मान कम से कम 10-15 साल पहले मिल जाना चाहिए था। इसके अलावा इस पुरस्कार की सूचना प्रोटोकाल के तहत दी जाती है पर अम्मा के साथ ऐसा नहीं किया गया।
3.दक्षिण भारत की अनदेखी होती है मुख्यधारा में?
-हिन्दी भाषा के अपने फायदे हैं, हिन्दी में किया गया काम पूरे देश में जाना जाता है। दक्षिण भारत की बात करें तो यहां केरल के कलाकारों के बारे में आन्ध्रप्रदेश के लोगों को नहीं पता होता और तमिलनाडू के बारे में कर्नाटक को। हिन्दी का बाजार और पहंुच दोनों विशाल हैं इसलिए पुरस्कारों के नजरिये से इसका पलड़ा भारी रहता है। पी लीलाम्मा का ही उदाहरण लें, वो एस जानकी से वरिष्ठ हैं और उन्होंने ही श्रृंगार वेले गीत के लिए उनका नाम सुझाया था, पर देश में कितने लोग उनके बारे में जानते हैं? ऐसे बहुत से बड़े नाम हैं जिनके काम के बारे में पूरे देश के लोगों को जानकारी नहीं है।
4. सरकार ही नहीं देश की जनता को भी सभी राज्यों के कलाकारों और संस्कृति के बारे में ज्यादा मालूम नहीं होता?
- हां देश के हर हिस्से के लागों को दूसरे हिस्से और वहां के लागों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। ये अपनी साझी विरासत को अगली पीढ़ी तक ले जाने की भी बात है। दरअसल, यहां ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी सरकार और उनके प्रतिनिधियों की है। उन्हें हर राज्य और वहां जो भी उल्लेखनीय काम कर रहा है उसपर फोकस करना चाहिए और सम्मान व पुरस्कारों के संदर्भ में राष्ट्रीय  स्तर पर सभी के काम का मुल्यांकन होना चाहिए।
5.दक्षिण भारत में संगीत के कुछ बड़े नामों की राय में एस जानकी को पच्चीस साल पहले ऐसे सम्मान मिल जाने चाहिए थे?
-वो सही कह रहे हैं, 75 साल की उम्र बहुत बड़ी होती है। आप जब पूरी उर्जा से सक्रिय होते हैं तब आपके काम की सराहना होनी चाहिए। कोई  व्ह्रीलचेयर पर आ जाएं तब उसे सम्मानित करना मुझे तर्कसंगत नहीं लगता। ये तब मिलना चाहिए जब आप उस ख़ुशी का जश्न मनाने लायक हों।
6. और कौन-कौन हैं, जिनके काम की अब तक अनदेखी हुयी है?
-उर्वशी शारदा, पी सुशीला, एम विश्वनाथन  और राममूर्ति ये संगीत के बहुत उंचें नाम हैं। इन्हें बहुत से सम्मान मिले हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर इनके नाम और काम को और सराहना मिलनी चाहिए।

7. अब तक के अपने संगीत कैरियर से वो संतुष्ट हैं?
-बिल्कुल! अम्मा 4-5 साल की उम्र से गा रही हैं, कीर्तन से शुरू  होकर उनकी संगीत-यात्रा 17 भाषाओं में 17 हजार से ज्यादा गीतों तक पहुंच गयी हैं और अभी भी सक्रिय हैं, 1957 से उन्होंने  पार्श्वगायन शुरू किया और तब से लगातार गा रही हैं अस्थमा की गंभीर बीमारी के बावजूद। इस साल भी एक तमिल गीत रिकार्ड हो चुका है। लोगों से बहुत प्यार मिला है जो सबसे बड़ी चीज है।
8.हिन्दी फिल्मों के लिए गाना कैसा अनुभव रहा? वो अपने समकालीनों संपर्क में अब भी है?
-हिन्दी फिल्मों के लिए गाना बहुत अच्छा अनुभव रहा, ओ पी नय्यर साहब ने उनकी आवाज सुनते ही कहा था तुम अब तक कहां थी? मोहम्मद रफी साहब के लिए अम्मा के मन में बहुत सम्मान है। लगभग चार-पांच सौ हिन्दी गाने गाए हैं अम्मा ने । और सबसे अच्छी बात रही बहुतों के बच्चों के साथ भी काम किया मसलन किशोर कुमार और अमित कुमार,येसुदास और फिर उनके बेटे के साथ। लेकिन हिन्दी फिल्मों के लिए 6-7 साल से गाने नहीं गा रही है। लेकिन पिछले 6-7 साल से हिन्दी फिल्मों के लिए गाने नहीं गा रही है। दरअसल, पहले पिता मां का सारा काम संभालते थे और रिकार्डिंग के लिए बार-बार मुंबई जाने से उन्हें काफी परेशानी होती थी, इसलिए वहां जाना ही बंद कर दिया। अभी हिन्दी फिल्म उद्योग के लोगों से उनका लगभग नहीं के बराबर संपर्क है।
9.नयी पीढ़ी के गायक-गायिकाओं में  कौन-कौन उन्हें पसंद आ रहे हैं
-नयी पीढ़ी में सभी बहुत अच्छा कर रहे हैं सभी का काम उन्हें अच्छा लगता है इसलिए किसी रियलिटी शो  में वो जज बनकर नहीं जाती ताकि अंक न देने पड़ें। वैसे चित्रा, सुजाता, मिनमिनी का गाना उन्हें बहुत पसंद है। शरण और विजय भी पसंद हैं और रहमान, इल्लैय्याराजा और सुब्बय्या रेड्डी का संगीत अच्छा लगता है।
10.  कौन सी भाषा में काम करना ज्यादा आसान रहा?
-तेलगू छोड़कर बाकी सभी भाषा अम्मा के लिए अनजानी ही थीं लेकिन पार्श्वगायन के पहले ही दिन उन्होंने तेलगू, तमिल, मलयालम, सिंहली और कन्नड़ भाषा में गाने रिकार्ड किए। दरअसल, वो गीतकार के साथ बैठकर पहले उच्चारण सीख लेती थीं। इसलिए सभी भाषाओं में काम करने में एक सा मजा आया।
11.  भविष्य में  भारत सरकार भारत रत्न दे ंतो उन्हें स्वीकार होगा?
- इस बारे में अभी कोई टिप्पणी उचित नहीं हैं। वैसे भी वो सम्मान के खिलाफ नहीं हैं बस उन्हें इसके टाईमिंग से शिकायत है। पुरस्कार को लेकर उनके मन में कोई दुर्भावना नहीं है बस इतनी लंबी अनदेखी से उन्हें शिकायत है जिसे उन्होंने जता भी दिया है।    

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

कितना बर्बर है किसी से उसकी शख्सियत की पहली पहचान छीन लेना, इस दर्द की कोई भी दवा बहुत कम है !



लड़कियों और महिलाओं पर तेजाबी हमले के मामले में कर्नाटक भी पीछे नहीं है। कार्तिका परमेश्वरन न,डा. महालक्ष्मी, श्रृति, हसीना हुसैन ये कुछ ऐसे नाम हैं जिनके वजूद को तेजाबी आग में झुलसा कर खत्म कर देने की कोशिश  की गई, वो भी उनके किसी के जबरदस्ती के प्यार को स्वीकार नहीं करने के इंसानी और बुनियादी अधिकार के कारण। ज्यादातर मामलों में एकतरफा प्यार में ठुकराए पुरुष  के अहम्  ने -तुम मेरी नहीं हो सकती तो तुम्हें किसी और का भी नहीं होने दुंगा, मानसिकता ने इन जिंदगी से भरे पढ़ते-लिखते, अपना काम करते भविष्य के सपने बुनते खुबसूरत चेहरों में हमेशा के लिए अंधेरा भर दिया। बंगलूरू में एसिड हमले की शिकार  हुई लड़कियों और महिलाओं के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था कैंपेन एंड स्ट्रगल अगेन्स्ट एस्डि अटैक आॅन वुमैन (सीएसएएएडब्ल्यू ) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस साल में केवल कर्नाटक में ही एसिड हमले 68 से ज्यादा मामले हुए हैं। कर्नाटक में सीएसएएएडब्ल्यू लगातार कई सालों से इनकी लड़ाई लड़ रहा है पर कोई खास नतीजा नहीं मिलने और सरकार की ओर से केवल आश्वासन, इस संस्था के साथ जुड़कर अपनी लड़ाई लड़ रही पीडि़तों के हौसलों को तोड़ रहा है। इस लड़ाई में उनकी सक्रियता और भागीदारी लगातार कम हो रही है। एसिड हमले की शिकार हसीना हुसैन से बात करने पर इसकी वजह का भी पता चल गया। उनके परिवार ने लगातार सात साल अदालत में उनकी लड़ाई लड़ी और कर्नाटक  हाई कोर्ट ने आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई साथ ही एसिड हमले की शिकार पीडि़तों के पुर्नवास के लिए कर्नाटक सरकार को निर्देष जारी किए, जिसके तहत प्लास्टिक सर्जरी का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन करना, पीडि़तो के संपूर्ण अदालती खर्च उठाना और पीडि़ता का  पुर्नवास होने तक उनकी पूरी देखभाल। कर्नाटक हाई कोर्ट के इस निर्देष से हसीना और उनके परिवार को बहुत राहत मिली थी और इंसाफ की उम्मीद जगी थी पर हकीकत कुछ और है। हसीना कहती हैं-अब 14 साल हो गए पर कुछ हासिल नहीं हुआ। अब तक सरकार से 1 लाख 80 हजार रूपए मिले, जबकि मेरे ईलाज में 20 लाख खर्च हो चुके हैं, मुझे आंखों से दिखता नहीं है। मेरे पिता ने अपना घर बेचकर मेरा ईलाज कराया थोड़ी मदद आम लोगों ने कर दी। पुर्नवास होने तक पीडि़तों की पूरी देखभाल की बात करते हैं पर सरकार द्वारा हर पीडि़त को 1 लाख 80 हजार थमा कर सब ठीक है मान लिया जाता है। हसीना इतनी मायुस हैं कि कहती हैं प्लीज मेरी स्टोरी नहीं लिखिए, हमारी कहानी छपती है और अगले दिन रद्दी की खबर बन जाती है। मैं नहीं चाहती कोई मेरी तस्वीर छापें, हमाले लिए मुद्दा महत्वपूर्ण है। दरअसल, कुछ होना होता तो मेरे बारे में इतना लिखा गया कि अब तक सब कुछ हो जाना चाहिए था। लेकिन अभी भी सिर्फ मैं ही नहीं मेरा परिवार भी इस हादसे और इसकी वजह से मिले षारीरिक, मानसिक और आर्थिक चोट से बाहर नहीं आ पाया है। हसीना जितनी सषंकित सरकार की ओर से है उतना ही इन लोगों की लड़ाई लड़ने वाली संस्थाओ से भी। हालांकि सभी के बारे में उनकी एक राय नहीं है पर ये जरूर कहती हैं कि-हमारा दुरूपयोग हुआ है कुछ लोग हमारे नाम पर लाखों रूपए अनुदान में हासिल कर लेते हैं और पीडि़तों को कुछ हजार थमा देते हैं।
हसीना, पढ़ लिख का नौकरी कर रही थी लेकिन अपने इंप्लायर से ही एसिड हमले की शिकार हो गई। 1999 में उनके पास ढ़रों सपने थे और आज उनका कोई फ्यूचर प्लान नहीं है। वो बस इतना चाहती हैं एसिड हमले को रोका जाना, आरोपी को सजा मिलना और पीडि़त का पुर्नवास इसी पर फोकस किया जाना चाहिए। उनके जैसी और पीडि़तों के बारे में उनसे जानकारी मांगने पर वो कहती हैं-सीसा ने दो साल से काम करना लगभग बंद कर दिया है, उसके मार्फत हम बहुत से पीडि़त आपस में संपर्क में थे और हमने खुद को इंसाफ दिलाने की आखिरी हद तक अधिकतम कोषिषें कर ली, पर इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता आप किसी से भी बात कर लें सब यहीं कहेंगी। पुरुषों की सोच में बदलाव ऐसे हमलों पर रोक और पीडि़तों के ईलाज व पुर्नवास के साथ उनकी शिक्षा और काबिलियत के मुताबिक काम, उन्हें यही चाहिए।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

कठोर जीवन और कला

कई मासूम जिंदगियों को बाल-मजदूरी, ग़रीबी और नशे के शिकंजे से निकाल कर बंगलुरू में खुली-ताजी हवा में सांस लेने का मौक़ा दे रहा है बॉर्न फ्री आर्ट स्कूल। मनोरमा की रिपोर्ट (Public Agenda)
कभी नारियल पानी बेचने में अपने पिता की मदद करने वाला सुब्रमण्या आज एक अच्छा-खासा अभिनेता है। अभिनय में जल्दी ही डिप्लोमा करने की उसकी ख्वाहिश है। साथ ही वह अच्छी फोटोग्राफी और क्ले मॉडलिंग भी करता है। कुछ ऐसा ही किस्सा लॉ फ्रीडा शांति का भी है, जिनका असली नाम तो लक्ष्मी था पर जॉन देवराज ने उसमें फ्रीडा काहलो को देखा और फ्रीडा नाम दे दिया। फ्रीडा जॉन देवराज के "बॉर्न फ्री आर्ट स्कूल' की आज मजबूत स्तंभ है। एक कलाकार होने के साथ ही स्कूल और हॉस्टल की तमाम जिम्मेदारियां बखूबी निभाती है। चार साल की उम्र में वह पुणे से भागकर बंगलुरू आयी थी और घरेलू नौकर से लेकर फैक्ट्री तक में काम करके अपना पेट पालती रही। लेकिन 2005 में "बॉर्न फ्री आर्ट स्कूल' के एक कैंप में शामिल होने के साथ उसकी जिंदगी बदल गयी। अब उसे मूर्तिकला, पेंटिंग, नृत्य-संगीत, फोटोग्राफी और क्लेमॉडलिंग में महारत हासिल है। उसकी बनायी कलाकृतियों और चित्रों की प्रदर्शनी लगती है। नन्हीं शिल्पा और मीना पहले ट्रैफिक सिग्नल पर गुलाब के फूल बेचा करती थीं, लेकिन अब वे दूसरी कक्षा में पढ़ाई कर रही हैं। फजल पहले एक ड्रग-एडिक्ट था, अब भी पूरी तरह से नशे की गिरफ्त से आजाद नहीं हुआ है। लेकिन, "बॉर्न फ्री आर्ट स्कूल' ने उसे भविष्य के प्रति आशावान जरूर बना दिया है। अक्तूबर 2009 में 25 बिहारी बाल बंधुआ मजदूरों को मैजेस्टिक के बैग बनाने की फैक्ट्री से छुड़ाया गया। उन्हीं में एक गज भी था। पांच सौ रुपये में गज को बच्चों के स्कूल बैग बनाने वाली फैक्ट्री में काम करने के लिए बेचा गया था। वह जिमनास्टिक में कर्नाटक राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
वेंकटेश, मारप्पा, श्रीनिवास, रेशमा, संजना, एंथनी, प्रशांत, एलिजाबेथ, गौरी गंजेला, रंजीता, चन्ना बासव्वा, पीटर, अनीता, जयराम, रॉबिन बालू, किरण जेके, रवि, जलाली जैसे कई और नाम हैं, जिनकी जिंदगियां बाल-मजदूरी, गरीबी और नशे की लत के शिकंजे से निकल कर अब खुली-ताजी हवा में सांस ले रही हैं, खिलखिला रही हैं। इसका सारा श्रेय बंगलुरू के "बॉर्न फ्री आर्ट स्कूल' और उसके संस्थापक जॉन देवराज को जाता है।
दरअसल, "बॉर्न फ्री आर्ट स्कूल' अपने आप में एक अनोखी पहल है। यह सड़कों और फुटपाथों पर रहने वाले बच्चों और बाल-मजदूरी और बंधुआ मजदूरी करने वाले बच्चों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहा है। वह भी गीत-संगीत, नृत्य, थियेटर, फोटोग्राफी, पेंटिंग, फिल्ममेकिंग, क्ले-मॉडलिंग और मूर्तिकला के जरिये। जॉन खुद जाने-माने कलाकार हैं। वे मूर्तिकला, पेंटिंग, संगीत, फोटोग्राफी, थियेटर और कला निर्देशन में पारंगत हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, लेकिन मन लगा तो रंगों, रेखाओं और आकारों की दुनिया में। आखिरकार उन्होंने अपना जीवन उन बच्चों के नाम कर दिया, जो अपने बुनियादी हकों से वंचित हैं। जॉन को बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए एक दशक से भी ज्यादा हो गया। सड़कों और फुटपाथ पर रहने वाले अनाथ बाल-मजदूर बच्चों के लिए और हजारों बच्चों को बाल-मजदूरी से निकाल कर मुख्यधारा में वापस लाने की कोशिश के बारे में जॉन कहते हैं, "मैं आंध्र प्रदेश का हूं, जहां एक दशक पहले चक्रवातीय तूफान में लाखों लोग मारे गये थे। मेरे आसपास के भी सैकड़ों लोग मारे गये थे। इस घटना का मुझ पर बहुत असर हुआ। मैं स्वयंसेवक बनकर लोगों की मदद के साथ ही पेंटिंग भी करने लगा। मेरी कलात्मक अभिव्यक्तियों में उस घटना की गहरी छाप अब भी है। उस तबाही ने मुझे बेचैन किया। फिर कला ने ही मुझे थामा। मेरी समझ में तभी आ चुका था कि कला बहुत समृद्ध माध्यम है समाज को कुछ वापस लौटाने का। इसमें लोगों और समाज को बदलने की क्षमता है।' 
जॉन ने 2006 में "बॉर्न फ्री आर्ट स्कूल' की शुरुआत की। मकसद था सड़कों पर मारे-मारे फिरने वालों बच्चों और बाल-मजदूरी करने वाले बच्चों को कला की मार्फत शिक्षा देकर मुख्यधारा में लाना। जॉन कहते हैं, "देश के बजट का यानी हमारे संसाधनों का पचास फीसद हिस्सा हथियारों की खरीद में खर्च होता है। देश के भविष्य को दुरुस्त करने के लिए सरकारों के पास बजट नहीं होता। इसलिए मैंने बाल-मजदूरी से मुक्त कराये गये बच्चों के साथ मिलकर दुनिया का सबसे लंबा प्रेम-पत्र पाकिस्तान के बच्चों के नाम लिखा जिसमें युद्ध नहीं, बल्कि शिक्षा को दोनों देशों की प्राथमिकता बनाने की गुजारिश की गयी थी। उस पर दोनों देशों के लाखों बच्चों के हस्ताक्षर थे। आखिर दोनों देशों के साधनहीन गरीब तबके के बच्चों की हालात एक जैसी ही है।'
जॉन कहते हैं, "पूरी दुनिया में 21 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे बाल-मजदूरी कर रहे हैं। अकेले भारत में यह संख्या दस-बारह करोड़ से ऊपर है। यानी इसे खत्म करने के लिए बहुत बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है। लेकिन जॉन ने कला का माध्यम ही इन बच्चों को मुख्यधारा में लाने के लिए क्यों चुना? यह पूछने पर वे कहते हैं, "ऐसे बच्चे बहुत कठिन दुनिया में रहकर आते हैं। उनके अनुभव बहुत कड़वे होते हैं, ऐसे में कला मरहम का काम करती है। इन आहत बच्चों की आत्मा को "हील' करती है। सब स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने और अपनी तकदीर खुद लिखने का हौसला देती है। ऐसा नहीं है कि हम केवल कलात्मक हुनर ही इन्हें सिखाते हैं, ये बच्चे स्कूलों में पढ़ते भी हैं।'
जॉन के लिए बगैर किसी किस्म की सरकारी सहायता या अनुदान के यह सब करना खासा मुश्किल काम रहा। लेकिन वे कहते हैं, "सबसे बड़ा सहयोग हमें वॉलंटियर्स से मिलता है, जो बगैर किसी चाहत के समाज को कुछ लौटाना चाहते हैं। फिलहाल हम यही चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा वॉलंटियर्स न सिर्फ बंगलुरू या कर्नाटक, बल्कि पूरे देश में हमसे जुड़ें और इसे आगे बढायें।'इसी साल फरवरी में ब्रिटेन की कलाकार सैडी ने एक महीने तक बॉर्न फ्री आर्ट स्कूल के 20 बच्चों को चित्रकला और पेंटिंग सिखायी और बाद में इन बच्चों की पेंटिंग की प्रदर्शनी "फ्रीडम फ्रॉम टाइल-गुड लाइफ, बैड लाइफ' के नाम से लगी, जिसे स्थानीय लोगों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, जापान, पोलैंड, इंग्लैंड, स्लोवाकिया जैसे देशों से आये लोगों ने भी देखा और सराहा। जॉन देवराज बच्चों के साथ मिलकर समय-समय पर कई आयोजन करते हैं, ताकि वे अपनी कला और रोजमर्रा के जीवन में उसकी प्रासंगिकता के बीच तालमेल बिठा सकें। इसी सिलसिले में हाल ही में जॉन ने बॉर्न फ्री बच्चों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा मिट्टी का घड़ा लालबाग में बनाया इसे गिनीज बुक्स ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल भी किया गया है। पर्यावरण संरक्षण और पेड़ों की रक्षा के संदेश के साथ बना यह घड़ा 25 फीट ऊंचा है। इसका वजन दो हजार किलोग्राम है। 

शनिवार, 28 जुलाई 2012


ताक़त के तीन हिस्से

कलह और गुटबाज़ी से जूझ रही कर्नाटक भाजपा का राजनीतिक संकट फ़िल हाल टल गया है लेकिन येदियुरप्पा की महत्वाकांक्षाओं के शिकार हुए सदानंद गौड़ा का गुट फिर से राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है। मनोरमा की रिपोर्ट( द पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित  )
कर्नाटक में भाजपा का संकट अभी खत्म होता नहीं लगता। सरकार बचाने और चलाने की जद्दोजहद में ही अगला विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ जायेगा, जिसमें मात्र ग्यारह महीने ही बचे हैं। चार साल के अंतराल में राज्य में तीसरे मुख्यमंत्री शपथ लेने वाले हैं। दरअसल, कर्नाटक भाजपा इन दिनों व्यक्तिगत अहम, कलह और गुटबाजी की राजनीति से जूझ रही है। मौजूदा संकट और नेतृत्व परिवर्तन उसी की बानगी है। पार्टी से बड़ा व्यक्ति विशेष का अहम हो गया है और केंद्रीय नेतृत्व की मजबूरी है उसे तुष्ट करना। आखिरकार येदियुरप्पा ने साबित कर ही दिया कि कर्नाटक में फिलहाल भाजपा के सबसे कद्दावर नेता वही हैं, चाहे वे मुख्यमंत्री पद पर रहें या न रहें। भाजपा को राज्य में अपना अस्तित्व बनाये और बचाये रखना है तो येदियुरप्पा के आगे उसे झुकना ही होगा। इसलिए सदानंद गौड़ा को असमय मुख्यमंत्री पद की बलि देनी पड़ी और जगदीश शेट्टर के लिए रास्ता खाली करना पड़ा। 
सदानंद गौड़ा साफ छवि के नेता हैं और उनकी सरकार पर कोई दाग भी नहीं लगा, बावजूद इसके वे अपना पद छोड़ने के लिए राजी हो गये तो इसकी वजह उनका राजनीतिक व्यक्तित्व और शैली ही है। उनकी जगह येदियुरप्पा होते तो ऐसा शायद नहीं कर पाते। गौड़ा शुरू से भाजपा के अनुशासित नेता रहे हैं और अब तक पार्टी के आदेशों के मुताबिक ही उन्होंने राजनीति की है। लेकिन मौजूदा घटनाक्रमों ने कर्नाटक भाजपा में उनका भी एक खेमा विकसित कर दिया है, जो हर आदेश को चुपचाप मानने को तैयार नहीं है। यह उस समय दिखा भी जब वे अपना इस्तीफा राजभवन में सौंपने जा रहे थे। उनके समर्थकों ने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन अंततः उन्होंने एक साल पूरा करने से पहले ही पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, वोक्कालिगा समुदाय के लोगों का तीव्र विरोध जारी है और वेे किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं। 
बहरहाल गौड़ा के प्रस्थान की इस पटकथा को पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने लिखा। जेल से वापस आने के साथ ही येदियुरप्पा ने केंद्रीय नेतृत्व पर खुद को मुख्यमंत्री बनाने या गौड़ा को बदलने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया था, जिसे टालने की भरपूर कोशिशें की गयीं। लेकिन पिछले दिनों उनके खेमे के नौ मंत्रियों ने कैबिनेट से इस्तीफा देकर केंद्रीय नेतृत्व को गौड़ा को हटाने के लिए अंततः मजबूर कर ही दिया। इन मंत्रियों में जगदीश शेट्टर भी एक थे। ये वही येदियुरप्पा हैं जो अपने शासन काल के दौरान इसी तरह की परेशानियां रेड्डी बंधुओं के कारण झेलते रहे थे। हालांकि, सरकार भी उन्होंने उन्हीं रेड्डी बंधुओं के पैसों और सहयोग से ही बनायी थी। लेकिन अवैध खनन के मामले में लोकायुक्त की रिपोर्ट में नाम आने पर पिछले साल जुलाई में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था और अगस्त में सदानंद गौड़ा प्रदेश के नये मुख्यमंत्री बनाये गये थे। ऐसा राजनीति में ही हो सकता है कि जिस जगदीश शेट्टर को मात देकर येदियुरप्पा ने सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनवाया था, आज पासा एकदम पलटा हुआ है। शेट्टर के लिए येदियुरप्पा ने गौड़ा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलवा दिया। वैसे कहा जाता है कि "दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है' लेकिन येदियुरप्पा शायद यह भूल रहे हैं कि सदानंद गौड़ा उनके खेमे के और उनके भरोसे के हुआ करते थे, जबकि जगदीश शेट्टर हमेशा उनके प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। दोनों लिंगायत समुदाय के नेता हैं, इसलिए येदियुरप्पा कभी भी शेट्टर का कद बढ़ने देना नहीं चाहते थे। जब गौड़ा उनके लिए रबर स्टांप मुख्यमंत्री नहीं बने, तो क्या गारंटी है कि शेट्टर आने वाले समय में उन्हें किनारे नहीं करेंगे? 
सबसे दुखद बात ये है कि इस पूरे प्रकरण ने कर्नाटक की जाति आधारित राजनीति का बदरंग चेहरा सामने रखा है, जहां भाजपा को अगली बार भी बहुमत में आने के लिए लिंगायतों को तुष्ट करना पड़ेगा। चूंकि येदियुरप्पा अदालत में चल रहे मामलों के कारण अभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकते इसलिए एक और लिंगायत नेता जगदीश शेट्टर को पार्टी का चेहरा बनाया गया है। कहा ये भी जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद के लिए येदियुरप्पा की पहली पसंद पिछली बार उनकी करीबी ऊर्जा मंत्री शोभा करंदलाजे ही थीं, लेकिन वे लिंगायत की बजाय वोक्कालिगा थीं, इसलिए मुख्यमंत्री नहीं बन सकीं। हालांकि, सदानंद गौड़ा भी वोक्कालिगा ही थे। दरअसल, कर्नाटक में सबसे ज्यादा सतरह फीसद वोट लिगंायतों के ही हैं और वोक्कालिगा 15 फीसद के साथ दूसरे नंबर पर आते हैं, लेकिन उनका वोट बंटा हुआ है। 
फिलहाल जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) की वोक्कालिगा समुदाय पर अच्छी पकड़ है, जबकि भाजपा के लिए राज्य में लिंगायत ही सबसे बड़े वोट-आधार हैं। दूसरी ओर लिंगायत वोट धर्मगुरुओं और मठों के द्वारा बहुत हद तक निर्देशित होते हैं और भाजपा का इन मठों और धर्मगुरुओं पर खासा असर है। कांग्रेस की पकड़ पिछड़ों और दलितों के बीच ज्यादा है। 
बहरहाल, जगदीश शेट्टर पहली लड़ाई तो जीत गये हैं, लेकिन क्या आगे का रास्ता तय करना उनके लिए आसान है? कर्नाटक में भाजपा सरकार के चार साल में तीसरे मुख्यमंत्री बने 56 वर्षीय जगदीश शेट्टर हुबली से चौथी बार विधायक हैं और लिंगायत होने के साथ उत्तरी कर्नाटक के प्रभावशाली नेता भी हैं, जहां भाजपा की मजबूत उपस्थिति है। एसएम कृष्णा के मुख्यमंत्री रहने के दौरान शेट्टर विपक्ष के नेता रह चुके हैं और सन् 2009 में ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री बनने से पहले येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री रहने के दौरान विधानसभा अध्यक्ष भी रह चुके हैं। अपने कैरियर की शुरुआत में वे येदियुरप्पा के करीब भी रहे हैं। यहां तक कि येदियुरप्पा के "ऑपरेशन कमल' को अमली जामा पहनाने में भी शेट्टर की प्रमुख भूमिका रही। अब देखना यह है कि साफ-साफ दो खेमों में बंट चुके विधायकों के साथ वे कैसा मंत्रिमंडल बना पाते हैं और असंतुष्टों को साध कर कैसे सरकार चला पाते हैं। बड़ी चुनौती उन्हें गौड़ा समर्थक विधायकों से ही मिलेगी। साथ ही अंदरूनी कलह से बिगड़ी भाजपा की छवि सुधारने की बड़ी जिम्मेदारी भी उनपर है। लेकिन इसके लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है। मई 2013 में विधाानसभा चुनाव हो सकते हैं या फिर ये भी हो सकता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ दिसंबर में ही कर्नाटक में चुनाव कराये जायें। बहरहाल, संकट का पहला पड़ाव तो पार कर लिया गया है। यानी मुख्यमंत्री पद का मसला, मंत्रीमंडल का गठन और हर खेमे को संतोषजनक प्रतिनिधित्व देना ये ज्यादा बड़ी समस्याएं नहीं हैं और केंद्रीय नेतृत्व को इसकी ज्यादा चिंता भी नहीं है। संकट शिखर के लोगों का और लोगों से है। दरअसल, येदियुरप्पा प्रदेश पार्टी अध्यक्ष का पद अपने लिए चाहते हैं। वे गौड़ा को किसी भी कीमत पर इस पद पर नहीं देखना चाहते, क्योंकि उनके नेतृत्व में अगर भाजपा राज्य में अगला चुनाव जीत जाती है, तो गौड़ा कर्नाटक में भाजपा के सबसे बड़े नेता बन कर उभर सकते हैं। दूसरी ओर, गौड़ा अपनी ताकत मुख्यमंत्री के बाद एक इसी पद से साबित कर सकते हैं। जाहिर है, केंद्रीय नेतृत्व का उन्हें राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव देना फिलवक्त राज्य की राजनीति से वनवास ले लेने के समान होगा। दूसरी ओर यह भी गौरतलब है कि येदियुरप्पा को कर्नाटक में जब बहुमत मिला तब गौड़ा ही प्रदेश अध्यक्ष थे। ऐसे में भाजपा के लिए "आगे कुंआ, पीछे खाई' सी स्थिति बन रही है। गौड़ा की उपेक्षा से वोक्कालिगा वोट प्रभावित हो सकते हैं। खबर ये भी है कि केंद्रीय नेतृत्व संतुलन बनाने के लिए प्रदेश पार्टी अध्यक्ष पद पर किसी दलित नेता को बिठा सकता है। क्योंकि येदियुरप्पा खेमा ईश्वरप्पा के बजाय गृहमंत्री आर अशोक को उपमुख्यमंत्री बनाना चाहता है और सदानंद गौड़ा खेमे की पसंद ईश्वरप्पा हैं। ऐसे में संभावना दो उपमुख्यमंत्री बनने की है। 
अब देखना ये है कि गौड़ा को प्रदेश पार्टी अध्यक्ष पद मिलता है या नहीं, क्योंकि राज्यसभा जाने की पेशकश तो उन्होंने पहले ही ठुकरा दी है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व उन्हें उनके खेमे के लोगों को बेहतर पोर्टफोलियो देने का आश्वासन ही दे सकता है। ये और बात है कि गौड़ा इस पर शायद ही मानें। उनके खेमे में पचास से ज्यादा विधायक हैं और शेट्टर कैबिनेट में 20 मंत्री पद उनकी मांग है। 

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

कितने दिन अमन-चैन

(Published in Public Agenda)
येदियुरप्पा गद्दी पाने को उतावले है। लेकिन अपने जिस चहेते सदानंद गौड़ा को उन्होंने कुर्सी पर बिठाया था वही आज उनकी राह का रोड़ा हैं। फ़िलहाल कर्नाटक भाजपा में तूफ़ान के आने से पहले की ख़ामोशी छायी है। मनोरमा की रिपोर्ट

कर्नाटक में जब येदियुरप्पा मुख्यमंत्री थे तो तीन बार कुछ ऐसा ही हाई वोल्टेज ड्रामा खेला गया जैसा पिछले दस दिनों से जारी है। तीनों बार वे अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहे, हालांकि चौथी बार उन्हें कुर्सी छोड़नी ही पड़ी। उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। अवैध खनन और भूमि आवंटन में अनियमितता के आरोपों के कारण जब उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी थी तब भी उनके पास सत्तर से ऊपर विधायकों का समर्थन था, लेकिन चाहते हुए भी वे विद्रोही तेवर नहीं दिखा सके। कारण केंद्रीय नेतृत्व हर हाल में कर्नाटक में लगे दाग को साफ करना चाहता था। तब येदियुरप्पा के खास चहेते सदानंद गौड़ा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे।आज वही सदानंद गौड़ा येदियुरप्पा की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। उस समय जगदीश शेट्टर अनंत कुमार खेमे की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। तब गुप्त मतदान से मुख्यमंत्री चुना गया था। गौड़ा को 66 मत मिले थे और शेट्टर को 52 ही। लेकिन राजनीति में कब पासा पलट जाये, कुछ कहा नहीं जा सकता। अब वही अनंत कुमार और येदियुरप्पा करीब आ गये हैं और उन 70 विधायकों के साथ-साथ जगदीश शेट्टर भी येदियुरप्पा के साथ खड़े हैं। यहां तक कि बजट सत्र से पहले खुद को मुख्यमंत्री नहीं बनाये जाने की सूरत में येदियुरप्पा चाहते थे कि शेट्टर को वित्त मंत्री बना दिया जाये ताकि बजट गौड़ा नहीं शेट्टर पेश कर सकें। बहरहाल, इस पूरे प्रकरण में भाजपा की अंदरूनी राजनीति और अनुशासन की कलई खुल गयी। राज्य में पार्टी को बड़ी चुनौती विपक्षी दलों से नहीं, बल्कि अपने ही खेमों से मिल रही है। चुनाव सन् 2013 में होने हैं पर ऐसे ही हालात रहे तो मौजूदा सरकार का अपना कार्यकाल पूरा कर पाना मुश्किल लगता है। संकट की शुरुआत इसी महीने के पहले हफ्ते से हो गयी थी जब कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अवैध खनन के मामले में येदियुरप्पा पर लोकायुक्त पुलिस द्वारा दायर एफआईआर रद्द कर दी। गौरतलब है कि लोकायुक्त विशेष अदालत के आदेश के खिलाफ येदियुरप्पा की ओर से कर्नाटक उच्च न्यायालय में अपील की गयी थी। चूंकि अवैध खनन पर जारी लोकायुक्त की रिपोर्ट में नाम आने पर ही पिछले साल जुलाई में येदियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ा था, इसलिए उच्च न्यायालय द्वारा इस मामलें में क्लीन-चिट मिल जाने पर ही तार्किक रूप से मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी दावेदारी वापसी की बनती है।इसलिए येदियुरप्पा ने दवाब की राजनीति खेलनी शुरू की। पहले उन्होंने उडुपी-चिकमगलूर के उपचुनाव में प्रचार करने से इनकार कर दिया जबकि वे स्टार प्रचारक थे। पार्टी को यहां मिली हार बेशक उनके मन की मुराद थी। इससे वे यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि राज्य में उनके कद का नेता कोई नहीं, बल्कि जिस लिंगायत मतदाता का समर्थन उनके साथ है, भाजपा उसकी अनदेखी नहीं कर सकती। इसके अलावा येदियुरप्पा ने अपने एक उम्मीदवार को राज्यसभा में पहुंचाकर अपनी दमदार वापसी का संकेत दे दिया है। फिर बजट सत्र से पहले मुख्यमंत्री बदलने का अल्टीमेटम उनकी दूसरी चाल थी। येदियुरप्पा अड़ गये कि बतौर मुख्यमंत्री वे ही बजट पेश करेंगे। उन्होंने यह धमकी 55 विधायकों के साथ दी जिनके बल पर वे बंगलुरू के एक रिसॉर्ट में डेरा डाले हुए थे। एक दिन बाद 10 और विधायक उनके साथ शामिल हो गये। फिलहाल उनका दावा है कि सत्तर से ऊपर विधायक उनके साथ हैं। वर्तमान में भाजपा के 117 विधायक हैं और सरकार बनाने के लिए 112 विधायकों का समर्थन जरूरी है। 
वैसे  उच्च न्यायालय के इस फैसले को फिर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है और उस पर फैसला आना बाकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सेंट्रल एमपावर्ड कमेटी को यह निर्देश दिया है कि अवैध खनन के मामले में येदियुरप्पा और उनके परिवार की संलिप्तता की सीबीआई जांच आवश्यक है या नहीं, इस पर अपनी रिपोर्ट दे। जरूरी नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी येदियुरप्पा के हक में आये या उनपर सीबीआई जांच का मसला न बने। अतः अक्लमंदी यही थी कि फिलहाल राज्य के नेतृत्व में बदलाव नहीं किया जाये।दूसरी ओर, पिछले महीनों में सदानंद गौड़ा बगैर किसी विवाद के सरकार चलाते रहे हैं। उनकी छवि साफ और ईमानदार नेता की है। वे आरएसएस की पसंद भी हैं। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उनके द्वारा पेश किये गये बजट को सराहना मिली है हालांकि इस पूरे विवाद के कारण इस पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो पायी। साथ ही वे राज्य के दूसरे सबसे बड़े समुदाय वोक्कालिगा से आते हैं और भाजपा की ओर से एचडी कुमारस्वामी का जवाब माने जाते हैं। लेकिन राज्य के जाति समीकरण में लिंगायत 20 फीसद से ऊपर हैं। इस समुदाय से येदियुरप्पा जैसा कोई और प्रभावशाली नेता भाजपा के पास नहीं है। भाजपा के गढ़ माने जाने वाले उडुपी-चिकमगलूर में पार्टी को पैंतालीस हजार मतों के अंतर से मिली हार चेतावनी है। कर्नाटक की जनता पिछले चार साल से भ्रष्टाचार के तमाम मामलों के साथ-साथ भाजपा का अंतर्कलह देख रही है जो अब अपने चरम पर है।आकलन के मुताबिक, इस उपचुनाव में करीब 24 हजार नये मतदाता जुड़े और पहली बार वोट दे रहे इन मतदाताओं का एक भी वोट भाजपा को नहीं मिला। यानी अगले चुनाव में मतदाता जाति के अलावा दूसरे गुंजाइश फैक्टर को नजरअंदाज नहीं करेगा। भाजपा के लिए चिंता की बात यह भी है कि लिंगायतों के दबदबे वाले राज्य के मठों का समर्थन अभी भी येदियुरप्पा के साथ ही है। ऐसे में येदियुरप्पा की ज्यादा दिनों तक अनदेखी नहीं की जा सकती। एक ओर येदियुरप्पा के बागी तेवर हैं तो दूसरी ओर सन् 2013 में चुनाव की नैया। बहरहाल, येदियुरप्पा की खामोशी तूफान से पहले की खामोशी भी हो सकती है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उन्हें बजट सत्र तक यथास्थिति बहाल रखने के एवज में अप्रैल में उनके हक में फैसला करने का आश्वासन दिया है। येदियुरप्पा यह दिखा चुके हैं कि 69 विधायकों का समर्थन उनके पास है और वे बजट सत्र में कभी भी सरकार गिरा सकने की स्थिति में थे। अब चालू सत्र तक उन्हें शांत कराकर भले ही गडकरी ने मामला सुलझा लिया हो, अप्रैल में पता चल जायेगा कि यह शांति कितने दिनों की थी।

सभी विधायक साथ हैं


कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष के एस ईश्वरप्पा से  मनोरमा की बातचीत

कर्नाटक में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम पर आप क्या कहते हैं?
राजनीति में ऐसा होता रहता है। यह पार्टी का अंदरूनी मसला था। पार्टी से बड़ा कोई नहीं है, अंततः सभी को उसी के अनुसार चलना है। लेकिन मुझे मीडिया के एक वर्ग से शिकायत है, जिसने सदानंद गौड़ा के इस्तीफा देने और येदियुरप्पा के कुर्सी संभालने की लगातार खबरें देकर भ्रम की स्थिति बनाये रखी। हमारी ओर से इस संबंध में कोई लिखित बयान जारी नहीं किया गया था।

यह भी कहा जा रहा है कि येदियुरप्पा 30 मार्च तक ही शांत हुए हैं। उसके बाद वे फिर धमाका कर सकते हैं?
मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं। जहां तक मुझे पता है, इस बारे में पार्टी में एक राय है कि सदानंद गौड़ा मुख्यमंत्री बने रहेंगे। वैसे भी इस संदर्भ में पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का ही फैसला अंतिम होगा। वैसे येदियुरप्पा इससे पहले भी कई बार ऐसी डेडलाइन दे चुके हैं। उसका नतीजा भी सबको मालूम ही है।

उनके पास 60-70 विधायकों का समर्थन है?
मेरी जानकारी में सभी विधायक पार्टी के साथ हैं और सभी को केंद्रीय नेतृत्व का हर फैसला मंजूर है। हमारा ध्यान अब अगले चुनाव पर है और पार्टी जाति और पैसों के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर टिकट देगी। भाजपा में ब्लैकमेलिंग की राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है।

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से क्या येदियुरप्पा को यह आश्वासन मिला है कि बजट सत्र खत्म होते ही उनके हक में फैसला होगा?
केंद्रीय नेतृत्व जो भी फैसला करेगा, हम सब मानेगे।

यह भी कहा जा रहा है कि येदियुरप्पा मुख्यमंत्री नहीं तो कर्नाटक में भाजपा के अध्यक्ष पद चाहते हैं?
मुझे इस बारे में भी नहीं पता। दिल्ली में पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं से मेरा विचार-विमर्श हुआ। ऐसा कुछ तो नहीं कहा गया मुझसे। वैसे अगर हाईकमान कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष येदियुरप्पा को बनाते हैं तो इसमें मैं क्या कर सकता हूं? केंद्रीय नेतृत्व का फैसला सभी को मान्य होगा।

उडुपी-चिकमगलूर के उपचुनाव में मिली हार पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? वह सीट पहले भाजपा के खाते में थी। येदियुरप्पा का प्रचार न करना पार्टी के लिए महंगा साबित हुआ?
हमारा ज्यादा नुकसान पार्टी में जारी अंतर्कलह से हुआ। खास तौर पर उपचुनाव से पहले येदियुरप्पा जी के साथ विधायकों का रिसॉर्ट में डेरा जमाना और सरकार पर अस्थिरता की तलवार लटका देना। जाहिर है, मतदाताओं में इससे भाजपा के प्रति बहुत नकारात्मक संदेश गया।

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

मैं बेदाग़ निकलूंगा

(published in Public Agenda)
अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर से मनोरमा की बातचीत
एंट्रिक्स-देवास सौदे में हुई अनियमितता के मद्देनजर केंद्र सरकार ने हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र, (इसरो) के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर को जिम्मेदार ठहराते हुए नायर समेत चार वैज्ञानिकों की किसी भी सरकारी पद पर नियुक्ति पर रोक लगा दी है। बंगलुरू में माधवन नायर से इस विषय पर बातचीत के मुख्य अंशः

देवास को ही सौदे के लिए क्यों चुना गया?
यह कहा जा रहा है कि सौदे में पारदर्शिता नहीं बरती गयी।ऐसा बिल्कुल नहीं है। उस समय एक नयी तकनीक या प्रौद्योगिकी को देश में लाने का विचार था। सन् 2002 की सैटेलाइट नीति बनायी ही गयी थी सैटेलाइटों के निजी परिचालन को प्रोत्साहित करने के लिए। 
अगर कोई भी निजी ऑपरेटर इसरो से ट्रांसपोंडर उपलब्ध कराने को कहता तो इसरो उपलब्ध कराता और न होने की स्थिति में किराये पर लेकर उपलब्ध कराता है। साथ ही, किसी भी इसरो कर्मचारी को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से संबंधित उद्योग शुरू करने की अनुमति दी गयी और कहा कि उन्हें अपेक्षाकृत कम लागत पर अंतरिक्ष तकनीक मुहैया करायी जायेगी। देवास सौदे के पहले से ही इसरो एस बैंड संचार के लिए सैटेलाइट तकनीक विकसित कर रहा था और दिसंबर 2010 से पहले एस-बैंड स्पेक्ट्रम और परिक्रमा स्लॉट का इस्तेमाल करना भी अनिवार्य था।एक बार ऐसा सैटेलाइट विकसित हो जाने के बाद हमें सर्विस मुहैया कराने वाले चाहिए थे। 2002-2004 में ऐसा कोई नहीं था। सौदा सभी के लिए खुला था, लेकिन कोई नहीं आया। 
यह सौदा देवास को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। इसी दौरान डॉ शंकर के अधीन एक टीम बनी और तकनीकी टीम के प्रस्तावों के आधार पर एंट्रिक्स नाम से इसरो की व्यावसायिक शाखा बनी। यह सौदा एंट्रिक्स के मार्फत हुआ और इसके लिए पूरी प्रक्रिया का पालन हुआ, जिसमें अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग लोगों और विभागों की अपनी-अपनी भूमिका रही। इसके अलावा सौदे के लिए राशि तय करते समय इस बात का ध्यान रखा गया था कि सरकार को कोई नुकसान न हो। साथ ही पूरे निवेश पर सरकार को दस से पंद्रह फीसद लाभ हासिल हो। 

क्या यह सौदा पूरी तरह से देवास के पक्ष में था?
नहीं, बिल्कुल नहीं। उस समय यह तकनीक केवल जापान के पास थी। हमें सात सौ करोड़ का चेक ऑडिटर के मार्फत मिला था। देवास को चुनने का कारण यह था कि किसी और कंपनी की ओर से बोली नहीं लगायी गयी थी और देवास ने यह भरोसा दिया था कि वह यह तकनीक देश में लायेगी। दरअसल, जब हम सैटेलाइट आधारित संचार तकनीक लेकर आये थे, तब बाजार में उसका कोई खरीदार नहीं था, केवल दूरदर्शन और टाटा स्काई थे। हमने "पहले आओ, पहले पाओ' के तहत आनेवाली अकेली कंपनी देवास के साथ समझौता कर लिया जबकि इस अनुबंध के लिए कोई भी बोली लगा सकता था। 

इस पूरे मसले में आपकी भूमिका क्या रही?
मैं इस सौदे के दौरान इसरो का प्रमुख था और एंट्रिक्स का अध्यक्ष इसरो का प्रमुख ही होता है। लेकिन कोई भी प्रस्ताव पहले तकनीकी समीक्षा के लिए जाता है। फिर वित्त मंत्रालय के पास जाता है। इसके बाद सभी अपनी सिफारिशें इसरो प्रमुख के पास भेजते हैं। इसके अलावा अंतरिक्ष आयोग का अध्यक्ष इसरो का प्रमुख होता है। प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रमुख सचिव और मंत्रिमंडल सचिव, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, वित्त सदस्य और अंतरिक्ष विभाग के अतिरिक्त सचिव भी इसके बोर्ड में होते हैं। इसरो की व्यावसायिक शाखा एंट्रिक्स और देवास के बीच 2005 में हुए करार के तहत कंपनी को 70 मेगाहर्टज एस-बैंड स्पेक्ट्रम डिजीटल मल्टीमीडिया सेवाओं के लिए बीस साल के लिए दिया गया था। इस करार पर मुहर एंट्रिक्स के बोर्ड ने मिलकर लगायी थी। मेरी भूमिका यही थी। 

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी यह सौदा खतरा था?
नहीं।240 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम पहले भी सेना और रक्षा संबंधी जरूरतों के लिए निर्धारित था और 70 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम को ही व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए रखा गया था। 

एक साल के बाद यह करार फिर से सुर्खियों में है। इसके पीछे क्या वजह है?
मैंने इस मसले का ट्रैक रिकॉर्ड नहीं रखा। सन् 2010 में यह मसला बाहर आया। एक बात और बाहर आ रही है - 2010 में जब मैं अध्यक्ष नहीं था, यूरोप से एक कंपनी आयी। दरअसल 2010 में ही अंतरिक्ष विभाग ने अगर कोई स्पष्टीकरण दिया होता तो यह विवाद होता ही नहीं। चतुर्वेदी समिति ने भी कहा है कि उस समय कोई कार्रवाई नहीं की गयी। अब जाकर किसी ने उन बातों का नोटिस लिया लेकिन सारा दोष उन लोगों के माथे मढ़ दिया जिन्होंने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी। 

इस विवाद पर आपका रुख क्या है?
मेरा कोई निजी एजेंडा नहीं है। लेकिन जो भी कहा जा रहा है, उससे मेरा गंभीर विरोध है। केवल प्रक्रिया में बरती गयी खामियों पर बात की जा रही है। जो लोग इसमें शामिल रहे हैं और जिम्मेदार हैं, उनके बारे में बात नहीं की जा रही। मैंने प्रधानमंत्री के पास अपील की है और उनके जवाब का इंतजार कर रहा हूं। मेरे लिए यह अपनी साख को बहाल करने और अपने सम्मान को बरकार रखने का सवाल है। मैंने 42 साल इसरो के लिए काम किया है और मुझे इस बात का गर्व है। मुझे भरोसा है कि मैं इस विवाद से बेदाग बाहर निकलूंगा। 

मंद होते बैंड के सुर


(Published in Public Agenda)
बंगलुरू जितना आईटी सिटी के तौर पर जाना जाता है उतना ही पब सिटी और देश  के बीयर कैपिटल के रूप में भी। सबसे ज्यादा पब देश में यहीं पर हैं और इन पबों में कार्यक्रम पेश करने वाले लाईव बैंड बंगलूरू के युवाओं की जीवन-शैली का अहम हिस्सा रहे हैं। पश्चिमी  संगीत खासतौर पर राॅक संगीत को लेकर यहां एक किस्म की दीवानगी रही है आश्चर्य  नहीं कि मेटेलिका को सुनने यहां चालीस हजार से ज्यादा की भीड़ जमा हो गई थी और आज भी दुनिया के तमाम नामी बैंड भारत में बंगलूरू में जरूर गाना चाहते हैं। लेकिन दूसरी हकीकत ये है कि बंगलुरू के कई लाईव बैंड खत्म हो गए हैं या खुद को बचाए रखने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। वजह यहां बार और पबों में लाईव बैंड के कार्यक्रमों पर लगी पाबंदी है।
दरअसल, बार और पबों में लाईव बैंड के साथ बारबालाओं के डांस को भी शामिल कर लिए जाने के बाद परेशानी की शुरूआत हुई। 2005 में मुंबई में बारबालाओं के काम करने पर पाबंदी लग जाने के बाद बड़ी संख्या में इनका पलायन बंगलुरू की ओर हुआ और अचानक यहां के पश्चिमी  संगीत आधारित लाईव बैंड के मायने बदल गए। लाईव बैंड के मार्फत बारबलाओं के डांस सभी बार और पबों का हिस्सा बनने लगे। इसी को रोकने के लिए कर्नाटक पुलिस कानून 2005 के तहत यहां 2008 से बार और पबों में लाईव बैंड पर बिल्कुल रोक लगा दी गई पर इसका मकसद बारगर्ल की संस्कृति को खत्म करना था। शुरूआत महिलाओं के बार या पब में किसी भी तरह  का काम करने पर मौखिक पाबंदी लगाकर की गई। जिसके खिलाफ  डोमलुर  के शेफ इन रीजेंसी बार एंड रेस्ट्रांट में काम करने वाली नाजिया और उनकी दो और सहकर्मियों ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में अर्जी दायर कर दी। क्योंकि इस आदेश  के बाद उन्हें रेस्तरां के प्रबंधन ने नौकरी से निकाल दिया था। अदालत ने अपने फैसले में बार में उनके काम करने के अधिकार को बरकरार रखा। दरअसल, 31 मई 2011 को बंगलुरू के पुलिस कमिश्नर  ने अपने अफसरों को शहर के उन सभी बार और रेस्तरां को बंद करा देने का मौखिक आदेश  दिया था जहां महिलाएं बारबाला के तौर पर काम करती हैं। जबकि देश  की सर्वोच्च अदालत ने दिसंबर 2007 में ही ये कहा था कि महिलाओं को शराब परोसी जानेवाली जगहों पर भी काम करने का अधिकार है। कर्नाटक आबकारी अधिनियम 1965 के नियम 9 में सार्वजनिक स्थान पर किसी महिला के द्वारा शराब परोसे जाने को असंवैधानिक माना गया था पर 2008 में कर्नाटक उच्च अदालत ने कर्नाटक आबकारी अधिनियम 1965 के नियम 9 को खारिज कर दिया था। हांलाकि बंगलूरू पुलिस ने उसी समय कर्नाटक उच्च न्यायालय में ये हलफनामा पेश  कर कहा कि उनके द्वारा महिलाओं को बार में बारटेंडर के तौर पर काम करने से नहीं रोका जाता बल्कि उन बारों और रेस्तरां पर छापे मारे जाते हैं जो गैरकानूनी रूप  से चल रहे हैं और जहां कोई भी अवैध गतिविधि संचालित की जाती हो। लेकिन 2008 से यहां किसी भी सार्वजनिक जगह जहां शराब परोसी जाती हो वहां गीत-संगीत या लाईव बैंड के कार्यक्रम नहीं पेश  किए जा सकते।  अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर  कानून और व्यवस्था बंगलुरू सुनील कुमार के मुताबिक बंगलुरू में वैसी जगहों जहां शराब परोसी जाती है, किसी भी किस्म के गीत-संगीत और नृत्य के कार्यक्रम दिन और रात किसी भी समय नहीं पेश  किए जा सकते हैं, लाईसेंस प्राप्त बार में रात साढ़े ग्यारह बजे तक शराब परोसी जा सकती हैं और महिलाएं वहां बारटेंडर के तार पर साढ़े ग्यारह बजे तक काम कर सकती हैं। लाईव बैंड शराब परोसने वाले बार को छोड़कर किसी भी सार्वजिक जगह पर कार्यक्रम पेश  कर सकते हैं। बंगलूरू पुलिस के मुताबिक फिलहाल बंगलूरू में लगभग साठ बारों में महिलाएं काम कर रही हैं और इनपर उनकी नजर हमेशा  रहती है।

बहरहाल, कानून और व्यवस्था के लिहाज से प्रशाषण  के पास अपने तर्क हैं पर बंगलुरू जहां लाईव बैंड की अपनी एक अलग संस्कृति रही है और इनकी अच्छी-खासी संख्या भी है, कई बैंड पबों और बार में कार्यक्रम करके ही खुद को चला पा रहे थे। लेकिन इस पाबंदी के कारण कई छोटे लाईव बैंड बंद हो गए, इसके कलाकार बेरोजगार हो गए। कुछ ने शहर बदल लिया। अमूमन रॉक,पॉप  और जैज संगीत पर आधारित इन लाईव बैंड समूहों के साथ ये दिक्कत रही है कि इनके श्रोता समूह अलग और युवा-पीढी के वे लोग हैं, जो पब और बार में जाते हैं।
वैसे कहने को बार और पबों में लाईव बैंड पर पाबंदी है पर सच में ऐसा है नहीं। कोरमंगला, इंदिरानगर, एमजी रोड जैसे इलाकों में कई पब  इस पाबंदी की धज्जिया उड़ाते मिल जाएंगे। खासतौर पर पश्चिमी  और मध्य बंगलुरू के बार और पबों में। कायरा रेस्तरा बार के निदेशक नवनीत कहते हैं उनके यहां शुक्रवार, शनिवार और रविवार को रात साढ़े आठ बजे से लाईव बैंड का लुत्फ लिया जा सकता है। इस दौरान उनके यहां शराब भी परोसी जाती है। शराब परोसी जानेवाली सार्वजनिक जगहों पर लाईव बैंड के कार्यक्रम पर पाबंदी की बात करने पर वो कहते हैं मेरी जानकारी में ऐसा केवल महिलाओं के शमिल होने और कार्यक्रम शालीन नहीं होने पर है। जहां तक मैं जानता हूँ केवल कायरा ही नहीं बल्कि लीजेंड ऑफ़ रॉक,  टेक फाईव, बी फ्लैट, फिलिंग स्टेशन,एक्सट्रीम स्पोर्टस बार, कासा डेल सोल जैसे और कई बार हैं जहां लाईव बैंड के कार्यक्रम होते हैं। इसके लिए कोई कोई विशेष अनुमति लेने की बात से भी इनकार किया उन्होनें। नवनीत ने तो यहां तक कहा कि उनके रेस्तरां में आयोजित मोहम्मद रफी नाईट में बंगलूरू के एसीपी मुरली ने भी अपना कार्यक्रम पेश किया था। और इनके यहां अच्छी खासी संख्या में लोग इनक कार्यक्रमों का लुत्फ उठाने आते हैं। सेंट मार्क रोड स्थित हार्ड रॉक कैफे बार में भी गुरूवार को लाईव बैंड का कार्यक्रम होता है। बार के मैनेजर ने बताया कि स्थानीय लाईव बैंड्स जिनमें लड़कियों का गाना और डांस होता है उनपर रोक है पर हमारे बार में फोकस केवल संगीत हैं और दिल्ली, उत्तर-पूर्व भारत के बैंड यहां हर सप्ताह अपने कार्यक्रम पश  करते हैं बंगलुरू में सिर्फ हार्ड रॉक ही नहीं कई और बार हैं जहां लाईव म्यूजिक बैंड्स कार्यक्रम पेश  करते हैं। ओर इसके लिए बंगलुरू पुलिस से विशेष  अनुमति हासिल करने की बात भी कहते हैं यही बात ला रॉक  कैफे के मैनेजर भी दोहराते हैं जहां हर रविवार को लाईव बैंड संगीत कार्यक्रम पेश  करता है। फिलहाल यहां 150 से ज्यादा बार हैं जिनमें  लाईव बैंड्स की परंपरा रही है, एम जी रोड स्थित आईस बार, कोकुन, रेस्टो बार, नेवादा पब, ब्लू तंत्रा, ओन  द रॉक्स  और अनलॉक  बार जैसे तमाम बार हैं जहां अभी भी लाईव बैंड सक्रिय है।
तस्वीर का दूसरा पहलू लाईव बैंड पर पाबंदी से बेरोजगार हुईं बारबालाओं की जिंदगी है। एक अनुमान के मुताबिक इस पाबंदी के बाद बार में काम करने वाली लगभग पैंतालीस हजार महिलाओं को जीविका के लिए देह-व्यापार अपनाना पड़ा है। महिलाओं के अधिकार और उनके खिलाफ हिंसा के लिए लड़ने वाली स्वयंसेवी संस्था विमोचना की शकुन कहती हैं लाईव बैंड पर रोक का सबसे बड़ा असर यही हुआ है कि सेक्स-वर्करों की संख्या में और इजाफा हो गया है। मुंबई में बार में महिलाओं के काम करने पर रोक लगने का तुरंत असर बंगलुरू पर हुआ था, मुंबई  से बड़ी संख्या में बारबालाएं यहां काम करने आयीं पर यहां भी रोक लग गयी। हमने उन महिलाओं के पुर्नवास की कोशिश  की जो हमारे पास मदद के लिए आयीं। इनमें ज्यादा संख्या नेपाल, बांग्लादेश  और उत्तर-पूर्व की लड़कियों की हैं,जिन्हें बारटेंडर की नौकरी मिली वो काम कर रही हैं। स्थानीय लड़कियां कर्नाटक के ही छोटे-छोटे शहरों में देह-व्यापार कर अपना गुजारा कर रही हैं। गौर करने वाली बात है कि बार और पबों में लाईव बैंड्स पर पाबंदी लग जाने के बाद ई-ब्रोथल और मसाज पार्लरों की संख्या यकायक काफी बढ़ गई। ज्यादातर बारबाला, बारटेंडर के ही रूप में काम करना चाहती हैं क्योंकि एक नई बारटेंडर को बीस से पैंतीस हजार तक तनख्वाह मिल जाती है, सेलीब्रिटी बारटेंडर की आय पचास हजार से उपर होती है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि बंगलरू के पीपुल्स एजुकेशन  सोसाईटी, इंस्टीट्यूट ऑफ़  होटल मैनेजमेंट और क्राईस्ट कालेज में बारटेंडिंग एक कोर्स के तौर पर पढ़ाया जाता है। और काफी संख्या में लड़कियां इस कोर्स के तहत प्रशिक्षण भी ले रही हैं। अनुमानतः राज्य में साठ -सत्तर हजार से भी ज्यादा बार हैं, जाहिर है लड़कियों के लिए ये बड़ी संख्या में रोजगार का जरिया हो सकते हैं। मुंबई की ही तरह जहां अस्सी के दशक से बार और पबों में महिलाएं डांसर और बारटेंडर के तौर पर काम कर रही हैं बंगलूरू में भी महिलाएं अस्सी के दशक से ही बार और पबों में काम कर रही हैं। अस्सी के दौरान कैबरे का चलन था और नब्बे के दशक में लाईव बैंड्स मशहूर हुए। ये भी गौर करने वाली बात है कि इन डांस बार में काम करने वाली लड़कियों को अपने काम को लेकर कोई परेशानी नहीं है, बारमालिक उन्हें आईटी और बीपीओ क्षेत्र में काम करने वाली लड़कियों की तरह ही पूरी सुरक्षा मुहैया कराते हैं। और सबसे बड़ी बात डांस के कारण वो खुद को देह-व्यापार से बचा लेती हैं। लेकिन प्रशाशन  का रवैया जरूर उन्हें खलता है। जबकि चाहने पर भी उनके पास कोई विकल्प नहीं है। इसमें कुछ दोष सामाजिक सोच का भी है। एमजी रोड के बार में काम करने वाली एक बारबाला बताती है,  हमलोगों ने कुछ दूकानों में सेल्सगर्ल की नौकरी मांगी पर हमें अपमानित कर भगा दिया गया।  यही शिकायत कर्नाटक बार और रेस्तरां कामगार महिला कल्याण संघ की ओर से भी है कि बार में महिलाओं के काम करने पर रोक हट जाने के बावजूद पुलिस उन्हें काम नहीं करने देती केवल बड़े रेस्तराओं के डिस्कोथिक में ही महिलाओं को बतौर बारटेंडर आसानी से काम करने देती है। ये सीधे तौर पर बराबरी से काम करने के संवैधनिक अधिकारों की अवहेलना है।
दरअसल, कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही वेलेन्टाईन डे विरोध, बार और पबों में महिलाओं के काम करने पर रोक या पबों में जाने वाली महिलाओं पर मंगलोर में श्री राम सेने के कार्यकर्ताओं द्वारा हमला किए जाने जैसी घटनाओं को कुछ लोग भाजपा के  सांस्कृतिक शुद्धिकरण  के जबरन प्रयासों  के तौर पर भी देखते हैं। प्रसिद्ध थर्मल एंड ए क्वाटर लाईव बैंड  के जाने-माने सदस्य ब्रुस ली मनी तो इसे सांस्कृतिक अपराध का नाम देना ज्यादा पसंद करते हैं। इसकी अगली कड़ी शराब पर पूणतया रोक लगाने की मांग हैं लेकिन दस हजार करोड़ से ज्यादा राजस्व देने वाली शराब पर सचमुच पाबंदी लगाना और बात है। यही नहीं 2010 जुलाई में बंगलुरू सिटी पुलिस ने बारों और पबों के लिए आचार-संहिता जैसी एक निर्देशिका भी बनायी, जिसका पालन करना सभी बारमालिकों के लिए अनिवार्य है। आचार-संहिता के तहत महिलाओं के लिए शालीन कपड़े व एक जैसी वर्दी पहनना अनिवार्य है। बार मालिकों को महिला कर्मचारियों को नौकरी पर रखने के बाद पुलिस को उनकी तस्वीर के साथ पूरा विवरण भी देना होगा। किसी नयी महिला कर्मचारी को रखने या उसके नौकरी छोड़ने पर भी पुलिस को सूचना देनी होगी। साथ ही महिलाओं की संख्या बार की कुल सीट-संख्या की एक चैथाई ही होनी चाहिए। इस निर्देशिका  में अच्छी बात ये भी है कि बारमालिकों के लिए श्रम कानून का पालन भी अनिवार्य है मसलन, उन्हें महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी, स्वास्थ्य सुविधा और प्रोविडेंट  फंड सभी कुछ देना होगा। इसलिए ड्रेस कोड पर लगभग सभी की सहमति है। कर्नाटक महिला कामगार संघ ने भी इसका विरोध नहीं किया।
कानूनन लाईव बैंड पुलिस के द्वारा वैध लाईसेंस जारी किए बिना नहीं चलने चाहिए पर बावजूद इसके, हकीकत में लगभग सौ बार ऐसे हैं जहां अभी भी गैरकानूनी तौर-तरीके से लड़कियों से बारबाला के अतिरिक्त मेहमानों का मनोरंजन करने का भी काम लिया जा रहा है। ड्रेस कोड का पालन नहीं किया जाता और सीसीटीवी भी पुलिस के कहने के बावजूद नहीं लगाया गया है। जिसके लिए पुलिस अफसरों को मोटी रिश्वत खिलायी जाती है। डिस्कोथिक के नाम पर भी बारबालाओं से डांस कराया जा रहा है। यानी अगर पाबंदिया हैं तो उसका तोड़ भी हैं पर इसके बीच सचमुच संगीत से प्यार करनेवालों और उसी से अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले लाईव बैंड नाहक मारा जा रहा है।